बदलते समय के साथ खेती में भी नए प्रयोग हो रहे हैं. किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ ऐसी फसलों की तरफ भी बढ़ रहे हैं, जिन में कम जगह में बेहतर आमदनी की संभावना हो. मशरूम की खेती (Mushroom Farming) भी इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. बटन और औयस्टर मशरूम के बाद अब लायंस मेन मशरूम किसानों और बाजार का ध्यान खींच रहा है.
देखने में यह आम मशरूम से बिलकुल अलग होता है. सफेद रंग के लंबे और घने बालों की वजह से यह कुछकुछ शेर की अयाल जैसा दिखाई देता है. यही वजह है कि इसे लायंस मेन यानी शेर की अयाल वाला मशरूम कहा जाता है.
लायंस मेन मशरूम केवल अपने अलग रूप की वजह से ही खास नहीं है. इस की खेती कम जगह में नियंत्रित वातावरण में की जा सकती है और बाजार में इस की मांग बढ़ने की संभावनाएं भी देखी जा रही हैं. खास बात यह है कि किसान इस के उत्पादन के साथसाथ इस की पैकिंग, सुखाने और पाउडर जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कर के अपनी आमदनी बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ सकते हैं.
अलग है लायंस मेन
इस का वैज्ञानिक नाम हेरिसियम एरिनेसियस है. यह बटन या औयस्टर मशरूम की तरह दिखाई नहीं देता है. इस के नीचे की तरफ दांत जैसी महीन संरचनाएं होती हैं और इसी वजह से इस का रूप काफी अलग नजर आता है. इस के बीजाणु भी इन्हीं संरचनाओं से निकलते हैं.
लायंस मेन मशरूम का आकार अच्छाखासा हो सकता है और अनुकूल परिस्थितियों में इस का वजन करीब आधा किलोग्राम तक पहुंच सकता है. इस का अनोखा रूप ही बाजार में इसे दूसरे मशरूम से अलग पहचान देता है.
क्यों खास है यह मशरूम
लायंस मेन मशरूम की सब से बड़ी खासीयत इस की अलग बनावट, पोषण संबंधी महत्व और इस के औषधीय उपयोग को ले कर बढ़ती दिलचस्पी है. इसे कई जगह ‘ब्रेन बूस्टर मशरूम’ के नाम से भी जाना जाता है. इस में पाए जाने वाले कुछ तत्वों को ले कर याददाश्त और तंत्रिका तंत्र यानी नसों से जुड़े संभावित लाभों पर शोध किया जा रहा है.
वर्तमान में याददाश्त, नसों और मस्तिष्क से जुड़े इस के संभावित फायदों को ले कर वैज्ञानिक अध्ययन जारी हैं. चिंता, अवसाद, अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी स्थितियों में इस के संभावित लाभों पर भी शोध किया जा रहा है.
यही वजह है कि यह मशरूम किसानों के लिए केवल कमाई का जरीया ही नहीं, बल्कि पोषण और खाद्य क्षेत्र में भी दिलचस्पी का विषय बन रहा है. भारत में अभी इस की खेती और खपत बटन और औयस्टर मशरूम की तुलना में कम है, लेकिन बाजार की संभावनाओं को देखते हुए किसानों की इस में रुचि बढ़ रही है.
कम जमीन में शुरू हो सकती है खेती
लायंस मेन मशरूम की खेती की सब से बड़ी खासीयत यह है कि इस के लिए खेत में ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं पड़ती. इसकी खेती पौलीप्रोपाइलीन यानी प्लास्टिक के थैलों में की जा सकती है. इस वजह से कम जमीन वाले किसान भी नियंत्रित वातावरण में इस की खेती शुरू करने के बारे में सोच सकते हैं.
इस की खेती के लिए सामान्यतौर पर चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों के बुरादे का इस्तेमाल किया जाता है.
तैयार किए जाने वाले माध्यम में करीब 80 फीसदी लकड़ी का बुरादा, 20 फीसदी गेहूं का चोकर और तकरीबन एक फीसदी चूना मिलाया जाता है. इस में पानी मिला कर मिश्रण को अच्छी तरह तैयार किया जाता है.
इस के बाद इस मिश्रण को थैलों में भर कर आटोक्लेव मशीन की मदद से कीटाणुरहित किया जाता है. माध्यम ठंडा होने के बाद इस में स्पौन मिलाया जाता है. इस के बाद थैलों को ऐसी जगह रखा जाता है जहां तापमान, नमी और स्वच्छता का सही तरीके से ध्यान रखा जा सके.
मशरूम की खेती को केवल थैला भर कर रख देने का काम समझना ठीक नहीं होगा. इस में तापमान, नमी, स्वच्छता और समय का लगातार ध्यान रखना पड़ता है. थोड़ी सी लापरवाही भी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है.
40–50 दिन में तैयार होता है कवक जाल
स्पौन मिलाने के बाद तैयार थैलों को लगभग 23–25 डिगरी सैल्सियस तापमान पर रखा जाता है. तकरीबन 40–50 दिनों में कवक जाल यानी माइसीलियम पूरे माध्यम में फैलने लगता है. इस के बाद फलन की प्रक्रिया शुरू होती है.
जब छोटेछोटे मशरूम दिखाई देने लगते हैं तो थैलों को खोल दिया जाता है. फलन के समय तापमान को लगभग 18–22 डिगरी सैल्सियस और कमरे में 80–85 फीसदी नमी बनाए रखने की जरूरत होती है. इस के लिए नमी के स्तर की नियमित निगरानी जरूरी होती है.
लायंस मेन मशरूम को बहुत ज्यादा रोशनी की जरूरत नहीं होती. जब इस के सफेद बाल नीचे की तरफ लटकने लगते हैं तो इसे कटाई के लिए तैयार माना जाता है यानी स्पौन डालने के बाद किसान को तकरीबन डेढ़ से 2 महीने तक पूरे उत्पादन चक्र पर नजर रखनी पड़ती है. सामान्यतौर पर स्पौन से पहली कटाई तक तकरीबन 45–60 दिन का समय लग सकता है.
8 से 10 हजार रुपए किलो तक पहुंच सकता है भाव
किसानों के लिए लाभ के नजरिए से लायंस मेन मशरूम को संभावनाओं वाली फसल माना जा रहा है. हालांकि इस की कीमत जगह, गुणवत्ता, मौसम, बाजार और बिक्री के तरीके के हिसाब से बदल सकती है. कई बाजारों में इस की कीमत 8 से 10 हजार रुपए प्रति किलो तक बताई जाती है खासकर जब इसे अच्छी गुणवत्ता और मूल्यवर्धित उत्पाद के रूप में बेचा जाए.
किसान अगर केवल ताजा मशरूम बेचने तक सीमित न रहें और इस की सफाई, पैकिंग, सुखाने या पाउडर जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करें तो कारोबार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं. सूखे मशरूम और पाउडर के अलावा इस से दूसरे खाद्य उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं. इस तरह मशरूम की खेती के साथ प्रसंस्करण और पैकेजिंग को जोड़ कर किसान अपनी कमाई के नए रास्ते बना सकते हैं.
लायंस मेन मशरूम की खेती (Mushroom Farming) अभी भारत में शुरुआती दौर में है, लेकिन बदलती खाद्य पसंद, सेहत और पोषण को लेकर बढ़ती जागरूकता और बाजार में नए उत्पादों की मांग इसे आने वाले समय की संभावनाओं वाली मशरूम किस्म बना सकती है. किसानों के लिए जरूरी है कि बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू करने से पहले स्थानीय बाजार, खरीदार, उत्पादन तकनीक और लागत की अच्छी तरह जानकारी लें. सही तकनीक और बाजार की समझ के साथ यह कम जमीन वाले किसानों के लिए आमदनी का एक नया जरीया बन सकता है.





