आदर्श पोषण वाटिका से स्वच्छ और संतुलित आहार

उस वाटिका को ‘पोषण वाटिका’ या ‘रसोईघर बाग’ या ‘गृहवाटिका’ कहा जाता है जो घर के अगलबगल में या घर के आंगन में ऐसी खुली जगह, जहां पारिवारिक श्रम से परिवार के इस्तेमाल के लिए विभिन्न मौसम में मौसमी फल और विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जाती हैं.

पोषण वाटिका का मुख्य मकसद ही रसोईघर का पानी व कूड़ाकरकट को पारिवारिक श्रम से उपयोग कर, घर की फल व सागसब्जियों की दैनिक जरूरतों की पूरा करने या आंशिक रूप से भरपाई करने की कोशिश करना व दैनिक आहार में उपयोग होने वाली सब्जी व फल शुद्ध, ताजा और जैविक उत्पाद रोजाना हासिल करना होता है.

आजकल बाजार में बिकने वाली ज्यादातर चमकदार फल और सागसब्जियों को रासायनिक उर्वरक का प्रयोग कर उगाया जाता है. इन फसल सुरक्षा पर तरहतरह के रसायनों का इस्तेमाल खरपतवार पर नियंत्रण, कीड़े और बीमारी को रोकने के लिए किया जाता है, परंतु इन रासायनिक दवाओं का कुछ अंश फल और सागसब्जी में बाद तक भी बना रहता है.

इस के चलते इन्हें इस्तेमाल करने वालों में बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम होती जा रही है और आम आदमी तरहतरह की बीमारियों से ग्रसित होता जा रहा है.

इस के अलावा फल और सागसब्जियों के स्वाद में भी काफी अंतर देखने को मिल जाता है, इसलिए हमें अपने घर के आंगन या आसपास की खाली खुली जगह में छोटीछोटी क्यारियां बना कर जैविक खादों का इस्तेमाल कर के रसायनरहित फल और सागसब्जियों का उत्पादन करना चाहिए.

जगह का चुनाव

इस के लिए जगह चुनने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती, क्योंकि ज्यादातर यह जगह घर के पीछे या आसपास ही होती है. घर से मिले होने के कारण थोड़ा कम समय मिलने पर भी काम करने में सुविधा रहती है.

गृहवाटिका के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए, जहां पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सके, जैसे नलकूप या कुएं का पानी, स्नान का पानी, रसोईघर का पानी आदि पोषण वाटिका तक पहुंच सके.

जगह खुली हो, जिस में सूरज की रोशनी मिल सके. ऐसी जगह, जो जानवरों से सुरक्षित हो और उस जगह की मिट्टी उपजाऊ हो, ऐसी जगह का चुनाव पोषण वाटिका के लिए करना चाहिए.

पोषण वाटिका का आकार

जहां तक पोषण वाटिका के आकार का संबंध है, वह जमीन की उपलब्धता, परिवार के सदस्यों की तादाद और समय की उपलब्धता पर निर्भर होता है.

लगातार फसल चक्र अपनाने, सघन बागबानी और अंत:फसल खेती को अपनाते हुए एक औसत परिवार, जिस में एक औरत, एक मर्द व 3 बच्चे यानी कुल 5 सदस्य हैं, ऐसे परिवार के लिए औसतन 25×10 वर्गमीटर जमीन काफी है. इसी से ज्यादा पैदावार ले कर पूरे साल अपने परिवार के लिए फल व सब्जियां हासिल की जा सकती हैं.

लेआउट करें तैयार

एक आदर्श पोषण वाटिका के लिए उत्तरी भारत खासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा व दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध तकरीबन 250 वर्गमीटर क्षेत्र में बहुवर्षीय पौधों को वाटिका के किसी एक तरफ  लगाना चाहिए, जिस से कि इन पौधों की दूसरे पौधों पर छाया न पड़ सके और साथ ही, एकवर्षीय सब्जियों के फसल चक्र व उन के पोषक तत्त्वों की मात्रा में बाधा न डाल सके. पूरे क्षेत्र को 8-10 वर्गमीटर की 15 क्यारियों में बांट लें.

* वाटिका के चारों तरफ बाड़ का इस्तेमाल करना चाहिए, जिस में 3 तरफ  गरमी और बरसात के समय कद्दूवर्गीय पौधों को चढ़ाना चाहिए और बची हुई चौथी तरफ सेम लगानी चाहिए.

* फसल चक्र, सघन फसल पद्धति और अंत:सस्य फसलों के उगाने के सिद्धांत को अपनाना चाहिए.

* 2 क्यारियों के बीच की मेंड़ों पर जड़ों वाली सब्जियों को उगाना चाहिए.

* रास्ते के एक तरफ  टमाटर व दूसरी तरफ चौलाई या दूसरी पत्ती वाली सब्जी उगानी चाहिए.

* वाटिका के 2 कोनों पर खाद के गड्ढे होने चाहिए, जिन में से एक तरफ वर्मी कंपोस्ट यूनिट व दूसरी ओर कंपोस्ट खाद का गड्ढा हो, जिस में घर का कूड़ाकरकट और फसल अवशेष डाल कर खाद तैयार कर सकें.

* इन गड्ढ़ों के ऊपर छाया के लिए सेम आदि की बेल चढ़ा कर छाया बनाए रखें. इस से पोषक तत्त्वों का नुकसान भी कम होगा व गड्ढा भी छिपा रहेगा.

पोषण वाटिका के फायदे

* जैविक उत्पाद (रसायनरहित) होने के कारण फल और सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में पौषक तत्व मौजूद रहते हैं.

* बाजार में फल और सब्जियों की कीमत ज्यादा होती है, जिसे न खरीदने से लगाई गई पूंजी में कमी होती है.

* परिवार के लिए ताजा फलसब्जियां मिलती रहती हैं.

* उपलब्ध सब्जियां बाजार के बजाय अच्छे गुणों वाली होती हैं.

* गृहवाटिका लगा कर औरतें परिवार की माली हालत को मजबूत बना सकती हैं.

* पोषण वाटिका से मिलने वाले मौसमी फल व सब्जियों को परिरक्षित कर सालभर तक उपयोग किया जा सकता है.

* यह मनोरंजन व कसरत का भी एक अच्छा साधन है.

* बच्चों के लिए ट्रेनिंग का यह एक अच्छा साधन भी है.

* मनोवैज्ञानिक नजरिए से खुद के द्वारा उगाई गई फलसब्जियां, बाजार के मुकाबले ज्यादा स्वादिष्ठ लगती हैं.

Home Gardenफसल की व्यवस्था

पोषण वाटिका में बोआई करने से पहले योजना बना लेनी चाहिए, ताकि पूरे साल फल व सब्जियां मिलती रहें. इस में निम्न बातों का उल्लेख होना चाहिए :

* क्यारियों की स्थिति.

* उगाई जाने वाली फसल का नाम और प्रजाति.

* बोआई का समय.

* अंत:फसल का नाम और प्रजाति.

* बोनसाई तकनीक का इस्तेमाल.

* इन के अलावा दूसरी सब्जियों को भी जरूरत के मुताबिक उगा सकते हैं.

* मेंड़ों पर मूली, गाजर, शलजम, चुकंदर, बाकला, धनिया, पोदीना, प्याज, हरा साग जैसी सब्जियां लगानी चाहिए.

* बेल वाली सब्जियां जैसे लौकी, तोरई, छप्पनकद्दू, परवल, करेला, सीताफल आदि को बाड़ के रूप में किनारों पर ही लगानी चाहिए.

* वाटिका में फल वाले पौधों जैसे पपीता, अनार, नीबू, करौंदा, केला, अंगूर, अमरूद आदि के पौधों को सघन विधि से इस तरह किनारे की तरफ  लगाएं, जिस से कि सब्जियों पर छाया या पोषक तत्त्वों के लिए होड़ न हो.

* इस फसल चक्र में कुछ यूरोपियन सब्जियां भी रखी गई हैं, जो अधिक पोषणयुक्त और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं.

* पोषण वाटिका को और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए उस में कुछ सजावटी पौधे भी लगाए जा सकते हैं.

पोषण वाटिका में फसल चक्र अपनाने से ज्यादा फलसब्जियां

प्लाट नं. : सब्जियों व फल का नाम

प्लाट नं. 1 : आलू, लोबिया, अगेती फूलगोभी

प्लाट नं. 2 : पछेती फूलगोभी, लोबिया, लोबिया (वर्षा)

प्लाट नं. 3 : पत्तागोभी, ग्वार फ्रैंच बीन

प्लाट नं. 4 : मटर, भिंडी, टिंडा

प्लाट नं. 5 : फूलगोभी, गोठगोभी (मध्यवर्ती) मूली, प्याज

प्लाट नं. 6 : बैगन के साथ पालक, अंत: फसल के रूप में खीरा

प्लाट नं. 7 : गाजर, भिंडी, खीरा

प्लाट नं. 8 : मटर, टमाटर, अरवी

प्लाट नं. 9 : ब्रोकली, चौलाई, मूंगफली

प्लाट नं. 10 : स्प्राउट ब्रसेल्स बैंगन (लंबे वाले

प्लाट नं. 11 : लीक खीरा, प्याज

प्लाट नं. 12 : लहसुन, मिर्च, शिमला मिर्च

प्लाट नं. 13 : चाइनीज कैवेजलैट्रस-प्याज (खरीफ)

प्लाट नं. 14 : अश्वगंधा (सालभर) (शक्तिवर्धक व दर्द निवारक) अंत: फसल लहसुन

प्लाट नं. 15 : पौधशाला के लिए (सालभर)

धान में कंडुआ रोग से बचने पर दें ध्यान

प्रोफैसर रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि पौधे से बाली निकलने के समय धान पर कंडुआ रोग का असर बढ़ने लगता है. इस रोग के कारण धान के उत्पादन पर बुरा असर पड़ने की संभावना बनी रहती है.

धान की बालियों पर होने वाले रोग को आम बोलचाल की भाषा में लेढ़ा रोग, बाली का पीला रोग से किसान जानते हैं. वैसे, अंगरेजी में इस रोग को फाल्स स्मट और हिंदी में मिथ्या कंडुआ रोग के नाम से जाना जाता है.

यह रोग अक्तूबर माह के मध्य से नवंबर माह तक धान की अधिक उपज देने वाली प्रजातियों में आता है. परंतु मौसम में बदलाव के कारण पूर्वांचल के कई जनपदों में अभी से यह रोग बालियों में देखा जा रहा है. जब वातावरण में काफी नमी होती है, तब इस रोग का प्रकोप अधिक होता है. धान की बालियों के निकलने पर इस रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं. रोग ग्रसित धान का चावल खाने पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. प्रभावित दानों के अंदर रोगजनक फफूंद अंडाशय को एक बड़े कटु रूप में बदल देता है, बाद में जैतूनी हरे रंग के हो जाते है.

इस रोग के प्रकोप से दाने कम बनते हैं और उपज में 10 से 25 प्रतिशत की कमी आ जाती है. मिथ्या कंडुआ रोग से बचने के लिए नियमित खेत की निगरानी करते रहें. यूरिया की मात्रा आवश्यकता से अधिक न डालें.

इस के बाद भी खेत में रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत कार्बंडाजिम 50 डब्लूपी 200 ग्राम अथवा प्रोपिकोनाजोल-25 डब्ल्यूपी 200 ग्राम को 200 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने से रोग से नजात मिलेगी. बहुत ज्यादा रोग फैल गया हो, तो रसायन का छिड़काव न करें. कोई फायदा नहीं होगा. रोग वाले बीज को अगली बार प्रयोग न करे.

गेहूं की 5 खास किस्में

गेहूं की खेती में अगर उन्नत किस्मों का चयन किया जाए, तो किसान ज्यादा उत्पादन के साथसाथ ज्यादा मुनाफा भी कमा सकते हैं. किसान इन किस्मों का चयन समय और उत्पादन को ध्यान में रखते हुए कर सकते हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान यानी आईआईडब्ल्यूबीआर, करनाल की मानें, तो गेहूं की ये 5 किस्में सब से नई हैं और इन से उत्पादन भी बंपर होता है.

करण नरेंद्र

यह गेहूं की नई किस्मों में से एक है. इसे डीबीडब्ल्यू-222 भी कहते हैं. गेहूं की यह किस्म बाजार में साल 2019 में आई थी और 25 अक्तूबर से 25 नवंबर के बीच इस की बोवनी कर सकते हैं. इस की रोटी की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है.

दूसरी किस्मों के लिए जहां 5 से 6 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है, पर इस में 4 सिंचाई की ही जरूरत पड़ती है. यह किस्म 143 दिनों में काटने लायक हो जाती है और प्रति हेक्टेयर 65.1 से 82.1 क्विंटल तक पैदावार होती है.

करन वंदना

इस किस्म की सब से खास बात यह होती है कि इस में पीला रतुआ और ब्लास्ट जैसी बीमारियां लगने की संभावना बहुत कम होती है. इस किस्म को डीबीडब्ल्यू-187 भी कहा जाता है.

गेहूं की यह किस्म गंगातटीय इलाकों के लिए अच्छी मानी जाती है. फसल तकरीबन 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म से प्रति हेक्टेयर तकरीबन 75 क्विंटल गेहूं पैदा होता है.

पूसा यशस्वी

गेहूं की इस किस्म की खेती कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए सब से सही मानी जाती है. यह फफूंदी और गलन रोग प्रतिरोधक होती है. इस की बोआई का सही समय 5 नवंबर से 25 नवंबर तक ही माना जाता है. इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 57.5 से 79.60 क्विंटल तक पैदावार होती है.

करण श्रिया

गेहूं की यह किस्म जून, 2021 में आई थी. इस की खेती के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, ?ारखंड, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य ठीक माने जा रहे हैं.

तकरीबन 127 दिनों में पकने वाली किस्म को मात्र एक सिंचाई की जरूरत पड़ती है. प्रति हेक्टेयर अधिकतम पैदावार 55 क्विंटल है.

डीडीडब्ल्यू-47

गेहूं की इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा सब से ज्यादा तकरीबन 12.69 फीसदी होती है. इस के पौधे कई तरह के रोगों से लड़ने में सक्षम होते हैं. कीट और रोगों से खुद की सुरक्षा करने में यह किस्म सक्षम है. प्रति हेक्टेयर उत्पादन तकरीबन 74 क्विंटल है.

कृषि से जुड़ी काम की बातें

धान की नर्सरी

* धान की नर्सरी डालने के लिए खेत की तैयारी करें. साथ ही, उन्नतशील किस्मों में नरेंद्र धान-359, नरेंद्र धान-2026, नरेंद्र धान-2064, नरेंद्र धान-2065, नरेंद्र धान-3112, सरजू-52, सीता आदि हैं और संकर किस्मों में एराइज-6444, प्रो. एग्रो-6201, पीएचबी-71, पायनियर-27 पी 31, 27 पी 37, 28 पी 67, आरआरएक्स-113, कावेरी-468, केआरएच-2, यूएस-312, आरएच-312, आरएच-1531 आदि हैं और सुगंधित धान की किस्म-टाइप-3, पूसा बासमती-1, मालवीय सुगंध-105, मालवीय सुगंध-3-4, नरेंद्र सुगंध एवं सीएलआर-10 आदि में से किसी एक किस्म के बीजों एवं खाद की व्यवस्था कर नर्सरी डालें.

* धान के बीजों की नर्सरी डालने के 15 दिन पूर्व खेत में हलकी सिंचाई करें, ताकि खेत में निकलने वाले खरपतवार खेत तैयार करते समय नष्ट हो जाएं.

अरहर

* अरहर की बोआई के लिए खेत को तैयार करें. बीज किसी प्रमाणित संस्था या कृषि विज्ञान केंद्र से ही खरीदें. किसानों को सलाह है कि वे बीजों को बोने से पहले अरहर के लिए उपयुक्त राईजोबियम और फास्फोरस में घुलनशील बैक्टीरिया से अवश्य उपचार कर लें.

अरहर की उन्नत किस्में

* पूसा-2001, पूसा-991, पूसा-992, पारस, मानक, यूपीएएस यानी उपास 120.

* खरीफ मक्का की बोआई के लिए खेतों की तैयारी करें, साथ ही उन्नतशील संस्तुति संकुल एवं संकर प्रजातियां-प्रकाश, वाई-1402, बायो-9681, प्रो.-316, डी-9144, दिकाल्ब-7074, पीएचबी-8144, दक्कन 115, एमएमएच-133 आदि में से किसी एक प्रजाति की बोआई के लिए खाद एवं बीज की व्यवस्था करें.

* मक्के की संकुल प्रजाति की बोआई के लिए 20-25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और संकर प्रजाति के लिए 18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई करें.

फसल सुरक्षा

* मूंग की फसल में फली बेधक कीट का प्रकोप दिखाई देने की संभावना है. अत: इस की रोकथाम के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट 5 फीसदी एसजी 220 ग्राम प्रति हेक्टेयर या डाईमेथोएट 30 फीसदी ईसी 1 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600-700 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव आसमान साफ होने पर करें.

* सब्जियों की फसलों में फल छेदक/पत्ती छेदक कीट की रोकथाम के लिए नीम औयल 1.5-2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 3-4 छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर करें. सब्जियों की खड़ी फसलों में निराईगुड़ाई करें और सिंचाई का काम 8-10 दिन के अंतराल पर शाम के समय करें.

* फल मक्खी कीट की संख्या जानने और उस के नियंत्रण के लिए कार्बारिल 0.2 फीसदी+प्रोटीन हाईड्रोलाइसेट या सीरा 0.1 फीसदी अथवा मिथाइल यूजीनाल 0.1 फीसदी+मैलाथियान 0.1 फीसदी के घोल को डब्बे में डाल कर ट्रैप लगाएं.

Animalपशुपालन में बरतें सावधानी

* पशुओं को दिन के समय छायादार जगह पर बांध कर रखें. पशुशाला में बोरे का परदा डाल कर रखें और उस पर पानी का छिड़काव कर ठंडा रखें.

* पशुओं को पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में ताजा और शुद्ध पानी उपलब्ध कराएं. तेज धूप से काम कर के आए पशुओं को तुरंत पानी न पिलाएं. आधा घंटा सुस्ताने के बाद पानी दें. पशुओं को सुबह और शाम नहलाएं.

* पेट में कीड़ों से बचाव के लिए पशुओं को कृमिनाशक दवा दें. खुरपकामुंहपका रोग की रोकथाम के लिए एफएमडी वैक्सीन से और लंगडि़या बुखार की रोकथाम के लिए बीक्यू वैक्सीन से पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. पशुओं में गलघोंटू और फड़ सूजन की रोकथाम के लिए टीकाकरण कराएं. शाम के समय पशुओं के पास नीम की पत्तियों का धुआं करें, ताकि मच्छर व मक्खी भाग जाएं.

Farmingमुरगीपालन

* मुरगियों को भोजन में पूरक आहार दें. विटामिन व ऊर्जा खाद्य सामग्री इस में मिलाएं और साथ ही साथ कैल्शियम सामग्री भी मुरगियों को आहार में दें.

* पेट में कीड़ों की रोकथाम के लिए दवा दें. मुरगियों को गरमी से बचाव के लिए मुरगीघर में परदे, पंखे और वैंटिलेशन की व्यवस्था करें.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए मुरगीघर में लगे हुए जूट के परदों पर पानी के छींटे मारें, जिस से ठंडक बनी रहे.

श्रीविधि तकनीक से धान की खेती

यह धान की खेती की ऐसी तकनीक है, जिस में बीज, पानी, खाद और मानव श्रम का समुचित तरीके से इंतजाम करना शामिल है, जिस का मकसद प्रति इकाई क्षेत्रफल में ज्यादा से ज्यादा उत्पादकता बढ़ाना है.

जमीन का चुनाव

इस विधि में खासतौर से जमीन, पानी और दूसरे पोषक तत्त्वों के बेहतर इंतजाम से पौधे की जड़ों के ज्यादा से ज्यादा विकास पर जोर दिया जाता है. इस के लिए जमीन में अंत:कर्षण क्रियाएं समयसमय पर जरूर करनी चाहिए, ताकि जमीन में नमी बनी रहे, जो सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ाने में मददगार होती है.

धान की खेती सभी तरह की जमीन में की जा सकती है, फिर भी इस के लिए दोमट चिकनी मिट्टी, पानी सोखने की ज्यादा कूवत वाली और ज्यादा जैविक तत्त्वों से भरपूर वाली जमीन अच्छी मानी जाती है, जिस की जल धारण की कूवत ज्यादा हो.

नर्सरी की तैयारी

परंपरागत विधि से धान की खेती एक एकड़ क्षेत्रफल में करने के लिए 12-16 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है, पर श्री विधि में एक एकड़ धान की खेती के लिए सिर्फ 2 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. इस के लिए 400 वर्गफुट की जगह पर नर्सरी तैयार की जाती है.

नर्सरी बनाने के समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. इस विधि से 10-14 दिन में पौध का रोपण किया जाता है. नर्सरी की क्यारी बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारी खेत के बीच या कोने में बनाई जाए, जहां पौध रोपण करना है. लंबाई हालात के मुताबिक व बैड की ऊंचाई आधार तल से 6 इंच होनी चाहिए.

पहली परत : 1 इंच गोबर की सड़ी खाद.

दूसरी परत : 1-1.5 इंच बारीक मिट्टी.

तीसरी परत : 1 इंच सड़ी गोबर की खाद.

चौथी परत : 2-5 इंच बारीक मिट्टी.

मल्चिंग : 3-4 दिन तक.

नर्सरी में रासायनिक खाद के बजाय गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से मिट्टी मुलायम रहने से पौध को बिना नुकसान पहुंचाए खेत तक ले जाया जाता है.

नर्सरी में बीज की बोआई

शोधित बीज को हाथ से लाइन बना कर 1-1 कर के लाइन से बोया जाता है और उस पर एक हलकी परत सड़ी गोबर की खाद डाली जाती है और आखिर में नर्सरी बैड को पुआल से ढक दिया जाता है. बीज जमने के बाद पुआल को हटा दिया जाता है.

पुआल हटाने के बाद सुबहशाम रोजाना हलकी सिंचाई जरूर करें. सिंचाई करते समय यह सावधानी बरतनी चाहिए कि बीज मिट्टी से बाहर न निकले.

Paddy Farming

खेत की तैयारी

इस विधि में दूसरी फसलों की तरह खेत की तैयारी की जाती है. खेत की जुताई करने के बाद पाटा लगा देते हैं. इस के बाद मार्कर यंत्र से खेत में लाइन बनाते हैं या फिर रस्सी की मदद से खेत में 25×25 सैंटीमीटर या 30×30 सैंटीमीटर पर लाइन खींच लेते हैं. जहां कटान होता है, वहीं पर प्रति हिल एक पौध की रोपाई की जाती है. इस विधि में परंपरागत विधि की तुलना में प्रति पौधा ज्यादा कड़े निकलते हैं.

पौध रोपण और सावधानियां

क्यारी में बीज बोने के बाद तकरीबन 10-14 दिन की पौध को सावधानी से निकाल कर 1-1 कर के मुख्य खेत में आधे घंटे के अंदर सावधानी से रोपना चाहिए और खेत में 2 सैंटीमीटर से अधिक पानी नहीं भरा होना चाहिए.

पौध की तैयारी

पौधे से पौधे की दूरी 25×25 सैंटीमीटर रखनी चाहिए और एक हिल पर एक ही पौध रोपना चाहिए. अगर जमीन की उर्वराशक्ति अधिक हो तो पौधे से पौधे की दूरी 30×30 सैंटीमीटर बढ़ा सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण और जड़ों का विकास

अच्छे पौधे विकसित हों, इस के लिए खेत में नमी बनाए रखें. बहुत ज्यादा पानी न भरें और जमीन में रंद्रावकाश अच्छा रखने के लिए खेत में कोनोवीडर से निराईगुड़ाई करें. जरूरत के हिसाब से ही पानी दें, जिस से पानी की बचत होगी.

सिंचाई

इस विधि में जरूरत के हिसाब से एक तय समय के बाद सिंचाई करते हैं, जिस से खेत में नमी बनाए रखने के साथसाथ जमीन में वायु का संचार अच्छा रहे. खेत में 1-2 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी नहीं देना चाहिए. पानी की कमी को ध्यान में रख कर इस तकनीक की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है.

गोबर की खाद या कंपोस्ट का इस्तेमाल

इस विधि में धान की ज्यादा उपज लेने के लिए कार्बनिक खादों जैसे गोबर की खाद या कंपोस्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए. कार्बनिक खाद मुहैया न होने पर जमीन की उर्वराशक्ति की जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल कर सकते हैं.

गन्ने से गुड़ बनाएं आमदनी बढ़ाएं

आज के समय में गन्ने की फसल किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए वरदान साबित हो रही है, लेकिन गन्ना पैदा करने वाले किसानों को अपनी गन्ना फसल को खांड़सारी व शुगर मिलों में ले जा कर बेचना काफी मेहनत भरा काम लगता है.

शुगर मिलों में लंबी लाइनों में अपने ट्रैक्टरट्रौली को खड़ा करना पड़ता है. 2-3 दिन के इंतजार के बाद गन्ना फसल की तुलाई होती है और फसल के मूल्य का भुगतान भी महीनों बाद मिल पाता है.

ऐसे में गन्ना किसान अगर अपने खेत पर गुड़भट्ठी लगा कर गुड़ बनाएं तो उन की मेहनत व समय की बचत के साथ ही लोकल लोगों को रोजगार मिलेगा. अपनी भट्ठी में बने गुड़ को लोकल हाट, बाजारों में ले जा कर उन्हें अच्छी कीमत मिल सकती है. बड़े गुड़ कारोबारी भी किसानों के गुड़ को खरीद कर साप्ताहिक भुगतान कर देते हैं.

ganna

गुड़ बनाने के लिए जमीन में गड्ढा खोद कर भट्ठी तैयार की जाती  है. ईंटों की जुड़ाई से चिमनी बनाई जाती है. ज्यादातर किसान आयताकार भट्ठी बनाते हैं. गन्ना पिराई के लिए क्रेशर लगाया जाता है, जो बिजली के अलावा ट्रैक्टर से भी चलाया जा सकता है.

गन्ना क्रेशर के पास ही गन्ने के रस को स्टोर करने के लिए सीमेंट या लोहे की धातु से बने टैंक का इस्तेमाल किया जाता है.

गन्ना के रस को गरम करने के लिए आयताकार या चौकोर आकार की बड़ीबड़ी कड़ाहियों का इस्तेमाल किया जाता है.

भट्ठी के निचले भाग में आग जला कर भट्ठी को गरम किया जाता है. शुरू में कुछ ईंधन की व्यवस्था करनी होती है. बाद में क्रेशर से रस निकालने के बाद गन्ने के जो अवशेष बचते हैं, उन्हें मैदान में फैला कर व सुखा कर ईंधन में इस्तेमाल किया जाता है.

Jaggeryगन्ने के रस को बड़ीबड़ी कड़ाहियों में भर कर भट्ठी पर गरम किया जाता है. जैसेजैसे रस उबलता है, उस में झाग आते हैं. ये झाग रस में मिला हुआ मैल या कूड़ा होता है. इसे एक करछी या छलनी की मदद से अलग कर दिया जाता है. भट्टी का ताप बढ़ते ही रस उबलने लगता है और गुड़ जमने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

जैसे ही गुड़ जमना शुरू होता है, उसे चट्टू की सहायता से खरोंच कर अलगअलग नाप वाले सांचों में भर दिया जाता है. सांचों में तेल की चिकनाई लगा दी जाती है. सांचों में भरे गुड़ को ठंडा होने के बाद बाहर निकाला जाता है.

जबलपुर जिले के खजरी दोनी गांव के किसान अभिषेक चंदेल बताते हैं कि वे अपनी गन्ना फसल शुगर मिलों को देने के बजाय अपने खेत पर गुड़भट्ठी बना कर देशी गुड़ बनाने का काम करते हैं. उन की गुड़भट्ठी में गांव के 8-10 नौजवानों को कामधंधा भी मिल जाता है और गुड़ बना कर बाजार में बेचने से शुगर मिलों से ज्यादा दाम भी किसानों को मिल जाते हैं. एक एकड़ के गन्ने से 45 से 50 क्विंटल गुड़ आसानी से बन जाता है. 5, 10, और 20 किलोग्राम की पैकिंग में परियां बना कर देशी गुड़ को रखा जाता है. हाट और बड़े बाजार के अलावा बड़ी तादाद में आसपास के गांव वाले देशी गुड़ उन की भट्ठी से भी खरीद कर ले जाते हैं.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करताज गांव के किसान राकेश दुबे बताते हैं कि उन्होंने 4 एकड़ जमीन में जैविक खेती के जरीए गन्ने की पैदावार ली. उन के द्वारा बीते 2 साल में गन्ने का उत्पादन 900 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गया और जैविक तरीके से कैमिकलरहित गुड़ बनाने का काम शुरू किया.

‘कुशल मंगल’ नाम से रजिस्टर्ड जैविक गुड़ का दाम बाजार में 50 से 70 रुपए प्रति किलोग्राम है. गन्ने की खेती से राकेश दुबे डेढ़ से 2 लाख रुपए प्रति एकड़ तक की आमदनी हासिल कर रहे हैं.

राकेश दुबे के मुताबिक, एक एकड़ में जैविक गुड़ 30 से 35 क्विंटल तक निकलता है, जबकि कैमिकल गुड़ 50 से 60 क्विंटल तक निकलता है. जैविक गुड़ की मार्केटिंग खुद करनी पड़ती है. भाव सही मिलने से मुनाफा ज्यादा होता है. जैविक गन्ने की लागत भी कम आती है. अभी सब से ज्यादा इन का गुड़ चंडीगढ़ जाता है. महाराष्ट्र, जयपुर, गुजरात, राजस्थान, हैदराबाद में भी इस की अच्छीखासी मांग है.

जैविक गुड़ विदेश में भी

गन्ने की खेती का 20 साल का अनुभव साझा करते हुए राकेश दुबे ने कहा, ‘‘किसानों को बाजार में गन्ने का न तो सही भाव मिलता है और न ही समय पर पैसा मिलता है. इसलिए हमारे जिले के ज्यादातर किसान गन्ने का उत्पाद बना कर ही बेचते हैं.

‘‘मैं ने यह काम बड़े पैमाने पर जैविक तरीके से शुरू किया. एक क्विंटल गन्ने से 13 किलोग्राम जैविक गुड़ बनता है.’’

नरसिंहपुर जिले में बनने वाले इस जैविक गुड़ का ‘कुशल मंगल’ नाम से रजिस्ट्रेशन हो चुका है. राकेश दुबे ने इस के लिए एक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाई है, जिस में 22 किसान हैं. अब ये किसान भी जैविक गन्ने के उत्पादन के साथ ही जैविक गुड़ बनाने की शुरुआत कर चुके हैं.

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में पिछले साल लगे कृषि मेले में इन के गुड़ की काफी मांग थी. कस्टम एजेंट की मदद से भी राकेश दुबे के गुड़ की मांग विदेशों में बढ़ी है. ये गुड़ औनलाइन अमेजन पर भी उपलब्ध है. कार्गो सर्विस, पोस्टल सर्विस, कोरियर ट्रांसपोर्ट के द्वारा दुबई और श्रीलंका जैसों देशों में भी ये गुड़ भेजा जाता है.

स्वास्थ्यवर्धक रहता है गुड़

जहां शक्कर या चीनी सिर्फ सुक्रोज से बनती है, वहीं गुड़ मुख्य रूप से सुक्रोज, मिनरल्स, आयरन और कुछ फाइबर से बनता है. इसलिए गुड़ दोनों से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है. चीनी और गुड़ के बीच का अंतर शरीर पर साफ दिखता है.

चीनी सुक्रोज का सरलतम रूप है, जो खून में तुरंत घुल जाता है. इस वजह से तुरंत ऊर्जा मिलती है. इसलिए मधुमेहग्रस्त लोगों को इस से दूर रहने के लिए कहा जाता है.

दूसरी तरफ गुड़ सुक्रोज की लंबी शृंखला से बना है, जिस के कारण हजम भी देर से होता है और ऊर्जा भी धीरेधीरे निकलती है. यह ऊर्जा बहुत देर तक रहती है और नुकसान भी नहीं होता है. गुड़ को लोहे के पात्र में प्रोसैस किया जाता है, इसलिए यह आयरन का स्रोत होता है.

डाक्टर बीएल चौहान के मुताबिक, गुड़ माइग्रेन को ठीक करने में मदद करता है और रजोस्राव के दौरान होने वाली ऐंठन में आराम दिलाता है. बच्चे को जन्म देने के बाद नई मां को गुड़ का काढ़ा इसीलिए दिया जाता है क्योंकि शिशु के जन्म के 40 दिन के बीच खून के थक्के को निकालने में मदद करता है.

गुड़ में जो सेलेनियम रहता है, वह ऐंटीऔक्सिडैंट का काम करता है जबकि पोटैशियम और सोडियम शरीर की कोशिकाओं में अम्लीय संतुलन को बनाए रखता है और ब्लड प्रैशर को संतुलत करता है.

वैसे, गुड़ में संतुलित मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस और जिंक रहता है जो खून को साफ करता है, वात रोग से बचाता है और पित्त विकार को ठीक करता है. गुड़ पीलया को ठीक करने में भी मदद करता है.

गन्ने से गुड़ बनाने की उन्नत तकनीक की जानकारी के लिए राकेश दुबे के मोबाइल नंबर 9425448313 और अभिषेक चंदेल के मोबाइल नंबर 9303375525 पर जानकारी ली जा सकती है.

धान की खेती से जुड़े सवाल जवाब व सुझाव

स्वस्थ एवं रोग व कीट से मुक्त धान की नर्सरी ही अधिक व गुणवत्तापूर्ण धान के उत्पादन का आधार होता है. नर्सरी स्वस्थ होनी चाहिए. खेतों की मेंड़ों को रोपाई से पहले साफसुथरा कर लेना चाहिए, जिस से कीट नहीं पनपते हैं.

सवाल : धान की रोपाई कब तक कर लेना उचित होता है?

जवाब : धान की रोपाई जुलाई माह के मध्य तक अवश्य कर लें. उस के बाद उपज में कमी निरंतर होने लगती है. यह कमी 30 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर में प्रतिदिन होती है.

सवाल : धान की कितने दिन की नर्सरी लगाना ज्यादा अच्छा रहता है?

जवाब : धान की 21 से 25 दिन की नर्सरी रोपाई के लिए सब से उपयुक्त होती है.

सवाल : धान की रोपाई की उचित दूरी क्या होनी चाहिए?

जवाब : साधारण उर्वरा भूमि में पंक्तियों एवं पौधों की दूरी 20 × 10 सैंटीमीटर उर्वरा भूमि में 20× 15 सैंटीमीटर रखें. पौधों की रोपाई 3 से 4 सैंटीमीटर से अधिक गहराई पर नहीं करनी चाहिए, अन्यथा कल्ले कम निकलते हैं और उपज में कमी होती है. एक स्थान पर 2 से 3 पौधे लगाएं. अगर वर्षा देर से हो रही है या फिर रोपाई में देरी होने के कारण एक स्थान पर 3 से 4 पौधे लगाना उचित होगा.

ध्यान रहे कि समय से रोपाई पर प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में 50 हिल अवश्य होना चाहिए. ऊसर और देर से रोपाई की स्थिति में 65 से 70 हिल प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में होना चाहिए.

Paddy Farmingरोपाई के बाद जो पौधे मर जाएं, उन के स्थान पर दूसरे पौधों को तुरंत लगा दें. अच्छी उपज के लिए प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में 250 से 350 बालियों की संख्या होनी चाहिए.

सवाल : धान की नर्सरी बड़ी होने पर किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

जवाब : धान की नर्सरी बड़ी हो जाने पर और देर से रोपाई की स्थिति में पौधों की चोटी चार अंगुल ऊपर से काट कर रोपाई करनी चाहिए, जिस से नर्सरी में दिए हुए कीटों के अंडे नष्ट हो जाएंगे और एक स्थान पर 3-4 पौधे लगाने चाहिए.

– प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, (सेवानिवृत्त वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष), निदेशक प्रसार्ड ट्रस्ट, मल्हनी, भाटपार रानी, देवरिया-274702 (उ.प्र.)

रोपें बांस, कमाएं पैसा

बांस से निर्मित वस्तुएं देखने में खूबसूरत, मजबूत व टिकाऊ होती हैं. इस की अलगअलग क्वालिटी के अनुसार इस का रेट भी किसानों को अच्छा मिलता है. इसलिए किसानों के लिए बांस की खेती फायदेमंद साबित होती रही है. बांस को एक बार रोपने के बाद 30-40 सालों तक उस की फसल ली जा सकती है.

बांस की विभिन्न वस्तुओं में उपयोग के अनुसार उस की अलगअलग किस्में आती हैं. लाठी के लिए प्रयोग किया जाना वाला बांस ठोस एवं पतला व कम लंबाई वाला होता है, वहीं घरों के निर्माण प्रयोग में आने वाले बांस की लंबाई अन्य किस्मों की अपेक्षा अधिक होती है. इस की कंटीली प्रजाति में मजबूती अधिक पाई जाती है व खोखलापन कम होता है. बांसुरी के लिए पतले बांस की किस्में प्रयोग में लाई जाती हैं, वहीं सजावटी वस्तुओं के निर्माण में प्रयोग में होने वाला बांस पीला, हरा व खोखला होता है.

बांस की खेती देश के हर कोने में की जा सकती है. यह पठारी, दोमट, बलुई, चिकनी, ऊसर व पथरीली जमीनों पर भी आसानी से उगाया जाने वाला पौधा है.

बांस की खेती खाली पड़ी जमीनों, नाले, नहरों व नदियों के किनारे स्थित खाइयों व नमी वाले स्थानों पर आसानी से की जा सकती है.

पूरे भारत में बांस की सब से अधिक खेती व अधिक किस्में पूर्वोत्तर राज्यों में पाई जाती है. बांस की खेती सिर्फ क्षारीय मिट्टी में नहीं की जा सकती है.

बांस की उन्नत प्रजातियां

अभी तक बांस की कुल 1,250 प्रजातियां पाई गई हैं, जिस में से 145 प्रजातियों को भारत में या तो उगाया जाता है या वह अपनेआप ही उग आता है.

भारत में उगाई जाने वाली बांस की कुछ उन्नत प्रजातियां निम्न है :

बैब्यूसा वलगैरिस

इस प्रजाति के बांस पीली, हरी व धारीधार होती है, जो देखने में बहुत खूबसूरत लगते हैं. इस वजह से इस की मांग सजावटी वस्तुओं के निर्माण के लिए ज्यादा होती है.

बैंब्यूसा टुल्ला

इस बांस की प्रजाति अपेक्षाकृत लंबी होती है.

बैंब्यूसा स्पायनोसा

इस किस्म में कांटे पाए जाते हैं. यह मजबूत होती है. इस की खेती उत्तरपश्चिम भारत में ज्यादा होती है.

डेंड्रोकलामस सख्त

इस प्रजाति के बांस मजबूत होते हैं व लंबाई में अधिक होते हैं.

बंबूसा नूतन

इस किस्म के बांस का उपयोग कई कामों में किया जाता है, इसलिए इस की मांग ज्यादा होती है.

मेलोकन्ना बंबूसोइड्स

इस बांस की किस्म की खेती पश्चिम बंगाल में अधिक होती है.

बैब्यूसा अरंडनेसी

यह सब से लंबी किस्म होती है. इस की ऊंचाई 30-40 फुट होती है, जो 30-100 के झुंड में एकसाथ उगती है.

बांस की रोपाई की तैयारी

बांस की रोपाई जुलाई से सितंबर माह तक की जा सकती है. यह नर्सरी तैयार कर राइजोम या उस की गांठों के द्वारा रोपा जाता है. बांस की रोपाई के लिए 30 सैंटीमीटर के लंबाई, चौड़ाई व गहराई का गड्ढा खोद कर 5×6 का अंतराल रखा जाता है.

बांस की नर्सरी तैयार करने के लिए उस के बीज को 24 घंटे तक पानी में भिगोए जाते हैं. इस दौरान एक बार पानी बदलना जरूरी होता है.

बांस के बीज : बांस की फसल रोपे जाने के 20-40 सालों के बीच सिर्फ एक बार पौधों में फूल आने से प्राप्त होते हैं. इस के बीज चावल की तरह होते हैं.

बांस के एक किलोग्राम बीज में लगभग 4,000 बीज होते हैं. बांस के पुंज में एकसाथ फूल आता है और सभी बांस फूल आने के बाद सूख जाते हैं.

अगर बांस की रोपाई उस की गांठों से करनी है, तो काटे गए बांसों की जड़ों को खोद कर उसे जुलाई से सितंबर माह तक रोप देना चाहिए और प्रत्येक दो माह के अंतराल पर इस की सिंचाई करते रहना चाहिए. इस के अलावा इस की जड़ों में सड़ी हुई गोबर की खाद व पत्तियों का प्रयोग करने से कल्ले अधिक फूटते हैं व फसल की बढ़वार अधिक होती है.

फसल की रोपाई के बाद पांचवे वर्ष से बांस की फसल मिलनी शुरू हो जाती है. इस के प्रत्येक पुंज में 5 से 10 वर्ष के बीच में किस्मों के अनुसार 15-100 कल्ले प्राप्त होते हैं. 15-20 वर्ष के बाद कल्लों की संख्या बढ़ जाती है और 30 वर्ष के बाद कल्लों की संख्या घटनी शुरू हो जाती है.

बांस की कटाई

बांस के पौधे अन्य फसलों की तरह नहीं होते हैं. इस की पुंजों से जो भूमिगत तना निकलता है, वह बड़ी तेजी से बढ़ता है और किसीकिसी किस्म की बढ़वार एक दिन में एक मीटर तक की होती है.

बांस 2 माह में अपना पूरा विकास कर लेता है. बांस के अच्छे बढ़वार के लिए वर्षा ऋतु में इस के पुंजों की बगल में मिट्टी चढ़ा कर जड़ों को ढक देना चाहिए.

बांस की कटाई उस के होने वाले उपयोग पर निर्भर करता है. अगर बांस की टोकरी बनानी है, तो वह 3-4 वर्ष पुरानी फसल हो. अगर मजबूती के लिए बांस की आवश्यकता है, तो 6 वर्ष की फसल ज्यादा उपयुक्त होती है.

बांस की कटाई का उपयुक्त समय अक्तूबर के दूसरे सप्ताह से दिसंबर माह तक का होता है. गरमी के मौसम में बांस की कटाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस से जड़ें सूख सकती हैं और कल्ले फूटने की कम संभावनाएं होती हैं.

बांस की खूबियां

बांस को अगर पर्यावरण मित्र कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगा, क्योंकि इस के एक हेक्टेयर खेत से 17 टन कार्बन अवषोषित किया जाता है. यह सर्वाधिक औक्सीजन छोड़ने वाला पौधा है. इसलिए यह वातावरण में शुद्ध वायु छोड़ने का एक प्रमुख घटक भी है.

बांस की एक खूबी यह भी है कि अगर इस की तुलना एक पेड़ से की जाए तो वह पेड़ 18 मीटर की लंबाई में बढ़ने के लिए 30-60 वर्ष का समय लेता है, जबकि बांस मात्र 30-60 दिनों के भीतर में 18 मीटर लंबाई में बढ़ जाता है.

बांस की खेती के अनगिनत लाभ

किसान राममूर्ति मिश्रा का कहना है कि बांस की खेती में न्यूनतम लागत व कम देखभाल की जरूरत होती है. इसे एक बार रोपने के बाद कई सालों तक फसल ली जा सकती है.

बांस प्रत्यक्ष रूप से किसान को लाभ तो देता ही है, साथ ही यह अप्रत्यक्ष रूप से भी कइयों को लाभ देने का माध्यम साबित हो रहा है.

Bamboo Products
Bamboo Products

 

देश में लाखों परिवार बांस आधारित उद्योग से अपना जीवनयापन कर रहे हैं. बांस से बनी हुई चीजें देशी पर्यटकों द्वारा महंगे दामों पर खरीदी जाती हैं. इस से महिलाओं के लिए सौंदर्य प्रसाधन, हेयर क्लिप, ग्रीटिंग कार्ड, चम्मच, तीरधनुष, खेती के उपकरण, कुरसीमेज, मछली पकड़ने का कांटा, चारपाई, डलिया जैसी हजारों वस्तुओं का निर्माण किया जाता है, इसलिए बांस को हरा सोना भी कहा जा सकता है.

गन्ने के साथ राजमा की खेती

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है. नकदी फसल होने और तमाम चीनी मिलें होने की वजह से किसानों के बीच गन्ना बहुत ही लोकप्रिय फसल है. इस की खेती ज्यादातर एकल फसल के रूप में की जाती है. किसान गन्ने की फसल को नौलख या पेड़ी के रूप में 2-3 साल तक लेते रहते हैं. अनेक किसान गन्ने के साथ अन्य फसल भी लेते हैं जिसे हम सहफसली खेती के रूप में जानते हैं. ऐसा करने से गन्ने की खेती में मुनाफा भी बढ़ जाता है.

गन्ना और राजमा की सहफसली खेती

खेत का चुनाव व तैयारी : गन्ना और राजमा की खेती के लिए समतल जीवांशयुक्त बलुई दोमट मिट्टी का चुनाव करना चाहिए. गोबर की खाद को खेत में डाल कर 4-5 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए.

बीज का चुनाव व बोआई : पंत अनुपमा, अर्का कोमल, करिश्मा, सेमिक्स, कंटेंडर वगैरह राजमा की उन्नत प्रजातियां हैं. राजमा के बीजों को कार्बंडाजिम की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. गन्ने के बीजोपचार के लिए कार्बंडाजिम की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर टुकड़ों को उस में 25-30 मिनट तक डुबोएं.

गन्ना और राजमा की सहफसली खेती में राजमा के 80 किलोग्राम और गन्ने के 60 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर के मध्य कर लेनी चाहिए. गन्ने की 2 लाइनों के बीच राजमा की 2 लाइनों की मेंड़ों पर बोआई करें.

 

निराईगुड़ाई व सिंचाई : दोनों फसलों की बोआई सर्दी के मौसम में होने की वजह से खरपतवारों की समस्या कम रहती है, फिर भी खरपतवार निकालने के लिए फसल में 2-3 बार निराईगुड़ाई करें. पूरे फसलोत्पादन के दौरान जमीन को नम बनाए रखें, ताकि फसल को पाले से सुरक्षित रखा जा सके.

खाद व उर्वरक : खेत में 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी गोबर की खाद मिलानी चाहिए. इस के अलावा 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 80 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट उर्वरकों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल सुरक्षा : बोआई से पहले बीजोपचार जरूर करें. आमतौर पर फलियां बनते समय फली भेदक, पर्ण सुरंगक व कुछ चूषक कीटों का हमला हो जाता है. कभीकभी मोजैक रोग का संक्रमण भी हो जाता है.

उन्नत तकनीक से खेती करने पर राजमा की फलियों की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति एकड़ तक हासिल हो जाती है और तकरीबन 40,000 रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. इस के साथ ही गन्ने की उत्पादकता में भी इजाफा होता है.

खास वजह यह भी है कि खेत में डाली गई खाद व उर्वरकों का अधिकतम इस्तेमाल भी है. खरपतवार प्रबंधन का लाभ दोनों फसलों द्वारा हासिल किया जाता है और सहफसल में अपनाए गए कीट व रोग प्रबंधन का लाभ मुख्य फसल को भी मिल जाता है.

कीटों व रोगों की रोकथाम

* नीम का तेल 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के इस्तेमाल से फसल की सुरक्षा भी हो जाती है और इनसानों की सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ता है.

* नीम का तेल न होने पर 2 लिटर क्विनालफास 25 ईसी या 1.25 लिटर मोनोक्रोटोफास 36 एसएल या 2 किलोग्राम कार्बारिल 50 डब्लूपी को 600-700 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से 12-14 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

अरंडी की खेती

अरंडी को अंगरेजी में कैस्टर कहा जाता है, जबकि गांवदेहात के लोग इसे आम बोलचाल में अंडउआ कहते हैं. इस का पेड़ झाड़ीनुमा और पत्ते चौड़ी फांक वाले होते हैं. ये देखने में पपीते जैसे बड़ेबड़े होते हैं और इस के पेड़ सड़कों के किनारे या बेकार पड़ी जमीनों, गड्ढों वगैरह में देखे जा सकते हैं.

Castor Oil
Castor Oil

अरंडी की मांग विकसित देशों में ज्यादा है. यह फसल तिलहनी फसल के तहत आती है. इस का तेल खाने के काम नहीं आता, लेकिन अनेक तरह की दवाओं, साबुन, कौस्मैटिक वगैरह में इस्तेमाल किया जाता है. इस के बीजों में 40 से 52 फीसदी तेल होता है और अरंडी की पैदावार में भारत पहले नंबर पर है, जो दुनियाभर की 90 फीसदी अरंडी की जरूरत को पूरा करता है.

अरंडी उगाने वाले खास राज्य गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश हैं. इस के अलावा अरंडी की सीमित मात्रा में खेती करने वाले राज्यों में कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश शामिल हैं.

गुजरात और राजस्थान में इस की खेती सिंचाई पर आधारित है, जबकि बाकी राज्यों में बारिश आधारित परिस्थितियों में इस की खेती की जाती है. यह आमतौर पर गरम मौसम की फसल है. साफ आसमान वाले गरम इलाकों में अरंडी की फसल अच्छी होती है.

मिट्टी : अरंडी की खेती तकरीबन सभी तरह की मिट्टी में, जिस में पानी न ठहरता हो, की जा सकती है. पर यह आमतौर पर भारत में बलुई दोमट और उत्तरपश्चिम राज्यों की हलकी कछारी मिट्टी में इस की खेती अच्छी होती है.

बीज और बोआई : बीज बोने की तैयारी के लिए गरमी के मौसम या गैरमौसम में अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए. इस की खेती ज्यादातर खरीफ मौसम में की जाती है. वैसे, इसे जूनजुलाई माह में बोते हैं और रबी मौसम में सिंचित हालात में सितंबर से अक्तूबर माह के आखिरी हफ्ते तक इस की बोआई की जा सकती है.

फसल तैयार होने की अवधि 120-240 दिन होती है. फसल बोने के लिए लाइन से लाइन की दूरी 90 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सैंटीमीटर रखी जाती है. इस के लिए प्रति हेक्टेयर 12 से 15 किलोग्राम बीज लगता है.

बीजों को हल के द्वारा या सीड ड्रिल की सहायता से भी बोया जा सकता है. बीजों को बोने की गहराई 7-8 सैंटीमीटर से अधिक नहीं रखनी चाहिए. बीज बोने से पहले 3 ग्राम थाइरम प्रति किलोग्राम बीजों की दर से उपचारित करना चाहिए. उपचारित करने से बीजजनित रोगों से नजात मिलती है.

अंत:फसल तकनीक

खरीफ मौसम में अरंडी को आमतौर पर एकल फसल या मिश्रित फसल के रूप में उगाया जाता है. इन से अधिक फायदा लेने के लिए अरंडी आधारित अंत:फसल इस तरह हैं: अरंडी और अरहर (1:1), अरंडी और लोबिया (1:2), अरंडी और उड़द (1:2), अरंडी और मूंग (1:2), अरंडी और ग्वार (1:1), अरंडी और मूंगफली (1:5), अरंडी और अदरक/हलदी (1:5) और अरंड और मिर्ची (1:8) के अनुसार बोआई करें.

खाद और उर्वरक : सामान्य तौर पर अरंडी की फसल में किसी खाद की खास जरूरत नहीं होती, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उन्नत किस्मों के बीज इस्तेमाल करने और सही मात्रा में खाद देने पर उन से अच्छी उपज ली जा सकती है.

अनेक इलाकों के हिसाब से 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30-40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. सिंचित इलाकों में नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस की पूरी मात्रा बोआई के पहले ही मिला देनी चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा को 2 महीने बाद सिंचाई के समय देना चाहिए और ऐसे इलाकों में, जहां फसल को सही मात्रा में पानी न मिल पाता हो, वहां नाइट्रोजन की पूरी मात्रा बोआई के समय ही कूंड़ों में डाल देनी चाहिए.

निराईगुड़ाई : अरंडी की खेती में खरपतवार ज्यादा फलताफूलता है. बीजाई के 25 दिन बाद ब्लैड हैरो से जुताई के समय या फिर 2-3 बार हाथ से खरपतवार को 15-20 दिन के अंतराल पर उखाड़ देना चाहिए, जिस से खरपतवारों को बढ़ने से रोका जा सके.

सिंचाई : कई साल तक फसल लेने के लिए अरंडी की समय पर सिंचाई करना जरूरी है. लंबे समय तक सूखा रहने पर एक सिंचाई स्पाइक विकसित होने की शुरुआती अवस्था में करें और दूसरे स्पाइक के शुरुआत में या विकसित अवस्था में देने से फसल को काफी फायदा मिलता है. इस से अच्छी पैदावार होती है. रबी और गरमी में बीजारोपण के तुरंत बाद एक सिंचाई देने से एकसमान अंकुरण होता है. मिट्टी को ध्यान में रखते हुए और फसल के विकास के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

अरंडी में लगने वाले रोग : अच्छी पैदावार के लिए फसल में रोग की रोकथाम भी जरूरी है.

अंगमारी रोग : यह एक आम रोग है. आमतौर पर यह रोग पौधों में शुरुआती बढ़वार के समय लगता है. रोग के लक्षण बीज पत्र के दोनों सतहों पर गोल व धुंधले धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं. अगर इसे रोका न गया तो यह रोग धीरेधीरे पत्तियों से तने और फिर पूरे पौधे को अपनी चपेट में ले लेता है. पत्तियां सड़ने लगती हैं और आखिर में पौधे सड़ कर गिर जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए डाइथेन एम 45 के 0.25 फीसदी घोल का 1,000 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए.

पर्णचित्ती रोग : इस रोग में पहले पत्तियों पर छोटेछोटे धब्बे उभरते हैं, फिर ये बाद में भूरे रंग के बड़े धब्बों में बदल जाते हैं.

1 फीसदी बोर्डोएक्स मिक्स्चर या कौपर औक्सीक्लोराइड 2 फीसदी की दर से छिड़काव करने से इस रोग की रोकथाम की जा सकती है वहीं मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लिटर या कार्बंडाजिम 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 10-15 दिन के अंतर पर 2 छिड़काव करने से इस रोग को कम किया जा सकता है.

झुलसा रोग : सब से पहले यह रोग बीज पत्र पर धब्बों के रूप में दिखाई देता है. पत्ते के किसी भी भाग में धब्बे दिखाई दे सकते हैं. जब हमला अधिक होता है तब धब्बे मिल कर एक बड़ा धब्बा सा बना देते हैं. इस की रोकथाम साफसुथरी खेती व प्रतिरोधी किस्मों के चयन द्वारा संभव है.

रोग के लगने की संभावना होने पर डाइथेन एम 45 या डाइथेन जेड 78 में से किसी एक फफूंदीनाशी की 1 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व की मात्रा को 500-600 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. यदि रोग नियंत्रण में न हो तो 10-15 दिन के बाद दोबारा छिड़काव करना चाहिए.

अरंडी में लगने वाले कीट

सैमीलूपर : यह इस फसल को बहुत तेजी से नुकसान पहुंचाने वाला कीट है. इस की रेंगने वाली लट, जो 3-3.5 सैंटीमीटर लंबी होती है, फसल को खा कर कमजोर कर देती है. यह लट 11-12 दिनों तक पत्तियां खाने के बाद प्यूपा में बदल जाती है. बारिश के समय (अगस्त से सितंबर माह) में इस कीट का अत्यधिक प्रकोप होता है.

लट सामान्य रूप से कालेभूरे रंग के होते हैं. इन पर हरीभूरी या भूरीनारंगी धारियां भी होती हैं. ये गिडारों की तरह सीधा न चल कर रेंगती हुई चलती हैं. इस कीट की रोकथाम के लिए क्विनालफास 1 लिटर कीटनाशी दवा को 700-800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव किया जा सकता है.

तना छेदक कीट : इस कीट की इल्ली गहरे और भूरे रंग की होती है. यह प्रमुख रूप से अरंडी के तनों और डालयों को खा कर खोखला कर देती है. इस की गिडार 2-3 सैंटीमीटर तक लंबी और भूरे रंग की होती है. इस अवस्था में वह 12-14 दिन रहती है और खोखले तनों के अंदर घुस कर प्यूपा में बदल जाती है.

इस की रोकथाम के लिए सब से पहले रोगग्रस्त तनों और संपुटों को इकट्ठा कर जला देना चाहिए और क्विनालफास 25 ईसी की 1 लिटर दवा को 800 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव कर देना चाहिए.

रोएं वाली इल्ली : खरीफ फसलों में रोएं वाली इल्ली इस फसल को अधिक नुकसान पहुंचाती है. इस कीट की साल में 3 पीढि़यां होती हैं. इस के गिडार पत्तियों को खाते हैं जो बाद में गिर जाते हैं. खेत में जैसे ही इस कीट के अंडे दिखाई दें, उन्हें पत्तियों समेत चुन कर जमीन में गाड़ देना चाहिए. बाकी कीड़ों की रोकथाम के लिए खेत में इमिडाक्लोप्रिड 1 मिलीलिटर को 1 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव कर देना चाहिए.

कटाई : अरंडी के 180-240 दिनों में 30 दिन के अंतर से 4-5 स्पाइक पैदा होते हैं. पहला स्पाइक (फलों का गुच्छा) बीजारोपण के 90 से 120 दिन में तैयार होता है. इस की फसल एकसाथ नहीं पकती. इन्हें 30 दिन के अंतर से तोड़ा जा सकता है.

अगर गुच्छे ज्यादा पक जाते हैं तो वे  फटने लगते हैं और बीज खेत में बिखर जाते हैं. अनेक किस्में ऐसी भी हैं जिन के गुच्छे फटते नहीं हैं. फलों के गुच्छों को काटने के साथ धूप में अच्छे से सुखाने के बाद उन्हें डंडों से पीट कर बीज अलग कर लिया जाता है. बीज निकालने के लिए यंत्र का भी इस्तेमाल किया जाता है. कैप्सूल को कई बार नालीदार बोर्ड पर रगड़ कर बीज बाहर निकाला जाता है जिस में काफी समय लगता है. साफ बीजों को जूट के थैलों में सामान्य परिस्थितियों में रखा जा सकता है.

राज्य के हिसाब से किस्में

आंध्र प्रदेश : डीसीएस 107, 48-1 (ज्वाला), क्रांति, किरन, हरिता किस्में हैं और जीसीएच 4, डीसीएच 519, डीसीएच 177, पीसीएच 111 और पीसीएच 222 संकर प्रजातियों की सिफारिश की गई है.

गुजरात : 48-1, जीसी 3 किस्में हैं और संकर प्रजातियों में जीसीएच 4, जीसीएच 6, जीसीएच 7, डीसीएच 519 वगैरह की सिफारिश की गई है.

राजस्थान : डीसीएस 107, 48-1 किस्में हैं और संकर प्रजातियों में जीसीएच 4, डीसीएच 32, आरएचसी 1, डीसीएच 177, डीसीएच 519 वगैरह की सिफारिश की गई है.

तमिलनाडु : एसए 2, टीएमबी 5, टीएमबी 6, को 1, 48-1 किस्में हैं और संकर प्रजातियों में जीसीएच 4, डीसीएच 31, डीसीएच 177, डीसीएच 519, वाईआरसीएच 1 की सिफारिश की गई है.

अन्य : डीसीएस 107, 48-1 किस्में हैं और संकर प्रजातियों में जीसीएच 4, जीसीएच 5, जीसीएच 6, डीसीएच 177, डीसीएच 519 की सिफारिश की गई है.

उपज : बारिश आधारित फसल से 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सिंचित इलाकों में 20-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से पैदावार मिलती है.

अरंडी फोड़ाई यंत्र

यह यंत्र हाथ से चलने वाला है. इस यंत्र से अरंडी की फली के अलावा मूंगफली के दाने भी अलग किए जाते हैं. इस में अरंडी व मूंगफली के लिए अलगअलग छलनियां लगी होती हैं. इस यंत्र की अनुमानित कीमत 2,500 से 3,000 रुपए तक है. इस यंत्र को केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल द्वारा बनाया गया है.