Milk Plant : जम्मू में बना 50 हजार टन क्षमता वाला दूध संयंत्र

Milk Plant : केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह ने पिछले दिनों कश्मीर के शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शालीमार कन्वेंशन सैंटर में आयोजित एक समारोह में कहा कि नीली क्रांति, मत्स्यपालन व जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी प्रमुख योजनाओं ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मूकश्मीर में मत्स्यपालन प्रणाली को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो बड़ी उपलब्धि है.

इस अवसर पर जम्मूकश्मीर के कृषि उत्पादन और पंचायती राज मंत्री जाविद अहमद डार, पशुपालन और डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय व केंद्र और जम्‍मूकश्‍मीर प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ कश्मीर घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से आए किसान भी मौजूद थे.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने ग्रामीण आय और पोषण सुरक्षा के इंजन के रूप में जम्मूकश्मीर के पशुधन और मत्स्यपालन क्षेत्रों के विकास के लिए भारत सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि देश भर में 10 करोड़ से अधिक किसान अपनी आजीविका के लिए पशुधन पर निर्भर हैं, जिन में से 90 फीसदी से अधिक डेयरी पशु छोटे और सीमांत किसानों के पास है और यह क्षेत्र ग्रामीण घरेलू आय में 12-26 फीसदी का योगदान देता है, जिस में डेयरी क्षेत्र की भागीदारी में 70 फीसदी से अधिक है. उन्‍होंने बताया कि डेयरी सहकारी सदस्यता में 32 फीसदी महिलाओं की हिस्सेदारी है, जो समावेशी विकास में डेयरी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि जम्मूकश्मीर में दूध उत्पादन में 47 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली है, जहां 2014-15 में दूध उत्पादन 19.50 लाख टन था वह 2023-24 में बढ़ कर 28.74 लाख टन हो गया है. जबकि केंद्र शासित प्रदेश में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 413 ग्राम प्रतिदिन है.

मछलियों के गुणवत्तापूर्ण बीज सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने जम्मूकश्मीर सरकार के लिए डेनमार्क से रेनबो और ब्राउन ट्राउट म‍छलियों के 13.40 लाख आनुवंशिक रूप से उन्नत अंडे (ओवा) के आयात की सुविधा प्रदान की है. इस से ट्राउट मछलीपालकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले मछली बीज की उपलब्धता में काफी सुधार हुआ है. इस का उत्पादन 2020-21 में 650 मीट्रिक टन से बढ़ कर 2023-24 में 2,380 मीट्रिक टन हो गया है, जो की 266 फीसदी की बढ़ोतरी को दर्शाता है.

Milk Plant

इस से पहले श्रीनगर में सिविल सचिवालय में एक बैठक में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह और जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने संयुक्त रूप से जम्मूकश्मीर के पशुपालन और मत्स्यपालन क्षेत्रों की एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की. उन्‍होंने सतवारी जम्मू में 50 हजार टन प्रतिदिन क्षमता वाले अल्ट्रा हाई टैंमपरेचर (यूएचटी) दूध प्रसंस्करण संयंत्र का उद्घाटन किया.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि हम आज यहां आप की चुनौतियों को सुनने, समझने और साथ मिल कर काम करने के लिए आए हैं. जहां गुंजाइश है, वहां काम होना चाहिए. उन्होंने केंद्र और जम्मूकश्मीर सरकार के बीच संयुक्त प्रयासों का आह्वान किया, ताकि संभावनाओं को परिणामों में बदला जा सके. उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास तभी हासिल किया जा सकता है जब आर्थिक विकास टिकाऊ आजीविका के माध्यम से जमीनी स्तर तक पहुंचे.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंग ने आगे कहा कि आज युवाओं को सूक्ष्म और लघु स्तर के पशुधन व मत्स्यपालन उद्यम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करने से रोजगार निर्माण व समावेशी विकास किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि मजबूत बुनियादी ढांचे के निर्माण और किसानों को बाजारों से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड और राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड जैसे प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों को शामिल करते हुए एक विस्तृत योजना तैयार की जा रही है.

उन्होंने लोगों को यह भी बताया कि भारत सरकार ने हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए पीएमएमएसवाई के अंतर्गत 852 करोड़ रुपए देने की प्रतिबद्धता जताई है, जिस में विशेष रूप से जम्मूकश्मीर के लिए 300 करोड़ रुपए शामिल हैं. इस से उत्पादन, उत्पादकता, बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा दिया जा सकेगा.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि जम्मूकश्मीर का सालाना मछली उत्पादन 2013-14 में 20,000 मीट्रिक टन से बढ़ कर 2024-25 में 29,000 मीट्रिक टन हो गया है, जबकि ट्राउट मछली उत्पादन 262 मीट्रिक टन से बढ़ कर 2,380 मीट्रिक टन हो गया है, जो 800 फीसदी से भी अधिक की बढ़ोतरी है. उन्होंने कहा कि ट्राउट मछली बीज का उत्पादन 9 मिलियन से बढ़ कर 15.2 मिलियन हो गया है, जबकि कार्प मछली बीज उत्पादन 40 मिलियन से बढ़ कर 63.5 मिलियन हो गया है.

केन्‍द्रीय मंत्री ने बताया कि मत्स्यपालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि के माध्यम से शीत जल मत्स्यपालन में 120 करोड़ रुपए से अधिक के निजी निवेश का समर्थन किया गया है. साथ ही, जम्मूकश्मीर की शीत जल मत्स्यपालन की अपार संभावनाओं को देखते हुए मंत्रालय ने अनंतनाग को शीत जल मत्स्यपालन क्लस्टर के रूप में औपचारिक रूप से नामित किया है, जिस में कुलगाम और शोपियां साझेदार जिले हैं, जो स्थायी आजीविका उत्पन्न करने के लिए एकीकृत मूल्यश्रृंखला विकास पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना चरण-II के तहत जम्मूकश्मीर में एक एकीकृत एक्वा पार्क के लिए 100 करोड़ रुपए के प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जो समग्र शीत जलीय कृषि विकास के लिए एक मौडल के रूप में काम करेगा.

पशुओं का संतुलित आहार (Balanced Diet) और कुल मिश्रित राशन

Balanced Diet : वह आहार जिस में  पशुओं के लिए जरूरी सभी पोषक तत्त्व सही मात्रा में मौजूद हों, उसे पशुओं का संतुलित आहार कहते हैं. किसानों को पशु आहार के जरूरी तत्त्वों के बारे में खास जानकारी नहीं होती. उन्हें शिक्षा व प्रशिक्षण के जरीए यह जानकारी देने की जरूरत है.

खानपान की अहमियत

* संतुलित खानपान अच्छे दूध उत्पादन के लिए बेहद जरूरी है.

* संतुलित खानपान के द्वारा पशुओं में होने वाले तमाम रोगों को रोका जा सकता है.

* यह पशुओं की सेहत सही रखता है और रोग प्रतिरोधी कूवत को बनाए रखता है.

* ज्यादा दूध उत्पादन के कारण पशु में पैदा हुए तनाव को भी संतुलित आहार खिला कर दूर किया जा सकता है.

* संतुलित आहार के जरीए पशु को सभी जरूरी पोषक तत्त्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज तत्त्व, विटामिन वगैरह प्राप्त होते हैं.

* संतुलित आहार हरे व सूखे चारे और दानों से तैयार होता है, लिहाजा यह बहुत ही स्वादिष्ठ व सेहत के लिए कारगर होता है.

कुल मिश्रित राशन

चारों और दानों को मिला कर जो राशन तैयार किया जाता है, उसे कुल मिश्रित राशन कहते हैं. इस राशन में आहार की जरूरी चीजों को इस अनुपात में मिलाया जाता है कि उस के द्वारा प्राप्त होने वाले पोषक तत्त्वों से पशु की मांग पूरी की जा सके.

राशन के फायदे

* कुल मिश्रित राशन खिलाने से पशु के उत्पादन में 5-8 फीसदी का इजाफा होता है.

* इसे खिलाने से भोजन का पाचन सही रहता है.

* दाने व चारे को अलगअलग  खिलाए जाने के बजाय मिश्रित राशन खिलाने से आहार इस्तेमाल दर 4 फीसदी तक बढ़ जाती है.

* पशुओं के विभिन्न वर्गों के लिए आहार में ज्यादा तत्त्वों को इस्तेमाल करने का मौका मिलता है.

* कम चीजों द्वारा तैयार पशु आहार खिलाने के मुकाबले संपूर्ण मिश्रण खिलाने से पाचन की गड़बड़ी को भी सही रखा जा सकता है.

* खनिज तत्त्वों व विटामिनों को अलग से देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि संपूर्ण मिश्रित आहार में ये पहले से ही मौजूद होते हैं.

*  बेस्वाद चीजों को भी इस के साथ मिला कर पशुओं को खिलाया जा सकता है.

* आहार के भंडारण व परिवहन की लागत को भी कम किया जा सकता है.

*  इसे खिलाने से कम लागत पर अच्छी आमदनी मिलती है.

कुछ खास बातें

* आहार नांद साफसुथरी और बारिश से बचाने वाली जगह पर होनी चाहिए.

* पशु के रहने की जगह आरामदेह होनी चाहिए, ताकि उसे गरमी व हवा के तनाव से बचाया जा सके.

* राशन में जरूरी प्रोटीन व नमक के स्तर की जांच करा लेनी चाहिए.

* पानी की जरूरत (200 लीटर प्रति गाय) और उस की क्वालिटी का खयाल रखना चाहिए.

* ज्यादा उत्पादन वाली गायों के लिए पंखों व फव्वारों का इंतजाम होना चाहिए.

* राशन के रेशों के स्तर की जांच करा लेनी चाहिए.

* चारे की गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए.

* पशुओं के तमाम वर्गों के लिए अलगअलग संपूर्ण मिश्रित राशन होना चाहिए.

संपूर्ण मिश्रित राशन में दुधारू गायों के लिए तय प्रोटीन स्तर तालिका में दिया है.

Country Cows : देशी गायें जलवायु परिवर्तन में टिकाऊ दूध उत्पादन की कुंजी

Country Cows : भारत दूध के उत्पादन के मामले में हमेशा आगे रहा है, मगर उस की देशी गायों ( Country Cows) को मामलू ही माना जाता रहा है. जर्सी जैसी विदेशी गायों की बहुत ज्यादा दूध देने की कूवत के मुकाबले भारतीय गायें कहीं नहीं टिक पाती थीं, मगर अब हालात बदल रहे हैं. ग्लोबल वार्मिंग के खतरे ने दुनिया को हिला कर रख दिया है और तमाम मामले गड़बड़ा गए हैं. रोजाना इस्तेमाल किया जाने वाला दूध भी एक खास मुद्दा है.

माहिरों का मानना है कि जलवायु में होने वाले बदलाव से दूध के उत्पादन में भारी कमी आएगी. वैज्ञानिकों का कहना है  दूध के उत्पादन में कमी होने के खतरे से गायों की देशी (Country Cows) नस्लें ही बचा पाएंगी.

करनाल के ‘राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान’ (एनडीआरआई) में अब तक हुए कई शोधों के बाद यह नतीजा सामने आया है. पिछले 5 सालों से ‘नेशनल इनोवेशंस इन क्लाइमेट रेसीलिएंट एग्रीकल्चर’ (एनआईसीआरए) प्रोजेक्ट के तहत चल रहे शोध का नतीजा भी यही है कि ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से देशी नस्ल की गायें ही बचा सकती हैं.

शोध से यह बात सामने आई है कि विदेशी और संकर नस्ल के दुधारू पशुओं की तुलना में देशी गायों में ज्यादा तापमान झेलने की कूवत होती है, लिहाजा जलवायु में होने वाले बदलावों से वे कम प्रभावित होती हैं. दरअसल देशी गायों की खाल यानी चमड़ी गरमी सोखने में मददगार होती है. देशी गायों में कुछ ऐसे जीन भी पाए गए हैं, जो गरमी सहने की कूवत में इजाफा करते हैं.

एनडीआरआई के वैज्ञानिकों का कहना है कि गरमी और सर्दी में अधिकतम और न्यूनतम तापमान में जरा से फर्क का असर पशुओं के दूध देने की कूवत पर पड़ता है. तमाम खोजों से मालूम हुआ है कि गरमी में 40 डिगरी से ज्यादा और सर्दी में 20 डिगरी से कम तापमान होने पर दूध के उत्पादन में 30 फीसदी तक की कमी आ जाती है.

खोजों के मुताबिक तापमान ज्यादा होने से संकर नस्ल की गायों के दूध में 15-20 फीसदी तक की कमी हो सकती है, मगर देशी नस्ल की गायों पर ज्यादा तापमान का खास असर नहीं पड़ता है. यह खोज भारतीय यानी देशी नस्ल की गायों के लिहाज से अच्छी कही जा सकती है. देशी गायों को पालने वाले इस बात पर खुश हो सकते हैं.

वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में होने वाला इजाफा यदि लंबे अरसे तक कायम रहता है, तो पशुओं के दूध देने की कूवत के साथसाथ उन की प्रजनन कूवत पर भी खराब असर पड़ता है.

एनडीआरआई के निदेशक डा. एके श्रीवास्तव के मुताबिक भारत में कुल दूध उत्पादन का 51 फीसदी भैंसों से, 20 फीसदी देशी नस्ल की गायों से और 25 फीसदी विदेशी नस्ल की गायों से मिलता है. लेकिन जलवायु में होने वाले बदलाव से इन आंकड़ों पर काफी फर्क पड़ेगा. यह बात दूध के कारोबारियों से ले कर वैज्ञानिकों तक के लिए चिंता का विषय है.

Country Cows

बरेली के ‘पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ (आईवीआरआई) के प्रधान वैज्ञानिक डा. ज्ञानेंद्र गौड़ का कहना है कि तापमान में इजाफा होने पर संकर नस्ल के पशु बहुत ज्यादा बीमार पड़ते हैं. बीमारी की वजह से वे चारा खाना काफी कम कर देते हैं, नतीजतन उन का शरीर काफी कमजोर हो जाता है. शरीर की कमजोरी की वजह से उन का दूध भी बहुत घट जाता है.

डा. ज्ञानेंद्र गौड़ ने आगे बताया कि तापमान में होने वाले इजाफे से देशी नस्ल के पशुओं पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. वे तापमान बढ़ने पर आमतौर पर बीमार नहीं पड़ते हैं, लिहाजा उन के दूध देने की कूवत पर भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता है.

बरेली के ‘पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ में फिलहाल 250 दूध देने वाले पशु मौजूद हैं, जो करीब 2700 लीटर दूध देते हैं. मगर तापमान में इजाफा होने से यह मात्रा घट कर 2200 लीटर तक पहुंच गई है. अपने पशुओं के दूध के आधार पर ही वैज्ञानिक नतीजे निकाल पाते हैं.

एक ही गोत्र में प्रजनन ठीक नहीं

वैज्ञानिकों ने शोधों से यह नतीजा निकाला है कि गायों की नस्लों के लिहाज से एक ही गोत्र में प्रजनन कराना ठीक नहीं है. उन का कहना है कि समगोत्र प्रजनन से पशु वंशानुगत रूप से अप्रभावी हो जाते हैं.

जालंधर की ‘दिव्य ज्योति जागृति संस्थान नूरमहल’ ने गायों की गायब हो रही देशी नस्लों के सुधार के लिए कामधेनु मुहिम चला रखी है. वहां साहिवाल, थारपारकर, हरियाणा, कांक्रेज व गिर नस्ल की गायों को बचाने के लिए सगोत्र आंतरिक प्रजनन से परहेज बरता जाता है. संस्थान से जुड़े स्वामी चिन्मयानंद और स्वामी विशालानंद ने गायों के मूत्र और गोबर की अहमियत बताते हुए कहा कि 1 गाय से 30 एकड़ जमीन पर खेती की जा सकती है. नूरमहल में फिलहाल 700 साहिवाल गायें मौजूद हैं. संस्थान की दिल्ली शाखा में भी 250 गायें हैं. संस्थान ने साहिवाल गाय से 25 लीटर तक दूध निकालने में कामयाबी पाई है. वैसे देशी नस्ल की गिर गाय ने कुछ साल पहले ब्राजील में 62 लीटर दूध देने का रिकार्ड कायम किया था.

यों तो आगामी 5 सालों में दूध उत्पादन में 30 लाख टन की गिरावट का अंदाजा लगाया जा रहा है, मगर देशी नस्ल की गायों की खूबी पर फख्र किया जा सकता है. भारत में भैंसों की 13 और गायों की 39 प्रजातियां मौजूद हैं. हालात के मुताबिक देशी गायों का वजूद दिनबदिन बढ़ता जाएगा. यह देशी नस्ल की गायें पालने वालों के लिए खुशी की बात है.

Sustain Plus Project : एनडीडीबी सस्टेन प्लस परियोजना हुई शुरू

Sustain Plus Project : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग ने बीते दिनों 3 मार्च, 2025 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में डेयरी क्षेत्र में स्थिरता पर कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह की उपस्थिति में इस कार्यशाला का उद्घाटन किया.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल और जौर्ज कुरियन भी इस अवसर पर उपस्थित थे.  डेयरी क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों के साथसाथ पशुपालन और डेयरी विभाग, पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, उर्वरक विभाग, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), इंडियन औयल कौर्पोरेशन लिमिटेड और विभिन्न दूध सहकारी समितियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस कार्यशाला में भाग लिया.

कार्यशाला ने तकनीकी, वित्तीय और कार्यान्वयन सहायता का लाभ उठा कर डेयरी क्षेत्र में सतत और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए एनडीडीबी और नाबार्ड के बीच समझौता हुआ.  देशभर में बायोगैस संयंत्र स्थापित करने के लिए एनडीडीबी ने 15 राज्यों के 26 दुग्ध संघों के साथ समझौता किया.

इस अवसर पर डेयरी क्षेत्र में स्थिरता के उद्देश्य से दिशानिर्देश जारी किए गए, साथ ही, एनडीडीबी (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) के लघु पैमाने पर बायोगैस, बड़े पैमाने पर बायोगैस/संपीड़ित बायोगैस परियोजनाओं और टिकाऊ डेयरी के आर्थिक सहायता के लिए एनडीडीबी ‘सस्टेन प्लस परियोजना’ के तहत वित्तपोषण पहलों की शुरुआत की गई.

इन पहलों से डेयरी फार्मिंग में चक्रीय प्रथाओं को अपनाने में तेजी आने, कुशल खाद प्रबंधन, ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलने और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की उम्मीद है.  इस राष्ट्रीय कार्यशाला ने नीति बनाने वालों, उद्योग जगत के नेताओं और विशेषज्ञों को स्थिरता बढ़ाने, कार्बन उत्सर्जन को कम करने और छोटे व सीमांत डेयरी किसानों के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित करने और विकसित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया.

Sustain Plus Project

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि आज जब हम श्वेत क्रांति 2.0 की ओर बढ़ रहे हैं, तो स्थिरता और चक्रीयता का महत्व और भी बढ़ गया है. उन्होंने कहा कि पहली श्वेत क्रांति की मदद से हम ने अब तक जो हासिल किया है, उस के अलावा डेयरी क्षेत्र में स्थिरता और चक्रीयता को अभी पूरी तरह हासिल किया जाना बाकी है.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि भारत की कृषि व्यवस्था छोटे किसानों पर आधारित है और गांवों से शहरों की ओर उन का पलायन उन की समृद्धि से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि ग्रामीण पलायन की समस्या पर काबू पाने के साथसाथ छोटे किसानों को समृद्ध बनाने के लिए डेयरी एक महत्वपूर्ण विकल्प है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि डेयरी क्षेत्र में चक्रीयता और स्थिरता पर ध्यान देने के साथ, ईंधन के उत्पादन के लिए गाय के गोबर का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में काफी मदद करेगा.

उन्होंने आगे कहा कि देश में 53 करोड़ से अधिक के विशाल पशुधन संसाधन में से लगभग 30 करोड़ गाय और भैंसें हैं, इसलिए बड़ी मात्रा में गाय का गोबर उपलब्ध है, जिस का उपयोग जैविक खाद, जैव ईंधन आदि के लिए किया जा सकता है, जिस से उत्पादकता बढ़ेगी और साथ ही किसानों की आय भी बढ़ेगी.

मंत्री राजीव रंजन सिंह ने आगे कहा कि आज सरकार के प्रयासों के कारण डेयरी क्षेत्र काफी हद तक असंगठित से संगठित क्षेत्र में बदल गया है. उन्होंने देश में हरित विकास और किसान कल्याण को बढ़ावा देने के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं, नवीकरणीय ऊर्जा पहलों और सार्वजनिक निजी भागीदारी के महत्व का भी जिक्र किया.

हितधारकों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को नवाचार के साथ एकीकृत करने से न केवल हरित विकास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि लाखों किसानों का भला भी होगा.

पशुपालन एवं डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय ने डेयरी क्षेत्र में टिकाऊ प्रथाओं की आवश्यकता और सर्कुलर अर्थव्यवस्था सिद्धांतों को एक करने के सरकार के दृष्टिकोण पर जोर दिया और कहा कि भारत “विश्व की डेयरी” है और डेयरी क्षेत्र, कृषि जीवीए में 30 फीसदी का योगदान देता है. इन टिकाऊ प्रथाओं को लागू करने के लिए एनडीडीबी ने 1,000 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ एक नई वित्तपोषण योजना शुरू की है, जिस का उद्देश्य छोटे बायोगैस, बड़े पैमाने के बायोगैस संयंत्रों और संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) परियोजनाओं के लिए लोन सहायता के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान करना है, जिस से आने वाले 10 सालों में विभिन्न खाद प्रबंधन मौडलों को बढ़ाने में सुविधा होगी.

कार्यशाला के विचारविमर्श के प्रमुख विषयों में सफल चक्रीय अर्थव्यवस्था मौडल, छोटे डेयरी किसानों के लिए कार्बन क्रैडिट के अवसर और टिकाऊ प्रथाओं को बढ़ावा देने में कार्बन ट्रेडिंग की भूमिका शामिल थी. भारत सरकार द्वारा समर्थित और एनडीडीबी के नेतृत्व में डेयरी क्षेत्र ने स्थिरता और चक्रीयता को बढ़ाने के लिए प्रमुख खाद प्रबंधन पहलों की शुरुआत की है.

3 उल्लेखनीय मौडलों में जकारियापुरा मौडल, बनास मौडल और वाराणसी मौडल शामिल हैं, जो दूध के साथसाथ गोबर की एक मूल्यवान वस्तु के रूप में क्षमता को उजागर करते हैं, जो एक अधिक टिकाऊ और चक्रीय डेयरी पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देता है, साथ ही पशुपालकों की आय में वृद्धि का भी काम करता है.

Kisan Samman : भोपाल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों का सम्मान

Kisan Samman : दिल्ली प्रेस की कृषि पत्रिका फार्म एन फूड द्वारा 28 फरवरी, 2025 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के 150 से ज्यादा किसान और कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए और खेती में नवाचार और तकनीकी के जरिए विभिन्न 17 श्रेणियों में बदलाव लाने वाले तकरीबन 30 किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विज्ञान केंद्रों को राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड से सम्मानित किया गया.

दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा, ‘कृषि जगत हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है. इसी क्षेत्र में किसानों के योगदान को लोगों को बताने के लिए हम ने फार्म एन फूड पत्रिका को शुरू करने की सोची और यह भी माना कि यह किसान समाज को जोड़ने की कड़ी है. मैं खुद को कृषि का छात्र मानता हूं. कोरोना काल मे घर पर एक किचन गार्डन बनाया था जो अब भी बरकरार है. हमारे जो आज के विजेता हैं वे बहुत मेहनती हैं और वे इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा अचीव कर रहे हैं. मेरी अपील है कि किसान इस पत्रिका से जुड़े रहें ताकि हमारी संस्था कृषि जगत में होने वाली हर बात को जनजन तक पहुंचा सकें.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और मध्य प्रदेश के सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, ‘भारत गांव में, खेत में और खलिहान में बसता है. हमें खेती पर और किसान पर ध्यान देना होगा. हमें फूड प्रोसेसिंग पर जोर देना होगा. ‘नदी जोड़ो अभियान’ इस में सहायक है. खेत से ही इस देश को मजबूत करने की इबारत लिखी जा सकती है. सरकार का यही उद्देश्य की खेती मुनाफे का धंधा बने.’

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और मध्य प्रदेश सरकार में कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री गौतम टेटवाल ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती और किसान हमेशा सीखता है. वह नवाचार करता है, नई तकनीक इस्तेमाल करता है. जब किसान के पास पर्याय खाद होगी और दूसरी सुविधाएं मुहैया होंगी, वह इस क्षेत्र में और आगे बढ़ेगा.’

विजेता किसानों में रतलाम के कपिल धाकड़ को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड दिया गया. महासमुंद के मिलन सिंग विश्वकर्मा और भोपाल के मनोहर पाटीदार को बेस्ट मेल फार्मर अवार्ड मिला. ग्वालियर की निशा निरंजन को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि भोपाल के गीता प्रसाद पाटीदार, शाजापुर के जयनारायण पाटीदार और टीकमगढ़ के पूरन लाल कुशवाहा को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड दिया गया.

अशोकनगर के खुमान सिंह रघुवंशी, भिंड के रामगोपाल सिंह, दंतेवाड़ा के जयलाल यादव को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग का अवार्ड मिला. उज्जैन के अश्विनी सिंह चौहान, नारायणपुर के सुरेंद्र कुमार नाग को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग दिया गया.

नरसिंहपुर के कृष्णपाल लोधी को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन शुगरकेन प्रोडक्शन मिला, जबकि अशोकनगर के राजपाल सिंह नरवरिया को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मैकेनाइजेशन अवार्ड हासिल हुआ. इसी तरह बलौदाबाजार के विरेंद्र अग्रवाल को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर का अवार्ड, तो मुरैना के यशपाल कुशवाह को बेस्ट मधुमक्खीपालक फार्मर अवार्ड दिया गया. शाजापुर के कृष्णपाल सिंह राजपूत को बेस्ट पोल्ट्री/हैचरी फार्मर अवार्ड मिला, तो नरसिंहपुर के राकेश दुबे को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग दिया गया.

कोंडागांव, छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को सस्टेनेबल फार्मिंग टेक्नोलॉजी अवार्ड, तो कोंडागांव की ही डा. अपूर्वा त्रिपाठी को वुमन एग्री-इनोवेटर आफ द ईयर का अवार्ड मिला. रतलाम के डा. सुशील कुमार, भिंड के डा. सत्येंद्र पाल सिंह, दुर्ग की डा. ज्योत्स्ना मिश्रा को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम से नवाजा गया.

इसी तरह केवीके बड़वानी, जिला बड़वानी, केवीके जावरा, जिला रतलाम, केवीके, रायसेन, जिला रायसेन, केवीके, नारायणपुर, जिला नारायणपुर, केवीके, बालोद, जिला बालोद को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड मिला. भोपाल के खारपी फार्मर एफपीओ और नरसिंहपुर के शक्तिपूजा एफपीओ को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.

इन श्रेणियों में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से कृषि विज्ञान केंद्रों व कृषि संस्थानों के संस्तुति सहित 200 से भी अधिक नोमिनेशन प्राप्त हुए थे. विभिन्न श्रेणियों में प्राप्त इन नोमिनेशन का 4 सदस्यीय जूरी द्वारा मूल्यांकन किया गया, जिस में सर्वश्रेष्ठ नोमिनेशन को पुरस्कार के लिए चुना गया.

इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत किसानों के साथसाथ कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य कृषि संस्थानों के वैज्ञानिक, अन्य शासकीय और प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे. इस कार्यक्रम का मंच संचालन विजी श्रीवास्तव ने किया. इस कार्यक्रम में कृभको और जात्रे आइसक्रीम की विशेष रूप से सहभागिता रही. उन्होंने सह प्रायोजक के रूप में किसानों का हौसला बढ़ाया.

Diarrhea in Calf: बछड़े को डायरिया से ऐसे बचाएं

गाय के बछड़े बचपन से ही स्वस्थ हों, तो भविष्य में उन का दूध उत्पादन बेहतर होता है. लेकिन उन के जीवन के पहले 3 हफ्ते में दस्त (डायरिया) एक सामान्य और गंभीर समस्या बन कर सामने आ सकती है.

यदि इस समस्या पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही उन के मरने का कारण बन सकता है. साल 2007 में यूएस डेयरी की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि 57 फीसदी वीनिंग गोवत्सों की मृत्यु दस्त के कारण हुई, जिन में अधिकांश बछड़े 1 माह से छोटे थे.

दस्त लगने की कई वजहें हो सकती हैं. सही समय पर दूध न पिलाना, दूध का अत्यधिक ठंडा होना या ज्यादा मात्रा में देना, रहने की जगह का साफसुथरा न होना या फिर फफूंद लगा चारा खिलाना आदि. इस के अलावा बछड़ों में दस्त अकसर एंटरोपैथोजेनिक ई कोलाई नामक जीवाणु के कारण होता है. यह जीवाणु आंत से चिपक कर घाव पैदा करता है, जिस से आंत के एंजाइम की गतिविधि घट जाती है. इस वजह से भोजन का पाचन प्रभावित होता है और खनिज पदार्थ अवशोषित होने के बजाय मल के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं.

कुछ ई कोलाई वेरोटौक्सिन का उत्पादन करते हैं, जिस से अधिक गंभीर स्थिति जैसे खूनी दस्त हो सकते हैं.आमतौर पर 2 सप्ताह से 12 सप्ताह के बछड़ों में साल्मोनेला प्रजाति के जीवाणुओं के कारण दस्त के लक्षण देखे जाते हैं. इस के अलावा कोरोना वायरस, रोटा वायरस जैसे वायरस और जियार्डिया, क्रिप्टोस्पोरिडियम पार्वम जैसे प्रोटोजोआ भी दस्त के सामान्य कारण हैं.

दस्त के लक्षणों को पहचानना बहुत महत्त्वपूर्ण है. बछड़े की धंसी हुई आंखें, तरल पदार्थों का सेवन कम होना, लेटना, हलका बुखार, ठंडी त्वचा और सुस्ती इस समस्या के संकेत हैं.

यदि बछड़ा बारबार लेट रहा हो, खुद से खड़ा नहीं हो पा रहा हो और खींचने पर आंखों के पास की त्वचा वापस आने में 6 सेकंड से अधिक समय ले रही हो, तो तुरंत पशु डाक्टर से सलाह लें.

दस्त से बचाव के लिए गर्भावस्था के अंतिम 3 महीनों में गाय के पोषण का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि बछड़ा स्वस्थ हो और मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ जन्म ले.

बछड़े को जन्म के 2 घंटे से ले कर 6 घंटे के भीतर खीस पिलाना आवश्यक है. यदि बछड़ा डिस्टोकिया (कठिन प्रसव) से पैदा हुआ हो, तो उस के सिर और जीभ पर सूजन के कारण खीस को वह ठीक से नहीं पी पाएगा. ऐसे में बछड़े की विशेष देखभाल करनी चाहिए.

इस के अलावा बछड़े को बाहरी तनाव जैसे अधिक ठंड, बारिश, नमी, गरमी और प्रदूषण से बचाना चाहिए. साथ ही सही समय पर टीका भी लगवाना आवश्यक है, ताकि बछड़ा स्वस्थ रह सके.

यदि बछड़े को दस्त हो जाए, तो सब से पहले शरीर में पानी और इलैक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करना जरूरी है. इस के लिए हर दिन 2-4 लिटर इलैक्ट्रोलाइट घोल पिलाएं. घर पर ही इलैक्ट्रोलाइट घोल बनाने के लिए :

1 लिटर गरम पानी में 5 चम्मच ग्लूकोज, 1 चम्मच सोडा बाईकार्बोनेट और 1 चम्मच नमक मिलाएं यानी एक चम्मच = 5 ग्राम लगभग.

नेबलोन आयुर्वेदिक पाउडर (10-20 ग्राम) को सादा पानी या चावल के मांड में मिला कर दिन में 2-3 बार पिलाएं. यदि स्थिति गंभीर हो, तो हर 6 घंटे पर यह घोल दें. दस्त करने वाले आंतरिक परजीवियों से बचाव के लिए एल्बेंडाजोल, औक्सीक्लोजानाइड और लेवामिसोल जैसे डीवार्मर्स समयसमय पर देने चाहिए. यदि आवश्यक हो, तो पशु डाक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक्स का उपयोग करें.

बछड़ों में दस्त की समस्या को सही समय पर पहचान कर उचित देखभाल और उपचार से नियंत्रित किया जा सकता है.

Cowpea: पशुओं के लिए पौष्टिकता से भरपूर लोबिया

पशुओं के लिए लोबिया (Cowpea)  दलहन चारा है. अधिक पौष्टिक व पाचकता से भरपूर होने के कारण इसे घास के साथ मिला कर बोने से इस की पोषकता बढ़ जाती है.

इस की फसल उगाने से किसानों को कई फायदे होते हैं. पहला तो यह कि इस से पशुओं के लिए हरा चारा मिलता है, वहीं दूसरी ओर खेत के खरपतवार को खत्म कर के मिट्टी की उर्वरताशक्ति भी बढ़ाने का काम करती है.

लोबिया (Cowpea) की फसल को किसान खरीफ और जायद मौसम में उगा सकते हैं.

भूमि और खेत की तैयारी

लोबिया (Cowpea)  की खेती आमतौर पर अच्छे जल निकास वाली सभी तरह की जमीनों में की जा सकती है, लेकिन दोमट मिट्टी पैदावार के हिसाब से अच्छी मानी गई है. अच्छे उत्पादन के लिए खेत को हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 जुताई करनी चाहिए, इस से बीज में अंकुरण जल्दी होता है और फसल अच्छी होती है.

बोआई का समय

लोबिया (Cowpea)  की फसल साल में 2 बार की जाती है. गरमियों की फसल के लिए बोआई का सही समय मार्च होता है, खरीफ मौसम में लोबिया (Cowpea) की बोआई बारिश शुरू होने के बाद जुलाई महीने में करनी चाहिए.

उन्नत किस्में

किसी भी फसल के ज्यादा उत्पादन के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं, उन में से एक उन्नत किस्म का बीज भी है. अगर आप अच्छे किस्म का बीज बोएंगे तो अधिक पैदावार मिलेगी. इसलिए जब भी बोआई करें, अच्छे बीज ही इस्तेमाल करें. आप की जानकारी के लिए कुछ उन्नत बीजों के नाम इस प्रकार हैं:

कोहिनूर, बुंदेल लोबिया-2, बुंदेल लोबिया-3, यूपीसी-5287, आईएफसी-8503, ईसी- 4216, यूपीसी- 5286, 618 वगैरह.

बीज की मात्रा व बोआई

किसान पशुओं के चारे के लिए एक ही खेत में कई तरह के बीज मिला कर बोआई करते हैं. ऐसे में अगर सिर्फ लोबिया (Cowpea)  की फसल लेनी है, तब 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर सही होता है. अगर ज्वार या मक्का आदि के साथ बोना है तो 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर ठीक होता है.

सिंचाई

गरमियों के मौसम में 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. पूरे सीजन में लगभग 6-7 सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि खरीफ मौसम में आमतौर पर सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, लेकिन लंबे समय तक बारिश न होने पर 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

गरमी में ज्यादा खरपतवार की दिक्कत नहीं होती, लेकिन 20-25 दिनों में खुरपी या फावड़े से गुड़ाई कर के खरपतवार पर काबू पाया जा सकता है. बीज बोने से पहले ट्रीफ्लूरानिन (0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करने से खरपतवार की बढ़वार कम होती है.

फसल कटाई

खरीफ मौसम की फसल 50-60 दिनों में और गरमियों की फसल 70-75 दिनों में कटाई (50 प्रतिशत फूल आने पर) के लिए तैयार हो जाती है. लोबिया (Cowpea)  की फसल की कटाई तब भी शुरू की जा सकती है, जब पौधे बड़े हो जाएं और चारे के लिए इस्तेमाल किए जाने लगें.

ये उपाय अपनाएं उम्दा दूध (Milk) पाएं

भारत का दूध (Milk) उत्पादन दुनिया में कुल दूध उत्पादन का 18.43 फीसदी है. दूध (Milk) में प्रोटीन, वसा व लैक्टोज पाया जाता है जो सेहत के लिए अच्छा होता है. लेकिन इसे खराब होने से बचाए रखना बहुत ही मुश्किल काम है.

ज्यादा दूध (Milk) उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को पाला जाता है, पर स्वच्छ दूध उत्पादन के बिना ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को रखना भी बेकार है.

स्वच्छ दूध (Milk) हासिल करने के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को रखने के साथसाथ उन को बीमारियों से बचाने और टीकाकरण कराने की जरूरत होती है, जिस से सभी पोषक तत्त्वों वाला दूध (Milk) मिल सके.

अकसर देखा जाता है कि कच्चा दूध (Milk) जल्दी खराब होता है. खराब दूध (Milk) अनेक तरह की बीमारियां पैदा कर सकता है, इसलिए दूध के उत्पादन, भंडारण व परिवहन में खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

कच्चे दूध (Milk)  में हवा, दूध दुहने वाले गंदे उपकरणों, खराब चारा, पानी, मिट्टी व घास से पैदा होने वाले कीटाणुओं से खराबी आ सकती है. इस वजह से कम अच्छी क्वालिटी के दूध (Milk) बाहरी देशों को नहीं बेच पाते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इस की मांग बढ़ रही है.

वैसे, दूध (Milk) में जीवाणुओं की तादाद 50,000 प्रति इक्रोलिटर या उस से कम होने पर दूध (Milk) को अच्छी क्वालिटी का माना जाता है. दूध इन वजहों से खराब हो सकता है:

* थनों में इंफैक्शन का होना.

* पशुओं का बीमार होना.

* पशुओं में दूध (Milk)  के उत्पादन से संबंधित कोई कमी होना.

* हार्मोंस की समस्या.

* पशुओं की साफसफाई न होना.

* दूध (Milk) दुहने का गलत तरीका.

* दूध (Milk) दुहने का बरतन और उसे धोने का गलत तरीका होना.

* दूध (Milk) जमा करने वाले बरतन का गंदा होना.

* चारे व पानी का खराब होना.

* दूध (Milk) दुहने वाला बीमार हो या साफसफाई न रखता हो.

* थनों का साफ न होना.

दूध (Milk)

स्वच्छ दूध (Milk) उत्पादन के लिए ये सावधानियां बरतना जरूरी हैं:

* पशुओं का बाड़ा या पशुशाला और पशुओं के दुहने की जगह साफ हो. वहां मक्खियां, कीड़े, धूल न हो.

* बीड़ीसिगरेट पीना सख्त मना हो. शेड पक्के फर्श वाले हों. टूटफूट नहीं होनी चाहिए. गोबर व मूत्र निकासी के लिए सही इंतजाम होना चाहिए. पशुओं को दुहने से पहले शेड को साफ और सूखा रखना चाहिए. शेड में साइलेज और गीली फसल नहीं रखनी चाहिए. इस से दूध (Milk) में बदबू आ सकती है.

* पशु को दुहने से पहले उस के थन और आसपास की गंदगी को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए.

* शेड में शांत माहौल होना चाहिए. सुबह और शाम गायभैंस के दुहने का तय समय होना चाहिए.

* दूध (Milk) दुहने वाला सेहतमंद व साफसुथरा होना चाहिए. दुहने वाले को अपने हाथ में दस्ताने पहनने की सलाह दी जानी चाहिए. दस्ताने न होने पर हाथों को अच्छी तरह जीवाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए. उस के नाखून व बाल बड़े नहीं होने चाहिए.

* दूध (Milk) रखने वाले बरतन एल्युमिनियम, जस्ते या लोहे के बने होने चाहिए. दुधारू पशुओं के थनों को दूध दुहने से पहले व बाद में पोटैशियम परमैगनेट या सोडियम हाइपोक्लोराइड की एक चुटकी को कुनकुने पानी में डाल कर धोया जाना चाहिए और अच्छी तरह सुखाया जाना चाहिए.

* दूध (Milk) दूहने से पहले और बाद में दूध की केन को साफ कर लेना चाहिए. इन बरतनों को साफ करने के लिए मिट्टी या राख का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

* दूध (Milk) दुहने से पहले थन से दूध (Milk) की 2-4 बूंदों को बाहर गिरा देना चाहिए क्योंकि इस में बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा होती है, जिस से पूरे दूध (Milk) में इंफैक्शन हो सकता है.

* दूध (Milk) दुहते समय हाथ की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. अंगूठा मोड़ कर दूध दुहने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इस से थन को नुकसान हो सकता है और उन में सूजन आ सकती है.

* एक पशु का दूध (Milk) 5-8 मिनट में दुह लेना चाहिए, क्योंकि दूध का स्राव औक्सीटोसिन नामक हार्मोन के असर पर निर्भर करता है. अगर दूध थन में छोड़ दिया जाता है तो यह इंफैक्शन की वजह बन सकता है.

* दूध दुहने के 2 घंटे के भीतर दूध (Milk) को घर के रेफ्रिजरेटर, वाटर कूलर या बल्क मिल्क कूलर का इस्तेमाल कर के 5 डिगरी सैल्सियस या इस से नीचे के तापमान में रखना चाहिए.

* दूध (Milk) के परिवहन के समय कोल्ड चेन में गिरावट को रोकने के लिए तय तापमान बनाए रखा जाना चाहिए.

* स्वास्थ्य केंद्रों पर पशुओं की नियमित जांच करा कर उन्हें बीमारी से मुक्त रखना चाहिए, वरना पशु के इस दूध (Milk) से इनसान भी इंफैक्शन का शिकार हो सकता है.

* पानी को साफ करने के लिए हाइपोक्लोराइड 50 पीपीएम की दर से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फर्श और दीवारों की सतह पर जमे दूध व गंदगी को साफ करते रहना चाहिए.

* दूध दुहते समय पशुओं को न तो डराएं और न ही उसे गुस्सा दिलाएं.

* दूध दुहते समय ग्वालों को दूध (Milk) या पानी न लगाने दें. सूखे हाथों से दूध दुहना चाहिए.

* एक ही आदमी दूध निकाले. उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

* दूध (Milk) की मात्रा बढ़ाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इस में गैरकानूनी रूप से बैन की गई चीजों को मिलाना व इस की क्वालिटी के साथ छेड़छाड़ करना ही मिलावट कहलाता है. यह मिलावटी दूध सब के लिए नुकसानदायक होता है. पानी, नमक, चीनी, गेहूं, स्टार्च, वाशिंग सोड़ा, यूरिया, हाइड्रोजन पेराक्साइड वगैरह का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने व उसे खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो गलत है.

दूध (Milk) की मिलावट का कुछ सामान्य तरीकों से पता किया जा सकता है. जैसे दूध (Milk) का खोया बना कर, दूध में हाथ डाल कर, जमीन पर गिरा कर, छान कर व चख कर. इस के अलावा वैज्ञानिक तरीके से भी दूध की मिलावट की जांच की जा सकती है.

पशुपालन में मशीनीकरण (Mechanization) को बढ़ावा

उदयपुर : 28 जनवरी, 2025. अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत ‘पशुपालन के लिए मशीनीकरण’ (Mechanization) विषय पर 2 दिवसीय 24वीं वार्षिक राष्ट्रीय कार्यशाला अनुसंधान निदेशालय सभागार में हुई.

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की मेजबानी में आयोजित इस कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली सहित देशभर के 100 से ज्यादा कृषि वैज्ञानिक, अभियंता और अनुसंधानकर्ताओं ने हिस्सा लिया.

उद्घाटन सत्र में आयुक्त पशुपालन, भारत सरकार, नई दिल्ली डा. अभिजीत मित्रा ने कहा कि कृषि पशुपालन के 3 प्रमुख घटक उत्पादन, रखरखाव एवं फूड सेफ्टी में मैकेनाइजेशन की अपार संभावनाएं  हैं. डेयरी पोल्ट्री के क्षेत्र में भी मशीनीकरण (Mechanization) को तरजीह दी जानी चाहिए, तभी हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चल पाएंगे.

उन्होंने आगे कहा कि पशुपालकों में आज 70 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं. पशुपालन के क्षेत्र में केवल एक छोटे से घटक गोबर उठाना, पोल्ट्री मल व अन्य अपशिष्ट की साफसफाई के लिए भी मशीन तैयार कर ली जाए, तो मानव श्रम की काफी बचत होगी और यह श्रम अन्य कार्यों के उपयोग में आ जाएगा.

डा. अभिजीत मित्रा ने आगे कहा कि पशुपालन विभाग, नई दिल्ली भविष्य में पंचायत राज, उद्यान, कृषि विपणन और अन्य संबद्ध विभागों को साथ ले कर पशुपालन में मशीनीकरण (Mechanization) पर कुछ इस तरह का रोल मौडल तैयार करेगा, जो देशभर में ब्लौक व पंचायत लैवल पर उपयोगी साबित हो. भारत में वर्तमान में 192 मिलियन गौवंश है. इन में से 27 फीसदी क्रौस ब्रीड हैं, जबकि 10 फीसदी ही दूध उत्पादन में शामिल है.

इस बीच उन्होंने राजस्थान की गाय की नस्ल ‘थारपारकर’ का भी जिक्र किया और कहा कि ‘थारपारकर’ वह नस्लीय गाय है, जो विपरीत परिस्थितियों में थार रेगिस्तान को पार करने की क्षमता रखती है और भरपूर दूध भी देती है.

उपमहानिदेशक, आईसीएआर, नई दिल्ली डा. एसएन झा ने कहा कि मौजूदा परिवेश में पशुपालन ही नहीं, बल्कि ‘संपूर्ण मशीनीकरण’ (Mechanization) की दिशा में भी काम करना होगा. विकास के मामले में दुनिया की गति काफी तेज है और ज्ञान के बल पर ही हम इस गति का मुकाबला कर पाएंगे. उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों को हर समय अपडेट रहने को कहा.

पशुपालन के साथसाथ फार्म मैकेनाइजेशन पर जोर देते हुए डा. एसएन झा ने कहा कि केवल जलवायु, साफसफाई व आर्द्रता को नियंत्रण करने मात्र से हम दूध उत्पादन में 10 फीसदी की और भी अधिक वृद्धि कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि हमें स्वीकार करना होगा कि ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इस धरा पर पशुधन रहेगा’ पुरानी परंपराओं का त्याग करते हुए पशुधन के रखरखाव, दूध व मांस उत्पादन में वृद्धि के लिए नए तौरतरीकों को अमल में लाना होगा.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बेबाकी से तर्क रखा कि जल, जंगल, जलवायु और जमीन अकेले मनुष्य की बपौती नहीं हैं, वरन इस चराचर जगत में विचरण करने वाले हर जीव का इस पर अधिकार है. गलती यहां हुई कि प्रकृति की इस देन को आदमी ने अपनी बपौती मान लिया. ऐसे में जलचर, नभचर और थलचर प्राणी कहां जाएंगे भलाई इसी में है कि पशुपक्षियों को भी पर्याप्त दानापानी मिलना चाहिए, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे.

उन्होंने पशु आहार बनाने, दूध निकालने, अपशिष्ट प्रबंधन और पानी देने की व्यवस्था के लिए भी उपकरण व मशीनरी विकसित करने पर जोर दिया. साथ ही, पशुधन के लिए बेहतर आवास, स्वच्छता व स्वास्थ्य नियंत्रण की भी आवश्यकता है.

आईसीएआर, नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक डा. अमरीश त्यागी ने कहा कि आने वाला समय क्षमता निर्माण व कौशल विकास का है. पशुपालन के लिए मशीनीकरण (Mechanization) इसी सोच का हिस्सा है. हर क्षेत्र में गहन अध्ययन, सर्वे तकनीक व प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से ही हम उपकरण और मशीन की कल्पना कर उसे साकार रूप में धरातल पर उतर पाएंगे.

परियोजना समन्वयक डा. एसपी सिंह, निदेशक, सीआईएई, भोपाल, डा. सीआर मेहता ने पशु प्रबंधन की आधुनिक तकनीकियों का जिक्र किया. आरंभ में सीटीएई डीन डा. अनुपम भटनागर ने अभियांत्रिकी महावि़द्यालय में होने वाली गतिविधियों पर प्रकाश डाला.

पुस्तक एवं पैम्फलेट का विमोचन

आरंभ में अतिथियों ने अधिष्ठाता सीडीएफडी डा. लोकेश गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘आधुनिक पशुपालन एवं प्रबंधन’ एवं पैम्फलेट समुचित पशु आहार प्रबंधन, पशुचलित उन्नत कृषि यंत्र का विमोचन किया.

कार्यशाला में इन का रहा प्रतिनिधित्व

आईसीएआर-सीआईएई, भोपाल (मध्य प्रदेश), एमपीयूएटी, उदयपुर (राजस्थान), जीबीपीयूएटी, पंतनगर (उत्तराखंड), यूएएस, रायचूर (कर्नाटक), वीएनएमयू, परभणी (महाराष्ट्र), आईजीकेवी, रायपुर (छत्तीसगढ़), ओयूएटी, भुवनेश्वर (ओडिशा), आईसीएआर-एनडीआरआई, करनाल (हरियाणा) और सीएयू-सीएईपीएचटी, गंगटोक (सिक्किम).

मत्स्यपालन क्षेत्र में हैं रोजगार की अपार संभावनाएं: राजीव रंजन सिंह

गुवाहाटी : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्यपालन विभाग ने असम के गुवाहाटी में ‘पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों की बैठक 2025’ का आयोजन किया. इस की अध्यक्षता मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी मंत्रालय और पंचायती राज मंत्रालय केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने की.

पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत लगभग 50 करोड़ रुपए की लागत वाली प्रमुख परियोजनाओं की शुरुआत की, जिस के तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र में आत्मनिर्भर मत्स्यपालन क्षेत्र बनाने की मंशा जाहिर की.  इन परियोजनाओं से मत्स्यपालन क्षेत्र में लगभग 4,530 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन लाभार्थियों को राष्ट्रीय मातिस्यकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) पंजीकरण प्रमाणपत्र, केसीसी कार्ड, सर्वश्रेष्ठ एफएफपीओ और मत्स्यपालन स्टार्टअप के लिए पुरस्कार सहित प्रमाणपत्र भी  दिए. साथ ही, क्षेत्रीय विकास की गति को जारी रखने और टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से मत्स्य विभाग ने सिक्किम राज्य में जैविक मत्स्यपालन और जलीय कृषि के विकास के लिए सिक्किम के सोरेंग जिले में जैविक मत्स्यपालन क्लस्टर को अधिसूचित किया.

केंद्रीय मत्स्य एवं पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन क्षेत्र की अपार संभावनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि प्रजातियों के विविधीकरण, मछली उत्पादन में 20-25 फीसदी की वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने व रोजगार सृजन के लिए उत्पादन खपत के अंतर को कम करने की जरूरत है.

उन्होंने राज्यों को क्षेत्र विशेष की कमियों को दूर करने के लिए राज्य केंद्रित योजनाएं बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया. केंद्र सरकार की  प्रमुख पहलों में मत्स्यपालन और अवसंरचना विकास कोष का लाभ उठाना, एनएफडीबी क्षेत्रीय केंद्रों के जरीए नवाचार को बढ़ावा देना, असंगठित क्षेत्र को औपचारिक बनाना, ब्रूड बैंक विकसित करना और केंद्रीय मीठाजल जीवपालन अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान में प्रगतिशील किसानों को प्रशिक्षण देना शामिल है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और पंचायती राज, उपराज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने जोर दे कर कहा कि किसानों की आय को दोगुना करना केवल कृषि को संबंधित क्षेत्रों, विशेष रूप से मत्स्यपालन के साथ एकीकृत कर के ही संभव है.

उन्होंने आगे कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना हमारी प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक  है, जिस में भूमि और संसाधन सीमाओं को दूर करने के लिए बायोफ्लोक और रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम जैसी नई जलीय कृषि पद्धतियों को अपनाने पर हमें जोर देना है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और अल्पसंख्यक कार्य, उपराज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने पूर्वोत्तर क्षेत्र और केरल में एकीकृत मछलीपालन की पारंपरिक प्रथाओं का जिक्र किया, जिस में टैपिओकासहमछलीपालन और सूअरसहमछलीपालन शामिल है, जिन्हें बेहतर दक्षता के लिए आधुनिक तकनीकों के साथ पुनर्जीवित किया गया है.

राज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने मछली उत्पादन को बढ़ाने और क्षेत्र के मत्स्यपालन के क्षेत्र को और अधिक बढ़ावा देने के लिए नई तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया.

इस सत्र में एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी डा. बिजय कुमार बेहरा द्वारा ‘पूर्वोत्तर राज्यों में मत्स्यपालन विकास के लिए पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चुनौतियों’ और केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, गुवाहाटी के प्रधान वैज्ञानिक डा. बीके भट्टाचार्य द्वारा ‘पूर्वोत्तर राज्यों में खुले जल मत्स्यपालन संसाधनों का विकास’ पर व्यावहारिक चर्चाएं भी शामिल थीं, जिस ने क्षेत्र में इस सैक्टर के भविष्य पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किए.

इस सम्मलेन के अवसर पर असम सरकार के मत्स्यपालन मंत्री कृष्णेंदु पौल ने भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र में असम के महत्वपूर्ण योगदान पर चर्चा करते हुए बताया कि असम ने 4.75 लाख मीट्रिक टन का उल्लेखनीय मछली उत्पादन और लगभग 20,000 मीट्रिक टन का निर्यात किया, जिस से मछली किसानों और मछुआरों को काफी फायदा हुआ है.

उन्होंने आगे कहा कि राज्य की 90 फीसदी से अधिक आबादी मछली का सेवन करती है, इसलिए मत्स्यपालन असम की अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान रखता है. पहाड़ियों में उत्पादन, उत्पादकता और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए पीएमएमएसवाई के तहत परियोजनाओं की पहचान की गई है, जिस का उद्देश्य संसाधनों का कायाकल्प और क्षेत्रीय विकास है.

इस के अलावा जापान के जेआईसीए द्वारा समर्थित असम मत्स्य विकास और ग्रामीण आजीविका परियोजना, समग्र जलीय कृषि विकास पर ध्यान केंद्रित करती है और यह क्षेत्र के लिए स्थायी आजीविका पैदा कर रही है और जमीनी स्तर पर अच्छी तरह से प्रगति कर रही है.

अरुणाचल प्रदेश सरकार के मत्स्यपालन, कृषि, बागबानी, एएचवीडीडी मंत्री गेब्रियल डेनवांग वांगसू ने मत्स्यपालन विकास में राज्य की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया और पीएमएमएसवाई के तहत छोटे और शिल्पकार किसानों को समर्थन देने पर जोर दिया.

मंत्री गेब्रियल डेनवांग वांगसू ने अरुणाचल प्रदेश में एक समर्पित शीत जल मत्स्यपालन संस्थान की स्थापना का प्रस्ताव रखा और बीज उत्पादन के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए एकमुश्त अनुदान की वकालत की. खुले पानी में मत्स्यपालन और टिकाऊ तौरतरीकों को अपनाने के अवसरों का जिक्र करते हुए उन्होंने हिमालयी राज्यों की अनूठी ताकतों को संबोधित करने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई योजना का भी आह्वान किया.

मिजोरम सरकार के मत्स्यपालन मंत्री पु. ललथनसांगा ने राज्य में मत्स्यपालन विकास में तेजी लाने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मंजूरी और राशि जारी करने में तेजी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया. पीएमएमएसवाई के तहत तालाबों के जीर्णोद्धार और कायाकल्प को शामिल करने के महत्व पर प्रकाश डाला गया, क्योंकि ये गतिविधियां मिजोरम के मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं.

इस के अलावा कम उत्पादकता का समाधान निकालने, गुणवत्ता वाले बीज एवं चारे की उपलब्धता में सुधार करना और मछली किसानों के लिए क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण को प्राथमिकता देने आदि की पहचान उन प्रमुख क्षेत्रों के रूप में की गई, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.

मणिपुर सरकार के मत्स्यपालन, समाज कल्याण, कौशल, श्रम, रोजगार और उद्यमिता मंत्री एच. डिंगो सिंह ने राज्य में मत्स्यपालन और जलीय कृषि क्षेत्र पर पीएमएमएसवाई की सफलता को स्वीकार किया. हैचरी, बायोफ्लोक सिस्टम, तालाब, केग कल्चर की स्थापना, सजावटी मछलीपालन, मछली कियोस्क, मूल्यवर्धित उद्यम, रोग निदान सुविधाएं और कोल्ड स्टोरेज इकाइयों की स्थापना से मणिपुर में सामूहिक रूप से बुनियादी ढांचे और अवसरों में बढ़ोतरी हुई है.

त्रिपुरा सरकार के मत्स्यपालन मंत्री सुधांशु दास ने बताया कि राज्य में मछली उत्पादन की क्षमता 2 लाख है, जिस में 38,594 हेक्टेयर क्षेत्र मछलीपालन के लिए है. वर्तमान में 85,000 मीट्रिक टन उत्पादन की तुलना में मांग 117,000 मीट्रिक टन है, जिस की कमी पश्चिम बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश से आयात कर के पूरी की जाती है.

मंत्री सुधांशु दास ने बताया कि त्रिपुरा में 98 फीसदी आबादी मछली का सेवन करती है. उन्होंने बायोफ्लोक और मोतीपालन से जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा की, जिस में इस क्षेत्र की मौसमी निर्भरता को एक प्रमुख कारण बताया.

सिक्किम सरकार के कृषि, बागबानी, पशुपालन व पशु चिकित्सा सेवाएं, मंत्री पूरन कुमार गुरुंग ने पीएमएमएसवाई से राज्य को होने वाले महत्वपूर्ण लाभों पर प्रकाश डाला, जिस में ट्राउट रेसवे हैचरी, जलीय कृषि प्रणाली और सजावटी मछलीपालन जैसी गतिविधियां शामिल हैं.

उन्होंने रेसवे और सजावटी मछली इकाइयों के निर्माण जैसे लंबित प्रस्तावों के लिए समर्थन का अनुरोध किया और मत्स्यपालन प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की मांग की. सिक्किम की जैविक स्थिति पर जोर देते हुए उन्होंने अतिरिक्त समर्थन का आह्वान किया और राज्य के मत्स्य विकास के लिए आईसीएआर संस्थानों के महत्व पर जोर दिया.

नागालैंड सरकार के मत्स्यपालन और जलीय संसाधन मंत्री ए. पंगजंग जमीर ने राज्य के मत्स्य संसाधनों, खासकर नए तालाबों और टैंकों के विकास की महत्वपूर्ण संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने और मछली किसानों की आय को बढ़ाने के लिए एक प्रमुख रणनीति के रूप में एकीकृत मछलीपालन की शुरुआत पर जोर दिया. इस क्षेत्र की इकोटूरिज्म की आशाजनक संभावनाओं की भी पहचान की गई और पहाड़ी क्षेत्रों में मछली परिवहन में सुधार के अवसरों को भविष्य के विकास के क्षेत्र के रूप में देखा गया है.

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने अपने मुख्य भाषण में पीएमएमएसवाई के तहत 1,700 करोड़ सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र को आवंटित की गई. साथ ही, 2,000 करोड़ रुपए किनकिन क्षेत्रों को दिए जाएंगे, इस पर भी प्रकाश डाला.

उन्होंने 3 प्रमुख क्षेत्रों पर ज्यादा जोर दिया, जिन में डिजिटलीकरण के माध्यम से मत्स्यपालन को औपचारिक बनाना, राज्य के अधिकारियों से इसे प्राथमिकता देना, ब्याज अनुदान और ऋण गारंटी जैसे वित्तीय साधनों के साथ मत्स्यपालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि को बढ़ावा देना और एफएफपीओ और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से एकीकृत खेती को आगे बढ़ाना शामिल है. उन्होंने युवा स्टार्टअप का समर्थन करने और मछली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अंतराल को दूर करने का भी आह्वान किया, जिस का लक्ष्य 12 लाख टन है.

मत्स्यपालन विभाग, भारत सरकार में संयुक्त सचिव सागर मेहरा ने भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र की उपलब्धियों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिस में उत्पादन, उत्पादकता, आय और निर्यात जैसे प्रमुख पहलुओं पर जोर दिया गया.

इस रिपोर्ट में पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्रचुर संसाधनों पर भी ध्यान दिया गया. साथ ही, रिपोर्ट में पूर्वोत्तर क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों और कमियों का भी जिक्र किया गया. भविष्य में इस के विकास के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण और फोकस क्षेत्रों पर भी चर्चा की गई.