रेशम कीटपालन : ग्रामीण महिलाओं ने लिखी तरक्की की कहानी

बस्ती जिले के ब्लाक बनकटी के परासी गांव की कौशल्या देवी के घर का खर्च पति की कमाई से बड़ी मुश्किल से चल पाता था. इस वजह से कौशल्या को अपनी छोटीछोटी जरूरतें पूरी करने के लिए मन मसोस कर रह जाना पड़ता था. इन्हीं पारिवारिक जिम्मेदारियों और अभावों के बीच कौशल्या की जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही थी. इसी दौरान कौशल्या द्वारा लिए गए एक छोटे से फैसले ने उस की जिंदगी ही बदल दी. अब कौशल्या को घर पर ही रोजगार मिल गया है और धीरेधीरे उस की माली हालत भी सुधरने लगी.

कौशल्या के गांव में नाबार्ड बैंक की मदद से शक्ति उद्योग प्रशिक्षण संस्थान नाम की एक संस्था ग्रामीण महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनवा कर उन में बचत की आदत डलवा रही थी.

इसी संस्था के निरंकार लाल श्रीवास्तव ने कौशल्या  को रेशम कीट पालन व्यवसाय के बारे में जानकारी दी और साथ ही यह भी बताया कि इस व्यवसाय को घर पर शुरू करने के लिए रेशम विभाग जरूरी उपकरण, कीट, शहतूत की पत्तियां आदि निशुल्क मुहैया करा रहा है.

कीटों द्वारा तैयार कोये को बेचने में भी महिलाओं को कोई परेशानी नहीं होगी, क्योंकि उन के घर से ही व्यापारी अच्छे दाम पर कोये खरीद कर ले जाएंगे. यह बात कौशल्या और उन के समूह से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं को जंच गई और यहीं से शुरू हुई इन महिलाओं के जीवन में बदलाव की कहानी.

रेशम कीटपालन (Silkworm Rearing)

संस्था के निरंकार लाल श्रीवास्तव ने कौशल्या और उन के समूह से जुड़ी तमाम महिलाओं को गांव में ही रेशम फार्म के प्रभारी वीरेंद्रनाथ तिवारी से मिलवाया और उन्हें रेशम कीट पालन के व्यवसाय के बारे में सलाह दी. वीरेंद्रनाथ ने महिलाओं को जरूरी फार्म भरवा कर उन्हें निशुल्क रेशम कीट पालन की जानकारी दी. कीट पालन के लिए जरूरी उपकरण जैसे रेशम कीट चाकी, रेशम कीट पालन ट्रे, सोलर लाइट, रेशम कीट पालन गृह आदि सुविधाएं भी निशुल्क मुहैया कराईं.

रेशम विभाग ने इन महिलाओं को शहतूत की पत्तियां और कीट भी फ्री मुहैया कराए. इस के बाद इन महिलाओं ने रेशम विभाग की मदद से अपने घर पर ही रेशम कीट पालन का व्यवसाय शुरू कर दिया. जब पहली बार कौशल्या और दूसरी महिलाओं को रेशम कीट पालन से कोये हासिल हुए, तो रेशम विभाग ने बाहर के व्यापारियों को तैयार रेशम कोये अच्छी कीमत पर बिकवाने में मदद की.

कौशल्या को पहली बार एक महीने में ही 14 किलोग्राम रेशम का कोया प्राप्त हुआ, जिस से उन्हें लगभग 20 हजार रुपए की कमाई हुई. इसी तरह समूह से जुड़ी दूसरी महिलाएं भी बिना लागत के इस व्यवसाय से प्रभावित हुईं. इस काम के दौरान घर के कामकाज भी प्रभावित नहीं हो रहे थे. इसलिए रेशम कीट पालन व्यवसाय से जुड़ने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई. कौशल्या और समूह की अन्य महिलाओं ने एक महीने में ही इतना पैसा कमा लिया, जितना उन के पति 4 महीने में बड़ी मुश्किल से कमाते थे.

रेशम कीटपालन (Silkworm Rearing)

कौशल्या की पहल से दूसरी महिलाएं भी प्रेरित : परासी गांव की महिलाओं के जीवन में रेशम कीट पालन से आए बदलाव से प्रभावित हो कर राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने शक्ति उद्योग प्रशिक्षण संस्थान से दूसरे गांवों की महिलाओं को भी रेशम कीट पालन के व्यवसाय से जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी.

इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए किसी तरह के खर्च की जरूरत नहीं थी, क्योंकि सारे संसाधन रेशम विभाग निशुल्क मुहैया करा रहा था और इसे घर पर ही किया जा सकता था. इसलिए आसपास के गांवों की सैकड़ों महिलाओं ने संस्था के निरंकार लाल श्रीवास्तव से रेशम कीट पालन के व्यवसाय के बारे में जानकारी ली. उन्होंने इन सभी महिलाओं का समूह बना कर उन्हें हल्लौर नगरा गांव में  विभाग के सहयोग से रेशम कीट पालन व्यवसाय शुरू करवा दिया. इस से इन महिलाओं के घरेलू काम प्रभावित हुए बिना आमदनी का रास्ता खुल गया.

कीट पालन व्यवसाय से जुड़ी लक्ष्मी का कहना है कि घरेलू काम निबटाने के बाद खाली समय काटना मुश्किल होता था, लेकिन अब रेशम कीट पालन के व्यवसाय से जुड़ने के बाद उन का समय कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. रेशम कीट पालन के व्यवसाय से जुड़ने के बाद अब उन्हें पैसे के लिए भी किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ता और घर के पुरुषों को भी अब हाड़तोड़ मेहनत नहीं करनी पड़ती.

प्रभावती का कहना है कि अब वे घर पर ही इतना कमा लेती हैं कि उन के बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला मिल जाता है और बच्चों की फीस वे अपने रेशम कीट पालन व्यवसाय से हुई कमाई से भरती हैं.

रेशम विकास विभाग बस्ती के सहायक निदेशक रामानंद मल्ल ने बताया कि रेशम विकास विभाग ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें जरूरी सुविधाएं अनुदान योजनाओं के जरीए उपलब्ध करा रहा है, जिस के तहत रेशम कीट पालकों को अच्छी किस्म के प्रतिरोधक चाकी रेशम कीट, जरूरी प्रशिक्षण, निशुल्क सिंचाई, कीट पालन ट्रे, उपकरण कीट पालन गृह अनुदान आदि की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं. उन्होंने बताया कि कोये की अच्छी गुणवत्ता के लिए निरंतर जानकारों से सलाहमशवरा किया जाता है. इस के साथ ही महिलाओं को कोये का भी अच्छा दाम मिल जाता है. बाहर से आए व्यापारी इन महिलाओं के घरों से अच्छी कीमत पर कोया खरीदते हैं.

रेशम कीटपालन (Silkworm Rearing)

रेशम  फार्म हल्लौर नगरा के अनुरक्षक वीरेंद्रनाथ तिवारी ने बताया कि रेशम विकास विभाग ऐसे भूमिहीन परिवारों, जिन के पास शहतूत के पौधों के रोपण के लिए जमीन नहीं है, उन परिवारों को रेशम फार्म में रोपित शहतूत के पौधों से शहतूत की पत्तियां निशुल्क मुहैया कराई जाती हैं.

शक्ति उद्योग प्रशिक्षण संस्थान के निरंकार लाल श्रीवास्तव ने बताया कि रेशम पालन व्यवसाय से जुड़ी महिलाओं को नाबार्ड के सहयोग से गु्रप लीडर, नेतृत्व विकास प्रशिक्षण, मौलिक प्रशिक्षण के साथसाथ अन्य जरूरी जानकारियां मुहैया कराई जा रही हैं, जिस से दलित महिलाएं भी अन्य महिलाओं की तरह आत्मनिर्भर बन सकें.

कोई भी ग्रामीण महिला जो कम पढ़ीलिखी है और अपनी माली हालत सुधारना चाहती है तो वह अपने जिले में रेशम विकास विभाग से मुलाकात कर रेशम कीट पालन का काम शुरू कर सकती है.

शीतलहर और पाले से फसलों की हिफाजत

सर्दी के मौसम में फसलों को शीतलहर और पाले से बचाना बहुत जरूरी है. इन के प्रकोप से भी फसलों को नुकसान होता है. टमाटर, आलू, मिर्च बैगन, पपीता, केला, मटर व चना आदि का शीतलहर व पाले से सब से ज्यादा 80 से 90 फीसदी तक नुकसान हो सकता है. इस से अरहर में 70 फीसदी, गन्ने में 50 फीसदी और गेहूं व जौ में 10 से 20 फीसदी तक नुकसान हो सकता है.

पाले की वजह से पौधों की पत्तियां व फूल खराब हो कर झड़ जाते हैं. पाले के असर से अधपके फल सिकुड़ जाते हैं और उन में झुर्रियां पड़ जाती हैं. इस से फलियों व बालियों में दाने नहीं बनते हैं और रहे दाने सिकुड़ कर और पतले हो जाते हैं.

रबी की फसलों में फूल निकलने और बालियां या फलियां आने व उन के विकास के वक्त पाला पड़ने की सब से ज्यादा उम्मीद रहती है. उस वक्त किसानों को सावधानी बरत कर फसलों की हिफाजत के तरीके अपनाने चाहिए.

सर्दी के मौसम में जब बहुत ज्यादा ठंड पड़ने लगती है और हवा रुक जाती है, तब रात में पाला पड़ने का खतरा रहता है. किसान पाला गिरने का अंदाजा मौसम से लगा सकते हैं.

सर्दी के दिनों में जिस रोज दोपहर से पहले ठंडी हवा चलती रहे और फिर दोपहर बाद अचानक बंद हो जाए और असामान साफ रहे, फिर उस दिन आधी रात से ही हवा रुक जाए, तो पाला पड़ने की आशंका ज्यादा रहती है. रात को खासतौर से तीसरे और चौथे पहर में पाला पड़ने का खतरा रहता है.

बचाव के तरीके

* जिस रात पाला पड़ने की आशंका हो उस रात 12 से 2 बजे के आसपास खेत की उत्तरीपश्चिमी दिशा से आने वाली ठंडी हवा की दिशा में खेत के किनारे पर बोई हुई फसल के आसपास मेंड़ों पर कूड़ाकचरा या घासफूस जला कर धुआं करना चाहिए ताकि खेत में धुआं आने से वातावरण में गरमी आ जाए. सुविधा के लिए मेंड़ पर 10 से 20 फुट के अंतर पर कूड़ेकरकट के ढेर लगा कर धुआं करें.

* जब पाला पड़ने की आशंका हो, तब खेत में सिंचाई करनी चाहिए. इस से जमीन में काफी देर तक गरमी रहती है, इस वजह से खेत का तापक्रम एकदम कम नहीं होता है. इस तरह से नमी होने पर शीतलहर व पाले से नुकसान का खतरा कम रहता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक सर्दी में फसल में सिंचाई करने का 0.5 से 2 डिगरी सेंटीग्रेड तक तापमान बढ़ जाता है.

* जिन दिनों पाला पड़ने की आशंका हो उन दिनों फसलों पर गंधक के तेजाब का 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए. इस के लिए 1 लीटर गंधक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में घोल कर 1 हेक्टेयर क्षेत्र में प्लास्टिक के स्प्रेयर से छिड़कें. ध्यान रखें कि पौधों पर घोल की फुहार अच्छी तरह लगे. छिड़काव का असर 2 हफ्ते तक रहता है. यदि इस के बाद भी शीतलहर व पाले की आशंका बनी रहे, तो 15 दिनों के अंतर से छिड़काव करते रहें.

* सरसों, गेहूं, चना, आलू, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने के लिए गंधक के तेजाब का छिड़काव करने से न केवल पाले से बचाव होता है, बल्कि पौधों में लौह तत्त्व की जैविक और रासायनिक सक्रियता भी बढ़ जाती है, जो पौधों को रोगों से लड़ने की कूवत देती है और फसल को जल्दी पकाने में मददगार होती है.

गाजर (Carrots) के फायदे

गाजर का नाम सुनते ही मन में खयाल आता है कि काश, कहीं से गाजर का हलवा खाने को मिल जाए. क्या गाजर का इस्तेमाल सिर्फ हलवा बनाने के लिए किया जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है, गाजर जायकेदार होने के साथ ही कई गुणों से भरपूर है. आयुर्वेद के मुताबिक गाजर स्वाद में मीठी, गुणों में तीक्ष्ण और कफ व रक्तपित्त को नष्ट करने वाली होती है.

गाजर का रंग कैरोटीन नामक तत्त्व से लाल होता है. कैरोटीन के कारण ही गाजर विटामिन ‘ए’ से भरपूर होती है. यह तत्त्व हमारे शरीर में विटामिन ‘ए’ बनाता है. अधिकतर हकीम और डाक्टर आंख के मरीजों को सलाह देते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा गाजर का इस्तेमाल करें.

गाजर को आप कच्ची, सलाद के साथ, जूस निकाल कर, अचार या हलवा बना कर खा सकते हैं.

गाजर के औषधीय गुण

* यदि किसी की त्वचा आग से झुलस गई हो तो कच्ची गाजर पीस कर जले हुए स्थान पर लगाने से तुरंत लाभ मिलता है और जले हुए स्थान पर ठंडक महसूस होती है.

*  गाजर का मुरब्बा काफी लाभकारी होता है. यह दिमाग के लिए काफी फायदेमंद होता है, रोज सुबह इस का सेवन करना चाहिए.

*  लो ब्लड प्रेशर के रोगियों को गाजर के रस में शहद मिला कर खाना चाहिए. इस से रक्तचाप सामान्य होने लगेगा.

*  गाजर, टमाटर, संतरे और चुकंदर का रस तकरीबन 25 ग्राम की मात्रा में रोजाना 2 महीने तक लेने से चेहरे के मुंहासे, दाग व झाइयां आदि मिटने लगते हैं. पथरी की शिकायत में गाजर, चुकंदर और ककड़ी का रस समान मात्रा में लें.

*  गाजर पीस कर व आग पर सेंक कर इस की पुल्टिस बना कर बांधने से फोड़े ठीक हो जाते हैं.

*  गाजर का अचार तिल्ली रोग को ठीक करता है.

*  अनिद्रा रोग में रोज सुबहशाम 1 कप गाजर का रस लें.

*  गाजर का सेवन उदर रोग, पित्त, कफ और कब्ज दूर करता है. यह आंतों में जमा मल को तीव्रता से साफ करता है.

*  गाजर उबाल कर रस निकाल लें. इसे ठंडा कर के 1 कप रस में, 1 चम्मच शहद मिला कर पीने से सीने में उठने वाला दर्द मिट जाता है.

*  बच्चों को कच्ची गाजर खिलाने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं.

*  गाजर का रोज इस्तमाल करने से खून की कमी दूर होती है.

*  इस प्रकार गाजर को यदि रोजाना इस्तेमाल में लाया जाए तो कई रोगों से नजात पाई जा सकती है.

गुड़पट्टी बन गई चिक्की

कभी गांवों में बनने वाली गुड़पट्टी अब चिक्की बन गई है. यह मिठाई की बड़ी दुकानों से ले कर औनलाइन भी बिकने लगी है. यह युवाओं को भी पसंद आने लगी है. जाड़ों में गुड़पट्टी ज्यादा बिकती है.

जाड़ों में गुड़चिक्की के जरीए सर्दी के असर को दूर किया जा सकता है. गुड़ और मूंगफली का इस में सब से अहम रोल होता है. इसे खाने से शरीर में गरमाहट रहती है.

यह गुड़चिक्की शरीर के इम्यून सिस्टम को भी मजबूत रखती है, जिस से सर्दीजुकाम, खांसी, अस्थमा आदि से बचा जा सकता है.

गुड़पट्टी खाने में लजीज लगती है. पहले गुड़पट्टी को आम लोगों की मिठाई माना जाता था. अब गुड़पट्टी चिक्की के नाम से मिठाई की बड़ीबड़ी दुकानों में मिलने लगी है.

आकार में गुड़पट्टी कई तरह की बनने लगी है. चिक्की या गुड़पट्टी का आकार कुछ भी हो, लेकिन इस का स्वाद एकजैसा होता है. स्वाद में लजीज गुड़पट्टी गुड़, चीनी और मूंगफली को मिला कर तैयार की जाती है.

सर्दियों में जो लोग मेवा नहीं खा सकते, उन के लिए मूंगफली किसी मेवे से कम नहीं होती है. रात में खाना खाने के बाद गुड़पट्टी का सेवन करने से शरीर गरम रहता है. इस से खाना पचाने में भी मदद मिलती है. गुड़ में एक खास तरह का तत्त्व होता है, जो खाना पचाने में मदद करता है.

सही पाचन से शरीर में ऐंटीआक्सिडेंट्स बनते हैं. इस से शरीर में बने टाक्सिंस को बाहर निकलने में आसानी रहती है. गुड़ मिला होने के कारण इसे खाने से कोई नुकसान भी नहीं होता है और शरीर का शुगर लेवल भी नहीं बढ़ता. इस से फैट और कोलेस्ट्राल का खतरा भी कम हो जाता है.

मूंगफली में प्रोटीन काफी मात्रा में होता है, जो शरीर को मजबूत बनाता है. शरीर में खून की कमी वाले लोगों को गुड़चिक्की का सेवन करना लाभदायक रहता है.

रोजगार का साधन

गुड़पट्टी या चिक्की बना कर बेचना एक अच्छा रोजगार है. मिठाई की दुकानों के साथ ही साथ सड़कों, मेलों और प्रदर्शनी में ठेला लगा कर इस को बेचा जाता है.

गुड़चिक्की बेचने वाले लोग इसे बड़े पैमाने पर बनाने वाले लोगों से ही खरीदारी करते हैं. गुड़पट्टी 300 रुपए से शुरू हो कर 500 रुपए प्रति किलोग्राम तक मिलती है.

महंगी वाली गुड़पट्टी चिक्की कहलाती है, जिसे तैयार करने में देशी घी का इस्तेमाल किया जाता है. गुड़पट्टी के कारीगर दीपक गुप्ता कहते हैं, ‘गुड़पट्टी बनाने में लगने वाली सामग्री की क्वालिटी काफी अच्छी होनी चाहिए. साथ ही इसे बनाते समय सफाई का पूरा खयाल रखना चाहिए. इस को ऐसे रखना चाहिए, जिस से इस में हवा न लगे. हवा लगने से यह कुरकुरी नहीं रहती और जल्दी खराब हो जाती है.

कैसे बनती है गुड़पट्टी

गुड़पट्टी बनाने के लिए अच्छी किस्म का गुड़ लेना चाहिए. गुड़पट्टी का रंग काला न हो कर पारदर्शी दिखे, इस के लिए गुड़ की बराबर मात्रा में इस में चीनी मिलाई जाती है. अगर गुड़पट्टी के रंग को ज्यादा साफ दिखाना है, तो गुड़ में चीनी की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए. वैसे सब से अच्छी गुड़पट्टी वही मानी जाती है, जिस में गुड़ और चीनी की मात्रा बराबर होती है.

पहले गुड़ व चीनी की 2 तार की चाशनी बनानी चाहिए. इस में जरूरत के मुताबिक मूंगफली के दाने साफ कर के व भून कर डालने चाहिए. 1 किलोग्राम तैयार चाशनी में 500 ग्राम मूंगफली के दाने डालें. जिन लोगों को गुड़ कम खाना हो, वे 750 ग्राम तक मूंगफली के दाने डाल सकते हैं. इस तैयार सामग्री को साफसुथरी जगह पर फैलाया जाता है.

जब सारी सामग्री सेट हो जाए, तो उसे कटर से इच्छानुसार टुकड़ोें और डिजाइन में काट लेते हैं. चिक्की ज्यादातर छोटेछोटे टुकड़ों में काटी जाती है. गुड़पट्टी को कुछ लोग प्लेट में सजा कर जमाते हैं. जिस जगह पर यह सामग्री डाली जाती है, वहां पर पहले से चिकनाई लगा दी जाती है, जिस से ठंडी होने के बाद इस को निकालने में आसानी रहे. गुड़पट्टी या चिक्की को कुरकुरा रखने के लिए नमी से बचाया जाता है.

धान की फसल (Paddy Crop) को बचाएं खैरा बीमारी से

देश में खरीफ सीजन में ली जाने वाली फसलों में प्रमुख रूप से धान की खेती होती है. दुनियाभर में की जाने वाली धान की खेती का तकरीबन 22 फीसदी हिस्सा भारत अकेले ही पैदा करता है. धान ही एकमात्र ऐसी फसल है, जिसे भारत में ली जाने वाली फसलों में सब से ज्यादा पानी की जरूरत होती है. धान में जितना पानी जरूरी है, उतना ही जरूरी इस में खरपतवार प्रबंधन, खाद उर्वरक प्रबंधन सहित इस के कीट और बीमारियों का प्रबंधन भी.

धान की खेती करने वाले किसान नर्सरी डालने से ले कर कटाई तक अगर सतर्कता न बरतें, तो उन्हें धान में कीट और बीमारियों के चलते भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है. वैसे तो धान की फसल में कई तरह के कीट और बीमारियों का प्रकोप दिखाई देता है, जो धान की फसल को पूरी तरह से बरबाद कर देता है. लेकिन इन्हीं बीमारियों में एक खैरा ऐसी बीमारी है, जो पौध की बढ़ोतरी को पूरी तरह से प्रभावित कर देती है. ऐसी दशा में धान की फसल का उत्पादन पूरी तरह से घट जाता है.

धान में लगने वाली खैरा बीमारी जिंक यानी जस्ता की कमी की वजह से होती है. इस बीमारी को पहली बार साल 1996 उत्तर प्रदेश के तराई एरिया में देखा गया, जिस की पहचान कृषि वैज्ञानिक यशवंत लक्ष्मण नेने द्वारा की गई थी. उन्होंने पाया कि इस रोग के प्रभाव में आ कर धान की फसल की बढ़वार रुक गई थी.

यह है पहचान
धान की फसल को प्रभावित करने वाली खैरा बीमारी जिंक की कमी से होती है. धान की फसल में खैरा बीमारी की पहचान करना बेहद आसान है. नर्सरी में रोपी गई धान की पौध में यह छोटेछोटे चकत्ते के रूप में दिखाई पड़ती है. इस बीमारी के प्रभाव में आने के बाद धान की पत्तियों पर हलके पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में कत्थई रंग में बदल जाते हैं. इस के बाद इस की पत्तियां मुरझा जाती हैं और मृत हो जाती हैं. इस से धान के पौध में बौनापन आ जाता है और उत्पादन काफी कम हो जाता है.

खैरा बीमारी की चपेट में आने के बाद धान के पौध की जड़ें भी कत्थई रंग की हो जाती हैं. यह बीमारी पहले खेत के किसी एक सिरे से शुरू होती है और देखते ही देखते पूरी फसल को अपनी चपेट में ले लेती है. अगर बारिश कम हुई है और धूप तेज हो, तो यह बीमारी और भी घातक हो जाती है.

खैरा बीमारी की चपेट में आने के बाद फसल में दाने कम बनते हैं या बनते ही नहीं हैं. इस बीमारी की चपेट में आने के बाद फसल उत्पादकता लगभग 30 से 40 फीसदी तक घट जाती है. इसलिए फसल में बीमारी का प्रकोप होने ही न पाए. किसानों को नर्सरी डालने के समय से ही इस के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है.

खैरा बीमारी से बचाव के लिए करें यह तैयारी

धान की फसल को खैरा बीमारी से बचाव के लिए रोपाई के पूर्व ही जब किसान खेत की तैयारी कर रहे हों, तो 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक का प्रयोग करना चाहिए. अगर धान की फसल में खैरा बीमारी का प्रकोप दिखाई पड़े तो प्रति हेक्टेयर की दर से 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 25 किलोग्राम चूने को 600 से 700 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. अगर बुझा हुआ चूना न मिल पाए, तो उस की जगह पर जिंक सल्फेट के साथ 2 फीसदी यूरिया का इस्तेमाल करना चाहिए.

खैरा बीमारी से बचाव के लिए डाली गई नर्सरी डालने के 10 दिनों के बाद पहला, 20 दिन बाद दूसरा छिड़काव करना चाहिए. किसान जब धान की फसल रोप चुके हों तो फसल रोपाई के 15 से 30 दिनों में तीसरा छिड़काव करना न भूलें.

धान की फसल में खैरा बीमारी से बचाव के लिए एक ही फसल में धान की फसल की रोपाई बारबार नहीं करनी चाहिए. ऐसा करने से मिट्टी में जिंक की कमी हो जाती है. इसलिए धान की फसल लेने के बाद उस खेत में उड़द या अरहर की खेती करने से जिंक की कमी दूर हो जाती है.

इस के अलावा धान की कई ऐसी उन्नत किस्में विकसित की गई हैं, जो खैरा बीमारी रोधी है. इसलिए इन किस्मों को उगाने पर जोर देना चाहिए. खेत में रासयनिक खाद के उपयोग में कमी ला कर जैविक खादों का उपयोग करना चाहिए.

पौधों के लिए जिंक का महत्व इसलिए है जरूरी

धान की फसल के लिए जिंक एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. यह पौधे के लिए क्लोरोफिल उत्पादन को बढ़ाने में मदद करता है, जिस से पौधों को पर्याप्त भोजन मिलने में मदद मिलती है.

धान के लिए जिन 8 सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, उस में जिंक सब से महत्वपूर्ण तत्व है. पौधों को जिंक की बहुत कम मात्रा की जरूरत होती है, लेकिन यह पौधे के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

जिंक पौधे में एंजाइमों को सक्रिय कर देता है, जो प्रोटीन संश्लेषण में मददगार होते हैं. अगर पौधे में जिंक की कमी हो जाए, तो इस से पौधे का रंग पीला पड़ जाता है. साथ ही, जिंक पौधे को ठंड का सामना करने में मदद करने के साथ ही पौध की रक्षा प्रणाली को भी मजबूत करता है.

किसान कंगाल, खेती बदहाल, किस ने किया यह हाल?

‘मरीज ए इश्क पर रहमत खुद की, मरज बढ़ता गया ज्योंज्यों दवा की…’ मिर्जा गालिब की ये पंक्तिया भारत की खेती और किसानों के हालात पर बिलकुल सटीक बैठती है. हाल ही में देश का ‘आर्थिक सर्वे’ और सालाना बजट 24 लगातार 2 दिनों तक देश की सब से बड़ी पंचायत ‘संसद’ में पेश किया गया.

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि को देश के विकास का इंजन बताया. सैध्दांतिक आधार पर उन का यह कहना गलत भी नहीं है, क्योंकि देश की लगभग 70 फीसदी जनता रोजगार के लिए और सौ फीसदी जनता भोजन के लिए कृषि व कृषि संबद्ध उपक्रमों पर ही आश्रित है. लेकिन जब बजट में कृषि के लिए राशि आवंटन की बात आई, तो हमेशा की तरह इस बार भी महज 3 से 4 फीसदी के बीच में ही सिमट गई.

विडंबना यह भी रही कि जब एक ओर सरकार कृषि के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां गिना रही थी, उसी समय दिल दहलाने वाली खबर आई कि देश के अमरावती जिले में पिछले 152 दिनों में 145 किसानों ने आत्महत्या की है. संसद में यह भी बताया गया कि देश में 31 किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं. कृषि प्रधान कहलाने वाले देश के लिए इस से बड़ा दुख और शर्म का विषय और क्या हो सकता है.
विश्व की 5वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दम अवश्य भरिए, पर हकीकत से भी आंख मत चुराइए. आंकड़े हमें आईना दिखा रहे हैं कि अमेरिका के किसान की सालाना आमदनी 65 लाख रुपए है यानी दैनिक आमदनी 18,000 रुपए है, वहीं भारत के किसान की प्रतिदिन की आमदनी महज 27 रुपए है. ऐसे में देश के करोड़ों किसान परिवार किन कठिन हालात में जीवनयापन करते होंगे, यह हमारे देश के नेताओं को आखिर कब समझ में आएगा?

क्या इन सवालों के जवाब हासिल करना जरूरी नहीं है कि जिस देश में ‘कृषि मूलम जगत सर्वम’ एवं ‘कृषिकर्मणि सर्वश्रेष्ठम्’ यानी कृषि को संपूर्ण जगत का आधार एवं सर्वोत्तम कार्य का दर्जा दिया जाता रहा है, वहां खेती और किसानों की यह दयनीय दुर्दशा आखिर कैसे हो गई?

भारत में कृषि का इतिहास हजारों साल पुराना है. वेदों में कृषि से संबद्ध पर्याप्त ऋचाएं हैं. ऋग्वेद में उल्लेख है कि किसान अपने खेतों में काम कर के समाज के लिए अनाज पैदा करता है और समृद्धि लाता है. यह माना जाता रहा है. ‘कृष्याः फलप्रदा धर्म्या प्रजा भूषणमुत्तमम्’ (कृषि धर्म है, जो उत्तम फल देती है और प्रजा का भूषण है.)

मुगलकालीन दौर में भी भारतीय कृषि का महत्वपूर्ण विकास हुआ. अकबर के शासन में तोतानामा और आयन ए अकबरी जैसी व्यवस्थाओं में कृषि का विशेष ध्यान रखा गया. लेकिन कालांतर में किसानों को भारी करों का सामना करना पड़ता था और सूखे या बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय उन की स्थिति और भी खराब हो जाती थी.

औपनिवेशिक काल में कंपनी और ब्रिटिश सरकार की कृषि नीतियों ने किसानों की स्थिति को बहुत प्रभावित किया. भारी कर, नकदी फसलों की ओर मजबूरी और किसानों की भूमि से जबरिया बेदखली जैसी नीतियों ने भारतीय किसानों को अत्यधिक कष्ट दिया. औपनिवेशिक शासन के तहत भारतीय कृषि का एक बड़ा हिस्सा निर्यात के लिए तैयार नकदी फसलों की ओर मुड़ गया, जिस से खाद्यान्न की कमी और किसानों की दुर्दशा बढ़ गई. यूरोपीय औपनिवेशिक औद्योगिक क्रांति के कारण भारत के कृषि आधारित ग्रामीण कुटीर उद्योगधंधे भी धीरेधीरे चौपट होते गए.

स्वातंत्र्योत्तर कृषि नीतियां व विसंगतियां

स्वतंत्रता के बाद कृषि को प्राथमिकता देने की बातें तो लगातार हुईं, लेकिन कृषि नीतियां धीरेधीरे योजनाबद्ध विकास की अन्य प्राथमिकताओं के नीचे दबती चली गईं. हरित क्रांति (1960 के दशक) ने कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि की, लेकिन इस ने कई जटिल समस्याओं को जन्म दिया. उर्वरकों, बीजों और सिंचाई की सुविधाओं पर अनुदान का भी प्रावधान रखा गया. लेकिन इस का फायदा बिचौलियों व रसूखदारों के अनैतिक गठजोड़ ने उठाया. लूट का ये सिलसिला आज भी जारी है.

वहीं दूसरी ओर असंगत रासायनिक खादों के प्रयोग ने आज देश की लगभग 85 फीसदी जमीन बंजर होने की कगार पर है. किसानों के उत्पाद को वाजिब मूल्य दिलाने के लिए ‘कृषि उत्पाद मूल्य आयोग’ बनाया गया, पर यह किसानों का पक्षधर कभी नहीं रहा और उन के द्वारा तय किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य खेती की वास्तविक लागत की तुलना में किसानों को घाटा ही देते रहे हैं. कृषि उपज मंडियां भी बनाई गईं, पर यहां भी राजनीतिक छुटभैयों, बिचौलियों आढ़तियों ने कब्जा कर लिया. यहां भी किसानों की लूट पर रोक नहीं लग पाई.

भारतीय कृषि की वर्तमान व भावी ज्वलंत समस्याएं
जलवायु परिवर्तन : पिछले दिनों एक खबर आई कि गेहूं पकने के समय गरमी के बढ़ जाने के कारण गेहूं के दाने सिकुड़ गए और देश के सकल गेहूं उत्पादन में लगभग 16 फीसदी की कमी आई. लगभग डेढ़ अरब की आबादी वाले देश भारत के लिए यह बेहद ही चिंताजनक है. ‘पर्जन्यः पर्जन्याः फलं कृषकस्य सुखाय’ (वर्षा का फल किसान के सुख के लिए है) – यह वैदिक उद्धरण खेती में मौसम की महत्ता को दर्शाता है. वैश्विक जलवायु परिवर्तन की अनियमित वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं से निबटना किसान के बस का नहीं है.

फसलचक्र बदलने के साथ ही किसानों को अपनी खेती की पद्धतियों में भी आवश्यक बदलाव करना जरूरी है.

खेती की बढ़ती लागत और किसानों के उत्पादों का वाजिब मूल्य न मिलना : किसानों की सब से बड़ी समस्या यही है कि उन्हें उन के उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाता है. आर्थिक सहयोग विकास संगठन और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 से 2017 के बीच किसानों को उत्पाद का सही मूल्य न मिल पाने के कारण 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.

सरकार की ही ‘शांता कुमार समिति’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि एमएसपी का लाभ सिर्फ 6 फीसदी किसानों को ही मिल पाता है. इस का सीधा सा मतलब है कि देश के 94 फीसदी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाता है और वे एमएसपी के फायदे से दूर रहते हैं.

देश के किसानों को उचित मूल्य न मिल पाने के कारण 5 से 7 लाख करोड़ का सालाना घाटा होता है, जबकि कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के सरकारी दावों के बावजूद बजट 2024 में कृषि के लिए महज 1.52 लाख करोड़ रुपए ही प्रावधानित किए हैं यानी किसानों को इस चिड़िया की चुग्गे जैसे बजट के बावजूद इस साल भी तकरीबन 5 लाख करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ेगा. जाहिर है कि स्थिति और भी विकराल होने वाली है.

किसानों पर कर्ज का बोझ : किसान को उन के उत्पाद का सही मूल्य न मिल पाने के कारण अकसर ही घाटा उठाना पड़ता है और उन की आय बहुत ही कम रहती है. कर्ज का बोझ और ब्याज की ऊंची दरें किसानों की माली हालत को और भी खराब करती हैं.

नैशनल सैंपल सर्वे औफिस के आंकड़ों के अनुसार, देश के लगभग 47 फीसदी किसान औसतन कर्ज में डूबे हुए हैं.

समाज का नासूर किसान आत्महत्याएं : महाराष्ट्र के अमरावती डिवीजन की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, 6 महीने में इस डिवीजन में 557 किसानों ने खुदकुशी कर ली, जबकि किसान संगठनों का कहना है कि विदर्भ में प्रतिदिन किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, साल 2020 में 10,677 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की. यह आंकड़ा दर्शाता है कि आर्थिक और मानसिक दबावों के चलते किसानों की स्थिति कितनी गंभीर है.

नीतिगत विसंगतियां – प्राचीन मान्यता रही है कि ‘राज्यं पालयेत् कृषि पालेन’ अर्थात राज्य की रक्षा कृषि की रक्षा से होती है. यह दर्शाता है कि कृषि की रक्षा किसी भी राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य है, जबकि हमारी सरकारों की नीतियां अकसर किसान विरोधी रही हैं. पिछले भूमि अधिग्रहण कानून, नए तीनों विवादास्पद कृषि कानून, हालिया बिजली बिल कानून इस के उदाहरण हैं. किसानों को यह डर है कि सरकार की ये सभी नीतियां आखिरकार उन के हितों के खिलाफ ही काम करेंगी और उन्हें बड़े कारपोरेट्स के सामने मजबूर कर देंगी.

असल जिम्मेदार कौन? : अब लाख टके का सवाल यह है कि इन किसान विरोधी नीतियों के लिए कौन जिम्मेदार है. यह सवाल और इस के जवाब दोनों बहुआयामी हैं, जैसे :

सरकारी नीतियां : सत्ता के लिए वोटों की ओछी राजनीति, कारपोरेट एवं सरकार की अनैतिक गठजोड़ के कारण सरकार की नीतियों और उन की कार्यान्वयन की प्रक्रिया अकसर किसानों के हितों के उलट होती है. कई वजहों से कृषि कानूनों और तमाम अन्य सुधारों के बावजूद उन का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो पाता.

कारपोरेट हित सर्वोपरि : राजनीतिक पार्टियां चुनाव लड़ने के खर्च के लिए बड़े कारपोरेट्स के चंदे पर निर्भर हैं. इसलिए बड़े कारपोरेट घरानों के हितों का प्रभाव भी कृषि नीतियों पर साफसाफ देखा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण, नकदी फसलों की प्रवृत्ति और कृषि में निवेश की नीतियों पर कारपोरेट का दबदबा रहता है.

साल 2020-21 में कारपोरेट कंपनियों का कृषि में निवेश बढ़ कर 78,000 करोड़ रुपए हो गया.  इन दिनों हर बड़ा कारपोरेट येनकेन प्रकरेण किसानों की भूमि हासिल कर अपने ‘लैंडबैंक’ की वृद्धि करने में लगा हुआ है. यह स्थिति देश के छोटे किसान, जो कि लगभग 84 फीसदी है, के लिए बेहद चिंताजनक है.

सामाजिक कुचक्र : भारतीय समाज की सामंती और जातिगत संरचना भी कृषि में असमानता को बढ़ावा देती है. छोटे और सीमांत किसान अकसर बड़े जमींदारों और अमीर किसानों के दबाव में रहते हैं. हालांकि इस स्थिति में कुछ बदलाव आया है, पर अभी भी उन की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए बहुतकुछ किया जाना है.

वोट केंद्रित राजनीति व बिखरा किसान नेतृत्व : लोकतंत्र में हर समुदाय व समूह अपनी सामाजिक स्थिति के अनुरूप अपना हक हासिल करने का प्रयास करता है. इस दौड़ में किसान कतार में सब से अंतिम पायदान पर खड़े हैं. दरअसल, देश की आबादी का सब से बड़ा भाग होने के बावजूद आज भी किसान एक संगठित वोट बैंक नहीं बन पाए हैं. भले ही  उन के मुद्दे और सारी समस्याएं समान होती हैं, पर यह समुदाय कभी भी अपने मुद्दों पर न तो पूरी तरह से एकजुट होता है और न ही अपने मुद्दों पर एकमुश्त वोट देता है.

किसान मतदाता बूथ में पहुंचने के बाद किसान रह ही नहीं रह जाता, बल्कि वह हिंदू, मुसलिम, सवर्ण, दलित, अगड़े, पिछड़े जैसे अनगिनत खांचों में बंट जाता है.

शातिर राजनीतिबाज अब यह तथ्य भलीभांति समझ गए हैं कि किसान कभी भी एकजुट हो कर एक वोट बैंक नहीं बन सकता और अपने मुद्दों के लिए एकजुट हो कर खड़ा नहीं हो सकता, इसलिए ये इन का भरपूर फायदा उठाते हैं. इस स्थिति के लिए किसानों का स्वार्थी, नपुंसक, अहंकारी, नकारा नेतृत्व भी काफी हद तक जिम्मेदार है.

ज्यादातर कूपमंडूक किसान नेता प्राय: स्वकेंद्रित व अपनेअपने झूठे अहंकारों में डूबे रहते हैं और ओछी राजनीतिक फायदे के लिए किसान हितों से भी समझौता करने को तैयार रहते हैं. इसलिए ये साझा मुद्दों पर भी जरूरी मजबूती के साथ एकजुट नहीं होते.

ज्यादातर किसान नेता किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के किसी न किसी छोटेबड़े नेता के उपग्रह होते हैं. कई बड़े आंदोलनों के निर्णायक मौकों पर ऐसे नेता अपने स्वार्थों के लिए आंदोलन को बेचने तक से बाज नहीं आते. अपने इन्हीं बुरे कामों से किसानों की आबादी 70 फीसदी होने के बावजूद यह समुदाय पिछले 75 सालों से 40 फीसदी वोट पा कर बनने वाली निकम्मी सरकारों का मुंह ताक रहा है.

सोचसमझ कर ही खरीदें धानबीज (Paddy Seeds)

बातचीत  – डा. आशुतोष कुमार मिश्र, संयुक्त कृषि निदेशक ब्यूरो,  उत्तर प्रदेश

खेती में अच्छी पैदावार के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, उर्वरक व मिट्टी में पोषक तत्वों की आवश्यक मात्रा का होना जरूरी है. अगर बीज अच्छा नहीं है, तो उस का सीधा असर अनाज के उत्पादन पर पडता है.

चूंकि खरीफ का सीजन मुख्यतौर पर धान की खेती का होता है, इसलिए किसानों को धान के अच्छे बीज व उस के चयन को ले कर विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है. अकसर किसानों की यह शिकायत होती है कि दुकानदार ने बीज बेचते समय जो खासियत बताई थी, वह सही नहीं निकली. इस स्थिति में किसान उस दुकानदार के खिलाफ कोई शिकायत नहीं कर पाता है और धान बीज की गुणवत्ता में कमी की वजह से नुकसान उठाने के बावजूद चुप बैठ जाता है. इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि किसान यह तय कर ले कि धान बीज कैसा हो और खरीदारी कहां से की जाए.

किसानों द्वारा धान बीज की खरीदारी को ले कर बरती जाने वाली जरूरी सावधानियों को ले कर संयुक्त कृषि निदेशक ब्यूरो, उत्तर प्रदेश, आशुतोष कुमार मिश्र से लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी बातचीत के खास अंश :

सवाल : धान बीज खरीदने के लिए किसानों को किन जरूरी चीजों पर ध्यान देने की जरूरत होती है?

जवाब : किसान धान बीज खरीदने से पहले यह तय कर लें कि वह जो बीज ले रहे है, उस के पैकेट पर शुद्धता व प्रमाणिकता की मुहर लगी है कि नहीं. इस के अलावा बीज टूटाफूटा नहीं होना चाहिए. बीज खरीदने से पहले किसान यह तय कर ले कि पैक पर उत्पादन तिथि व उस की अंकुरण क्षमता दर्ज हो.

सवाल : किसान द्वारा धान बीज कहां से खरीदा जाना सही होता है?

जवाब : किसान की सुविधा के लिए गांव के नजदीक ही सरकारी बीज विक्रय केंद्र स्थापित किए गए हैं. साथ ही, ब्लौक लेवल पर कृषि बीज गोदाम स्थापित किए गए हैं. साधन सहकारी समितियां इफको, पीसीएफ, कृभको, एग्रो, बीज निगम जैसी संस्थाओं के बीज विक्रय केंद्रों द्वारा बीज खरीदा जाना उपयुक्त होता है.

सवाल : सरकारी बीज विक्रय केंद्रों पर धान बीज खरीदने के क्या फायदे हैं?

जवाब : किसानों द्वारा सरकारी क्रय केंद्रों से बीज खरीदे जाने से उन्हें सरकार द्वारा बीजों पर सरकारी अनुदान के तहत छूट मिलती है. इस के अलावा सरकारी बीज विक्रय केंद्र द्वारा किसानों को बीज खरीदे जाने के उपरांत रसीद दी जाती है, जिस से धान बीज की गुणवत्ता व अंकुरण में कमी आने पर किसान विभाग के जिम्मेदार अधिकारी, कर्मचारियों के पास क्लेम कर सकता है.

सवाल : क्या सरकारी बीज गोदामों पर किसानों को मिलने वाले सभी प्रजातियों के धान बीज की खरीदारी करने पर छूट मिलती है?

जवाब : नहीं. 15 वर्ष से ऊपर की पुरानी प्रजातियों पर राज्य या केंद्र सरकार द्वारा कोई अनुदान देय नहीं है, क्योंकि इन प्रजातियों के पुराने होने से उत्पादन कम होता है. इस में प्रमुख रूप से सरजू 52, नरेंद्र 359, सांभा मंसूरी व सोना मंसूरी है.

सवाल : सरकारी बीज क्रय केंद्रों से मिलने वाले धान की किन प्रजातियों पर अनुदान उपलब्ध है?

जवाब : सरकारी बीज क्रय केंद्रों खरीदने पर 10 वर्ष के भीतर ईजाद की गई धान की नई प्रजातियों पर अनुदान देय है, जिस में हाईब्रिड व प्रमाणित बीज शामिल हैं.

सवाल : सरकारी बीज गोदामों के अलावा और किन बीज क्रय केंद्रों से अनुदान वाले बीज प्राप्त किए जा सकते हैं?

जवाब : सरकारी बीज गोदामों के अलावा किसान इफको, कृभको, पीसीएफ, बीज निगम व एग्रो द्वारा संचालित दुकानों से अनुदान वाले बीज खरीद सकते हैं. इन संस्थाओं को सरकारी अनुदान वाले बीज विक्रय करने वाले बीज मुहैया कराती है.

सवाल : अकसर अनुदान वाले बीज किसानों को नहीं मिल पाते हैं? ऐसी हालत में किसान क्या करे?

जवाब : कृषि विभाग की पूरी कोशिश रहती है कि किसानों को उन की मांग के अनुरूप धान बीज उपलब्ध कराए जाएं, लेकिन कभीकभी मांग की अपेक्षा बीज नहीं उपलब्ध हो पाता है. इस अवस्था में किसान कृषि विभाग द्वारा जारी लाइसैंसशुदा कृषि बीज भंडारों से धान बीज खरीद सकते हैं.

सवाल : किसान प्राइवेट दुकानों से बीज क्रय करने से पहले कैसे यह जानकारी प्राप्त करे कि दुकान लाइसैंसशुदा है या नहीं?

जवाब : बिलकुल सही सवाल किया आप ने. किसानों को प्राइवेट दुकानों से धान बीज क्रय करने से पहले यह तय कर लेना चाहिए कि वह जिस दुकान से बीज क्रय कर रहा है, वह लाइसैंसशुदा है या नहीं. इस के लिए जिला कृषि अधिकारी से या फोन द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकता है.

सवाल : किसानों की अकसर यह शिकायत रहती है कि प्राइवेट दुकानों द्वारा नकली धान बीज बेच दिया गया है. इस अवस्था में किसान क्या कदम उठाए?

जवाब : हां, अकसर बीज विक्रय करने वाले दुकानदार नकली बीज बेचते हैं. इस तरह का वाकिआ मेरे संज्ञान में भी आ चुका है. इस अवस्था में किसानों को चाहिए कि वह जिस प्राइवेट दुकान से धान बीज क्रय कर रहा है, उस से पक्की रसीद जरूर बनवाए. साथ ही, पैकेट के ऊपर लगाए गए टैग व खाली पैक को भी सुरक्षित रखे. अगर बोआई के बाद तो किसान उस रसीद, खाली पैकेट व टैग के साथ कृषि विभाग के जिला कृषि अधिकारी, उपनिदेशक कृषि, सुयक्त निदेशक कृषि, या जिलाधिकारी के पास शिकायत कर सकता है. इस अवस्था में प्राइवेट बीज विक्रेता द्वारा नकली बीज बेचने की पुष्टि होने के बाद जरूरी कानूनी कार्यवाही करने के साथ उन्हें जेल भेजने का प्रावधान है.

सवाल : किसानों को धान बीज क्रय करने से पहले सब से जरूरी ध्यान देने वाली बात क्या है?

जवाब : किसानों को चाहिए कि बीज क्रय करने के पहले उन्नतशील नई प्रजातियों व समयसमय पर आने वाले तकनीकी बदलाव की जानकारी प्राप्त करें, जिस से धान की फसल से अधिक उत्पादन लिया जा सके और जहां तक संभव हो, धान बीज सरकारी बीज विक्रय केंद्रों या मान्यताप्राप्त संस्थाओं से ही खरीदें.

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत और किसानों के सवाल

देश में 18वीं लोकसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच खेती से जुड़े तमाम सवाल गांवदेहात में मुखर हो रहे हैं. विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों में एमएसपी की कानूनी गारंटी से ले कर किसानों की फसलों के वाजिब दाम समेत कई मुद्दे शामिल हैं. सभी दल 14 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को रिझाने में लगे हैं. चुनाव के पहले और किसान आंदोलन के बीच चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ देने के साथ राजनीति गरमा गई. भाजपा ने किसान वोटों को रिझाने के लिए रालोद के साथ गठबंधन भी किया.

राजनीतिक गहमागहमी के बीच 15 मई को किसान राजनीति के असली चौधरी यानी चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का जन्मदिन ‘जल, जंगल और जमीन बचाओ दिवस’ के रूप में मनाया गया. आजाद भारत की किसान राजनीति के वे सब से बड़े नायक थे.

आजादी के पहले देश में पिछले सौ सालों में कई किसान आंदोलन हुए. खुद महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, आचार्य नरेंद्र देव, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, स्वामी सहजानंद और प्रो. एनजी रंगा जैसे दिग्गज किसान आंदोलनों से जुड़े रहे, पर आजादी के बाद तसवीर बदली. कई किसान संगठन बने और कई बड़े नेता उभरे. समय के साथ किसान राजनीति के रंग, तेवर व कलेवर बदल गए.

लेकिन चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत बाकी किसान नेताओं से हमेशा अलग रहे. इसी कारण वे भारत के किसानों के दिलों में स्थायी जगह बनाने में कामयाब रहे. बेबाकी से किसानों की बात रखना और नफानुकसान की परवाह न करना उन की खूबी थी.

चौधरी महेंद्र सिंह से मैं पहली बार साल 1988 में मेरठ कमिश्नरी धरने पर मिला था. बाद में ‘अमर उजाला’ अखबार में आने के बाद मैं लगातार उन के संपर्क में बना रहा. चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत से जुड़ी तमाम ऐतिहासिक और निजी घटनाओं का मैं गवाह भी रहा हूं. ऐसे दौर में उन्होंने किसानों को संगठित किया, जब वास्तव में इस की सब से अधिक जरूरत थी.

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने किसान को एक जाति और किसानी को धर्म कहा. पर किसानों को जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के खांचे में बंटने नहीं दिया. उन का नेतृत्व दक्षिण के उन किसानों ने भी स्वीकार किया, जो उन की भाषा भी नहीं जानते थे, पर उन को यकीन था कि चौधरी टिकैत ही ईमानदारी से उन के लिए खड़े रहेंगे.

Chaudhary Mahendra Singh Tikait

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में जो किसान आंदोलन उभरा, उस की संगठन क्षमता और तेवर ने भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर असर डाला. विदेशी मीडिया मेरठ, गंग नहर के किनारे भोपा, सिसौली, शामली और बोट क्लब पर किसानों की भीड़ और टिकैत का करिश्माई व्यक्तित्व देख कर हैरान थी. साल 1987 के बाद अपनी आखिरी सांस तक वे भारत के किसानों के एकछत्र नेता बने रहे. कई सरकारों ने उन की ताकत को कम करने का विभिन्न स्तर पर प्रयास किया. खुद चौधरी अजित सिंह इस में शामिल थे, पर ऐसा हुआ नहीं.

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसान आंदोलन ने 2 बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं. उदारीकरण की आंधी में भारत के कृषि क्षेत्र को एक हद तक बचाया. नीतियों में बदलाव आया, पर वैसा नहीं जैसा विश्व व्यापार संगठन या ब़ड़े देश चाहते थे.

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत दिल्ली ही नहीं, विदेशों में आवाज उठाने पहुंचे. किसान आंदोलन के सब से अहम पड़ाव यानी करमूखेड़ी बिजलीघर पर हुए पुलिस गोलीकांड में 2 नौजवानों जयपाल और अकबर की शहादत को भाकियू ने कभी नहीं भुलाया.

साल 1989 में मुज़फ्फरनगर के भोपा क्षेत्र की मुसलिम युवती नईमा के साथ न्याय के लिए चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने जो आंदोलन चलाया, उस ने एक अनूठी एकता का संकेत दिया. टिकैत के नेतृत्व में हुई अधिकतर विशाल पंचायतों की अध्यक्षता सरपंच एनुद्दीन करते थे और मंच संचालन का काम गुलाम मोहम्मद जौला. जब साल 1987 में मेरठ में भयावह सांप्रदायिक दंगे फैले तो भी भारतीय किसान यूनियन ने ग्रामीण इलाकों में एकता बनाए रखी. उन का सफर आम किसान से महात्मा बनने का सफर था. टिकैत की आवाज सभी सुनते थे.

मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव में 6 अक्तूबर, 1935 को जनमे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का पूरा जीवन ग्रामीणों को संगठित करते बीता, भारतीय किसान यूनियन 1986 में बनाई, तो उन का प्रयास यही रहा कि यह अराजनीतिक बना रहे. मेरठ की कमिश्नरी को 24 दिनों के घेराव ने चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की ख्याति दुनियाभर में पहुंचा दी. दिल्ली औऱ लखनऊ की सरकार हिल गई. किसानों के हकों के सवाल पर राज्यों और केंद्र सरकार से टिकैत की कई बार लड़ाई हुई.

टिकैत का आंदोलन हमेशा अहिंसक रहा. वे गांधी की राह के पथिक थे और चौधरी चरण सिंह के विचारों का उन पर प्रभाव था. उन में धैर्य था, जो 110 दिनों तक चला. रजबपुर सत्याग्रह हो या फिर दिल्ली में वोट क्लब की महापंचायत में सब ने देखा. फतेहगढ़ केंद्रीय कारागार से ले कर दिल्ली की तिहाड़ जेल में वे गए, तो लोगों का आदर पाया.

टिकैत जब भी दिल्लीलखनऊ कूच का ऐलान करते, तो सरकारी प्रतिनिधि उन को मनानेरिझाने सिसौली पहुंचते. लेकिन टिकैत को जो ठीक लगता था, वही करते थे. उन की सादगी, ईमानदारी और लाखों किसानों में उन का भरोसा आंदोलनों में साफ दिखा.

आंदोलनों में वे मंच पर जरूरी होने पर जाते थे, बाकी हुक्का गुड़गुड़ाते हुए किसानों की भीड़ में कहीं भी पहुंच जाते थे. विदेशी पत्रकारों को उन से मिल कर हैरानी होती थी. धूलमाटी से लिपटा उन का कुरता, धोती और सिर पर टोपी के साथ उन की बेलाग बोली ने उन को बाकियों से हमेशा अलग बनाया. अपने घर पर वे आम किसान ही थे. आंदोलन के लिए कभी किसी बड़े आदमी से चंदा नहीं मांगा. किसानों ने अपने दम पर आंदोलन चलाया. उन के हर आंदोलन में वाजिब दाम का मुद्दा शामिल रहा. जीवनभर वे किसानों की लूट के खिलाफ सरकारों को आगाह करते रहे. वे दोस्तों के दोस्त थे. चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत भारतीय किसान राजनीति में एक प्रकाशपुंज की तरह उभरे थे. उन में गहरी समझ थी. उन में कभी दंभ नहीं दिखा.

आजादी के बाद के वे ही एकमात्र ऐसे किसान नेता थे, जिन को पश्चिमी मीडिया ने भी महत्व दिया. इस के पीछे असली वजह उन की सोच और आंदोलन का अभिनव तरीका रहा. संगठन शक्ति से टिकैत ने किसानों की बात मनवा ली. पर हर चीज के लिए उन को दिल्लीलखऩऊ जाना गंवारा नहीं था. वे संसद और विधानसभाओं से खुद दूर रहे और अपने साथियों को भी दूर रखा. राह चलते किसानों के तमाम झगड़े वे निबटा देते थे.

15 मई, 2011 को 76 साल की उम्र में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हो गया, लेकिन लाखों किसान आज भी अपने सवालों पर चौधरी टिकैत के बनाए संगठन भारतीय किसान यूनियन और राकेश टिकैत की तरफ देखता है.

अनोखा बांस (Bamboo) : फायदे अनेक

बांस की बांसुरी से तो हम सब ही परिचित हैं. बांस को लोग आमतौर पर लकड़ी मान लेते हैं. बांस एक तरह की विशेष घास है. आज यह मनुष्य के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही है.

बांस एक सपुष्पक, आवृतबीजी, एक बीजपत्री पोएसी कुल का पादप है. इस के परिवार के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य दूब, गेहूं, मक्का, जौ और धान हैं. बांस दुनिया में सब से तेजी से बढ़ने वाला पौधा है जो  24 घंटे में 7.6 इंच बढ़ता है. कुछ प्रजातियां अनुकूल परिस्थितियों में प्रतिदिन एक मीटर से अधिक बढ़ सकती हैं. एक नया बांस एक साल से भी कम समय में अपनी पूरी ऊंचाई पर पहुंच गया.

बांस का एक पेड़ किसी भी अन्य पेड़ की तुलना में 35 फीसदी अधिक औक्सीजन छोड़ता है और बांस हर साल 17 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कार्बन डाईऔक्साइड को अवशोषित भी करता है. यह एक बहुमूल्य कार्बन सिंक के रूप में काम कर सकता है.

मजे की बात यह है कि बांस को उगाने के लिए किसी उर्वरक की जरूरत नहीं है. यह अपने पत्तों को गिरा कर उन के पोषक तत्वों का उपयोग खुद को विकसित करने के लिए करता है.

बांस सूखे सहिष्णु पौधे हैं. ये रेगिस्तान में विकसित हो सकते हैं. सब से सौफ्टवुड पेड़ों के 20-30 सालों की तुलना में बांस की कटाई 3-5 सालों में की जा सकती है.

बांस का उपयोग कंक्रीट के साथसाथ मचान, पुलों और घरों के बनाने के लिए किया जाता है. बांस में भूमिगत जड़ों और राइजोम्स का एक विस्तृत नेटवर्क है, जो मिट्टी के क्षरण को रोकते हैं. बांस गरमियों में अपने आसपास की हवा को 8 डिगरी तक ठंडा करता है.

ठंडे पहाड़ी प्रदेशों से ले कर उष्ण कटिबंधों तक, संपूर्ण पूर्वी एशिया में, 500 उत्तरी अक्षांश से ले कर उत्तरी आस्ट्रेलिया और पश्चिम में, भारत और हिमालय में, अफ्रीका के उपसहारा क्षेत्रों और अमेरिका में दक्षिणपूर्व अमेरिका से ले कर अर्जेंटीना एवं चिली में (470 दक्षिण अक्षांश) तक बांस के वन पाए जाते हैं.

बांस की खेती कर के कोई भी इंसान लखपति बन सकता है. एक बार बांस खेत में लगा दिया जाए, तो 5 साल बाद वह उपज देने लगता है. अन्य फसलों पर सूखे एवं कीटबीमारियो का प्रकोप हो सकता है. इस के कारण किसान को माली नुकसान उठाना पड़ता है. लेकिन बांस एक ऐसी फसल है, जिस पर सूखे एवं वर्षा का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है.

छोटीछोटी टहनियों और पत्तियों को डाल कर उबाला गया पानी, बच्चा होने के बाद पेट की सफाई के लिए जानवरों को दिया जाता है. जहां पर चिकित्सकीय उपकरण उपलब्ध नहीं होते, बांस के तनों एवं पत्तियों को काटछांट कर सफाई कर के खपच्चियों का उपयोग किया जाता है.

बांस का खोखला तना अपंग लोगों का सहारा है. इस के खुले भाग में पैर टिका दिया जाता है. बांस की खपच्चियों को तरहतरह की चटाइयां, कुरसी, टेबल, चारपाई एवं अन्य चीजें बनाने के काम में लाया जाता है. मछली पकड़ने का कांटा, डलिया आदि बांस से ही बनाए जाते हैं. मकान बनाने और पुल बांधने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है. इस से तरहतरह की चीजें बनाई जाती हैं, जैसे चम्मच, चाकू, चावल पकाने का बरतन आदि.

नागा लोगों में पूजा के अवसर पर इसी का बरतन काम में लाया जाता है. इस से खेती के औजार, ऊन और सूत कातने की तकली बनाई जाती है. छोटीछोटी तख्तियां पानी में बहा कर, उन से मछली पकड़ने का काम लिया जाता है. बांस से तीर, धनुष, भाले आदि लड़ाई के सामान तैयार किए जाते थे.

पुराने समय में बांस की कांटेदार झाड़ियों से किलों की रक्षा की जाती थी. पैनगिस नामक एक तेज धार वाली छोटी वस्तु से दुश्मनों के प्राण लिए जा सकते हैं. इस से तरहतरह के बाजे जैसे बांसुरी, वायलिन, नागा लोगों का ज्यूर्स हार्प एवं मलाया का औकलांग बनाया जाता है.

एशिया में इस की लकड़ी बहुत उपयोगी मानी जाती है और छोटीछोटी घरेलू वस्तुओं से ले कर मकान बनाने तक के काम आती है. बांस का तना भी  खाया जाता है और इस का अचार व मुरब्बा भी बनता है.

मजदूर दिवस (Labor Day) : सब से दयनीय मजदूर भारत का किसान

चुनावी व्यस्तताओं के बीच अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस भी आया और चला गया. यों  तो पूरे साल यह देश कोई न कोई राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाता रहता है. बाल दिवस, वृद्ध दिवस, महिला दिवस, किसान दिवस, पर्यावरण दिवस वगैरह.

अब तो हालात यह हैं कि साल के दिन भी कम पड़ गए हैं. एक ही तारीख में कई अलगअलग राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय दिवस पड़ रहे हैं, किसे मनाएं और किसे छोड़ें? पर क्या सचमुच हमारे देश की सरकारें और हम स्वयं इन तमाम गंभीर सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण संबंधी मुद्दों के प्रति गंभीर हैं?

देश की प्राथमिकताओं में ये मुद्दे कहां हैं? राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों, संकल्पपत्रों एवं गारंटियों में यह मुद्दे कहां हैं? इन यक्ष प्रश्नों पर विचार क्यों नहीं होना चाहिए?

हमारे देश में चुनाव पर्व कमोबेश पूरे साल निरंतर चलता रहता है.‌ विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के अलावा ग्राम पंचायतों के चुनाव, विभिन्न स्थानीय निकायों के चुनाव, नगरपालिका, नगरनिगम, कार्पोरेशनों के चुनाव, नाना प्रकार की सहकारी समितियों, सोसाइटीज के चुनावों में देश लगातार व्यस्त रहता है.

हालिया लोकसभा के चुनाव चक्र में राजनीतिक पार्टियां पिछले कई महीनों से पूरे देश को मथ रही हैं. एकएक रैली पर करोड़ोंअरबों रुपए खर्च हो रहे हैं. कुल मिला कर अरबोंखरबों रुपए इन चुनावों के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर चुनाव के नाम पर समस्त सरकारी मशीनरियां पंगु बनी हुई हैं. कहीं कोई सार्थक काम इंचभर आगे बढ़ता नहीं दिखता.

कहा जाता है कि अब जो कुछ भी होगा, चुनाव के बाद ही होगा. पर ये चुनाव तो सतत चलते ही रहेंगे. इन खर्चीले चुनावों के संपन्न होने के बाद दरअसल होता क्या है. अपवादों को छोड़ कर दें तो इस में जो प्रत्याशी जीतेंगे, वह सब से पहले चुनाव में खर्च की गई अपनी पूरी रकम मय ब्याज के इसी सिस्टम से येनकेन प्रकरेण वसूलेंगे.

उस के बाद अपने आगामी चुनावों के लिए और आगे अपनी संतानों के चुनाव खर्च की अग्रिम व्यवस्था के लिए भी पैसा जनता की योजनाओं से ही चूसा जाएगा.‌ हमेशा की तरह ये सारे चयनित जनसेवक भी देखतेदेखते लोकतंत्र का पारस पत्थर घिस कर अमीर हो जाएंगे और आगे भी, हमारेआप के जैसे लोग इसी तरह मजदूर दिवस, किसान दिवस मनाते और जिंदाबादमुरदाबाद करते रह जाएंगे.

अगर ऐसा नहीं होता, तो आजादी के 77 सालों बाद भी हमारे एक मजदूर की दैनिक मजदूरी एक कप अच्छी कौफी की कीमत से भी कम न होती. देश में न्यूनतम मजदूरी 300 रुपए से भी कम मिल रही है, जबकि आज आभिजात्य कौफीहाउस के एक कप कौफी की कीमत इस से ज्यादा है.

सालोंसाल मजदूर दिवस बनाने और जिंदाबाद का पुरजोर नारा लगाने के बावजूद आज भी मजदूर न तो ढंग से जिंदा रहने के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति कर पा रहा है, न ही अपना स्वाभिमान बचा पा रहा है और न ही कहीं आबाद हो पा रहा है.

मजदूरों की बात हुई, तो भारत में सब से दयनीय मजदूर तो भारत का किसान है. किसान के न तो काम के घंटे तय होते हैं और न ही संडेमंडे की कोई छुट्टी होती है. उसे तो कड़कड़ाती ठंड में 4 डिगरी से भी कम तापमान में पानी लगाने के लिए आधी रात को खेत पर जाना ही पड़ेगा. 48 डिगरी में भी चाहे चिलचिलाती धूप हो, लू चल रही हो, उसे हर हाल में खेतों में पसीना बहाना ही पड़ेगा. इन को कोई केजुअल अथवा मैडिकल लीव नहीं मिलती. कुपोषण के मारे ये किसान 40 साल की उम्र में ही बूढ़े हो जाते हैं.

अब एक बार हम यह भी आकलन कर लें कि इस जीतोड़ मेहनत व नारकीय जीवन के बदले में उसे मिल क्या रहा है? क्या उन्हें उन की मजदूरी भी मिल पा रही है. 5 आदमी के परिवार के एक व्यक्ति की न्यूनतम औसत मजदूरी 300 रुपए प्रतिदिन भी गिना जाए, और साल की 200 दिनों की मजदूरी जोड़ी जाए, तो साल में एक किसान परिवार को खेती में उस की लागत और उस पर देय 50 फीसदी फायदे को छोड़ कर कम से कम 3 तीन लाख रुपए तो उस के और उस के परिवार की मजदूरी के ही मिलने चाहिए. परंतु देश का पेट भरने वाले अन्नदाता किसान को असल में क्या और कितना मिल रहा है, उस की बानगी पेश करना चाहूंगा.

देश में किसान परिवार की वर्तमान औसत मासिक आय केवल 10,218 रुपए है, जबकि झारखंड के किसान परिवार की औसत आय महज 4,895 रुपए प्रति माह है. इस का मतलब यह हुआ कि झारखंड के पूरे किसान परिवार की एक दिन की आमदनी लगभग 160 रुपए है.

मजदूर दिवस (Labor Day)

हमारे गांव का औसत परिवार 5 आदमियों का माना जाता है. इस का मतलब हुआ कि एक व्यक्ति के हिस्से में रोजाना लगभग 30 रुपए ही आ रहे हैं. इस 30 रुपए में ही उसे दोनों टाइम अपना पेट भी भरना है, तन भी ढकना है, सामाजिक रिश्तों को भी निभाना है, बच्चों को पढ़ानालिखाना है, बूढ़े लाचार मांबाप पालने हैं और उन का और अपने परिवार का इलाज भी करवाना है, जबकि आज एक अच्छी सिगरेट की कीमत इस से ज्यादा है.

ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार के साथ ही दूसरे राज्यों के किसानों की स्थिति भी इस से कोई खास बेहतर नहीं है. सरकार वादा करने के बावजूद किसानों को उन के उत्पादन की न्यूनतम लागत (C2+FL) पर 50 फीसदी मुनाफे के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर के उन्हें यह वाजिब मूल्य व्यापारियों से दिलवाने के लिए जरूरी एमएसपी गारंटी कानून भी नहीं ला रही है.

हकीकत तो यह है कि सरकार और बाजार दोनों मिल कर किसान का लगातार शोषण करते आए हैं. किसान के परिश्रम व पसीने को वाजिब मूल्य देने के नाम पर बाजार और सरकार दोनों को सांप सूंघ जाता है.

नौकरीपेशा मध्यम तबके की हालत भी बहुत खराब है. पिछले कई सालों से इनकम टैक्स स्लैब में कोई प्रभावी बदलाव नहीं आया है, जबकि महंगाई सूचकांक 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ चुका है.

मध्यवर्गीय नौकरीपेशा व्यक्ति की साल में 2 महीने की मजदूरी अथवा वेतन सरकार हड़प ले रही है. इस से पच्चीसों हजार करोड़ रुपए खर्च कर के नई संसद बन गई है और ऐसे ही ढेर सारे अनुत्पादक कामों में इन करोड़ों कामगारों की खूनपसीने की कमाई लुटाई जा रही है.

हमारे नेता और उन की नीतियां हमारे किसानों, मजदूरों और कामगारों की स्थिति को तमाम वादों और जुमलों के बावजूद क्यों नहीं सुधार पा रही हैं, क्योंकि ये चंद पूंजीपतियों की दलाल सरकारें वैसा चाहती ही नहीं. इन की नीतियों के कारण गरीब दिनोंदिन और गरीब व अमीर दिनोंदिन और अमीर होते जा रहे हैं. देश का सारा पैसा, संपत्ति और संसाधन मुट्ठीभर धन्ना सेठों की तिजोरियों में कैद होता जा रहा है.

अब अपनेआप से यह पूछने का वक्त आ गया है कि क्या यही दिन देखने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपनी जान पर खेल कर लाठी, डंडे, गोली खा कर, जेल में चक्की पीस कर, अपना खूनपसीना बहा कर अनगिनत जानें दे कर यह आजादी हासिल की थी? और अरबोंखरबों रुपए खर्च कर कराए जा रहे इन चुनावों से बहुसंख्यक किसान, मजदूर, कामगार परिवारों को क्या फायदा?

जब चुनाव के बाद जनता की सेवा के लिए अवसर मांगने वाले ये जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के चंद दिनों में ही येनकेन प्रकरेण देखतेदेखते करोड़पतिअरबपति हो जाएंगे और अब तक चली आ रही नीति और रीति के अनुसार फिर ऐसी नीतियां और योजनाएं बनाएंगे, जिस से कामगार, किसान बस किसी तरह जिंदा रहे और मरने न पाए. लेकिन दिनोंदिन गरीब और गरीब होता जाए और अमीर दिनोंदिन और अमीर. और इस सड़ेगले घुन लगे लोकतंत्र के अंतिम पायदान पर खड़ी जनता इन नकली जनसेवक नेताओं और उन के मुट्ठीभर चुनिंदा आकाओं की पालकी ढोता रहे.

शायद यह अंतिम सही वक्त है कि अब किसान,मजदूर, कामगार, नौकरीपेशा तबका एकसाथ बैठ कर यह तय करे कि क्या लोकतंत्र का वर्तमान स्वरूप, यह रीढ़विहीन चुनावी तंत्र और ये मंहगे चुनावी ड्रामे अब हमारे लिए बेसुरे, बेमानी और निरर्थक हो गए हैं. शायद हमारे संपूर्ण सिस्टम की पुनर्समीक्षा करने और बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था के चयन के लिए विचारमंथन और इस संपूर्ण व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव करने का वक्त अब आ गया है.