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बाकला एक ऐसी फसल है जो कि आज भी भारत में अपनेआप को पूरी तरह से स्थापित नहीं कर पाई है. भारत में इस फसल को हकीकत में अनाथ के रूप में जाना जाता है और यह फसल अभी भी उपेक्षा की शिकार है.
दुनियाभर में उगाई जाने वाली तमाम दलहनी फसलों में सोयाबीन और मटर के बाद बाकला का स्थान है. बाकला का इस्तेमाल न केवल अनाज के रूप में होता है बल्कि इस में औषधीय गुण भी हैं. बाकला से ज्यादा उत्पादन कूवत किसी भी दलहनी फसल में नहीं पाई गई है.
बाकला सूखे को तो सहन कर ही लेता है साथ ही कुछ समय के लिए पानी को भी सहन कर लेता है और कुछ सीमा तक अम्लीय मिट्टी में भी उगाया जा सकता है. इस के पौधे में बढ़ने की अच्छी कूवत पाई जाती है.
कम समय में तैयार होती फसल
इस की फसल के पकने यानी तैयार होने की अवधि भी मटर के बाद सब से कम है. शुष्क खेती में 105 से 107 दिनों व सिंचित अवस्था में 115 दिनों में फसल तैयार हो जाती है. चूंकि इस पर पाले का असर नहीं होता, इसलिए किसी खास सावधानी की जरूरत नहीं है.
बाकला द्वारा हर साल प्रति हेक्टेयर 150-300 किलोग्राम नाइट्रोजन इकट्ठा होती है, जो 3 सौ से 6 सौ किलोग्राम से भी ज्यादा यूरिया के बराबर है.
खेत की तैयारी
यह हर तरह की जमीन में उगाया जा सकता है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी में इस की पैदावार अच्छी होती है. खेत को 1-2 जुताई कर के तैयार करना चाहिए. जुताई के बाद पाटा जरूर लगाएं, जिस से ढेले फूट जाएं और जमीन समतल हो जाए.
बोआई का समय
अगेती बोआई करने पर इस की बढ़वार अच्छी होती है. इस की बोआई धान की सीधी बोआई में जूनजुलाई में भी उतेरा के रूप में की जाती है. सामान्य बोआई नवंबर व दिसंबर महीने में होती है. इसे 15 दिसंबर तक बो देना चाहिए. इस को खेत की मेंड़ पर डिबलिंग कर के भी लगा सकते हैं.
बाकला की फसल को मसूर, आलू, मक्का व गन्ना के बीच अंतरवर्ती फसल के रूप में ले सकते हैं.
वैरायटी :
केंद्रीय प्रजाति नामांकन समिति ने आज तक मात्र 2 किस्मों को ही अधिसूचित किया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पटना द्वारा इस की 2 प्रजातियां तैयार की गई हैं:
विक्रांत (वीएच-82-1) : हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार ने इस किस्म को तैयार किया है. इस की औसत बीज उपज पहाड़ों पर 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि मैदानों में 15-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. विक्रांत 130-140 दिनों की फसल है.
पूसा सुमित : इस किस्म को आईएआरआई, नई दिल्ली पूसा ने तैयार किया है. पौधे 75 सेंटीमीटर लंबे होते हैं और पौधे में करीब 10 शाखाएं होती हैं. एक पौधे में सौ फलियां तक लगती हैं.
हरी फली की औसत उपज कूवत 180 क्विंटल है. आमतौर पर हरी फलियां बोआई के बाद 65 से 75 दिनों के बाद आनी शुरू हो जाती हैं.
2011215 : इस प्रजाति का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पटना में एकल पौध चयन तकनीक को अपना कर किया गया है. यह सिंचित व असिंचित दशा के लिए साल 2012 में जारी की गई है. इस की फसल 115-120 दिनों की होती है.
2011410 : इस प्रजाति को भी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने एकल पौध चयन तकनीक से तैयार किया है. यह केवल सिंचित दशा के लिए ही है. पौधे का आकार झाड़ीनुमा होता है.
पहली फली जमीन से 7.5 सेंटीमीटर ऊंचाई पर ही आ जाती है. पैदावार सिंचित अवस्था में 50-60 क्विंटल और फसल 120-125 दिनों की होती है.
बीज दर : बोआई हमेशा लाइन में करें. लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर रखें. बीज 6-7 सेंटीमीटर गहरा बोएं. एक हेक्टेयर के लिए 75-80 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.
बोआई से पहले बीज की 10 किलोग्राम मात्रा का 15 ग्राम थीरम और 5 ग्राम बाविस्टीन के पानी में बनाए घोल से उपचार करने से बीमारियों से बचाव हो जाता है. बीज उपचार करने के बाद छाया में सुखा लें. एक दिन बाद राइजोबियम कल्चर से इस को उपचारित करें. उपचार के लिए 5 पैकेट यानी 5 सौ ग्राम कल्चर प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें. डेढ़ लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ घोल कर उसे धीमी आंच पर 25 मिनट तक पकाएं. घोल को ठंडा होने पर उस में कल्चर डाल दें.
प्लास्टिक की चादर या सीमेंट के फर्श पर इस मिश्रण को बीज के ढेर पर चारों तरफ थोड़ाथोड़ा डाल दें, जिस से सारे दोनों पर कल्चर अच्छी तरह लग जाए. इन उपचारित बीजों को 2-3 घंटे छाया में सुखा कर सुबह 11 बजे से पहले या शाम को 3 बजे के बाद बोआई करें.
खाद व उर्वरक
खेत की जुताई के समय ही अगर हो सके तो कंपोस्ट खाद या गोबर की खाद का इस्तेमाल 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 5 किलोग्राम बोरेक्स के साथ करना चाहिए. फसल बोआई के समय ही खेतों के कूंड़ में 45 किलोग्राम यूरिया और 325 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 40 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें.
सिंचाई
वैसे तो बाकला सूखा अवरोधी फसल है, लेकिन 1-2 सिंचाई करने पर पैदावार अच्छी होती है. शुद्ध फसल में एक सिंचाई की जरूरत 45 से 50 दिनों पर फूल लगने से पहले होती है, जिस से दाने अच्छे बनते हैं.
खरपतवार
खरपतवार की समस्या बहुत कम पाई जाती है, फिर भी बोआई के 30-35 दिनों बाद एक गुड़ाई कर दें तो खरपतवार खत्म हो जाते हैं. वासालिन 2 लीटर को बोआई के 2-3 दिनों बाद 1000 लीटर पानी में घोल कर खेतों में छिड़काव करें.
बीमारी व कीट
फफूंद से होने वाली पत्र चित्ती व चूर्ण फफूंद का हमला कई बार देखा गया है. इस के लिए डेढ़ लीटर कैराथेन या 3 किलोग्राम सल्फेक्स को 1000 लीटर पानी में चूर्ण फफूंद के लिए और इंडोफिल का इस्तेमाल अन्य बीमारियों के लिए करना उचित होगा.
कीटों में पत्रछेदक, लाही की रोकथाम के लिए रोगर नामक दवा की 2 लीटर मात्रा का छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए.
अगर यह फसल सब्जी के लिए उगाई गई है, तो जिस समय फलियों में दाने पड़ जाएं, तुड़ाई कर लेनी चाहिए. इस की 100-150 क्विंटल फलियां प्रति हेक्टेयर मिल जाती हैं. जब इस को दाने के लिए उगाया जाता है, तो कटाई करने में सावधानी अपनानी चाहिए. कटाई में देर कर दी जाती है, तो दाना चटक कर गिर जाता है. Pulse Crop





