Crop Protection : पाला से किसान कैसे करें फसल सुरक्षा

अधिक ठंड होने पर किसानों को अपनी फसल की भी चिंता सताने लगती है. घटते तापमान में पाला पड़ने की अधिक संभावना होती है. ऐसे में किसानों को पाले से फसल को बचाने के लिए क्या क्या करें तैयारी ? जानने के लिए इस लेख में पढ़ें ऐसी अनेक जानकारी जो आपकी फसल को रखेंगे स्वस्थ.

पाले से किन फसलों को होता है अधिक नुकसान :

जाड़े के दिनों में पाला पड़ना आम बात है. पाले से पशु-पक्षी तो बचने के उपाय कर लेते हैं, लेकिन किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या पाले से फसलों को बचाव को लेकर आती है. पाले से खराब होने वाली में टमाटर, मिर्च, बैगन जैसी सब्जियां और मटर, चना, अलसी, सरसों, जीरा, धनिया, सौंफ आदि में 50 फीसदी से ज्यादा का नुकसान हो सकता है. इसी तरह दलहनी फसल अरहर और गन्ने और गेहूं की फसलों में यह नुकसान 50 फीसदी तक हो सकता है.

फसल पर कैसे दिखता है पाले का असर :

रबी मौसम में फसलों में फूल और फलियां बनते समय पाला पड़ने की सर्वाधिक संभावनाएं रहती हैं, इसलिए ऐसे समय में किसानों को पाले से सुरक्षा के उपाय अपनाने चाहिए. पाले के प्रभाव से पौधों की पत्तियां एवं फूल झुलसे हुए दिखाई देते हैं. यहां तक कि अधपके फल सिकुड़ जाते हैं, उन में झुर्रियां पड़ जाती हैं एवं कई फल गिर जाते हैं. फलियों एवं बालियों में दाने नहीं बनते हैं एवं बन रहे दाने सिकुड़ जाते हैं.

किस समय पड़ता है पाला

जब तापमान शून्य डिगरी सेल्सियस से नीचे चला जाता है और हवा रुक जाती है, तो रात को पाला पड़ने की संभावना रहती है. आमतौर पर पाले का अनुमान दिन के बाद के वातावरण से लगाया जा सकता है. वैसे रात को तीसरे एवं चौथे पहर में पाला पड़ने की संभावनाएं अधिक रहती हैं.

जाड़ों में हवा का रुख बदल देता पाले का मिजाज :

सर्दियों में चलने वाली हवा का पाले छत्तीस का आंकड़ा है. सर्दी के दिनों में जिस दिन दोपहर के बाद हवा चलना बंद हो जाए और आसमान साफ रहे, तो पाला पड़ने की संभावना अधिक रहती है. आमतौर पर तापमान चाहे कितना ही नीचे चला जाए और अगर शीत लहर चल रहे तो पाला नहीं पड़ेगा. परंतु यदि इसी बीच हवा का चलना रुक जाए, तो पाला पड़ने की संभावना बढ़ है, जो फसलों के लिए नुकसानदायक है.

कैसे करें पाले से बचाव :

किसान दिन-रात खेती-किसानी का काम करते हुए मौसम के मिजाज को जानता है. और उसे आने वाले मौसम का अनुमान हो जाता है, इसलिए किसान को जब पाला पड़ने के आसार नजर आएं तो उस रात 12 बजे से 2 बजे के आसपास खेत की उत्तरपश्चिम दिशा से आने वाली ठंडी हवा की दिशा में बोई हुई फसल के किनारे मेंड़ों पर आसपास, मेंड़ों पर रात में कूड़ा-कचरा या घास-फूस जलाकर धुआं करना चाहिए, ताकि खेत में धुआं हो जाए एवं वातावरण में गरमी आ जाए. चाहें तो मेंड़ पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कूड़े-करकट के ढेर लगा कर धुआं करें. इस तरीके से तापमान बढ़ाया जा सकता है, जो पाले की रुकावट करेगा.

Crop Protection

पौधशाला में अपनाएं यह तकनीक :

पौधशाला के पौधों एवं छोटे पौधे वाले उद्यानों, नकदी सब्जी वाली फसलों को टाट, पॉलीथिन अथवा भूसे से ढक देना चाहिए. हवा आने वाली दिशा की तरफ रुकावट करें. यानी उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ टाटियां बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगाएं.

फसल पर करें मल्चिंग :

पाले से बचाव के लिए मल्चिंग भी एक तरीका है. यह तकनीक ज्यादातर छोटे पौधे वाली फसल या मेंड़ पर लगाई गई सब्जियों की खेती पर अधिक कारगर है. इस तकनीक में फसल को पुआल, प्लास्टिक शीट या सूखी पत्तियों आदि से ढक दिया जाता हैं, जिससे फसल का पाले से बचाव हो जाता है.

सिंचाई भी है लाभकारी :

जब पाला पड़ने की संभावना अधिक हो तब खेत में सिंचाई करनी चाहिए. नमी वाली जमीन में काफी देर तक गरमी रहती है और भूमि का तापमान कम नहीं होता है, इसलिए कभी यह तरीका भी अपनाया जा सकता है.

सर्दियों में पड़ने वाला पाला खेती की अनेक फसलों को खासा नुकसान पहुंचाता है, इसलिए किसान थोड़ी सूझ-बूझ से फसलों में पाले से होने वाले नुकसान को कम कर सकता है.

Mashroom Cultivation : घर से मशरूम का खिलता कारोबार

मशरूम शाकाहारी लोगों को खास पसंद होता है और यह स्वादिष्ठ होने के साथसाथ सेहत भी सुधारता है. ताजे और शुद्ध मशरूम का लुत्फ लेने के लिए या अतिरिक्त कमाई का जरीया बनाने के लिए इसे आसानी से घर में काफी कम जगह में उगाया जा सकता है. इस में विटामिन बी और सी भरपूर मात्रा में होते हैं. इस में शर्करा और स्टार्च बिलकुल नहीं होता है, जिस से यह शुगर और मोटापे के रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद है.

ढींगरी मशरूम से अधिक मुनाफा :

आमतौर पर ढींगरी मशरूम की खेती सितंबर से अप्रैल महीने के बीच की जा सकती है. इस के लिए 20 से 25 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान और 80 से 85 फीसदी आर्द्रता की जरूरत होती है. गेहूं, जौ, बाजरा वगैरह के भूसे, लकड़ी के बुरादे या रद्दी कागज की लुगदी पर इस का उत्पादन किया जा सकता है.

कैसे करें मशरूम उत्पादन :

वैसे अनाज का भूसा इस की खेती के लिए सब से अच्छा जरीया है. भूसे को साफ पानी में भिगो कर रातभर छोड़ दिया जाता है और अगली सुबह भूसे से पानी से निकाल कर कर उसे उबलते हुए पानी में डाल दिया जाता है. इस के बाद उसे ठंडा होने के लिए 2 से 4 घंटे तक छोड़ दें. भूसे को बैविस्टीन और फार्मेलिन की मदद से उपचारित कर के रोगमुक्त कर लेना चाहिए. इस के लिए 10 ग्राम बैविस्टीन और 50 मिलीलिटर फार्मेलिन को 100 लिटर पानी में डाल कर भूसे को उस में डुबो दिया जाता है.

किसान ने बताया कुछ खास :

मशरूम उगाने वाले बिहार के नालंदा जिले के कथैली गांव के किसान बृजनंदन प्रसाद कहते हैं कि प्रति किलोग्राम गीले भूसे में 40 से 60 ग्राम तक मशरूम का बीज (स्पौन) मिलाएं. अगर कमरे का तापमान कम हो तो स्पौन की मात्रा को 25 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है. बीज मिले भूसे को 45 सैंटीमीटर लंबे अैर 30 सैंटीमीटर चौड़े प्लास्टिक के थैलों में दोतिहाई तक भर दिया जाता है और उस के बाद सभी थैलों के मुंह को सुतली से अच्छी तरह से बांध दिया जाता है. सभी थैलों में छोटेछोटे छेद कर दिए जाते हैं. इस से बीजों को हवा मिलती रहती है.

जरूरत के मुताबिक छोटे या बड़े आकार के थैलों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

तापमान नियंत्रण से उम्दा पैदावार :

इन थैलों को कमरे, बरामदे, झोंपड़ी या किसी भी छायादार व हवादार जगह पर ही रखें. इस बात का ध्यान रखें कि जिस जगह पर थैलों को रखा जाए, वहां का तापमान 20 से 25 डिगरी सैंटीग्रेड हो और आर्द्रता 80 से 85 के आसपास होनी चाहिए.

2-3 हफ्ते के बाद सफेद कवकजाल भूसे पर उगता नजर आने लगता है. जब कवकजाल पूरी तरह से फैल जाए तो थैलों को हटा दिया जाता है. भूसे में नमी बनाए रखने के लिए दिनभर में 2-4 दफे स्प्रेयर से पानी का छिड़काव करना होता है, ताकि आर्द्रता 80-85 के बीच बनी रहे. पौलीथिन के थैलों को हटाने के बाद मशरूम को हलकी रोशनी और ताजी हवा की दरकार होती है. इस के लिए कमरे में 3-4 ट्यूब लाइटें और पंखे लगा सकते हैं.

3 बार मिलता है मशरूम उत्पादन :

थैलों को हटाने के तकरीबन 15 दिनों के बाद भूसे के गट्ठर से मशरूम निकलने लगता है. इस के पूरी तरह तैयार होने पर किनारा भीतर की ओर मुड़ने लगता है. तब डंठल को तोड़ कर निकाल लें.
पहली फसल लेने के बाद भूसे के गट्ठर पर पानी का छिड़काव करते रहें, इस से 10-15 दिनों बाद दूसरी और फिर तीसरी फसल ली जा सकती है. 1 भूसे के गट्ठर से 3 बार फसल ली जा सकती है.

1 किलोग्राम भूसे से 1 किलोग्राम मशरूम पैदा होता है और इस पर प्रति किलोग्राम 15 रुपए का खर्च बैठता है. बाजार में मशरूम 150 से 200 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है. इस हिसाब से मशरूम लागत से 8-10 गुना ज्यादा कमाई देता है.

Mushroom Cultivation

मशरूम उगाने में इन बातों का रखें खयाल :

-मशरूम के स्पौन को कमरे के तापमान पर 30-35 दिनों से ज्यादा समय तक नहीं रखना चाहिए.

-मशरूम को उगाने के दौरान मौसम और तापमान को ध्यान में रखना चाहिए.

-सफाई पर पूरा ध्यान देना चाहिए.

-ठीक से सफाई नहीं होने पर स्पौन के थैलों में फफूंद या कई तरह के कीड़े पैदा हो सकते हैं.

मशरूम उत्पादन एक ऐसा कारोबार है, जिसे बिना खेती की जमीन के भी शुरू किया जा सकता है. लेकिन इस के लिए जरूरी है, मशरूम उत्पादन करने की तकनीक जानने की. इस के लिए अनेक कृषि संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र और मशरूम उत्पादक किसान समयसमय पर किसानों को ट्रेनिंग देते हैं. आप वहां से ट्रेनिंग ले कर इस कारोबार को कहीं अधिक मुनाफेदार बना सकते हैं. मशरूम की मांग आजकल बड़े होटलों और बाजार में काफी ज्यादा है, इसलिए इस का बाजार भाव भी अच्छा मिलता है.

Agricultural Education : कृषि क्षेत्र में है रोजगार की भरमार

आज देश की 65 से 70 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप से ग्रामीण परिवेश से जुड़ी है. सबसे ज्यादा सरकारी बजट कृषि क्षेत्र को दिया जाता है. सरकार का फोकस भी कृषि क्षेत्र पर अधिक है. इससे साफ दिख रहा है कि कृषि क्षेत्र रोजगार का एक विशाल हब है, इसलिए कृषि क्षेत्र में आप बड़े से बड़ा पद पा सकते हैं. जरूरत है केवल सही राह चुनने की. कृषि क्षेत्र में क्या कोर्स किए जा सकते हैं, जानिएं –

12वीं बाद करें कृषि की पढ़ाई

छात्रों को इंटर की परीक्षा देने के बाद चिंतित होने की जरूरत नहीं है. कृषि क्षेत्र में रोजगार की ढेरों संभावनाएं हैं. जरूरत है केवल जानकार बनने की. इसी को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों बाबा राघवदास कृषक इंटर कालेज भाटपार के सभागार में इंटरमीडिएट के छात्रों और अध्यापकों के साथ एक कैरियर काउंसिल किया गया, जिसमें आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अयोध्या, उत्तर प्रदेश की प्रोफैसर डा. सुमन प्रसाद मौर्य (अध्यक्ष मानव विकास एवं परिवार कल्याण संस्था) ने छात्रों को उनके भविष्य की शिक्षा के विषय में बताया.

Agricultural Education

कृषि में चुने मनपसंद कोर्स :

आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज, अयोध्या, उत्तर प्रदेश के 5 कृषि विश्वविद्यालयों में से एक है, जिसको A++ रैंकिंग मिली है. इस कृषि विश्वविद्यालय में कृषि, उद्यान एवं वानिकी, मत्स्य, पशुपालन एवं पशु चिकित्सा, कृषि अभियंत्रण के अलावा सामुदायिक विज्ञान का महाविद्यालय है. इस महाविद्यालय में स्नातक, परास्नातक और पीएचडी उपाधि के लिए विभिन्न पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं. प्रत्येक वर्ष इस डिगरी में नामांकन के लिए यूपीकैटेट (UPCATET) की संयुक्त परीक्षा होती है. इसके लिए आवेदन https//updated net पर किए जा सकते हैं

छात्राएं कर सकती हैं खुद का कारोबार

प्रोफैसर मौर्य ने बताया कि, सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय में बीएससी औनर्स के 2 पाठ्यक्रम चलते हैं. सामुदायिक विज्ञान (गृह विज्ञान) के 5 प्रमुख विषयों के विभागों द्वारा वैज्ञानिक और कलात्मक ज्ञान व कौशल सिखाए जाते हैं. दूसरा फूड एंड डाइटीशियन का कोर्स है, जिसमें आहार विज्ञान और उससें रोगियों के उपचार के बारे में बताया जाता है. यह 4 वर्षीय डिग्री कार्यक्रम व्यावसायिक उपाधि है, जिस को करने के बाद आप अपना स्वयं का उद्योग शुरू कर सकते हैं.

युवा कृषि क्षेत्र में अच्छे विश्वविद्यालय से शिक्षा लेकर एक अच्छा नागरिक बनने के साथ ही रोजगार भी पा सकते हैं.

Organic Farming: किसानों के लिए क्यों है लाभकारी

रासायनिक खेती करने वाले किसान अब जैविक खेती की ओर रुख करने लगे हैं. सरकार और सरकारी संस्थाएं भी आगे बढ़कर किसानों को प्रोत्साहित कर रही हैं. आखिर जैविक खेती क्यों है फायदेमंद? पढ़िए और जानिए विशेषज्ञों की बातें.

किसानों के लिए हुई संगोष्ठी

हाल ही में जैविक खेती को लेकर महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में किसान संगोष्ठी का आयोजन हुआ. यह खास आयोजन उदयपुर के कीट विज्ञान विभाग में जैविक कृषि द्वारा कौशल विकास विषय पर हुआ. अनेक कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन्हें आप के लिए भी जानना जरूरी है.

कुलपति डा. प्रताप सिंह ने क्या कहा

विश्वविद्यालय के कुलपति डा. प्रताप सिंह ने जैविक कृषि की उपयोगिता एवं महत्ता पर प्रकाश डालते हुए किसानों को जैविक कृषि की विभिन्न विधाओं के बारे में बताया. उन्होंने किसानों से कहा कि जैविक कृषि के द्वारा गुणवत्तायुक्त फसल से किसान अपना और समाज के स्वास्थ्य को अच्छा रख सकते हैं, साथ ही जैविक तरीके से की गई फसल को बाजार में बेचने पर अधिक लाभ भी प्राप्त होता है.
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में परमानंद, चित्तौड़ प्रांत संगठन मंत्री, भारतीय किसान संघ ने भी किसानों को संबोधित किया और किसानों को गौ आधारित कृषि की महत्ता और उपयोगिता के बारे में बताया.

Organic Farming

डा. जेपी मिश्रा, निदेशक अटारी का क्या है कहना

कृषि विज्ञान केंद्रों के द्वारा किसानों और जैविक कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार प्रयासरत है, विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को कृषि तकनीकी पहुंचाकर उन्हें कैसे लाभान्वित किया जा सकता है, उन योजनाओं के बारे में निदेशक ने विस्तृत जानकारी दी.

कीट नियंत्रण में जैविक तरीका है कारगर :

राजस्थान कृषि महाविद्यालय के प्रोफेसर डा. मनोज कुमार महला ने विभिन्न फसलों में लगने वाले कीट और उनसे होने वाले नुकसान व नियंत्रण के बारे में बारीकी से बताया. फेरोमौन ट्रैप और वनस्पतियों से बनाए जाने वाली दवाओं के द्वारा कीट नियंत्रण पर चर्चा कर जानकारी दी.

वहीँ डेयरी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के प्रोफेसर डा. लोकेश गुप्ता ने जैविक कृषि में पशुधन के रखरखाव और आहार के बारे में किसानों को बताया. इस कार्यक्रम में 160 किसानों, विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई. कार्यक्रम में किसानों को जैविक कृषि से संबंधित किट वितरित किए गए. महाविद्यालय के डा. जगदीश चौधरी, आचार्य एवं विभागाध्यक्ष, शस्य विज्ञान विभाग ने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया.

Organic Farming : ‘कृषि मित्र’ किसान विज्ञान शुक्ला की सफलता की कहानी, जानिएं

खेती में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्ट‌ी की घटती उर्वराशक्ति और आमजन की बिगड़ती सेहत का जज्बा समझते हुए बांदा जिले के अतर्रा गांव के युवा किसान विज्ञान शुक्ला ने एक ऐसी राह चुनी जो खुद के लिए तो मील का पत्थर साबित हुई और अन्य किसानों के लिए भी खेती में नई राह दिखाने का काम कर रही है. विज्ञान शुक्ला बांदा जिले के ऐसे प्रगतिशील किसान हैं, जिनके साथ आज बुंदेलखंड क्षेत्र के लगभग 15 हजार से अधिक किसान जुड़े हुए हैं और उन के बताए रास्ते पर चल कर सफल खेती कर रहे हैं.

जैविक खेती को अपना कर लाखों की कमाई :

विज्ञान शुक्ल ने बताया कि स्नातक की पढ़ाई के दौरान परिजनों को रासायनिक खादों से जूझते देख कर उन का मन दुखी हो गया था. उन्होंने बताया कि ज्यादातर किसान खेती में रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस से खेत की मिट्टी खराब होने के साथ ही लोगों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है.

ऐसे में मैं ने एक नई शुरुआत की और कंपोस्ट खाद के निर्माण में जुट गया और खेती में मित्र कीट कहे जाने वाले केंचुओं से बनने वर्मी कंपोस्ट और गोबर की खाद को अपनाया. इस की शुरुआत करने के लिए चार चरही में गोबर भर कर कन्नौज से लाए और उस में केंचुए ला कर छोड़े तो अच्छी वर्मी कंपोस्ट खाद बनने की शुरुआत हुई.

अच्छे नतीजों से उत्साहित हो कर कृषि एवं उद्यान विभाग से अनुदान ले कर काम को आगे बढ़ाया. कुछ समय बाद खेतों में पैदावार बढ़ने लगी, जिस से खाद में अच्छा उत्पादन होने लगा, तो आमदनी भी बढ़ने लगी. 3 वर्षों के बाद इस काम से फसल पैदावार के अलावा खाद बिक्री से लाख रुपया प्रतिवर्ष आय के रूप आने लगा.

कभी अकेले चले थे अब हजारों कदम हैं साथ :

विज्ञान शुक्ला ने अब से लगभग 15 साल पहले अकेले ही जैविक खेती की शुरुआत की और कंपोस्ट बनाने का काम अपने घर से शुरू किया और आज उन से प्रेरणा ले कर जिले के लगभग हजारों किसान जैविक खेती को अपना रहे हैं, जो लगातार उन के संपर्क में रह कर जैविक खेती के अच्छा फसल उत्पादन ले रहे हैं. उन्होंने बताया कि जैविक खेती की शुरुआत के 2 सालों में फसल उत्पादन में 10 से 12 फीसदी तक की कमी आई थी, जो बाद में पूरी हो गई. अब तो रासायनिक खेती की तुलना में 20 से 25 फीसदी अधिक पैदावार मिलती है और कम लागत में गुणवत्तायुक्त फसल उत्पादन मिलता है, जिस के बाजार दाम भी अच्छे मिलते हैं.

विज्ञान शुक्ला ने बताया कि उन के प्रक्षेत्र पर स्थापित वर्मी कंपोस्ट यूनिट, पशुपालन यूनिट, जैविक आउटलेट पर अभी तक लगभग 10 हजार किसान भ्रमण कर चुके हैं.

पशुपालन (Dairy Farming) बना मददगार :

विज्ञान शुक्ला ने बताया कि वे पशुपालन भी कर रहे हैं, जो उन के लिए खेती में खासा मददगार बन रहा है. पशुओं से मिलने वाले गोबर से खाद बनाने का काम तो आसान होता ही है, बल्कि पैसे की भी बचत होती है. डेयरी फार्मिंग के कारोबार से दूध की प्रोसैसिंग कर अनेक उत्पादों से भी खासी कमाई हो जाती है.

कैसे करते हैं खेती :

विज्ञान शुक्ला धान, गेहूं, ज्वार, हाईब्रिड ज्वार, मूंग आदि की खेती करते हैं और खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करते हैं और 3 जुताई कल्टीवेटर से कर मिट्टी की संतुति के अनुसार बीज तय करते हैं. जुताई के समय गोबर की खाद 6 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालते हैं. खरपतवार की रोकथाम के लिए समय पर निराईगुड़ाई का काम करते हैं और पहली निराई के समय पौधों में विरलीकरण का काम करते हैं. पहली सिंचाई खेती में पुष्पावस्था के समय और दूसरी सिंचाई पुष्प आने के बाद करते हैं.

जैविक तरीके से फसल सुरक्षा :

फसल सुरक्षा के लिए रस चूसने वाले कीटों और छोटी सूंड़ी, इल्लियों की रोकथाम के लिए नीमशास्त्र का इस्तेमाल और कीटों और बड़ी सूंड़ी के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं. छिड़काव के लिए 100 लिटर पानी में 2.5 मिलीलिटर नीमास्त्र/ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं और फसल तैयार होने के बाद फसल काटने पर उसे धूप में सुखा कर 10 से 12 फीसदी नमी पर उस का भंडारण करते हैं. सुरक्षित भंडारण के लिए नीम की सूखी पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं. बीज बोने से पहले उस का बीजशोधन ट्राइकोग्रामा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर के बाद राइजोबियम कल्चर 200 ग्राम प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से करते हैं.

लोगों को दे रहे हैं रोजगार :

विज्ञान शुक्ला का कहना है कि उन के प्रक्षेत्र पर 30 वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगी हैं और 13 पशुपालन यूनिट हैं. जैविक आउटलेट हैं जिन के जरीए लगभग सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है.

राष्ट्रीय स्तर के कृषि पुरस्कार से सम्मानित :

विज्ञान शुक्ला को उन के द्वारा खेती में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्य के लिए अनेक राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं, जिस में राष्ट्रीय स्तर का ‘जगजीवनराम अभिनव पुरस्कार’ भी शामिल है. इस के अलावा पिछले साल दिल्ली प्रैस द्वारा ‘फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड’ के अलावा उन्हें ढेरों सम्मान मिल चुके हैं.

विज्ञान शुक्ला ने अनुसार वर्मी कंपोस्ट तकनीक में 15 फुट लंबी, 3 फुट चौड़ी, 2 फुट ऊंची चरही में 15 क्विंटल गोबर और 4 क्विंटल केंचुआ की जरूरत पड़ती है, जिस में 11 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार हो जाती है.

यह खाद 2 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त है. इस में सभी 16 पोषक तत्त्व होते हैं. इस के प्रयोग से यूरिया, डीएपी जैसी रासायनिक खादों की जरूरत नहीं पड़ती है. छोटा से छोटा किसान भी वर्मी कंपोस्ट खाद का उत्पादन कर सकता है.

Pesticides : फलसब्जियों में जहर कीटनाशकों का कहर

Pesticides : आज के दौर में अनाज से ले कर फलसब्जी यहां तक कि फूल भी बिना रासायनिक उर्वरक (Pesticides) का इस्तेमाल किए पैदा नहीं हो रहे हैं. कम समय में अधिक उपज लेना, साल में ज्यादा फसल लेना, ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन की वजह से किसानों को अधिकतर खेती में रासायनिक उर्वरक (Pesticides) इस्तेमाल करने पड़ते हैं. इन सब से किसान को पैदावार तो मिल जाती है, लेकिन इस अधिक पैदावार के साथसाथ जहरीली होती फसल से अनेक बीमारियां भी मिलती हैं, जिन से घिर कर लोग डाक्टरों के यहां चक्कर लगाते हैं.

समयसमय पर सरकारी कानून बनते हैं, सूचनाएं, अधिसूचनाएं आती हैं कि खेती में इस्तेमाल हो रहे जहरीले रसायनों पर रोक लगाई जाए. नियम बनते हैं, सरकारी खेल चलता है, सरकार द्वारा बनाए गए नियमों को लागू करने के लिए समितियों का गठन होता है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. नियमों को दरकिनार कर पूरे देश की मंडियां और बाजार जहरीले रसायनों से पलीबढ़ी सब्जियों व फलों से भरे पड़े हैं.

जहरीले रसायन क्यों?

अब से लगभग 30-35 साल पहले भारत में हरित क्रांति का दौर आया था. उस दौर में विदेशों से अनेक तरह के बीज भारत में आए, ताकि हम अधिक पैदावार ले सकें. लेकिन बीजों के साथसाथ अनेक तरह के खरपतवारों के बीज भी आ गए. गाजरघास भी उन्हीं बीजों का परिणाम है, जिस ने आज खेतों में नाजायज कब्जा जमा रखा है. जाहिर सी बात है कि जब बीजों के साथ खरपतवार भी आएंगे, तो उन्हें खत्म करने के लिए उन के पीछेपीछे जहरीले रसायन व कीटनाशक (Pesticides) भी आएंगे. देखते ही देखते पूरे देश में फसलों पर जहरीले रसायनों ने कब्जा कर लिया.

आज लोगों की भलाई के लिए नित नई खोजें होती हैं, लेकिन आज के कारोबारी कहीं न कहीं किसी न किसी तरह से अपना हित साधने में लगे हैं, चाहे इस से समाज का कितना ही नुकसान क्यों न हो.

माना कि जहरीले रसायनों (Pesticides) के इस्तेमाल से फसल से खरपतवार खत्म होते हैं, कीटों का नाश होता है, लेकिन जब जहरीले रसायनों का उपयोग अंधाधुंध शुरू हो जाता है, तो फायदे की जगह नुकसान भी होता है. आज रातोंरात फलसब्जियों को बढ़ानेपकाने के लिए इंजैक्शन द्वारा उन में जहरीले रसायन डाले जा रहे हैं.

फलों व सब्जियों में चमक लाने के लिए उन पर मोम, तेल, ग्रीस वगैरह लगाए जाते हैं. अदरक से मिट्टी हटाने के लिए उसे तेजाब में धोया जाता है. ये ऐसे शौर्टकट हैं, जिन से एकआध खास वर्ग को तो बहुत फायदा होता है, लेकिन तमाम लोगों को मिलती हैं बीमारियां, अस्पताल के चक्कर व आर्थिक नुकसान.

फलों को पकाने में प्रयोग

फलों की आज बाजार में बहुत खपत है. उसी खपत को पूरा करने के लिए कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए फलों को कच्चा ही तोड़ लिया जाता है और उन्हें जल्दी पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड (जिसे आम बोलचाल की भाषा में लोग कार्बेड कह देते हैं) का इस्तेमाल किया जाता है. इस से जो जहरीली गैस निकलती है, उस से फल बहुत जल्दी पक जाते हैं. यह ऐसी प्रक्रिया है, जिस से फल पक तो जल्दी जाते हैं, लेकिन इन फलों में न तो कुदरती स्वाद ही होता है न ही ये सेहत के लिए बेहतर होते हैं.

खेतों में रासायनिक खाद

फसल बोने के साथ ही किसान की मजबूरी हो जाती है कि वह रासायनिक खाद इस्तेमाल करे और जब तक फसल पक कर तैयार होती है, तब तक 2-3 बार उस फसल में रसायन का इस्तेमाल किसी न किसी रूप में किसान करता है. अगर किसान ऐसा न करे तो उस की फसल ही चौपट हो जाएगी. या तो खरपतवार फसल को बढ़ने ही नहीं देंगे या कीट फसल को नष्ट करेंगे. इसलिए आज जरूरी हो गया है कि हम रासायनिक खेती को छोड़ कर जैविक खेती करें, जिस से हमें हानिरहित भरपूर फसल मिले.

Pesticides

खराब पानी का असर

देहाती क्षेत्रों के अलावा अगर हम शहरों की बात करते हैं, तो देश की राजधानी दिल्ली भी इस जहर से अछूती नहीं है. दिल्ली शहर में दर्जनों गंदे नाले यमुना नदी में मिलते हैं और यमुना नदी के किनारे होने वाली फसलों में इसी गंदे पानी का इस्तेमाल होता है. आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि यह पानी किस हद तक जहरीला होता है. नालों के पानी में मलमूत्र, फैक्टरी से निकले रसायन, तेजाब वगैरह जहरीली चीजें मिली होती हैं.

पिछले साल दिल्ली की यमुना नदी में पानी की हर 3 महीने में जांच की गई. इस जांच के नतीजे चौंकाने वाले थे. निजामुद्दीन पुल के पास 100 मिलीलीटर पानी में 9.3 करोड़ मलीय कौलिफोर्म पाए गए. ओखला बैराज के पास प्रति 100 मिलीलीटर पानी में 5.2 करोड़ मलीय कौलिफोर्म पाए गए, यही नहीं, इसी यमुना नदी के पानी में कई जगहों पर तो आक्सीजन की मात्रा शून्य पाई गई. अब आप खुद अंदाजा लगाएं कि बिना आक्सीजन कोई जीवित कैसे रह सकता है. हां, जलखुंभी इस पानी में खूब पनपती है.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर को लें. वहां चमड़े का कारोबार होता है. वहां पर भी फैक्टरियों से निकले जहरीले पानी का खेती में इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे उदाहरण देश के हर कोने में मिल जाएंगे, तो क्यों हम आज लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं? क्यों लोगों के जीवन में जहर घोल रहे हैं?

आज हम केवल इस तरह के खानपान के चलते ही उलटी, डायरिया, पेट दर्द, पेशाब की बीमारियां, आंतों में इन्फैक्शन, त्वचा रोग, अपच, किडनी वगैरह के रोगों से घिरे हुए हैं. ऐसा न हो, इस के लिए सभी को सुधरना होगा. केवल अपना फायदा न देख कर समाज को भी देखना होगा. हमें खेती में सुधार लाना होगा.

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट

साल 2002 से भारत में बीटी और जीएम बीजों (जैव संशोधित बीज) की शुरुआत हुई. इस को ले कर भारत में बवाल भी हुआ. मोनसेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने इन बीजों को कृषि बाजार में यह कह कर उतारा था कि बीटी कपास और बीटी बैगन पर कीड़ा नहीं लगेगा, जिस से पैदावार तो बढ़ेगी, ही कीटनाशक का खर्च भी बचेगा. यह सब कह कर बीटी बीजों की कीमत सामान्य बीजों की तुलना में कई गुना रखी गई और बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो ने खूब कमाई की. लेकिन 3 साल बाद पता चला कि ऐसा कुछ नहीं है, उन बीजों द्वारा बोई गई फसल पर भी कीटों का प्रकोप हुआ. तब तक तो कंपनी अपना खेल खेल चुकी थी.

इसी तरह से अनेक कंपनियां हर बार नईनई वैराइटी के बीज विकसित करती हैं, जिन से होने वाली फसल पैदावार से आगे बोने के लिए भी बीज नहीं मिल पाते. मतलब साफ है कि किसान हर बार इन कंपनियों के बीज खरीदे. किसान का पीछा कंपनियां यहां भी नहीं छोड़तीं. जब कभी फसल में कीट का प्रकोप होगा तो उन्हीं कंपनियों द्वारा बनाए गए कीटनाशक ही उन बीजों द्वारा बोई गई फसल पर कारगर होते हैं. इस से साफ पता चलता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने फंदे में किसान को किस कदर जकड़ रखा है. इसलिए अभी भी वक्त है, हमें इन से बचना होगा और जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा.

जैविक खेती कीजिए

वर्मी कंपोस्ट खाद के इस्तेमाल से खेत, फसल और इनसान सेहतमंद रहते हैं. वर्मी कंपोस्ट खाद फसल व सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है. फसल कटने के बाद उस खेत की उपजाऊ शक्ति कमजोर हो जाती है. ऐसे में किसानों को अपने खेत में उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए वर्मी कंपोस्ट यानी प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. यह फायदे का सौदा है.

वर्मी कंपोस्ट का फसल में इस्तेमाल करने से खेत में नमी बरकरार रहती है. इस से फलफूल व सब्जियों वगैरह की जिंदगी बढ़ जाती है. फसल की रंगत ही बदल जाती है और फसल की पैदावार भी बढ़ जाती है.

यह रासायनिक खादों से सस्ती खाद है और फसल को अनेक बीमारियों के प्रकोप से बचाती है. इस के इस्तेमाल से पैदा हुई पौष्टिक व साफ सब्जियां हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखती हैं.

वर्मी कंपोस्ट इस्तेमाल करने का तरीका

वर्मी कंपोस्ट एक ऐसी कुदरती खाद है, जिसे किसान किसी भी फसल में किसी भी समय इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस से खास फायदा उस वक्त होता है, जब यह मिट्टी में मिल जाए. वर्मी कंपोस्ट खाद की आधी मात्रा जमीन की तैयारी करते समय जरूर डालें. फिर एक बार ट्रांसप्लांटिंग के समय डालें या फिर जब 2 पत्ते की स्टेज हो तब डालें. इस के बाद जब फसल पर फूल आने लगें, तब भी प्राकृतिक खाद डालें.

Sheep Herder : भेड़पालक विजेताओं को किया गया सम्मानित

Sheep Herder : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के संस्थान केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में 16 अक्तूबर, 2025 को आईसीएआर से आए उपमहानिदेशक पशु विज्ञान (डीडीजी) डा. राघवेंद्र भट्टा और सहायक महानिदेशक पशु स्वास्थ्य (एडीजी) डा. दिवाकर हेमाद्री द्वारा संस्थान की विभिन्न गतिविधियों में भाग ले कर अवलोकन करते हुए अपने आवश्यक सुझाव और मार्गदर्शन दिया. दोनों अथितियों ने और्गेनिक फार्मिंग समकलित मौडल के तहत निर्मित इकाई, सैक्टर 18 पर वैटरनरी डिस्पैंसरी एंड आइसोलेशन वार्ड, एबीआईसी के इंक्यूबिटी के उत्पाद का विमोचन, उत्कृष्ट 2 और 4 दांत प्रतियोगिता का उद्घाटन, एसीएसपी किसानों की सफलता की कहानी पुस्तक का विमोचन, मालपुरा परियोजना के किसानों को इनपुट्स फीडिंग ट्रॉफ और पानी की टंकी और संस्थान में चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का इनपुट और प्रमाणपत्र वितरण के साथ समापन किया गया. डा. आर. भट्टा डीडीजी द्वारा कार्यक्रम में अपने संबोधन में संस्थान द्वारा किए जा रहे कार्य की किसानों से विचार विमर्श करते हुए प्रशंसा की और वर्तमान की चुनौतीयां और भविष्य के हिसाब अनुसार अपने शोधकार्य और फील्ड गतिविधियों में बदलाव करने की सलाह निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर और उपस्थित वैज्ञानिकों को दी.

संस्थान निदेशक डा. अरुण कुमार द्वारा डीडीजी को संस्थान की विभिन्न परियोजनाओं और गतिविधियों की जानकारी देते हुए प्रशिक्षण हाल और संस्थान के स्टाफ के लिए भी सभागार के पुनिर्माण की मांग करते हुए परिषद से पूरे सहयोग की आशा की.

कार्यक्रम में परिषद के एडीजी डा. दिवाकर हेमाद्री द्वारा भी किसानों को अधिक से अधिक संस्थान से जुड़ कर वर्तमान के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से भेड़पालन अपनाने पर जोर दिया और छोटे पशुओ में वैज्ञानिक स्वास्थ्य प्रबंधन पूरी तरह अमल में लाने के लिए निवेदन किया.

निदेशक डा. अरुण कुमार ने बताया कि हम डीडीजी डा. आर. भट्टा से हमेशा पूरा सहयोग मिलता रहता है. मालपुरा नस्ल की भेड़ के उत्कृष्ट मेढे प्रतियोगिता में 2 दांत में प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार कालूराम गुर्जर निमेड़ा, सियाराम मीना निमेड़ा, राजेश रैगर समेलिया फागी और 4 दांत मे प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार हीरालाल बैरवा भीपुर, कैलाश जाट अरनिया काकड़ पीपलू, रामदयाल सिंह रामदेव की ढाणी फागी को डा. आर. भट्टा द्वारा प्रमाणपत्र दे कर सभी प्रतिभागियों को मिल्क कैन का वितरण किया गया. इसी तरह मद समकालन और कृत्रिम गर्भाधान के 40 से ज्यादा प्रशिक्षण में भाग ले रहे प्रतिभागियों को अनुसूचित जाति उपयोजना से एआई किट का भी वितरण किया गया. सैक्टर 18 पर 24 गांवों के 52 मालपुरा भेड़पालक (Sheep Herder) किसान को फीडिंग ट्रॉफ का वितरण भी इस अवसर पर पधारे गए अथितियों द्वारा किया गया.

डीडीजी द्वारा संस्थान के सैक्टर भ्रमण के अलावा संस्थान के कर्मचारियों के साथ भी विस्तार से चर्चा की गई, जिस में आवश्यक बातों को सुन कर परिषद की ओर से पूरे सहयोग का आश्वासन दिया. अविकानगर संस्थान में इस अवसर पर और्गेनिक फार्मिंग विषय पर निर्मित इकाई की शुरुआत करते हुए उस को भविष्य के लिए डीडीजी जरूरी बताया.

Fennel Cultivation : बढ़िया कमाई देती सौंफ की खेती

Fennel Cultivation : राजस्थान के जोधपुर जिले के बिलाड़ा क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान कुन्नाराम ने सौंफ की सफल खेती (Fennel Cultivation) कर के अच्छी कमाई की है. कुन्नाराम के पास 10 बीघा जमीन है और वे साल 1982 में 10वीं जमात पास करने के बाद से ही खेतीबारी के काम में जुट गए थे.

कुन्नाराम पिछले तकरीबन 5 साल से सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) कर रहे हैं. उन्होंने सौंफ की खेती के लिए उन्नत बीज लिया और अच्छी तरह जुताई कर उस में 2 ट्रॉली प्रति बीघा की दर से गोबर की देशी खाद का इस्तेमाल किया.

कुन्नाराम सौंफ की बोआई जुलाई के आखिरी हफ्ते में करते हैं और जरूरत के मुताबिक फसल की सिंचाई करते हैं. उन्होंने सिंचाई के लिए ‘बूंदबूंद सिंचाई पद्धति’ अपनाई है.

कुन्नाराम सौंफ की फसल में रसायनों का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करते हैं. वे सौंफ की पूरी खेती जैविक तरीके से ही करते रहे हैं. वे खेती के साथसाथ पशुपालन भी करते हैं, जिस से उन्हें अपने घर की ही देशी खाद भी मिल जाती है.

कुन्नाराम बताते हैं कि सौंफ की फसल के गुच्छों की कटाई वे 3 बार 7 से 10 दिन के अंतराल पर करते हैं और 3 बार गुच्छों की कटाई करने के बाद चौथी बार में पूरी फसल काट लेते हैं और उस में से सौंफ को अलग कर लेते हैं. इस तरह वे कुल 4 बार सौंफ के गुच्छों की कटाई करते हैं.

कटाई के बाद सौंफ के गुच्छों को छाया में रस्सी पर सूखने से सौंफ का हरापन बना रहता है. इस के बाद पक्के फर्श पर सौंफ को गुच्छों से अलग कर लिया जाता है.

सौंफ मसाला फसल है. इसे औषधीय फसल भी कहा जाता है. इसे मसाले के रूप में और सीधा भी खाने के काम में लिया जाता है.

इस साल कुन्नाराम ने कुल 10 बीघा में सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) की, जिस का उत्पादन कुल 150 मन प्राप्त किया यानी एक बीघा में कुल 6 क्विंटल पैदावार हुई. बाजार में बिलाड़ा मंडी में इस बार उन्हें 13,000 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिला, तो एक बीघा में कुल 78,000 रुपए की पैदावार मिली. खेती के सभी खर्च निकाल कर कुल 35 से 50 हजार रुपए की शुद्ध आय प्रति बीघा मिली है. इस प्रकार उन्हें सौंफ की खेती से हर साल साढ़े 3 लाख से 4 लाख रुपए तक का कुल शुद्ध लाभ मिल जाता है. इस फसल को कृषि विभाग के अधिकारियों, वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों ने देखा और सराहा.

कुन्नाराम बताते हैं कि उन्होंने कृषि विभाग के प्रशिक्षणों में नवीन तकनीक को जानने ले लिए भाग लिया. पड़ोसी राज्य गुजरात में भी सौंफ की खेती और नवीनतम तकनीक अपनाई.

कुन्नाराम के पड़ोसी ओमप्रकाश और मांगीलाल ने उन से सीख ले कर सौंफ की अच्छी खेती की है. पिचियाक गांव के बुधाराम, मिश्रीलाल दगलाराम बताते हैं कि सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) से उन्होंने भी 30,000 रुपए प्रति बीघा की दर से शुद्ध आय मिल जाती है.

बिलाड़ा क्षेत्र के कृषि अधिकारी भीखाराम बताते हैं कि सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) किसानों की अच्छी कमाई दे रही है, इसलिए बिलाड़ा पंचायत समिति में सौंफ की खेती का रकबा बढ़ा है और सौंफ की खेती का कुल रकबा 800 हेक्टेयर तक पहुंच गया है. खरीफ में कपास, मूंग, तिल, ज्वार की खेती करते हैं और रबी में ज्यादातर किसान सौंफ और जीरा की फसल लेते हैं.

कुन्नाराम की जैविक खेती देख कर पड़ोसी गांव के किसानों ने भी इसे अपनाने की सोची. गांव रामपुरिया के किसान चुन्नीलाल बताते है कि सौंफ में बूंदबूंद सिंचाई से कालिया रोग (ब्लाइट) और गूंदिया वोग (गमोसिस) का नियंत्रण हो जाता है. इस प्रकार बिलाड़ा, पिचियाक, खारिया, जेलवा, भानी, उचियाडा रामपुरिचा गांवों में भी सौंफ की खेती (Fennel Cultivation) से किसानों की अच्छी कमाई हो जाती है.

अधिक जानकारी के लिए आप कुन्नाराम के मोबाइल नंबर 941366051 और लेखक के मोबाइल नंबर में 9414921262 पर संपर्क कर जानकारी ले सकते हैं.

Organic Farming : जैविक खेती से फायदा

Organic Farming : आजकल खेती से ज्यादा उपज लेने के लिए कई तरह की रासायनिक खादों व दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है. करीब 80 फीसदी किसान खेतों में रासायनिक खादों और जहरीली दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस से उपज तो बढ़ी है, लेकिन इनसानों की जिंदगी में इस का बुरा असर हो रहा है. इसी वजह से आज हमें नईनई बीमारियां घेर रही हैं.

आंकड़ों के मुताबिक आज के समय में सब से ज्यादा जहर पंजाब राज्य के उत्पादों में पाया गया है. एलड्रिन नामक दवा ब्लड कैंसर का कारण बनी, तो उस पर रोक लगी. इसी तरह एंडोसलफान नामक दवा ने दिमागी तंत्र प्रणाली को प्रभावित किया, तो उस पर भी रोक लगाई गई. फिर भी इस तरह की दवाएं मिलतेजुलते नामों से आज भी बाजार में मिल रही हैं और लोगों की जिंदगियों से खिलवाड़ कर रही हैं.

आज ऐसा दौर आ चुका है कि हम रासायनिक खेती से हट कर जैविक खेती (Organic Farming) की ओर कदम बढ़ाएं.

कैसे करें जैविक खेती?

आज कई तरीकों से जैविक खादें बनाई जाती है, जैसे गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट व तरल जैविक हरी खाद वगैरह. गोबर की खाद को कम से कम 3 महीने तक गड्ढों में सड़ा कर कंपोस्ट खाद बनाएं और फसल लगाने के पहले खेत में डालें. यह हमारी सब से पुरानी पारंपरिक खाद है.

ढैंचा, लोबिया, उड़द व मूंग वगैरह को हरी खाद के लिए उगाएं और फिर जुताई कर के खेत में मिला कर सड़ा दें. यह भी एक अच्छा तरीका है. पुराने किसान आज भी इसे इस्तेमाल में लाते हैं.

केंचुओं के द्वारा वर्मी कंपोस्ट तैयार किया जाता है. यह बहुत ही उत्तम खाद होती है. इसे आजकल तमाम लोग इस्तेमाल कर रहे हैं.

* जैविक खाद का मिश्रण तैयार करें (गोबर, मूत्र, गुड़, दाल और जीवाणु खाद मिला कर) और फसल में 5-6 बार तक इस्तेमाल करें. इसे बनाने के लिए इन सब को सड़ा कर तरल जैविक पदार्थ तैयार किया जाता है.

* दानेदार रासायनिक खाद की जगह एनपीके पाउडर और चिलेटेड सूक्ष्म पोषक तत्त्वों को खड़ी फसल में स्प्रे करें.

* नीम और गौमूत्र वाले कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल करें.

* अच्छी गुणवत्ता वाले जैविक खेती (Organic Farming) से उत्पादित बीजों का इस्तेमाल करें.

* खरपतवार निकालने के लिए खड़ी फसल में निराईगुड़ाई करें. गरमियों में खेत की जुताई कर के खेत को कुछ दिनों के लिए खाली छोड़ दें.

इस प्रकार के कुछ तरीकों को अपना कर जमीन, स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाया जा सकता है और कम खर्च में टिकाऊ खेती की जा सकती है.

जैविक खादों से फायदे

* पौधों की ताकत बढ़ती है और उन में ज्यादा सर्दीगरमी से लड़ने की कूवत पैदा हो जाती है.

* फूलों और फलों की पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* जैविक खादें हर फसल के लिए फायदेमंद होती हैं.

* इन में नुकसान देने वाले जीवाणु नहीं होते हैं.

* फल, सब्जी, अनाज देखने में सुंदर और स्वादिष्ठ होते हैं.

* पैदावार में बढ़ोतरी होती है और बीमारियों के प्रति लड़ने की ताकत बढ़ती है.

* बीजों का अंकुरण अच्छी तरह होता है.

* तैयार फल व सब्जियां हानिकारक रसायनों से रहित और पौष्टिक होती हैं.

* लगातार जैविक खेती (Organic Farming) करने से पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* जैविक खाद के इस्तेमाल से पौधों में तमाम बीमारियों व कीड़ों से लड़ने की कूवत बढ़ती है, नतीजतन रासायनिक कीटनाशकों, रोगनाशकों व खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल कम से कम हो जाता है. इस से किसानों का खर्च भी बचता है.

आरगैनिक खेती के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए जैलदार बंधु आरगैनिक कृषि फार्म के मोबाइल नंबरों 09416392681, 09068506781 पर संपर्क कर सकते हैं.

मूत्रगोबर से बनाते हैं जीवामृत

गुजरी गांव (मध्य प्रदेश) के किसान अभिषेक गर्ग सिर्फ 1 गाय के मूत्र और गोबर में अन्य पदार्थो को मिला कर जैविक घोल तैयार करते है और उस तरल जैविक घोल को अपनी फसल में खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. उन के अमरूद के बाग इसी जैविक घोल के इस्तेमाल से लहलहा रहे हैं.

अभिषेक गर्ग ने इस घोल का नाम जीवामृत रखा है. उन का कहना है कि सिर्फ 1 गाय से तैयार इस जीवामृत से 30 एकड़ में खेती की जा सकती है, जो रासायनिक खाद की तुलना में बहुत किफायती है.

जीवामृत  बनाने का तरीका : गाय से रोजाना मिलने वाले 10 किलोग्राम गोबर और गोमूत्र से तैयार मिश्रण में 1 किलोग्राम बेसन, 1 किलोग्रम गुड़, 1 किलोग्राम मिट्टी व 1 किलोग्राम मौसमी फसल डाल कर इस घोल को 7 दिनों तक सड़ाएं और पूरे हफ्ते तक हर रोज इसे 2 बार 5 मिनट तक हिलाएं. 1 हफ्ते बाद जैविक घोल तैयार हो जाता है. इस घोल को छान कर फसल पर समयसमय पर छिड़काव करते रहें. किसान इस जैविक घोल को ज्यादा मात्रा में भी बना सकते हैं. अनुपात के मुताबिक केवल सामान की मात्रा बढ़ा लें.

रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के नुकसान

खेती की मिट्टी कठोर हो जाने से उस की पानी सोखने की कूवत कम हो जाती है और बीजों का जमाव भी कम होने लगता है. तमाम तरह के फंगस, वायरस वगैरह की बीमारियां (जड़ व तना गलन, मरोडि़या, उखेड़ा, पीला और काला रतुआ, कंडुआ वगैरह) फसल में लगने लगती हैं और एक समय ऐसा आता है, जब कीटनाशकों का असर भी कम हो जाता है.

रसायनों के इस्तेमाल से अनाज, सब्जी, फल व चारा वगैरह जहरीले होने लगते हैं. इनसानों और जानवरों में बीमारियों को बढ़ावा मिलता है और कैंसर, टीबी, डायबिटीज, हार्ट अटैक, स्वाइन फलू, जैसी बीमारियां भी मुंह बाए खड़ी रहती हैं.

Bastar Gaurav Samman : अपनी माटी से मिला सब से बड़ा सम्मान

Bastar Gaurav Samman : फरसगांव में हुए ‘मेरा लक्ष्य, मेरा अभिमान’ कार्यक्रम के अंतर्गत हजारों लोगों की मौजूदगी में बस्तर अंचल की कई प्रतिभाशाली विभूतियों को ‘बस्तर गौरव सम्मान’ (Bastar Gaurav Samman)  प्रदान किया गया. इस आयोजन में लगभग 10,000 लोगों की ऐतिहासिक उपस्थिति रही, जिन में 5,000 से अधिक युवा और बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं.

मुख्य अतिथि गजेंद्र यादव (मंत्री, स्कूल शिक्षा, छत्तीसगढ़) थे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विधायक नीलकंठ टेकाम ने की. नीलकंठ टेकाम पहले कोंडागांव के कलक्टर रहे हैं, जिन्होंने आईएएस की नौकरी छोड़ कर जनसेवा को जीवन का ध्येय बनाया.

इस अवसर पर बस्तर की जिन विभूतियों को सम्मानित किया गया, उन में प्रमुख हैं डा. राजाराम त्रिपाठी जो जैविक खेती व औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण में अग्रणी रहे हैं और सफेद मूसली, स्टीविया और काली मिर्च की उन्नत प्रजाति विकसित कर पूरे देश को नई दिशा देने वाले और आदिवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित हैं.

Bastar Gaurav Samman

विशाल सभा को संबोधित करते हुए विधायक नीलकंठ टेकाम ने कहा, “डा. राजाराम त्रिपाठी ने अपने अदम्य परिश्रम से न केवल बस्तर, बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया है. प्राकृतिक खेती और लुप्त हो रही जड़ीबूटियों को पुनर्जीवित करने का उन का कार्य ऐतिहासिक है. सफेद मूसली, स्टीविया और विशेषकर काली मिर्च की उन्नत प्रजाति ने हजारों किसानों की जिंदगी बदली है. आदिवासी समाज के उत्थान में उन का योगदान अमूल्य है. ऐसे व्यक्तित्व वास्तव में धरती के सच्चे सपूत हैं.”

सम्मान ग्रहण करते हुए डा. राजाराम त्रिपाठी ने कहा, “मुझे देशविदेश में कई पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त हुए, लेकिन अपनी धरती, अपनी माटी और अपने लोगों से मिला यह ‘बस्तर गौरव सम्मान’ (Bastar Gaurav Samman) मेरे जीवन का सब से बड़ा सम्मान है. इसे मैं बस्तर की माटी, अपने आदिवासी भाइयोंबहनों, अपने सभी परिजनों और मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के अपने प्रत्येक साथी को समर्पित करता हूं. सच्चा सम्मान वही है जो हमें और अधिक समर्पण और ऊर्जा के साथ समाजसेवा के लिए प्रेरित करे.”

इस कार्यक्रम का एक और प्रमुख आकर्षण स्थानीय छात्रछात्राओं द्वारा प्रस्तुत की गई ‘रक्तबीज नृत्य नाटिका’ और नशामुक्ति पर केंद्रित सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा.