कैमिकल दवाओं (Chemical Pesticides) से बढ़ रहे जहर की वजह से लाखों लोग हर साल कैंसर, दमा, एलर्जी, हार्टअटैक, माइग्रेन, हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह जैसी भयानक बीमारियों से मर जाते हैं, वहीं करोड़ों बच्चे विकलांगता व अंधेपन के शिकार हो रहे हैं. ऐसा नहीं है कि जहरीली दवाओं के जानलेवा खतरों से बचा नहीं जा सकता, लेकिन इस के लिए ठोस खेती की नीति बनाया जाना बहुत जरूरी है.
भारत में दवाओं के इस्तेमाल संबंधी कोई भी सही दिशानिर्देश नहीं हैं. कोई भी किसान किसी भी पीड़कनाशी का इस्तेमाल कभी भी, कहीं भी और कितनी भी मात्रा में करे, इस पर कोई रोकटोक नहीं है. खेती में हो रहे दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से ये कैमिकल इनसानों और दूसरे जीवों के लिए जानलेवा व घातक साबित हो रहे हैं.
खेती में दवाओं का इस्तेमाल खासतौर से कीटों को मारने और खरपतवार नियंत्रण में किया जाता है. भारत में दवाओं की कुल खपत का 67 फीसदी खेती में, 21 फीसदी घरों में और 12 फीसदी कारखानों में इस्तेमाल होता है.
खतरनाक होती कैमिकल दवाएं
कैमिकल दवाएं सब से ज्यादा खतरनाक होती हैं. इन में हैवीमैटल्स (शीशा, पारा, कैडमियम, आर्सेनिकल्स वगैरह), बैंजीन, फ्लोराइड कंपाउंड्स, रेडियो न्यूक्लाइड्स (डाईऔक्सिंस), फिनोल, इथाइलिन औक्साइड वगैरह जहरीले व हानिकारक तत्त्व पाए जाते हैं.
खेती में दवाओं की इस्तेमाल क्षमता बहुत कम मात्रा यानी 2 से 5 फीसदी होने की वजह से इन का 95 से 98 फीसदी हिस्सा बेकार चला जाता है. इस्तेमाल में लाई गई दवाओं का 25 से 30 फीसदी सिंचाई के साथ रिस कर जमीन के पानी, खेती उत्पादों और वातावरण को गंदा करता है, जबकि बचा हुआ 40 से 65 फीसदी हिस्सा जमीन में जमा हो कर उसे बंजर बना देता है.
इस तरह कैमिकल दवाओं से खाद्य पदार्थ, जमीन का पानी, वातावरण और खेती लायक जमीन सभी तेजी से खराब हो रहे हैं. खेती का खास इलाका (फूड बास्कैट) कहा जाने वाला पंजाब सब से ज्यादा दवाओं के इस्तेमाल की वजह से कैंसर का खास अड्डा बन गया है.
रासायनिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल किए जाने से खाद्य पदार्थों में हानिकारक तत्त्वों की मात्रा सरकार द्वारा स्वीकृत मात्रा से बहुत ज्यादा हो चुकी है.
खाद्य पदार्थों में जरूरत से ज्यादा मौजूद सीसा हाई ब्लड प्रेशर, दिमाग की कमजोरी, आदमियों व औरतों की प्रजनन कूवत में कमी, क्रोमियम से किडनी व लिवर की खराबी, खून में लाल रक्त कणिकाओं का कम होना, हाल ही में पैदा हुए बच्चों में जन्मजात विकलांगता, महावारी में खून निकलने की अधिकता, आर्सेनिकल्स से मधुमेह, डायरिया व निकल्स से विकसित भ्रूण में खराबी, विभिन्न तरह के कैंसर, पारे से बुखार, डायरिया और बेंजीन से डीएनए व गुण सूत्रों के खत्म होने और बोनमेरो खराब होने का खतरा पैदा होता है.
बरतें सावधानी
सब्जियों में चमक लाने के लिए कापर सल्फेट और फल पकाने के लिए कैल्सियम कार्बाइड का इस्तेमाल किया जाता है, जो आंखों के साथ साथ खाल में जलन और खून में मिल कर किडनी व लीवर को नुकसान पहुंचाता है.
इस की खून में बढ़ोतरी होने से पेशाब लाल हो जाता है. इस से शरीर में हार्मोंस का संतुलन बिगड़ जाता है. नतीजतन, बुढ़ापा समय से पहले आने लगता है.
डेरी उद्योग में ज्यादातर लोग गाय व भैंस को औक्सीटोसिन का इंजैक्शन लगाते हैं, जिस का जहर दूध में आ जाती है. ऐसा दूध पीने से लड़कियों में परिपक्वता शीघ्र आ जाती है और आदमियों में प्रजनन क्षमता में कमी के साथसाथ दिमाग से जुड़ी परेशानियां बढ़ जाती हैं.
तरबूज व ऐसे दूसरे फलों को मीठा करने के लिए सैकरीन का इंजैक्शन लगाया जाता है. ऐसे तरबूज खाने से डायरिया, खाल और सांस से जुड़ी परेशानियां बढ़ जाती हैं. अदरक को हाइड्रोक्लोरिक एसिड से धोया जाता है. अदरक में एसिड की मौजूदगी से किडनी में पथरी का खतरा बढ़ जाता है, लीवर खराब हो जाता है और पेट में जलन होने लगती है.
कैमिकल दवाओं के नुकसान से यों तो कोई भी अनजान नहीं है, फिर भी केंद्र या राज्य सरकारों ने इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं.
जहरीली दवाओं से बचने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने की सिफारिश की है, लेकिन दूसरी ओर उन्हीं कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि देश में पूरी तरह जैविक खेती अपनाई गई, तो देश का खाद्यान्न उत्पादन घट जाएगा और भूखे मरने की नौबत आ जाएगी. इसी डर से पिछले सालों में जैविक खेती को बढ़ावा देने की कोशिशें कामयाब नहीं हो पाई हैं.





