मिट्टी की जांच कराएं

अच्छी पैदावार लेने के लिए समयसमय पर खेत की मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए, जैसे जमीन में होने वाले पोषक तत्त्वों के बारे में जानकारी व अनेक उन कमियों का पता चल सके, जिस से फसल पैदावार पर असर पड़ रहा है. समय रहते हम खेत की मिट्टी की जांच करा कर खेत की मिट्टी को सुधार सकते हैं और अपनी जमीन से अच्छी पैदावार ले सकते हैं.

मिट्टी की जांच कब

फसल की कटाई हो जाने अथवा परिपक्व खड़ी फसल में प्रत्येक 3 साल में फसल मौसम शुरू होने से पहले एक बार भूमि में नमी की मात्रा कम से कम हो.

क्यों

सघन खेती के कारण खेत की मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी. मिट्टी में विभिन्न पोषक तत्त्वों की उपलब्धता की दशा का बोधक. बोई जाने वाली फसल के लिए पोषक तत्त्वों की आवश्यकता का अनुमान. संतुलित उर्वरक प्रबंध द्वारा अधिक लाभ.

कैसे

एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 8-10 स्थानों से ‘ङ्क’ आकार के 6 इंच तक के गहरे गड्ढे बनाएं. एक खेत के सभी स्थानों से प्राप्त मिट्टी को एकसाथ मिला कर एक संयुक्त नमूना बनाएं. नमूने की मिट्टी से कंकड़, घास इत्यादि अलग करें. सूखे हुए नमूने को कपड़े की थैली में भर कर किसान का नाम, पता, खसरा संख्या, मोबाइल नंबर, आधार संख्या, उगाई जाने वाली फसलों आदि का ब्योरा दें. नमूना प्रयोगशाला को भेजें अथवा ‘परख’ मृदा परीक्षण किट द्वारा स्वयं परीक्षण करें.

पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों का वर्गीकरण

पौधे जड़ों द्वारा भूमि से पानी और पोषक तत्त्व, वायु से कार्बनडाईऔक्साइड और सूर्य से प्रकाश ऊर्जा ले कर अपने विभिन्न भागों को बनाते हैं. पोषक तत्त्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है :

मुख्य पोषक तत्त्व : नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश.

गौण पोषक तत्त्व : कैल्शियम, मैग्नीशियम और गंधक.

सूक्ष्म पोषक तत्त्व : लोहा, जिंक, कौपर, मैग्नीज, मौलिब्डेनम, बोरोन और क्लोरीन.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क करें.

सबसौयलर मिट्टी  को बनाए हवादार

आज भारीभरकम मशीनों को जुताई, फसल की कटाई व दूसरे जरूरी कामों के लिए खेत में चलते देखना आम बात है. इस तरह की खेती में खेत की लगभग 25 सैंटीमीटर से ज्यादा गहराई तक की परत कड़ी बनती जा रही है.

खेत की निचली सतह में इस तरह की कड़ी परत बन जाने की वजह से मिट्टी में पानी व हवा का आनाजाना कम हो जाता है. मिट्टी के कड़ा होने के कारण पानी जमीन में नीचे की ओर नहीं जा पाता और खेतों में पानी भराव जैसी परेशानी पैदा होने लगती है.

इतना ही नहीं, इन्हीं सख्त परतों के चलते पौधों की जड़ें भी मिट्टी में ज्यादा गहराई तक नहीं जा पाती हैं. सख्त परतों के नीचे मौजूद पोषक तत्त्वों व पानी का इस्तेमाल भी नहीं कर पाती हैं. नतीजा पैदावार कम होती है.

खेत में बनी इन सख्त परतों से नजात दिलाने के लिए एक मशीन तैयार की गई है, जिस को सबसौयलर  कहते हैं. यह सबसौयलर  कई आकार, प्रकार व नामों से बाजार में उपलब्ध हैं. इस मशीन के इस्तेमाल से खेत की निचली सतहों में मौजूद कठोर परतों को तोड़ कर मिट्टी को मुलायम व हवादार बना दिया जाता है, जिस से खेत में पानी भराव जैसी स्थिति पैदा नहीं होती व पैदावार भी अच्छी मिलती है.

इस मशीन का इस्तेमाल किसी भी तरह की मिट्टी में हो सकता है, लेकिन हलकी बलुई दोमट, दोमट व चिकनी मिट्टी में इस का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है, क्योंकि इस  तरह की मिट्टी में ही ज्यादातर सख्त परतें बनती हैं.

सबसौयलर से जुताई के फायदे

इस मशीन का खास काम मिट्टी में बनी सख्त परतें तोड़ना है व जब ये परतें टूट जाती हैं, तो उस के कई फायदे होते हैं.

* सख्त परतें टूट जाने से मिट्टी में हवा का आवागमन बढ़ता है और मिट्टी में मौजूद फायदेमंद छोटे जीवों की काम करने की ताकत बढ़ जाती है.

* मिट्टी में पानी का आवागमन बढ़ता है, जिस से खेत की पानी सोखने की कूवत बढ़ जाती है व खेत में पानी भराव के हालात पैदा नहीं होते.

* कड़ी परतें टूट जाने के बाद पौधों की जड़ें खेत में ज्यादा गहराई तक जा कर पोषक तत्त्वों व पानी का अवशोषण करती हैं, जिस से उन के विकास में बढ़वार तो होती ही है, साथ ही खेत में मौजूद पोषक तत्त्व व पानी का सही इंतजाम भी होता है.

*  इस मशीन के इस्तेमाल से खेत में दीमक का असर भी कम हो जाता है, क्योंकि मशीन चलने से दीमक के घर खत्म हो जाते हैं.

* जब सबसौयलर खेत चले में तो पौधों की जड़ें ज्यादा गहरी जाती हैं, इसलिए आंधीतूफान व बाढ़ वगैरह की स्थिति आने पर फसल गिरने की समस्या कम हो जाती है.

* ज्यादा लवण वाली मिट्टी में इस मशीन को चलाने से मिट्टी की ऊपरी सतह में मौजूद लवण की फालतू मात्रा पानी के साथ रिस कर जमीन के काफी नीचे चली जाती है और खेत ऊसर नहीं बनता.

ऐसे करें मशीन का इस्तेमाल

इस मशीन को ट्रैक्टर के पीछे लगा कर खेत में चलाया जाता है. हालांकि इस का खास काम मिट्टी की कड़ी परतों को तोड़ना है, लेकिन इस के मूल ढांचे में थोड़ा सा बदलाव कर इस को ज्यादा कारगर बना दिया गया है. अब इस मशीन से परत तोड़ने के साथसाथ खेत में गहराई पर खाद देने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

सबसौयलर का इस्तेमाल करते समय कुछ जरूरी बातों का खयाल रखें :

*      सबसौयलर के टाइंस की दूरी ठीक होनी चाहिए.

*      खेत में नमी बहुत ज्यादा या बहुत कम नहीं होनी चाहिए.

*      सबसौयलर चलाने के बाद खेत में भारी मशीनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

घर के आंगन में  आदर्श गृह वाटिका

आजकल बाजार में बिकने वाली चमकदार फलसब्जियों को रासायनिक उर्वरक का प्रयोग कर के उगाया जाता है. रसायनों का इस्तेमाल खरपतवार, कीड़े व बीमारियों रोकने के लिए किया जाता है.

इन रासायनिक दवाओं का कुछ अंश फलसब्जी में बाद तक भी बना रहता है. इस के कारण इन्हें इस्तेमाल करने वालों में बीमारियों से लड़ने की ताकत कम होती जा रही है.

इस के अलावा फलों व सब्जियों के स्वाद में अंतर आ जाता है, इसलिए हमें अपने घर के आंगन या आसपास की खाली जगह में छोटीछोटी क्यारियां बना कर जैविक खादों का इस्तेमाल कर के रसायनरहित फलसब्जियों को उगाना चाहिए.

स्थान का चयन

इस के लिए स्थान चुनने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती, क्योंकि अधिकतर ये स्थान घर के पीछे या आसपास ही होते हैं. घर से मिले होने के कारण थोड़ा कम समय मिलने पर भी काम करने में सुविधा रहती है.

गृह वाटिका के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए, जहां पानी पर्याप्त मात्रा में मिल सके, जैसे नलकूप या कुएं का पानी, स्नान का पानी, रसोईघर में इस्तेमाल किया गया पानी पोषण वाटिका तक पहुंच सके.

स्थान खुला हो, ताकि उस में सूरज की भरपूर रोशनी आसानी से पहुंच सके. ऐसा स्थान हो, जो जानवरों से सुरक्षित हो और उस स्थान की मिट्टी उपजाऊ हो.

पोषण वाटिका का आकार

जहां तक पोषण वाटिका के आकार का संबंध है, तो वह जमीन की उपलब्धता, परिवार के सदस्यों की संख्या और समय की उपलब्धता पर निर्भर होता है.

लगातार फसल चक्र, सघन बागबानी और अंत:फसल खेती को अपनाते हुए एक औसत परिवार, जिस में 1 औरत, 1 मर्द व 3 बच्चे यानी कुल 5 सदस्य हों, ऐसे परिवार के लिए औसतन 250 वर्गमीटर की जमीन काफी है. इसी से अधिकतम पैदावार ले कर पूरे साल अपने परिवार के लिए फलसब्जियां हासिल की जा सकती है.

बनावट

आदर्श पोषण वाटिका के लिए उत्तरी भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध 250 वर्गमीटर क्षेत्र में बहुवर्षीय पौधों को वाटिका के उस तरफ लगाना चाहिए, जिस से उन पौधों की अन्य दूसरे पौधों पर छाया न पड़ सके. साथ ही, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि ये पौधे एकवर्षीय सब्जियों के फसल चक्र और उन के पोषक तत्त्वों की मात्रा में बाधा न डाल सकें.

पूरे क्षेत्र को 8-10 वर्गमीटर की 15 क्यारियों में विभाजित कर लें और इन बातों का ध्यान रखें :

* वाटिका के चारों तरफ बाड़ का प्रयोग करना चाहिए, जिस में 3 तरफ गरमी व वर्षा के समय कद्दूवर्गीय पौधों को चढ़ाना चाहिए और बची हुई चौथी तरफ सेम लगानी चाहिए.

* फसल चक्र व सघन फसल पद्धति को अपनाना चाहिए.

* 2 क्यारियों के बीच की मेंड़ों पर जड़ों वाली सब्जियों को उगाना चाहिए.

* रास्ते के एक तरफ टमाटर और दूसरी तरफ चौलाई या दूसरी पत्ती वाली सब्जी उगानी चाहिए.

* वाटिका के 2 कोनों पर खाद के गड्ढे होने चाहिए, जिन में से एक तरफ वर्मी कंपोस्ट यूनिट और दूसरी तरफ कंपोस्ट खाद का गड्ढा हो, जिस में घर का कूड़ाकरकट व फसल अवशेष डाल कर खाद तैयार की जा सके.

इन गड्ढों के ऊपर छाया के लिए सेम जैसी बेल चढ़ा कर छाया बनाए रखें. इस से पोषक तत्त्वों की कमी भी नहीं होगी और गड्ढे भी छिपे रहेंगे.

फसल की व्यवस्था

पोषण वाटिका में बोआई करने से पहले योजना बना लेनी चाहिए, ताकि पूरे साल फलसब्जियां मिलती रहें. योजना में निम्नलिखित बातों का उल्लेख होना चाहिए :

फलसब्जियों के नाम

इन के अलावा अन्य सब्जियों को भी जरूरत के मुताबिक उगा सकते हैं :

* आलू, लोबिया, अगेती फूलगोभी.

* मेंड़ों पर मूली, गाजर, शलजम, चुकंदर, बाकला, धनिया, पोदीना, प्याज व हरे साग वगैरह लगाने चाहिए.

* बेल वाली सब्जियां जैसे लौकी, तुरई, चप्पनकद्दू, परवल, करेला, सीताफल वगैरह को बाड़ के रूप में किनारों पर ही लगाना चाहिए.

* वाटिका में पपीता, अनार, नीबू, करौंदा, केला, अंगूर, अमरूद वगैरह के पौधों को सघन विधि से इस प्रकार किनारे की तरफ लगाएं, जिस से सब्जियों पर छाया न पड़े और पोषक तत्त्वों के लिए मुकाबला न हो.

इस फसल चक्र में कुछ यूरोपियन सब्जियां भी रखी गई हैं, जो कुछ अधिक पोषण युक्त होती हैं व कैंसर जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक कूवत रखती हैं.

पोषण वाटिका को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए उस में कुछ सजावटी पौधे भी लगाए जा सकते हैं :

*      पछेती फूलगोभी, लोबिया, लोबिया (वर्षा)

*      पत्तागोभी, ग्वार, फ्रैंच, बीन

*      मटर, भिंडी, टिंडा

*      फूलगोभी, गांठगोभी (मध्यवर्ती), मूली, प्याज

*      बैगन के साथ पालक, अंत:फसल के रूप में खीरा

*      गाजर, भिंडी, खीरा

*      ब्रोकली, चौलाई, मूंगफली

*      स्प्राउट ब्रसेल्स, बैगन (लंबे वाले)

*      खीरा, प्याज

*      लहसुन, मिर्च, शिमला मिर्च

*      चाइनीज कैबेज, प्याज (खरीफ)

*      अश्वगंध (सालभर), अंत:फसल लहसुन

*      मटर, टमाटर, अरवी

पोषण वाटिका के लाभ

* जैविक उत्पाद (रसायनरहित) होने के कारण फलसब्जियों में काफी मात्रा में पोषक तत्त्व मौजूद रहते हैं.

* बाजार में फलसब्जियों की कीमत अधिक होती है, जिसे न खरीदने से अच्छीखासी बचत होती है.

* परिवार के लिए हमेशा ताजा फलसब्जियां मिलती रहती हैं.

* वाटिका की सब्जियां बाजार के मुकाबले अच्छी क्वालिटी वाली होती हैं.

* गृह वाटिका लगा कर महिलाएं अपनी व अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकती हैं.

* पोषण वाटिका से प्राप्त मौसमी फल व सब्जियों को परिरक्षित कर के सालभर इस्तेमाल किया जा सकता है.

* यह बच्चों के प्रशिक्षण का भी अच्छा साधन है.

* यह मनोरंजन और व्यायाम का भी एक अच्छा साधन है.

* मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी खुद उगाई गई फलसब्जियां बाजार की फलसब्जियों से अधिक स्वादिष्ठ लगती हैं.

बीआईएस ने एग्री बाय-प्रोडक्‍ट के लिए जारी किया मानक, कृषि उत्पादों और पत्तियों से बनेंगे बरतन

नई दिल्ली : भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने और सस्‍टेनेबिलिटी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एग्री बाय-प्रोडक्‍ट से बने भोजन परोसने वाले खास बरतनों के लिए मानक आईएस 18267: 2023 को जारी किया है. यह मानक निर्माताओं और उपभोक्ताओं को व्यापक दिशानिर्देश प्रदान करता है, ताकि देशभर में गुणवत्ता आवश्यकताओं में एकरूपता सुनिश्चित हो सके.

इस मानक के लागू होने के व्यापक फायदे हैं, क्योंकि बायोडिग्रेडेबल एग्री बाय-प्रोडक्‍ट बरतनों के उपयोग से पर्यावरण सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और एक चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है. इन बरतनों में किसी नुकसानदेह पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया है, और इसलिए इन से उपभोक्ताओं का कल्याण सुनिश्चित होगा.

यह मानक किसानों के लिए आर्थिक अवसर सृजित करता है और सस्‍टेनेबल कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देते हुए ग्रामीण विकास में योगदान करता है.

दुनियाभर में डिस्पोजेबल टेबलवेयर का उपयोग बढ़ रहा है. इस से डिस्पोजेबल टेबलवेयर के वैश्विक बाजार का भी विस्‍तार हो रहा है. डिस्पोजेबल प्लेट का बाजार वर्ष 2020 में 4.26 अरब डालर था, जो बढ़ कर वर्ष 2028 तक 6.73 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान है.

इसी प्रकार वर्ष 2021 से 2028 के बीच इस में 5.94 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर (सीएजीआर) से विस्‍तार होगा.

भारत में कई लार्ज स्‍केल और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) स्तर के विनिर्माता बायोडिग्रेडेबल कटलरी के उत्पादन में सक्रिय योगदान कर रहे हैं. उन्हें इस मानक के लागू होने से काफी फायदा होगा. इन उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और इसलिए इन के उत्पादन से जुड़े विनिर्माताओं की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है.

इस मानक में बायोडिग्रेडेबल बरतनों के उत्पादन के लिए कच्चे माल, विनिर्माण तकनीक, प्रदर्शन और स्वच्छता आवश्यकताओं सहित विभिन्न पहलुओं को शामिल किया गया है. इस में प्लेट, कप, कटोरे आदि बरतन बनाने के लिए पसंदीदा सामग्री के तौर पर खास पत्तियों और आवरण जैसे कृषि बाय-प्रोडक्‍ट्स के उपयोग को निर्दिष्ट किया गया है.

यह मानक पौधों और पेड़ों के उपयुक्त हिस्सों का उपयोग करने का सुझाव देता है. साथ ही, यह हाट प्रैसिंग, कोल्‍ड प्रैसिंग, मोल्डिंग और सिलाई जैसी विनिर्माण तकनीक प्रदान करता है. यह चिकनी सतहों, बिना धारदार किनारों के उपयोग पर भी जोर देता है और रसायनों, रेजिन और चिपकने वाले पदार्थों के उपयोग को प्रतिबंधित करता है.

मात्स्यिकी महाविद्यालय में छात्रसंघ कार्यालय का उद्घाटन

उदयपुर : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संगठक, मात्स्यिकी महाविद्यालय में छात्रसंघ कार्यालय का उद्घाटन मुख्य अतिथि डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, एमपीयूएटी ने एवं कालेज के डीन डा. बीके शर्मा एवं छात्र प्रतिनिधियों की उपस्थिति में किया.

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश सचिव एनएसयूआई, सत्येंद्र यादव, छात्रसंघ अध्यक्ष, एमपीयूएटी, महासचिव मनीष बुनकर, रिसर्च रिप्रेजेंटेटिव मनोज मीणा, दीपेंद्र सिंह, अध्यक्ष, आरसीए, प्रदीप मेहरा महासचिव, सीसीएएस, एवं अन्य महाविद्यालयों के अनेक छात्रछात्राएं उपस्थित थे.

महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डा. सुबोध शर्मा एवं प्रशासनिक अधिकारी डा. एमएल ओझा एवं कालेज के सभी अध्यापक और स्टाफ सदस्य उपस्थित थे.

छात्रसंघ कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर महाविद्यालय के निर्विरोध चुने गए महासचिव जयराम जाट एवं संयुक्त सचिव सौरभ मीणा को आपसी सहयोग व भाईचारे की मिसाल कायम करने पर बधाई दी.

इस अवसर पर कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने विद्यार्थियों को मात्स्यिकी सेवाओं और उच्च अध्ययन में उज्ज्वल भविष्य के बारे में बताते हुए अपने स्वयं के, प्रदेश के और राष्ट्र के निर्माण में जुट जाने का आह्वान किया. उन्होंने राज्य के एकमात्र महाविद्यालय के विकास एवं यहां फैकल्टी लाने का आश्वासन भी दिया. साथ ही, उन्होंने महाविद्यालय के दो विद्यार्थियों का आईसीएआर की राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना में संस्थागत विकास कार्यक्रम के अंतर्गत चयन होने एवं उन्हें उच्चस्तरीय मात्स्यिकी संस्थान में थाईलैंड में प्रशिक्षण के लिए भेजने के लिए अधिष्ठाता को बधाई दी.

मात्स्यिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. बीके शर्मा ने छात्रसंघ के पदाधिकारियों को महाविद्यालय के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने, शिक्षण सुविधाओं का लाभ उठाने एवं लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने में अपनी पूरी शक्ति से जुट जाने का आह्वान किया.

फेस औथेंटिकेशन फीचर वाला पीएम किसान मोबाइल एप लौंच

नई दिल्ली : 22 जून 2023. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी व किसानों को आय सहायता के लिए लोकप्रिय योजना “प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि” के अंतर्गत फेस औथेंटिकेशन फीचर का पीएम किसान मोबाइल एप केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लौंच किया.

आधुनिक टैक्नोलौजी के बेहतरीन उदाहरण इस एप से फेस औथेंटिकेशन फीचर का उपयोग कर किसान दूरदराज, घर बैठे भी आसानी से बिना ओटीपी या फिंगरप्रिंट के ही फेस स्कैनर के जरीए ईकेवाईसी पूरा कर सकता है और सौ अन्य किसानों को भी उन के घर पर ईकेवाईसी करने में मदद कर सकता है. भारत सरकार ने ईकेवाईसी को अनिवार्य रूप से पूरा करने की आवश्यकता समझते हुए किसानों का ईकेवाईसी करने की क्षमता को राज्य सरकारों के अधिकारियों तक भी बढ़ाया है, जिस से हरेक अधिकारी 500 किसानों के लिए ईकेवाईसी प्रक्रिया को पूरा कर सकता है.

कृषि भवन, नई दिल्ली में आयोजित इस समारोह से देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों में उपस्थित हजारों किसानों के साथ ही केंद्र व राज्य सरकारों के अधिकारी और विभिन्न सरकारी एजेंसियों एवं कृषि संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में वर्चुअल जुड़े थे.

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि भारत सरकार की बहुत ही व्यापक एवं महत्वाकांक्षी योजना है, जिस के क्रियान्वयन में राज्य सरकारों ने काफी परिश्रमपूर्वक अपनी भूमिका का निर्वहन किया है, इसी का परिणाम है कि लगभग साढ़े 8 करोड़ किसानों को केवाईसी के बाद हम योजना की किस्त देने की स्थिति में आ गए हैं. यह प्लेटफार्म जितना परिमार्जित होगा, वह पीएम किसान के काम तो आएगा ही, और किसानों को कभी भी कोई लाभ देना हो, तब भी केंद्र व राज्य सरकारों के पास पूरा डेटा उपलब्ध होगा, जिस से कोई परेशानी खड़ी नहीं हो सकेगी.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि पीएम किसान एक अभिनव योजना है, जिस का लाभ बिना किसी बिचौलियों के केंद्र सरकार किसानों को दे पा रही है. आज इतनी बड़ी संख्या में किसानों को टैक्नोलौजी की मदद से ही लाभ देना संभव हो पाया है. इस पूरी योजना के क्रियान्वयन पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं कर सकता है, जो बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि है. भारत सरकार ने टैक्नोलौजी का उपयोग कर के यह जो एप बनाया है, उस से काम काफी आसान हो गया है. भारत सरकार ने सभी आवश्यक सुविधाएं राज्यों को उपलब्ध करा दी हैं, अब राज्य ज्यादा तेजी से काम करेंगे, तो सभी हितग्राहियों तक हम पहुंच जाएंगे और निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे.

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार यह आग्रह करते रहे हैं कि योजना के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध है तो हम सेचुरेशन पर पहुंचे. उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में इस दिशा में काम चल रहा है, जिसे शीघ्र पूरा करने पर ज्यादा से ज्यादा संख्या में सभी पात्र किसानों को योजना की 14वीं किस्त मिल सकेगी. उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि इस संबंध में सभी राज्य सरकारें प्रवृत्त हों.

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि टैक्नोलौजी से कृषि क्षेत्र को लाभ हो रहा है और इस एप की नई सुविधा से भी किसानों को काफी सहूलियत होगी.

केंद्रीय कृषि सचिव मनोज अहूजा ने भी अपने विचार रखे. अतिरिक्त सचिव प्रमोद कुमार मेहरदा ने एप की विशेषताएं बताईं. कार्यक्रम का संचालन विभागीय सलाहकार मनोज कुमार गुप्ता ने किया.

इस अवसर पर कुछ राज्य सरकारों के अधिकारियों ने योजना व एप के लाभ से संबंधित अपने अनुभव भी साझा किए. युवाओं के जरीए भी एप से अधिकाधिक किसानों को जोड़ने का प्रयास किया जाएगा और निर्धारित मापदंडों के आधार पर इस में सहायक युवाओं को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा सर्टिफिकेट दिया जाएगा.

पीएम किसान दुनिया की सब से बड़ी डीबीटी योजनाओं में से एक है, जिस में किसानों को आधारकार्ड से जुड़े बैंक खातों में 6 हजार रुपए सालाना राशि, 3 किस्तों में सीधे हस्तांतरित की जाती है. 2.42 लाख करोड़ रुपए, 11 करोड़ से ज्यादा किसानों के खातों में शिफ्ट किए जा चुके हैं, जिन में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं हैं. कोविड के समय लौकडाउन के दौरान भी किसानों के लिए पीएम किसान योजना एक मजबूत साथी साबित हुई थी. योजना ने किसानों को सीधे वित्तीय सहायता प्रदान कर आवश्यक सुविधाओं को सुनिश्चित किया व कठिन समय में आत्मविश्वास प्रदान किया है. अब पीएम किसान पोर्टल पर आधार सत्यापन व बैंक खाता विवरण अपडेशन से संबंधित कठिनाइयों का डिजिटल पब्लिक गुड्स के प्रभावी उपयोग से समाधान हो गया.

पहली बार देखा गया है कि 8.1 करोड़ से अधिक किसानों को पीएम किसान की 13वीं किस्त का भुगतान सीधे उन के आधारकार्ड से जुड़े बैंक खातों में केवल आधार इनेबल्ड पेमेंट के जरीए सफलतापूर्वक किया गया, जो अपनेआप में एक कीर्तिमान है. नया एप उपयोग में बहुत सरल है, गूगल प्ले स्टोर पर आसानी से डाउनलोड हेतु उपलब्ध है. एप किसानों को योजना व पीएम किसान खातों से संबंधित बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारी भी प्रदान करेगा. इस में नो यूअर स्टेटस मौड्यूल उपयोग कर किसान लैंडसीडिंग, आधारकार्ड को बैंक खातों से जोड़ने व ईकेवाईसी का स्टेटस जान सकते हैं.

विभाग ने लाभार्थियों के लिए उन के दरवाजे पर आधारकार्ड से जुड़े बैंक खाते खोलने के लिए इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) को भी शामिल किया है और सीएससी को राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की मदद से ग्रामस्तरीय ईकेवाईसी शिविर आयोजित करने को कहा.

खरीफ में सब्जी,धान व दलहनी फसलों की उन्नत किस्में लगाएं

हर वर्ष की तरह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने खरीफ फसलों की बुआई को लेकर जरूरी सलाह व दिशानिर्देश जारी किए हैं. कृषि संस्थान ने किसानों को धान की नर्सरी तैयार करने की सलाह दी है, इसके साथ ही, अधिक उपज देने वाली किस्मों के चयन और बीजों के उपचार के लिए भी सलाह दी है

अगेती फसल से अधिक मुनाफा

कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार, यह समय अगेती फूलगोभी, टमाटर, हरी मिर्च और बैंगन की पौधशाला तैयार करने का उचित समय है.

मिट्टी जाँच कराने से फायदा

फसल लगाने से पहले अपने खेत की मिट्टी जांच करवाने का भी काम किसानों को कर लेना चाहिए. खेत की मिट्टी की जांच किसी प्रमाणित स्रोत से करवाएं. मिट्टी जांच के बाद मिले नतीजों के आधार पर खेत में खादबीजऔर उचित पोषक तत्वों वाले उर्वरक जमीन में डालें.

इसके अलावा अगर आप के खेत एकसार नहीं हैं तो लेजर लैंड लेबलर की मदद से खेत को समतल भी करा सकते हैं.

ऐसा करने से खेत में कहीं जलभराव भी नहीं होता और फसल से अधिक पैदावार भी मिलती है.

अपने क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजाति का चयन

इस समय धान की फसल का भी समय है. धान की अधिक पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों का चयन करे .अपने क्षेत्र के लिए धान की अधिक पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों का चयन करें. इस की जानकारी के लिए नजदीकी कृषि संस्थान से भी जानकारी ले सकते हैं.

खास किस्में : धान की खास किस्मों में पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1509,
पूसा बासमती 1885, पूसा बासमती 1886,
पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1637,
पूसा 44, पूसा 1718, पूसा बासमती 1401,
पूसा सुगंध 5, पूसा सुगंध 4 (पूसा 1121),
पंत धान 4, पंत धान 10 जैसी किस्में शामिल हैं.

ये सभी प्रजातियां किसानों को अच्छी पैदावार देने वाली हैं.

धान की नर्सरी

धान की नर्सरी तैयार करने के लिए नर्सरी की क्यारियों को लगभग 1.25 से 1.5 मीटर की लंबाई चौडाई के अनुसार बनाएं.

करें बीज उपचार

पौधशाला में पौध तैयार करते समय बुवाई से पहले, बीजों को उपचारित करें. इसके बाद, बीजों को बाहर निकालकर किसी छायादार स्थान में 24-36 घंटे तक टाट, बोरी आदि से ढककर रखें और हल्के-हल्के पानी की छिड़काव करते रहें. ताकि नमीं बनी रहे और बीजों का अंकुरण अच्छा हो सके.

अरहर की खेती के लिए

अरहर की अधिक उपज वाली किस्मों का चयन करें. इन दिनों अरहर की बुवाई कर सकते हैं. ध्यान रहे, जिस खेत अरहर की खेती करनी है उसमें पानी का ठहराव न हो. पानी निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए.
बीज से अच्छे अंकुरण के लिए बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का ध्यान रखना आवश्यक होता है.

अरहर की अधिक उपज देने वाली किस्में:

पूसा अरहर-16, पूसा 2001, पूसा 2002, पूसा 991, पूसा 992 आदि.

बीजोपचार करें

बीजों को बोने से पहले अरहर के लिए राईजोबियम और फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जीवाणुओं (पीएसबी) के टीकों से उपचार करें .इस उपचार से फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है.

मूंग उड़द की खेती

मूंग और उड़द की भी बोआई भी इस समय कर सकते हैं.

मूंग की उन्नत किस्में
मूंग की उन्नत किस्मों में
पूसा-1431, पूसा-1641,
पूसा विशाल,
पूसा-5931, एस एम एल-668.

उड़द की उन्नत और नई किस्में

उड़द की उन्नत किस्मों में टाईप-9, टी-31, टी-39 आदि की बुवाई कर सकते हैं.
सभी दलहनी फसलों को बोने से पहले उपचारित जरूर करें.

जरूरी सावधानियाँ

किसानों को फसल से अच्छी उपज लेने के लिए चाहिए कि वह समय से फसल बोयें. साथ ही खेत में जलभराव न होने दें. खेत में खरपतवार न पनपने दें. समय से निराईगुड़ाई करते रहें. साथ ही कीटबीमारी का भी ध्यान रखें.

प्रदेश के सभी कृषि विश्वविद्यालयों में टेस्टिंग लैब स्थापित की जाए

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में उन के सरकारी आवास पर राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के संचालक मंडल की 168वीं बैठक आयोजित की गई.

इस मौके पर मुख्यमंत्री द्वारा किसानों के हितों के संरक्षण के लिए विभिन्न दिशानिर्देश दिए गए.
बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद द्वारा किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए किए जा रहे प्रयास सराहनीय है. मंडी शुल्क को न्यूनतम करने के बाद भी राजस्व संग्रह में मंडियों का अच्छा योगदान है. वित्तीय वर्ष 2021-22 में जहां 614 करोड़ रुपए की आय हुई थी, वहीं वर्ष 2022-23 में 1520.95 करोड़ रुपए की आय हुई है. वर्तमान वित्तीय वर्ष के पहले 2 माह में अब तक 251.61 करोड़ रुपए का राजस्व संग्रहित हो चुका है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि फसलों को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, बागबानी फसलों के गुणवत्तापूर्ण रोपण एवं रोगमुक्त बनाने के लिए आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय किसानों की सुविधा के दृष्टिगत राज्य सरकार ने बड़ी संख्या में ग्रामीण हाटपैठ और आधुनिक किसान मंडियों का निर्माण कराया है, क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार नए हाटपैठ और किसान मंडियों का निर्माण कराया जाना चाहिए. इन का अच्छा मेंटीनेंस रखें. पटरी व्यवसायियों को यहां समायोजित किया जाना चाहिए. मंडियों में रोशनी की समुचित व्यवस्था हो, जलभराव की स्थिति न हो, किसानों की सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाए और कृषि फसल की सुरक्षा के अच्छे इंतजाम किए जाएं. शौचालय और पेयजल के पर्याप्त इंतजाम रखें.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि यह सुखद है कि मंडी परिषद की सहायता से कृषि विश्वविद्यालयों में छात्रावासों का निर्माण कराया जा रहा है. इन छात्रावासों का निर्माण कार्य गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखते हुए समयबद्ध ढंग से कराया जाए. कृषि मंत्री द्वारा इन निर्माणाधीन छात्रावासों का निरीक्षण किया जाए. विभिन्न जनपदों में कृषि उत्पादन मंडी परिषद की भूमि/भवन निष्प्रयोज्य हैं. इस भूमि/ भवन के व्यवस्थित इस्तेमाल के लिए ठोस कार्ययोजना बनाई जाए. इन के माध्यम से परिषद अपनी आय का एक नवीन विकल्प भी सृजित कर सकता है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आगे कहा कि कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा अनेक नीतिगत प्रयास किए जा रहे हैं. प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए भी योजनाबद्ध रीति से काम किया जा रहा है. किसानों को उन की उपज की वाजिब कीमत मिले, उत्पाद की ब्रांडिंग हो, सही बाजार मिले, इस के लिए राजधानी लखनऊ में ‘एग्री मौल’ स्थापित किया जा रहा है. इस बारे में कार्यवाही तेजी से आगे बढाएं. एग्री मौल में किसान सीधे अपने फलसब्जियों की बिक्री कर सकेंगे. मंडी परिषद द्वारा नवी मुंबई में निर्यात प्रोत्साहन के लिए वर्ष 2006 में स्थापित किए गए औफिस ब्लौक को और उपयोगी बनाने के लिए इसे एमएसएमई विभाग से जोड़ा जाना चाहिए.

इस अवसर पर कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही और राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के संचालक मंडल के सदस्यगण उपस्थित थे.

लेजर लैंड लैवलर: खेत करे एकसार

फसल से बेहतर पैदावार लेने के लिए खेत का समतल होना जरूरी है. अगर खेत कहीं से ऊंचा या नीचा नहीं है तो उस खेत की पैदावार दूसरे असमतल खेतों से कहीं ज्यादा होगी. साथ ही, लागत भी कम होगी.

ऊंचेनीचे खेत में सिंचाई करते समय पानी पूरी तरह से समान रूप से नहीं फैल पाता है. इस वजह से खेत में कुछ जगहों पर खरपतवार पनपने लगते हैं और सभी पौधों व बीजों को सही अनुपात में पानी नहीं मिल पाता है, जिस से पैदावार पर बुरा असर पड़ता है. लेजर लैंड लैवलर मशीन का इस्तेमाल कर के किसान इस समस्या को दूर कर सकते हैं.

लेजर लैंड लैवलर

यह लैवलर 4 उपकरणों से मिल कर बनता है, जिन्हें लेजर ट्रांसमीटर, लेजर रिसीवर, कंट्रोल बौक्स व लैवलर कहते हैं.

लेजर ट्रांसमीटर : लेजर ट्रांसमीटर एक तिपाई स्टैंड पर लगा होता है, जो लेजर यानी तरंगों को ट्रैक्टर पर तेजी से भेजता है. इन तरंगों की मदद से खेत के ऊंचेनीचे हिस्सों का पता लगता है. यह औजार खेत के किसी भी हिस्से में रखा जा सकता है.

लेजर रिसीवर : यह औजार लैवलर के ऊपर लगा होता है. ट्रांसमीटर द्वारा भेजी गई तरंगों को यह लगातार पकड़ता रहता है और इस की सूचना कंट्रोल बौक्स को भेजता रहता है.

कंट्रोल बौक्स : यह औजार ट्रैक्टर के ऊपर लगाया जाता है. लेजर रिसीवर द्वारा हासिल तरंगों के मुताबिक ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक सिस्टम की मदद से लैवलर को ऊपरनीचे करता रहता है.

लैवलर : यह औजार ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक सिस्टम से जोड़ा जाता है, जो तीनों औजारों की मदद से खेत को एकसमान रूप से समतल करता है.

काम करने का तरीका

जब ट्रांसमीटर से तरंगें निकल कर रिसीवर से टकराती हैं, जो बकेट के ऊपर लगे स्टैंड पर बंधा होता है, तो रिसीवर किरणों के मध्य में रहते हुए चेन द्वारा जुड़े हुए कंट्रोल बौक्स को ऊपर या नीचे जाने के लिए सिग्नल भेजता है. कंट्रोल बौक्स में से उसी समय करंट हाइड्रोलिक सिस्टम को जाता है, जिस से हाइड्रोलिक तेल की सप्लाई बकेट के पीछे टायरों के बीच में लगे हाइड्रोलिक सिलैंडर को मिलती है. यह सिलैंडर टायरों को ऊपरनीचे करता है, जिस के विपरीत बकेट ऊपरनीचे होती रहती है.

बकेट आगेपीछे दोनों तरफ पिनों के साथ जुड़ी होती है, इसलिए उस पर जमीन के ऊंचानीचा होने का कोई असर नहीं पड़ता. बकेट को एक सीमित ऊंचाई पर बंधे होने से उस के आगे आने वाली मिट्टी कट कर आगे खिंची चली जाती है और जहां पर गड्ढा मिलता है, मिट्टी खुद ही बकेट के नीचे से निकल कर फैलती रहती है. इस तरह खेत समतल हो जाता है. ट्रैक्टर को ऊंचाई की तरफ से निचाई की दिशा में चलाना होता है, बाकी काम लेजर लैवलर द्वारा अपनेआप किया जाता है.

लेजर लैंड लैवलर के फायदे

* खेत में पानी, खाद और कीटनाशक दवाओं का एकसमान फैलाव होने से पैदावार बढ़ती है और मिट्टी समतल करने से समय की बचत होती है.

* पानी का पूरापूरा इस्तेमाल होता है और पानी की 30-40 फीसदी तक बचत होती है.

* फसल की पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* खरपतवारों में कमी आती है और खरपतवार काबू करने में काफी मदद मिलती है.

*  फसल एकसमान पकती है.

यंत्र की खरीद पर सरकार द्वारा सब्सिडी

लेजर लैंड लैवलर एक महंगा कृषि यंत्र है. इस यंत्र को इस्तेमाल करने के लिए ट्रैक्टर की भी जरूरत होती है.

इस यंत्र की खरीद पर सरकार द्वारा किसानों को सब्सिडी भी दी जाती है, जो अलगअलग राज्यों में कम या ज्यादा हो सकती है. आमतौर पर छोटे, सीमांतक महिला किसानों के लिए सरकार द्वारा 50 फीसदी तक सब्सिडी दी जाती है. बडे़ किसानों को यह सब्सिडी 40 फीसदी तक भी हो सकती है.

इस के अलावा कुछ शर्तें भी हैं, जिन का पालन करना भी जरूरी है. जैसे, किसानों को पोर्टल पर आवेदन करते समय यह निश्चित करना होगा कि वह अपने खेत में फसल अवशेष नहीं जलाएंगे.

ट्रैक्टरचालित यंत्रों के लिए यदि आवेदन किया है तो किसान के पास ट्रैक्टर भी होना चाहिए, जो उसी के नाम रजिस्टर्ड हो.

आवेदक के नाम या उस की पत्नी/पति/पिता/माता/पुत्र/पुत्री के नाम पर कृषि जमीन होनी चाहिए.

संबंधित वैबसाइट पर कृषि यंत्र निर्माताओं व यंत्र बेचने वालों की सूची भी होती है. अपनी सुविधानुसार मनपसंद डीलर से यंत्र लिया जा सकता है.

आम के फलों पर कीट नियंत्रण के उपायों को ले कर कार्यशाला का आयोजन

मुंबई : एशिया पैसिफिक प्लांट प्रोटेक्शन कमीशन ने भारत को नवंबर, 2022 के दौरान बैंकौक में आयोजित एशिया और पैसिफिक प्लांट प्रोटेक्शन कमीशन (एपीपीपीसी) के 32वें सत्र के दौरान 2023-24 के लिए कीट नियंत्रण उपायों को ले कर (आईपीएम) सर्वसम्मति से स्थायी समिति के द्विवार्षिक अध्यक्ष के रूप में चुना गया था. आम के फलों पर कीट नियंत्रण उपायों के प्रबंधन के लिए सिस्टम दृष्टिकोण पर कार्यशाला का आयोजन एपीपीपीसी और कृषि मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से 19 जून से 23 जून, 2023 तक वाशी, नवी मुंबई में किया जा रहा है.

भारत सरकार की कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने आशीष कुमार श्रीवास्तव, संयुक्त सचिव (पीपी), कृषि और किसान कल्याण विभाग, डा. युबकधोज जीसी, कार्यकारी सचिव, एपीपीपीसी सचिवालय, डा. एसएन सुशील, निदेशक, आईसीएआर-एनबीएआईआर, एमओए एंड एफडब्ल्यू और डा. जेपी सिंह, पीपीए, डीपीपीक्यूएस की उपस्थिति में कार्यशाला का उद्घाटन किया.

उद्घाटन भाषण में शोभा करंदलाजे ने विश्वभर में बाजार उपलब्ध कराने के लिए कीटनाशक और अवशेषमुक्त फलों और सब्जियों के उत्पादन पर जोर दिया है, ताकि किसानों की आय में वृद्धि की जा सके.

उन्होंने कामना की कि कार्यशाला से मिलने वाले लाभ वसुधैव कुटुंबकम के भारत के आदर्श वाक्य का प्रसार करेंगे.

उन्होंने आगे कृषि निर्यात/व्यापार, किए जाने वाले उपायों और निर्यात प्रोत्साहन के लिए मिल कर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया.

संयुक्त सचिव (पीपी) आशीष कुमार श्रीवास्तव ने अंतर्राष्ट्रीय पादप संरक्षण सम्मेलन (आईपीपीसी), एपीपीपीसी और जिंसों के सुरक्षित ट्रांसबाउंड्री मूवमेंट के लिए फाइटोसैनेटरी मिटिगेशन में उन की भूमिका के बारे में जानकारी दी है.

इतना ही नहीं, उन्होंने भारत में आम के लिए सिस्टम के कार्यान्वयन पर अपने अनुभव साझा किए. इस सिलसिले में उन्होंने कृषि पंजीकरण/राज्य कृषि विभाग के साथ बाग पंजीकरण, किसान स्तर पर एकीकृत कीट प्रबंधन के आवेदन, कीट की नियमित निगरानी और कीट के समय पर प्रबंधन द्वारा सभी महत्वपूर्ण कृषि वस्तुओं के लिए सिस्टम दृष्टिकोण के विकास पर जोर दिया, जिस से सभी किसान यहां तक कि छोटे और सीमांत किसान भी निर्यात गुणवत्ता वाली उपज का उत्पादन कर सकें और कड़े उपचार से बचा जा सके.

आईसीएआर-एनबीएआईआर के निदेशक डा. एसएन सुशील ने पादप स्वच्छता उपायों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुरूप भारत में सिस्टम दृष्टिकोण के सफल कार्यान्वयन की जानकारी दी और विशेष रूप से ग्रेपनेट के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यताप्राप्त सिस्टम दृष्टिकोण को याद किया.

डीपीपीक्यू एंड एस के पौध संरक्षण सलाहकार और एपीपीपीसी-आईपीएम की स्थायी समिति के अध्यक्ष डा. जेपी सिंह ने अपने स्वागत भाषण में किसानों के पंजीकरण, किसानों द्वारा अच्छी कृषि पद्धतियों को अपनाने, कीट निगरानी और फाइटोसैनेटरी के माध्यम से भारत में सिस्टम और कीटनाशकमुक्त वैश्विक व्यापार के लिए उपचार के कार्यान्वयन की यात्रा साझा की.

एपीपीपीसी सचिवालय के कार्यकारी सचिव डा. युबकधोज ने कहा कि यह क्षमता विकास कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कृषि उत्पाद के सीमापारीय आवागमन के दौरान फ्रूटफ्लाई के प्रबंधन के लिए व्यावहारिक उपाय प्रदान करेगा.

एपीडा के निदेशक तरुण बजाज, कृषि के निर्यात में एपीडा (एपीईडीए) की भूमिका और भारत द्वारा लगभग 60 मिलियन डालर के ताजा आम का निर्यात करने की व्याख्या की.

बंगलादेश, इंडोनेशिया, लाओ, मलेशिया, नेपाल, फिलीपींस, समोआ, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम, भूटान के प्रतिभागियों ने कार्यशाला में प्रत्यक्ष रूप से और शेष देशों ने वर्चुअल रूप से भाग लिया. इस के अलावा, डीपीपीक्यूएस, फरीदाबाद, एपीईडीए, एमएसएएमबी के अधिकारियों और गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के राज्य के बागबानी विभाग के अधिकारियों ने कार्यशाला में हिस्सा लिया.

5 दिनों की कार्यशाला के दौरान आम के फलों पर कीट नियंत्रण उपायों के लिए सिस्टम के दृष्टिकोण पर विचारविमर्श, सभी प्रासंगिक आईएसपीएम की समीक्षा, आम कीट के लिए प्रीहार्वेस्ट इंटीग्रेटेड प्लांट हेल्थ मैनेजमेंट और एनपीपीओ केस स्टडी पर चर्चा की जाएगी और उक्त कार्यशाला में उपचार सुविधा और आम के बगीचे का दौरा भी किया जाएगा.