Barnava Chakbandi-

जिस बरनावा को महाभारत में लाक्षागृह के नाम से जाना जाता है, जहां पांडवों ने 1 साल तक अज्ञातवास जैसा संघर्ष झेला था, उसी बरनावा, बागपत, उत्तर प्रदेश के किसानों ने जमीन के लिए 45 साल का अज्ञातवास झेला है. 1981 में शुरू हुई चकबंदी अब जा कर महाभारत की तरह ही अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंची है.

बन गया इतिहास

बरनावा गांव बागपत में है और महाभारत काल का माना जाता है. यहीं कौरवों ने पांडवों को जलाने के लिए लाख का महल बनवाया था. 5 हजार साल बाद इसी ऐतिहासिक जमीन पर किसानों की अपनी जमीन की लड़ाई 45 साल चली. अब जा कर अंतिम अभिलेख तैयार हो रहा है.

45 साल का वनवास क्यों?

इस कहानी की शुरुआत 1981 में गांव की 3,075 एकड़ जमीन पर 1900 किसानों की बिखरी जमीनों को एक जगह करने के लिए चकबंदी शुरू हुई.

चक बिगड़े, विवाद बढ़े

-जमीन का चक काटने के बाद किसी की जमीन कम हो गई, किसी की ज्यादा. कब्जे भी नहीं मिले.

-कोर्टकचहरी का चक्कर. कोर्ट में 450 से ज्यादा मुकदमे चले.

-हाईकोर्ट तक गए किसान. जब 30 साल तक कुछ नहीं हुआ तो किसान हाईकोर्ट पहुंचे. 2015 में हाईकोर्ट ने चकबंदी पूरी करने का आदेश दिया, पर अधिकारी हर 2 महीने में शपथ पत्र देकर तारीख मांगते रहे.

इस बीच कई बुजुर्ग किसान अपने चक का इंतजार करतेकरते ही चल बसे. बड़ौत औफिस में 45 साल पुराने रजिस्टर आज भी उसी इंतजार की कहानी सुना रहे हैं.

अब जा कर मिलेगा ‘राजतिलक’

जैसे पांडवों का वनवास खत्म होने के बाद राज मिला था, वैसे ही अब बरनावा के किसानों का इंतजार खत्म हो रहा है. प्रदेश के चकबंदी आयुक्त के अभियान के तहत बरनावा की चकबंदी को धारा 52(1) के तहत समापन की ओर ले जाया जा रहा है.

अंतिम नक्शा और खतौनी बनते ही किसानों को पक्का मालिकाना हक मिलेगा, बैंक से लोन मिलेगा और जमीन की खरीदबिक्री का डर खत्म होगा.

चकबंदी का क्या है मकसद

चकबंदी का मकसद किसानों का भला करना होता है ताकि टुकड़ों में बंटी जमीन एक जगह आ जाए और ट्रैक्टर, सिंचाई आसान हो. लेकिन जब यह प्रक्रिया ही 45 साल खिंच जाए तो फायदे की जगह यह सजा बन जाती है. बरनावा की कहानी पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश के लिए सबक है. Barnava Chakbandi

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