धान की खेती (Paddy cultivation) और फसल का रोगों व कीटों से बचाव

हमारे देश की खरीफ  की प्रमुख खाद्यान्न फसल धान है. धान की खेती असिंचित व सिंचित दोनों परिस्थितियों में की जाती है. धान की फसल में विभिन्न कीटों का प्रकोप होता है. कीट एवं रोग प्रबंधन का कोई एक तरीका समस्या का समाधान नहीं बन सकता, इसलिए रोग व कीट प्रबंधन के उपलब्ध सभी उपायों को समेकित ढंग से अपनाया जाना चाहिए.

प्रमुख रोग

झोंका (ब्लास्ट)

यह रोग पिरीकुलेरिया ओराइजी नामक कवक द्वारा होता है. इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर दिखाई देते हैं, परंतु इस का आक्रमण पर्णच्छंद, पुष्पक्रम, गांठों और दानों के छिलकों पर भी होता है. पत्तियों पर आंख की आकृति के छोटे, नीले धब्बे बनते हैं, जो बीच में राख के रंग के और किनारे पर गहरे भूरे रंग के होते हैं, जो बाद में बढ़ कर आपस में मिल जाते हैं. इस के फलस्वरूप पत्तियां झुलस कर सूख जाती हैं.

तनों की गांठें पूरी तरह से या उन का कुछ भाग काला पड़ जाता है. कल्लों की गांठों पर कवक के आक्रमण से भूरे धब्बे बनते हैं, जिन के गांठ के चारों ओर से घेर लेने से पौध टूट जाते हैं.

बालियों के निचले डंठल पर धूसर बादामी रंग के क्षतस्थल बनते हैं, जिसे ‘ग्रीवा विगलन’ कहते हैं. ऐसे डंठल बालियों के भार से टूट जाते हैं, क्योंकि निचला भाग ग्रीवा संक्रमण से कमजोर हो जाता है.

बचाव

* झोंका अवरोधी प्रजातियां जैसे नरेंद्र-118, नरेंद्र-97, पंत धान-6, पंत धान-11, सरजू-52, वीएल धान-81 आदि रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करें.

* इस रोग के नियंत्रण के लिए बोआई से पूर्व बीज को ट्राइसाइक्लैजोल 2 ग्राम या थीरम व कार्बंडाजिम (2:1) की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

* रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-12 दिन के अंतराल पर या बाली निकलते समय 2 बार जरूरत के मुताबिक कार्बंडाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 1 किलोग्राम मात्रा को 700-800 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

* रोग का अधिक प्रकोप होने की दशा में ट्राइसाइक्लैजोल की 350 ग्राम मात्रा को 700-800 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें, साथ ही स्टीकर/सरफेक्टेंट 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर मिलाएं.

भूरी चित्ती या भूरा धब्बा

यह रोग हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी कवक द्वारा होता है. इस रोग के कारण पत्तियों पर गोलाकार भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. पौधों की बढ़वार कम होती है, दाने भी प्रभावित हो जाते हैं, जिस से उन की अंकुरण क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है.

पत्तियों पर धब्बे आकार व माप में बहुत छोटे बिंदी से ले कर गोल आकार के होते हैं. पत्तियों पर ये काफी बिखरे रहते हैं. छोटा धब्बा गाढ़ा भूरा या बैगनी रंग का होता है.

बड़े धब्बों के किनारे गहरे भूरे रंग के चक्त्ते होते हैं और बीच का भाग पीलापन लिए गंदा सफेद या धूसर रंग का हो जाता है. धब्बे आपस में मिल कर बड़े हो जाते हैं और पत्तियों को सुखा देते हैं.

बचाव

* उर्वरकों विशेषकर नाइट्रोजन की संस्तुत मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि नाइट्रोजन की अधिक मात्रा देने से रोग का प्रकोप बढ़ता है.

* बीजों को थीरम व कार्बंडाजिम (2:1) की 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए.

* फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैंकोजेब 63 प्रतिशत (कार्बंडाजिम 12 प्रतिशत) की 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव 10-12 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए.

खैरा

यह रोग मिट्टी में जस्ते की कमी के कारण होता है. इस में पत्तियों पर हलके पीले रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं. इस रोग के लक्षण पौधशाला में और रोपाई के 2-3 सप्ताह के अंदर छोटेछोटे टुकड़ों में दिखते हैं. रोग ग्रस्त पौधा छोटा रह जाता है. निचली सतह पर कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं, जो एकदूसरे से मिल कर पूरी पत्ती को सुखा देते हैं.

रोगग्रस्त पौधों की जड़ों की वृद्धि रुक जाती है. ऐसे पौधों में छोटीछोटी कमजोर बालियां निकलती हैं. उपज में कमी रोग की व्यापकता पर निर्भर करती है.

बचाव

* खेत में तैयारी के समय 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए.

* फसल पर 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 2.5 किलोग्राम बुझे  चूने का 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

* पौधशाला में जिंक के 2 छिड़काव बोआई के 10-20 दिन बाद करना चाहिए. बुझे चूने के स्थान पर 20 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग किया जा सकता है.

* पौधे की जड़ों को रोपाई से पहले 2 प्रतिशत जिंक औक्साइड घोल में 1 से 2 मिनट के लिए डुबोना चाहिए.

आभासी कंड या कंडुवा

यह रोग क्लेविसेप्स ओराइजीसैटावी नामक कवक द्वारा होता है. रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं. रोगग्रस्त दानों के अंदर कवक, अंडाशय को एक बड़े कूटरूप में बदल देता है, जो पहले पीले रंग का और बाद में जैतूनी हरा आकार में धान के दानों से दोगुना से भी बड़ा हो जाता है. इस पर बहुत अधिक संख्या में बीजाणु चूर्ण के रूप में  होते हैं. उपज में हानि केवल रोगग्रस्त दानों से ही नहीं, बल्कि इस के ऊपरनीचे के स्पाईकिकाओं में दाने न पड़ने से भी होती है.

बचाव

* फसल कटाई से पूर्व ग्रसित पौधों को सावधानी से काट कर अलग कर लें और जला दें.

* गरमी में खेत की जुताई करने से रोगजनक के स्क्लेरोशिया नष्ट किए जा सकते हैं.

* रोगी खेत से बीज नहीं लेना चाहिए. रोगी दानों को कटाई से पहले अलग कर देना चाहिए या रोगी पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए.

* बीजोपचार कार्बंडाजिम व थिरम मिश्रण की 2.5 ग्राम से प्रति किलोग्राम बीज के अनुसार करें.

* जिन क्षेत्रों में यह रोग अधिक लगता है, उन क्षेत्रों में पुष्पन के दौरान कवकनाशी रसायन जैसे प्रोपीकोनाजाल (टिल्ट) की 1 मिलीलिटर या क्लोरोथेलोनिल (कवच) 2 ग्राम प्रति लिटर की दर से पहला छिड़काव बाली निकलते समय और दूसरा छिड़काव जब बाली पूरी तरह से निकल आई हो, करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है.

जीवाणु झुलसा

यह रोग जैन्थोमोनास कैम्पोस्ट्रिस का स्पि. ओराइजिकोला द्वारा होता है. मुख्य रूप से यह पत्तियों का रोग है. इस रोग के कारण शुरुआत में पीले या पुआल के रंग के लहरदार धब्बे पत्ती के एक या दोनों किनारों के सिरे से प्रारंभ हो कर नीचे की ओर बढ़ते हैं.

ये धारियां शिराओं से घिरी रहती हैं और पीली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती हैं. मोती की तरह छोटेछोटे पीले से गेरुए रंग के जीवाणु पदार्थधारियों पर पाए जाते हैं, जो पत्तियों की दोनों सतह पर होते हैं.

कई धारियां आपस में मिल कर बड़े धब्बे का रूप ले लेती हैं, जिस से पत्तियां समय से पहले सूख जाती हैं. पर्णच्छद भी संक्रमित होता है, जिस पर लक्षण पत्तियों के समान ही होते हैं. रोग की उग्र अवस्था में ग्रस्त पौधे पूरी तरह से मर जाते हैं.

बचाव

* रोग सहिष्णु किस्में जैसे: नरेंद्र पंत-359, पंत धान 4, पंत धान 10 और महर आदि उगाएं.

* खेत से अतिरिक्त पानी समयसमय पर निकालते रहना चाहिए और नाइट्रोजन प्रधान उर्वरकों का प्रयोग मात्रा से अधिक नहीं करना चाहिए.

* बोने से पूर्व बीज को स्ट्रेप्टोमाइसीन के 100 पीवीएम घोल मैंकोजेब 63 प्रतिशत (कार्बंडाजिम 12 प्रतिशत) की 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचार कर लेना चाहिए.

* फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्ट्रेप्टोमाइसीन 15 ग्राम और मैंकोजेब 63 प्रतिशत (कार्बंडाजिम 12 प्रतिशत) की 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव 10-12 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए.

पर्णच्छद अंगमारी

(शीथ ब्लाइट)

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई द्वारा  होता है. इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों व पर्णच्छद पर दिखाई देते हैं. पर्णच्छद पर पत्ती की सतह से ऊपर 1 सैंटीमीटर लंबे गोल या अंडाकार हरे पुआल के रंग या मटमैले धब्बे प्रकट होते हैं, जो बाद में बढ़ कर 2-3 सैंटीमीटर लंबे व 1 सैंटीमीटर चौड़े, अनियमित आकार के क्षतस्थल बना देते हैं.

क्षतस्थल बाद में बढ़ कर तने को चारों ओर से घेर लेते हैं. अनुकूल परिस्थितियों में फफूंद छोटेछोटे भूरे काले रंग के दाने पत्तियों की सतह पर पैदा करता है, जिन्हें स्क्लेरोशिया कहते हैं. ये स्क्लेरोशिया हलका झ झटका लगने पर नीचे गिर जाते हैं.

बचाव

* फसल काटने के बाद अवशेषों को जला दें.

* खेतों में अधिक जल भराव नहीं करना चाहिए.

* रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजेब व कार्बंडाजिम का मिश्रण 2.5 ग्राम या प्रोपेकोनाजोल 1 मिलीलिटर या हेक्साकोनेजोल 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करना चाहिए. पहला छिड़काव रोग दिखाई देते ही और दूसरा छिड़काव 15 दिन बाद करना चाहिए.

बकनी व तना विगलन

यह रोग जिब्रेला फ्यूजीकुरोई कवक द्वारा होता है. यह रोग जापान में सर्वप्रथम देखा गया. बकनी एक जापानी शब्द है, जिस का मतलब मुखी पौधे से है.

इस रोग से पौधशाला में पौधे पीले, पतले और दूसरे स्वस्थ पौधों के विपरीत काफी लंबे हो जाते हैं. इस अवस्था में पौधे सूख कर मर जाते हैं. रोग से ग्रस्त रोपित पौधे भी इसी प्रकार के लक्षण प्रदर्शित करते हैं.

बचाव

* प्रभावित पौधों को खेत से सावधानी से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

* रोगी खेत से बीज का चुनाव नहीं करना चाहिए.

* बीजों को बोआई से पूर्व ट्राईकोडर्मा 5 ग्राम या 2.5 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए.

प्रमुख कीट

तनाबेधक

धान की फसल में इस कीट का प्रकोप अत्यधिक होता है. प्रमुख रूप से पीला तनाबेधक आक्रमण करता है. इस कीट के प्रौढ़ लंबे, पीले या सफेद रंग होते हैं. कीट की सूंडि़यां पीले या मटमैले रंग की होती हैं, जो तने को छेद कर अंदर ही अंदर खाती रहती हैं.

इस के प्रकोप से पौधे का मध्य तना सूख जाता है, जिसे ‘मृत गोभ’ कहते हैं. बाद के आक्रमण से धान की बाली बिना दाने वाली निकलती है. बाली वाली अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां सूख कर सफेद हो जाती हैं और दाने नहीं बनते हैं.

ऐसी बालियां ऊपर से खींचने पर आसानी से खिंच जाती हैं, जिसे ‘सफेद बाली’ कहते हैं. इस कीट का आर्थिक हानि स्तर 5-10 प्रतिशत मृत केंद्र या सफेद बाली प्रति वर्गमीटर आंकी गई है.

धान की खेती (Paddy cultivation)

प्रबंधन

* पौध की 1.5-2.0 इंच ऊपरी पत्तियों को काट कर रोपाई करें, जिस से कीट द्वारा दिए गए अंडे नष्ट हो जाते हैं.

* फसल पर तनाबेधक और पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप होने पर ट्राईकोग्रामा जपोनिकम नामक परजीवी (ट्राईकोकार्ड) के 1.0-1.5 लाख अंडे प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करें.

* तनाबेधक कीट के लिए प्रतिरोधक प्रजातियों जैसे: रत्ना, पंत धान-6, सुधा, वीएल-206 को उगाएं.

* 5 प्रतिशत नीम के तेल का छिड़काव करें.

* खेत में 20 गंधपास प्रति हेक्टेयर की दर से लगा कर वयस्क कीटों को एकत्र कर नष्ट किया जा सकता है.

* 5 प्रतिशत सूखी बालियां दिखाई देने पर कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 प्रतिशत दानेदार दवा 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डाल कर पानी लगा दें या फिब्रोनिल 5 प्रतिशत एससी की 400-600 मिली मात्रा को 500-600 लिटर पानी के साथ सरफेक्टेंट 500 मिलीलिटर घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

पत्ती लपेटक

इस कीट का प्रकोप अगस्तसितंबर माह में अधिक होता है. इस कीट के कारण खेत में मुड़ी हुई बेलनाकार पत्तियां दिखाई देने लगती हैं, जिन के अंदर सूंड़ी पत्ती के हरे भाग को खाती रहती हैं.

प्रभावित खेत में धान की पत्तियां सफेद व झुलसी हुई दिखाई देती हैं. कीट की इल्लियां (सूंड़ी) अंडों से निकलने के कुछ समय बाद इधरउधर विचरण कर अपनी लार द्वारा रेशमी धागा बना कर पत्ती के किनारों को मोड़ लेती हैं और वहां रहते हुए पत्ती को खुरचखुरच कर खाती हैं.

कीट के पनपने के लिए तापमान 25-30 सैल्सियस और वायु में नमी 83-90 प्रतिशत उपयुक्त दशा है.

प्रबंधन

* खेत में जगहजगह प्रकाश प्रपंच लगा कर वयस्क कीटों को एकत्र कर नष्ट कर दें.

* 2 ट्राईकोकार्ड्स प्रति हेक्टेयर की दर से 10-15 दिन के अंतराल पर 4-5 बार खेत में जगहजगह पर समान दूरी पर लगाएं.

* अधिक प्रकोप होने की दशा में एसीफेंट 50 एसपी की 700 ग्राम या फिप्रोनिल 5 एसपी की 600 मिलीलिटर या ट्रायजोफास 40 ईसी 400 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए.

गंधी बग

इस कीट का वयस्क लगभग 15 मिलीलिटर लंबा और हरेभूरे से गहरे भूरे रंग का होता है. इस कीट की पहचान इस से आने वाली दुर्गंध द्वारा आसानी से की जा सकती है.

कीट के नवजात और प्रौढ़ दोनों ही दुग्धावस्था में बालियों के दूध को चूसते हैं, जिस से बालियों में दाने नहीं बन पाते हैं. रस चूसने वाले बिंदु पर दानों में भूरा दाग बन जाता है और दाने खोखले रह जाते हैं.

इस के नियंत्रण के लिए खेतों के किनारों से खरपतवारों को निकालते रहना चाहिए, क्योंकि ये कीट इन पर पलते हैं और दूधिया दाने बनने की अवस्था में ही फसल पर आक्रमण करते हैं.

प्रबंधन

* खेत की मेंड़ों पर उगी हुई घासों की सफाई करें.

* 5 प्रतिशत नीम के सत का खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए.

दीमक

दीमक एक सामाजिक कीट है, जो  लगभग सभी फसलों में हानि पहुंचाता है. दीमक के परिवार में राजा, रानी श्रमिक व सैनिक सहित 4 सदस्य मौजूद रहते हैं.

परिवार में रानी की संख्या केवल एक होती है, जो बच्चे देने का काम करती है. दीमक का प्रकोप बलुई मिट्टी वाले और असिंचित क्षेत्रों में अधिक होता है.

दीमक उन सभी वस्तुओं को सामान्यत: हानि पहुंचाते हैं, जिन में सेल्यूलोज पाया जाता है. ये जड़ व तने को खा कर सुखा देते हैं. इस तरह के सूखे हुए पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सकता है.

प्रबंधन

* ग्रीष्म ऋतु में एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करते हैं, जिस से हानिकारक कवक, जीवाणु, कटुआ कीट की सूंडि़यां और सभी प्यूपा और अन्य कीटों की विभिन्न अवस्थाएं, जो जमीन के अंदर सुषुप्तावस्था में पड़ी रहती हैं, जमीन के ऊपर आने से तेज धूप की गरमी के कारण और चिडि़यों द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं.

* कच्चे गोबर को खेत में नहीं डालें, क्योंकि इस से दीमक का प्रकोप बढ़ता है.

* सिंचाई की समुचित व्यवस्था करें.

* दीमक के घरों को नष्ट कर रानी को मार दें.

* ब्यूवेरिया बेसियाना की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 30 किलोग्राम अच्छी सड़ी गोबर की खाद में मिला कर खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन में मिला दें.

* खड़ी फसल में प्रकोप होने पर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी 2-3 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 10-20 किलोग्राम बालू में मिला कर उचित नमी पर सायंकाल में बुरकाव करें.

धान के फुदके

धान में अकसर 2 प्रकार के फुदके आक्रमण करते हैं, उजली पीठ वाला फुदका (डब्ल्यूबीपीएच) और भूरा फुदका (बीपीएच). भूरे फुदके के प्रौढ़ भूरे रंग के होते हैं, जिन की लंबाई लगभग 3.5-4.5 मिलीलिटर तक होती है.

इस कीट के नन्हे फुदके और प्रौढ़ दोनों ही पौधों की कोशिकाओं का रस चूसते हैं, जिस से पौधा पीला पड़ जाता है. इस के अधिक आक्रमण की दशा में फुदका झूलसा या हार्पर बर्न जैसे लक्षण प्रकट होते हैं.

प्रारंभ में ये फसल के किसी एक स्थान से शुरू हो कर पूरे खेत में फैल जाते हैं. इस के अलावा ये कीटग्रासी स्टंट नाम के विषाणु रोग को फैलाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

प्रबंधन

* लीफ  हापर और प्लांट हापर के नियंत्रण में लाइकोसा प्रजाति की मकड़ी अधिक कारगर होती है, इसलिए खेत में मकड़ी की संख्या बढ़ाने के लिए मेंड़ पर जगहजगह धान की पुआल के गट्ठर डाल देने चाहिए. इस तकनीक का उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ गांवों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया, जिस से कीट व रोगनाशी रसायनों के प्रयोग और लागत में कमी आई. साथ ही, उपज में वृद्धि हुई.

* कीट का प्रकोप होने की दशा में यूरिया का खड़ी फसल में छिड़काव बंद कर दें.

* फसल में मित्र कीटों और मकडि़यों का संरक्षण करना चाहिए.

* कीटों का अधिक प्रकोप होने की दशा में थायोमेथोक्जाम 300 ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड 300 मिलीलिटर दवा का प्रति हेक्टेयर की दर से 600-800 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

धान का हिस्पा

यह काले रंग का कीट होता है और इस के शरीर पर छोटेछोटे कांटेनुमा रोएं होते हैं. इस की लंबाई 5 मिलीलिटर तक होती है. इस के गिडार और वयस्क दोनों पत्तियों को खुरच कर उस के हरे भाग को खाते हैं, जिस से पत्तियां सूख जाती हैं.

प्रबंधन

* रोपाई के पूर्व पौध के शिरों को थोड़ा काट दें. तत्पश्चात रोपाई करें.

* रोकथाम के लिए  फ्रिवोनिल 2 मिली. प्रति लिटर पानी की दर से या मैथोमिल 2.0 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

धान (Paddy) की वैज्ञानिक खेती

धान की वैज्ञानिक खेती में गलत तरीके से सिंचाई करने या कैमिकल उर्वरक के ठीक तरह से इस्तेमाल न करने की वजह से धान की खेती से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों में नाइट्रस औक्साइड और मिथेन खास हैं. ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देने में मिथेन 15 फीसदी और नाइट्रस औक्साइड का 5 फसदी योग है.

इसे निमस सस्य विधि से कम किया जा सकता है.

ग्रीनहाउस गैसों में मिथेन का वार्मिंग पोटैशियम कार्बन डाईऔक्साइड की तुलना में 21-25 गुना ज्यादा. 1880 में नाइट्रेट औक्साइड की मात्रा 270 थी जो अब 319 पीपीवी (2010) है जिस को निम्न विधि द्वारा कम किया जा सकता है:

* एसआरआई तकनीकी का इस्तेमाल.

* नाइट्रीफिकेशन व यूरियेज अवरोधक का इस्तेमाल : धान की खेती में नाइट्रीफिकेशन व यूरियेज अवरोधकों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नाइट्रीफिकेशन या डीनाइट्रीफिकेशन की प्रक्रिया प्रभावित होती है. इस के लिए नीम तेल, अमोनियम थायोसल्फेट, थायोयूरिया, लेपित यूरिया का इस्तेमाल करना चाहिए.

* एकीकृत पोषण प्रबंधन : टिकाऊ फसल उत्पादन के लिए एकीकृत पोषण प्रबंधन के तहत संतुलित खाद उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

* जैविक उर्वरकों का इस्तेमाल.

* कम पानी में एरोबिक धान उगाने की पद्धति अपना कर.

किस्मों का चयन : ऐसी प्रजातियों को चुनना चाहिए जिस में अच्छी क्वालिटी, कीट व रोग के प्रति प्रतिरोधी, कम ऊंचाई व कम समय में पकने वाली, बाजार में ज्यादा मांग व अच्छी कीमत हो.

जल्दी पकने वाली : नरेंद्र 80, पंत धान 12.

मध्यम समय के लिए : पंत 10, पंत 4, सरजू 52, पूसा 44.

सुगंधित : पूसा संकर धान 10, पूसा 1121 (सुगंधा 4) बासमती, पूसा 217, पूसा बासमती 1, पूसा 1509, पूसा बासमती 6, बल्लभ बासमती 21, 22, बासमती सीएसआर 30.

संकर धान : पंत संकर 1, नरेंद्र संकर 2, प्रोएग्रो 6111, संकर धान 3, प्रोएग्रो 6201, प्रोएग्रो 6444.

बीजोपचार : बीज के प्रमाणित होने के साथसाथ अच्छी तरह से जमाव हो. शुद्धता के अलावा बीजों के स्वच्छ व स्वस्थ होने की प्रमाणिकता भी होती है. 2 फीसदी साधारण नमक के घोल में बीज डालने पर पतले व हलके बीज पानी की ऊपरी सतह पर तैरने लगते हैं, जबकि स्वस्थ बीज नीचे तली में बैठ जाते हैं.

सेहतमंद बीजों को 2-3 बार साफ पानी से धोएं. 25 किलोग्राम बीजों के लिए 19 ग्राम एमईएमसी 3 फीसदी और 15 स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या 40 ग्राम प्लांटोमारलीन को 45 लिटर पानी में मिलाएं और इस घोल में रातभर भिगो दें.

जीवाणु झुलसा रोग से बचाव के लिए 3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजों को उपचारित करने के बाद छाया में गीले बोरे से 24-36 घंटे तक जमाव होने के बाद पौधशाला में डाल दें.

पौध तैयार करने की विधि : आमतौर पर एक हेक्टेयर खेत के लिए तकरीबन 500-600 वर्गमीटर जगह पर्याप्त है. पौध तैयार करने की प्रमुख 4 विधियां हैं:

गीली क्यारी बना कर : खेत तैयार करने के बाद पानी भर कर 2-3 बार पडलिंग करने के बाद 1.25 मीटर चौड़ी और लंबी क्यारी बनाएं और बीचबीच में 30 सैंटीमीटर जलनिकास के लिए नालियां जरूर बनाएं.

प्रति 10 वर्गमीटर के लिए 225 ग्राम यूरिया और 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट 60-70 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश व 50 ग्राम जिंक के साथ कंपोस्ट सही मात्रा में डालने से जमीन की भौतिक दशा में सुधार के साथसाथ पौध उखाड़ने में आसानी रहती है.

सिंचाई के बाद 5 दिन खेत को गीला रखें. पानी को कदापि खड़ा या जमा न होने दें अन्यथा कोमल पौध झुलस जाएंगी. तकरीबन 2 हफ्ते बाद जरूरत के मुताबिक 50 ग्राम यूरिया प्रति वर्गमीटर की दर से देना चाहिए.

शुष्क विधि : पंक्तियों में सूखे बीज की बोआई कर जमाव के बाद 5 सैंटीमीटर पानी भर देते हैं.

डेपाग विधि : इस विधि में 30 वर्गमीटर पौध प्रति हेक्टेयर के लिए सही रहती है. इस में 8 मीटर लंबी, 1 मीटर चौड़ी और 10 सैंटीमीटर ऊंची क्यारी बनाते हैं. क्यारियों को पौलीथिन की चादर से ढक कर 2.5 सैंटीमीटर मोटी राख या रेत की परत फैला देते हैं.

अंकुरित बीज को रेत या राख पर समान मोटाई से फैला देते हैं. 3 दिन तक बीजों को टाट से ढक कर दिन में 3-4 बार फुहारे से पानी डालते हैं. अंकुरित बीजों को सुबहशाम खाली हाथ से दबाते हैं, जिस से जड़ प्रणाली ठीक हो सके.

क्यारियों के चारों ओर वाली नालियों को ऊपरी सतह तक पानी से भरा रहना चाहिए.

3 दिन बाद टाट को हटा कर 1 सैंटीमीटर पानी खड़ा रहने देते हैं.

बीजाई के एक हफ्ते बाद 14 ग्राम यूरिया को 4 लिटर पानी में घोल कर एक दिन के अंतर से 16वें दिन तक छिड़काव करते हैं.

धान (Paddy)

चटाई (मैट टाइप) : इस विधि में फ्रेम के नीचे पौलीथिन, टाट या अखबार बिछा देते हैं. फ्रेम में बारीक मिट्टी और कंपोस्ट 3:1 के अनुपात में मिला कर तकरीबन 1.5 सैंटीमीटर की तह बना देते हैं. तह के ऊपर पहले अंकुरित बीज की 500 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से बीजाई करते हैं.

इस के बाद हाथ से थोड़ा दबा कर ऊपर से मिट्टी या कंपोस्ट की परत लगा कर उस पर फुहारे से दिन में 3-4 बार पानी देते हैं. 4-5 दिन बाद क्यारियों की बराबर में बनी नालियों में पानी भर देते हैं. इस से पानी निचली सतह में पहुंच जाता है. 10वें दिन जरूरत के मुताबिक यूरिया की टाप ड्रैसिंग करते हैं और 20वें दिन पौध तैयार हो जाती है.

उर्वरक प्रबंधन

50 फीसदी कैमिकल, 25 फीसदी कंपोस्ट हरी खाद, 25 फीसदी जैव उर्वरक.

धान में उर्वरक का इस्तेमाल मिट्टी जांच के आधार पर ही संतुलित मात्रा में करना चाहिए.

कंपोस्ट खाद खेत की आखिरी जुताई के समय कैमिकल खादों में यूरिया की आधी मात्रा फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा देनी चाहिए. बाकी नाइट्रोजन 2 बार में इस्तेमाल करना चाहिए. गोभ अवस्था के बाद यूरिया का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

नीम लेपित यूरिया आमतौर पर 5 फीसदी अलग से देना चाहिए.

जैविक उर्वरक और हरी खाद की सही विधि से इस्तेमाल करने पर नाइट्रोजन की मात्रा 50-55 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कम कर देनी चाहिए.

पर्णीय छिड़काव : पौलीफीड 10:19:19+6 सूक्ष्म पोषक तत्त्व लोहा, मैगनीज, बोरौन, जिंक कौपर और मौलिब्डेनम.

यूरिया 10 ग्राम, 2 ग्राम डीएपी और 10 ग्राम पोटैशियम क्लोराइड पेनिकल इनिसिएशन.

इफको द्वारा 17-44-0, 18:18:18 की 1.5 फीसदी रोपाई के 15-20 व 30-40.

जून महीने में रोपाई के लिए 25-30 दिन की आयु की पौध की 20 गुना 15 सैंटीमीटर की दूरी पर यानी 33-35 स्थान प्रति वर्ग मीटर पर 2-3 पौध प्रति स्थान पर रोपाई करनी चाहिए.

जुलाई के दूसरे पखवारे में रोपाई करने के लिए पौधे को 20 गुना 10 सैंटीमीटर पर 2-3 सैंटीमीटर गहराई पर 2-3 पौध की रोपाई करते हैं.

पुष्पन के समय सही परिस्थितियां

* पुष्पन के लिए हर दिन औसत तापमान 25-30 डिगरी सैल्सियस.

* सापेक्ष नमी 70-80 फीसदी.

* दिन व रात के तापमान में फर्क 8-10 डिगरी सैल्सियस.

खरपतवार नियंत्रण

क्यूटाक्लोर (मेंचिटी) 50 ईसी 2-2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के तुरंत बाद.

बीसपायरिकपैक सोडियम 200 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई 2-3 पत्ती की अवस्था तक 2, 4 डी इथाइल ईस्टर 34 ईसी 1.25-1.50 लिटर मात्रा रोपाई के 30-35 दिन बाद.

मेट सल्फ्यूरौन 20 डब्ल्यूपीसी 20-25 ग्राम प्रति हेक्टेयर रोपाई के 30-35 दिन बाद.

समन्वित खरपतवार नियंत्रण के लिए क्यूटाक्लोर 50 ईसी की 2-2.5 लिटर रोपाई के तुरंत बाद और 2,4 डी इथाइल ईस्टर की 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 2-3 पत्ती की अवस्था पर.

जल प्रबंधन : धान में क्रांतिक अवस्था जैसे कल्ले फूटते समय, बाली निकलते समय या फूल खिलने पर या फिर दाना भरते समय पानी देना बहुत जरूरी है.

प्रयोगों से यह साबित हो चुका है कि खेत में पानी हमेशा खड़ा होने की अपेक्षा खेत से पानी लुप्त होने के 2 दिन बाद सिंचाई से पैदावार ज्यादा हासिल होती है.

किसान ने खोजी खूबियों वाली धान (Paddy) की नई किस्म

हमारे देश में उन्नत बीज का संकट आज भी बना हुआ है जबकि नए व उन्नतशील बीजों की खोज में कृषि वैज्ञानिक लगातार लगे हुए हैं. अगर खरीफ सीजन में उगाई जाने वाली फसलों की बात करें, तो इस सीजन में धान की खेती प्रमुख स्थान रखती है.

देश की जलवायु के हिसाब से धान की अलगअलग किस्म बोई जाती हैं, फिर भी किसानों को अगर किसी किस्म से उत्पादन ज्यादा मिलता है तो उस का स्वाद उतना अच्छा नहीं होता.

धान की पतली वैराइटी की बात की जाए तो इस का स्वाद खाने में तो अच्छा होता है लेकिन उस का उत्पादन मोटे धान की अपेक्षा कम मिलता है. धान की बहुत कम ऐसी किस्में हैं, जिन में उत्पादन और स्वाद के साथसाथ उन में पोषक तत्त्वों की प्रचुर मात्रा मौजूद हो.

धान की ऐसी ही एक किस्म को खोज निकालने का काम किया है बस्ती जिले के रुधौली ब्लौक के कचारी कलां गांव के पूर्वांचल बैंक के रिटायर्ड बैंक कर्मी बृजेंद्र बहादुर पाल ने.

बैंक से रिटायर होने के बाद उन्होंने अपने गांव में पुरखों की जमीन पर खेती करने का फैसला लिया. चूंकि उन के खेतों की मिट्टी खेती के नजरीए से बहुत उपजाऊ है, ऐसे में वे साल में एक खेत से 3-3 फसलें तक लेते हैं.

खरीफ फस्ल में वे धान की बड़े स्तर पर खेती करते हैं. वे धान की अलगअलग कई वैराइटियों की फसलें लेते हैं. उन्होंने साल 2014 में धान की कई वैराइटियों की फसल ले रखी थी और उसी धान की बोई गई फसल में उन्होंने देखा कि धान के कुछ पौधे बोई गई फसल से अलग हट कर हैं.

उन्हें लगा कि हो सकता है कि यह आसपास धान की बोई गई दूसरी प्रजातियों के परागण के चलते हुआ हो. ऐसे में उन्होंने धान के उन पौधों की विशेष देखभाल शुरू कर दी और धान के उन पौधों में बाली फूटी तो वह आसपास की सभी वैराइटियों से अलग हट कर थी.

इस धान की वैराइटी की बालियां दूसरी किसी भी वैराइटी से बड़ी होने के साथसाथ इस के दाने काले रंग के सूरजमुखी के बीज जैसे बड़ेबड़े और चमकीले थे. जब इन पौधों से धान पक कर तैयार हुआ तो उस से उन्हें आधा किलो बीज मिले. इस के बाद उन्होंने दूसरे साल 1 बिस्वां जमीन में फसल ली. इस से उन्हें इतना उत्पादन हासिल हुआ कि वे अगले साल बोआई के अलावा खा भी सके. उन्होंने इस खोजी गई वैराइटी को अपने नाम के पहले अक्षर ब नाम के पूरे अक्षरों की संख्या को जोड़ कर बी-6 नाम दिया है.

बृजेंद्र बहादुर पाल ने खोजी गई प्रजाति बी-6 को जलभराव व सिंचित अवस्था में उगा कर देखा तो पाया कि इस के पौधों की लंबाई 10 सैंटीमीटर है. इस के चलते यह बाढ़ व जलभराव की स्थिति में भी आसानी से उगाई जा सकती है. जबकि पानी की सही उपलब्धता में सिंचित दशा में भी इस बी-6 वैराइटी को आसानी से उगाया जा सकता है. इस की फसल को दोनों ही अवस्थाओं में उगा कर अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है.

यह वैराइटी दोमट, चिकनी या बलुई दोमट मिट्टी सही पाई गई है. इस फसल में धान की सामान्य प्रजातियों की तरह खाद व उर्वरक की जरूरत पड़ती है.

धान (Paddy)

इन विधियों से बोएं इस वैराइटी को : उन्होंने धान की खोजी गई इस नई किस्म बी-6 को बोई जाने वाली सभी विधियों से आजमा कर देखा है. यह वैराइटी छिटकाव विधि, नर्सरी विधि और ड्रम सीडर व लाइनिंग विधियों से उगाई जा सकती है.

यह प्रजाति सभी विधियों से उगाए जाने में कामयाब रही है. अगर इस को नर्सरी में उगा कर रोपाई करना चाहते हैं तो जून के दूसरे हफ्ते तक नर्सरी डाल दें और तैयार नर्सरी को 21 दिन बाद खेत में रोप देना चाहिए. अगर इस की बोआई छिटकाव विधि या लाइनिंग विधि से करना चाहते हैं तो जुलाई के दूसरे हफ्ते तक बोआई कर दें.

प्रमाणन के लिए कर चुके हैं आवेदन : बृजेंद्र बहादुर पाल द्वारा खोजी गई धान की बी-6 किस्म खाने में स्वाद से भरपूर होने के साथ ही साथ पोषक तत्त्वों से भी भरपूर है. इस में उन्होंने स्थानीय स्तर पर इस की जांच करवा ली है और इस के प्रमाणन के लिए उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली व राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोयंबटूर को भी भेज रखा है.

इस वैराइटी के धान के चावल चौड़े, चमकीले व खाने में बहुत ही स्वादिष्ठ पाए गए हैं. बृजेंद्र बहादुर पाल द्वारा खोजी इस बी-6 वैराइटी के धान की खूबी यह है कि इस धान की कुटाई में इस के चावल टूटते नहीं हैं. इसलिए पकाने पर यह चावल न केवल देखने में अच्छे लगते हैं, बल्कि बहुत स्वादिष्ठ भी होते हैं.

अगर आप भी इस वैराइटी को उगाना चाहते हैं तो आप बृजेंद्र बहादुर पाल के मोबाइल नंबर 8795798979 पर संपर्क कर सकते हैं या उन्हें चिट्ठी भी लिख सकते हैं. पता है: ग्राम-पचारी कलां, पोस्ट-खंभा, जनपद-बस्ती, उत्तर प्रदेश, पिन-272151.

समय से करें खेतीबारी से जुड़े ये काम

मई का महीना खेती के नजरिए से खास होता है. इस महीने जहां गेहूं की मड़ाई और भंडारण पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है, वहीं सब्जियों की फसल की समय से सिंचाई, निराईगुड़ाई और तैयार फसल की तुड़ाई से ले कर समय से बाजार पहुंचाने को ले कर किसानों को खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

वैसे भी मई का महीना खरीफ फसल की बोआई और रोपाई से जुड़ी तैयारियों के नजरिए से भी अहम माना जाता है. मिट्टी की उत्पादन कूवत की जांच के लिए मिट्टी का नमूना भी किसान इसी महीने स्थानीय लैब पर ले जा  सकते हैं. साथ ही, खेतीकिसानी से जुड़े इन कामों को भी किसान समय से पूरा करें:

जो किसान गेहूं की मड़ाई किसी वजह से समय से पूरा नहीं कर पाए हैं, वे हर हाल में मई महीने के पहले हफ्ते तक मड़ाई का काम पूरा कर लें. साथ ही, जिन किसानों ने मड़ाई का काम पूरा कर लिया है और वे गेहूं को बोरियों में भंडारित करना चाहते हैं, तो वे पहले जमीन से कम से कम एक फुट ऊपर लकड़ी का प्लेटफार्म बना लें. उस के बाद बोरे के नीचे गेहूं और नीम की पत्तियां बिछा कर दीवार से 50 सैंटीमीटर की दूरी पर भंडारित करें.

गेहूं के भंडारण के लिए जूट की नई बोरियों को चुनें. इस के अलावा गेहूं के 100 किलोग्राम बीज में एक किलोग्राम नीम का बीज मिला कर रखें. इस से गेहूं में कीटों का प्रकोप नहीं हो पाता है.

जो किसान भंडारगृह में गेहूं का भंडारण करना चाहते हैं, वे भंडारगृह को कीटनाशक से विसंक्रमित कर लें.

अगर किसान रासायनिक कीटनाशी का इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं, तो वे प्रति क्विंटल में एक किलोग्राम नीम की पतियों को छाया में सुखा कर और अच्छे से साफ कर के गेहूं भंडारण के समय मिला दें.

जो खेत रबी की फसल से खाली हो चुके हैं, उन की उर्वरा कूवत की जांच जरूर कराएं. इस से फसल में संस्तुत मात्रा में खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करने में किसानों को आसानी होगी.

खेत से मिट्टी की जांच के लिए नमूना लेने के लिए एक एकड़ खेत में अलगअलग 8-10 जगहों पर निशान लगा लेते हैं. इस के बाद अंगरेजी के “V” आकार में 6 इंच गहरेगहरे गड्ढे बना कर निकाली गई मिट्टी को 4 भागों में बांट लेते हैं. इस के बाद आमनेसामने के 2 भागों की मिट्टी को मिला कर बाकी बची मिट्टी फेंक देनी चाहिए.

इस तरह से नमूने के लिए ली जाने वाली मिट्टी के तकरीबन 500 ग्राम होने तक इस प्रक्रिया को दोहराते रहते हैं. इस के बाद मिट्टी के नमूने को थैली में भर कर अपना नाम, पूरा पता, खेत की पहचान, नमूना लेने की तारीख, जमीन की ढलान, सिंचाई का स्रोत, जल निकासी, अगली बोआई करने की फसल, पिछले साल की फसलों की जानकारी आदि विवरण के साथ जांच के लिए स्थानीय मृदा जांच प्रयोगशाला में जमा कर दिया जाता है.

किसान यह जरूर ध्यान दें कि जिस खेत से वे नमूना ले रहे हैं, उस की मिट्टी गीली न हो और जिस खेत में हाल ही में कंपोस्ट, खाद, चूना, जिप्सम आदि का इस्तेमाल किया गया है, उस खेत की मिट्टी का नमूना न लें. इस के अलावा खेत की मेंड़ों और रास्तों की मिट्टी का नमूना नहीं लेना चाहिए. साथ ही, यह भी ध्यान दें कि खेत के किनारों से कम से कम 1-1.5 मीटर अंदर की तरफ से नमूना लें.

मई महीने में ही किसान खेतों के समतलीकरण का काम पूरा कर लें, जिस से खरीफ की फसल में सिंचाई के समय पानी पूरे खेत में आसानी से पहुंच जाता है.

खाली खेत की गहरी जुताई आरएमबी प्लाऊ से करें. इस से खेत से खरपतवार नष्ट होने के साथ ही फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े मर जाते हैं और खेत के पानी को सोखने की कूवत बढ़ जाती है.

जिन किसानों ने हरी खाद के लिए सनई या ढैंचा की बोआई नहीं की है, वे मई महीने के पहले हफ्ते में बोआई का काम हर हाल में पूरा कर लें.

सनई या ढैंचा की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 50-60 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. हरी खाद के लिए सनई या ढैंचा की फसल 40-45 दिन में प लटाई के काबिल हो जाती है.

किसान खरीफ में ली जाने वाली सब से मुख्य फसल धान के लिए खेती की तैयारी शुरू कर दें. जो किसान धान की सब से देर से पकने वाली किस्में लेना चाहते हैं, वे मई महीने के आखिरी हफ्ते में नर्सरी जरूर डाल दें.

धान की नर्सरी में मीडियम आकार वाली किस्मों की प्रति हेक्टेयर 35 किलोग्राम, मोटे धान की 40 किलोग्राम व महीन धान की 30 किलोग्राम मात्रा डालें.

धान के उसी बीज का चयन करें, जो आधारित और प्रमाणित हो, क्योंकि ऐसे बीज के जमाव और शुद्धता की प्रमाणिकता होती है. धान बीज को नर्सरी में डालने के पहले उस का उपचार जरूरी है.

बीजोपचार के लिए प्रति किलोग्राम बीज के लिए 4 ग्राम ट्राईकोडर्मा या 2.5 ग्राम कार्बंडाजिम या थीरम की जरूरत पड़ती है.

धान की नर्सरी डालने के लिए 8 मीटर लंबी और 1.5 मीटर चौड़ी क्यारियां बनाना सही होता है.

धान बीज को नर्सरी में डालने के पहले उसे 24 घंटों के लिए पानी में भिगोने के बाद उसे पानी से निकाल लें और 24 से 48 घंटे तक छायादार जगह पर ढेर बना कर रख दें. इस से बीज अंकुरित हो जाता है. जब बीज पूरी तरह से अंकुरित हो जाए, तो नर्सरी में बीज डालने से जमाव दर सही होता है.

जिन किसानों ने जायद की फसल के रूप में मूंग, उड़द और लोबिया की फसल ले रखी है, वे फसल की सिंचाई हर 15 दिन पर करते रहें.

सूरजमुखी की खेती करने वाले किसान समय से फसल की सिंचाई करते रहें और पौधों पर मिट्टी चढ़ा दें.

फसल में झर्रीदार पत्ती रोग, पीला चितेरी या पीत रोग, चूर्णी कवक पर्ण बूंदगी रोग, रुक्ष रोग, उड़द का पीला चित्तवर्ण रोग, उड़द का पत्र दाग रोग और कीटों का प्रकोप फसल में दिखाई पड़ने पर अपने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक फसल सुरक्षा से बात कर के सही उपाय अपनाएं.

जो किसान मूंगफली की खेती करना चाहते हैं, वे जायद फसल मूंगफली की बोआई मई महीने के पहले हफ्ते तक पूरा कर सकते हैं. जायद सीजन में बोई जाने वाली मूंगफली की उन्नत किस्मों में एचबी 84, एम 522, एम 335 व एम 37 का इस्तेमाल किया जा सकता है.

मूंगफली की फसल में बोआई के समय 250 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से करें. साथ ही, सिंचाई वाले एरिया में नाइट्रोजन 25 से 30 किलोग्राम, फास्फोरस 50 से 60 किलोग्राम और 40 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करें.

फसल से खरपतवार निकालते रहें व किसी भी तरह की बीमारी या कीट का प्रकोप दिखने पर तुरंत ही स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें.

जिन किसानों ने सूरजमुखी की फसल ले रखी है, वे 15-20 दिन के अंतराल पर निराईगुड़ाई कर फसल की सिंचाई करते रहें

गन्ने की खेती करने वाले किसान, जिन्होंने वसंतकालीन गन्ने की फसल ले रखी है, वे 20 दिनों के अंतर पर फसल की सिंचाई करते रहें. साथ ही, फसल में प्रति हेक्टेयर की दर से 130 से 165 किलोग्राम यूरिया की बोआई कर फसल की सिंचाई कर दें.

इस के अलावा गेहूं की फसल से खाली हुए खेत में गन्ने की बोआई करने के लिए कतार से कतार की दूरी 60-65 सैंटीमीटर रख कर मई के पहले हफ्ते में बो दें. नुकसान से बचने के लिए गन्ने की रोगरोधी किस्मों का ही चयन करें.

चूंकि मई महीने में तेज लू चलती है, ऐसे में गन्ने की फसल की बढ़वार के लिए समय से सिंचाई बहुत माने रखती है, इसलिए गन्ने की फसल की सिंचाई 15-20 दिन के अंतर पर करते रहें. गन्ने की पेड़ी में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सिंचाई के बाद 163 किलोग्राम यूरिया की मात्रा दें.

फसल को गिरने से बचाने के लिए पौधों के अगलबगल मिट्टी चढ़ाना न भूलें. फसल में किसी भी तरह के रोग व कीट का असर दिखने पर अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें.

जहां सिंचाई का अच्छा इंतजाम है, वहां किसान मई महीने में कपास की बोआई कर सकते हैं. इस की उन्नत किस्मों में फतेह, एलडीएच 11, एलएच 144, धनलक्ष्मी, पूसा 8-6, एचडी-1 जैसी किस्मों का चयन करें.

सिंचाई वाले क्षेत्र में बलुई व बलुई दोमट मिट्टी में कपास की खेती की जा सकती है. बीज की बोआई सीडड्रिल से करें. बोआई के पहले बीज शोधन करना न भूलें.

जिन किसानों ने गरमियों की फसल के रूप में टमाटर, बैगन व हरी मिर्च जैसी सब्जियों की खेती कर रखी है, वे भी समय पर सिंचाई करते रहें.

बैगन व टमाटर की फसल में प्रति हेक्टेयर 50 किलोग्राम नाइट्रोजन व हरी मिर्च में 35 किलोग्राम नाइट्रोजन का इस्तेमाल करें. फसल में कीट नियंत्रण के लिए फैरोमौन ट्रैप लगाएं.

जिन किसानों ने बीज के लिए फूलगोभी, गांठगोभी, पत्तागोभी, शलजम, गाजर, मूली व पालक छोड़ रखी थी, वे मई महीने के दूसरे सप्ताह तक फसल की कटाई कर लें और बीज को कड़ी धूप में सुखा कर भंडारित करें.

प्याज और लहसुन की तैयार फसल की सिंचाई बंद कर मई के पहले हफ्ते से खुदाई शुरू कर छाया व हवादार जगह पर भंडारित करें.

जो किसान हलदी और अदरक की खेती करना चाहते हैं, वे हलदी का 15-20 क्विंटल व अदरक के 16-18 क्विंटल बीज का इस्तेमाल प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के लिए कर सकते हैं. हलदी की उन्नत किस्मों में कस्तूरी, सोनिया, सुगना,अमलापुरम, कृष्णा, राजेंद्र, मधुकर सही होती हैं, जबकि अदरक की उन्नत किस्मों में सुप्रभा, सुरभि, सुरुचि व हिमगिरी सही होती हैं.

सूरन की खेती करने वाले किसान मई महीने में बोआई का काम जरूर पूरा कर लें. इस की उन्नत किस्मों में गजेंद्र, संतरागाछी, श्रीपद्मा (एम-15) का चयन कर सकते हैं.

गरमियों में बोई जाने वाली मूली की उन्नत किस्मों में पूसा चेतकी सही मानी जाती है और यह महज 45 दिनों में तैयार हो जाती है. इस किस्म की बोआई अप्रैल से अगस्त महीने तक की जा सकती है.

मई महीने में गरमी ज्यादा होती है, इसलिए लौकी, तोरई, कद्दू, खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, खीरा जैसी फसलों की सिंचाई समय पर करते रहें.

फसल में कीड़े व रोग का प्रकोप दिखने पर नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र पर संपर्क करें.

मई महीने में आम, अमरूद, पपीता, आलूबुखारा, नाशपाती, बेर, लीची, अंगूर, आंवला, नीबू जैसे फलदार पौधों की सिंचाई करते रहें. इस महीने लीची के फल पक कर तैयार हो जाते हैं. जब लीची के फल गहरे गुलाबी या लाल रंग के हो जाएं, तो फलों की तुड़ाई शुरू कर दें. फलों को फटने से बचाने के लिए सिंचाई का उचित इंतजाम करें.

मई महीने में अमरूद की फसल की छंटाई करें. इस से नई शाखाएं निकलती हैं, जिस से सर्दियों में पौध से ज्यादा फल मिलते हैं.

जिन लोगों ने केले की रोपाई कर रखी है, वे रोपित पौध में 25 ग्राम नाइट्रोजन आधा मीटर दूर की गोलाई में डाल कर सिंचाई करें.

अगर कागजी नीबू में फलों के फटने की समस्या आ रही है, तो पौधों पर 4 फीसदी पोटेशियम सल्फेट के घोल को पानी में मिला कर छिड़काव करें.

मई महीने में रजनीगंधा की रोपाई पहाड़ी क्षेत्रों में की जा सकती है. आमतौर पर रजनीगंधा की रोपाई मार्च महीने से जून माह के बीच की जा सकती है. जिन किसानों ने रोपाई कर रखी है, वे हर 15 दिन पर फसल की सिंचाई करते हुए फसल से खरपतवार निकालते रहें.

मई महीने में गुलदाउदी की कटिंग को जड़ बनने के लिए मिट्टी में डालें. गुलाब, ग्लेडियोलस की सिंचाई का खास खयाल रखें.

जो किसान औषधीय फसलों की खेती करना चाहते हैं, वे मई महीने में तुलसी, सफेद मूसली की बोआई कर सकते हैं. साथ ही, पहले हफ्ते में सर्पगंधा की नर्सरी डालें. एक हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिए नर्सरी डालने में 6-7 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जिन किसानों ने मैंथा की फसल लगा रखी है, वे फसल में नाइट्रोजन की अंतिम टौप ड्रेसिंग कर लें.

चारे वाले फसल के रूप में जिन किसानों ने ज्वार, बाजरा व मक्के की बोआई कर रखी है, वे समय पर सिंचाई करते रहें और जिन्होंने अभी तक बोआई नहीं की है, वे मई महीने के पहले हफ्ते तक जरूर बोआई कर दें.

चारे वाली किस्मों की खेत में बोआई के पहले प्रति हेक्टेयर 10 टन देशी खाद का इस्तेमाल करें. जिन किसानों ने बरसीम, जई व लोबिया की फसल बीज के लिए छोड़ रखी थी, वे कटाई कर बीज के दानों को कड़ी धूप में सुखा कर ही रखें.

 

पशुओं को मई महीने में चलने वाली तेज लू से बचाने का सही इंतजाम करें और उन्हें सही मात्रा में हरा चारा देते रहें.

इस महीने पशुओं को पानी की ज्यादा जरूरत होती है. ऐसे में पशुओं के लिए सही मात्रा में पीने के लिए साफ पानी का इंतजाम रखें.

मुरगीपालन के व्यवसाय से जुड़े लोग मुरगीखाने को ठंडा रखने के लिए एस्बेस्टस या टिन की छतों पर पैंट लगाएं और परदों पर पानी के छींटें मारें.

मुरगियों के लिए पीने के लिए साफ पानी का सही से इंतजाम करें और उन के चारे में प्रोटीन की मात्रा 18 फीसदी से बढ़ा कर 20 फीसदी करें.

सेहत के लिए फायदेमंद काला नमक धान की खेती

खरीफ फसलों में धान उत्तर प्रदेश की प्रमुख फसल है. प्रदेश में चावल की औसत उपज में वृद्धि हो रही है.

इसी कड़ी में प्रदेश और  देश में खुशबूदार (खुशबूदार चावल) की मांग भी काफी बढ़ रही है.

पूर्वांचल के जिलों में काला नमक धान की खेती की अलग ही पहचान है. इस की क्वालिटी के चलते बाजार भाव भी ज्यादा रहता है.

पहले की प्रचलित काला नमक की प्रजातियों में कुछ समस्याएं जैसे उपज का कम होना, ज्यादा समयावधि, पौधों की लंबाई ज्यादा होने के चलते गिर जाना और ज्यादा पानी की जरूरत के चलते इस प्रजाति का क्षेत्रफल लगातार घटता गया.

लेकिन काला नमक के खास गुणों के चलते भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के लगातार शोध के बाद काला नमक की ज्यादा पैदावार वाली काला नमक 101, काला नमक 102 व काला नमक 103 किस्में बौनी, खुशबूदार व ज्यादा उपज देने वाली प्रजातियां विकसित की गई हैं. इन की खेती कर किसान ज्यादा मुनाफा उठा सकते हैं.

इन प्रजातियों में कई ऐसी खूबियां हैं, जो न केवल स्वाद में अच्छी मानी जा रही हैं, बल्कि ये कुपोषण को दूर करने में सब से ज्यादा मुफीद भी मानी जा रही हैं. इन प्रजातियों में निम्नलिखित खूबियां हैं :

*    इन में दूसरे चावल की तुलना में आयरन 29.9 फीसदी व जिंक 31.1 फीसदी पाया जाता है, जो दूसरी सभी खुशबूदार प्रजातियों से सब से ज्यादा है.

*    इन के चावल में कुपोषण से लड़ने की ताकत ज्यादा होती है.

*    दाना काला, सफेद व बहुत ज्यादा खुशबूदार होता है

*    पैदावार पुराने काला नमक से डेढ गुना ज्यादा होती है.

*    20 अक्तूबर महीने के करीब बाली आती हैं और फसल नवंबर महीने के आखिर तक तैयार हो जाती है.

*    पुराने काला नमक से पकने में 2 हफ्ते कम समय लेती है.

*    पौधे की ऊंचाई तकरीबन 100-110 सैंटीमीटर तक होती है.

*    बालियां 20-25 सैंटीमीटर लंबी होती हैं.

*    दाने का प्रकार मध्यम होता है. इसे साधारण मशीन से भी कुटाई (चावल निकाला) किया जा सकता है.

*    चावल का औसत बाजार भाव 55-60 रुपए प्रति किलोग्राम व मांग ज्यादा होने के चलते बेचने में कोई समस्या नहीं आती है.

*    चावल का फीसदी 65-70 तक पाया जाता है.

भूमि का चयन

सभी तरह की भूमियों में, जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध हों, आसानी से इस की खेती की जा सकती है. वैसे, दोमट, मटियार व काली मिट्टी इस के लिए अच्छी होती है.

बीज की दर

काला नमक धान की तकरीबन 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर रोपाई के लिए सही है.

नर्सरी का प्रबंधन

काला नमक धान की नर्सरी दूसरी प्रजाति के धान की तुलना में देर से यानी जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के दूसरे हफ्ते तक डालना अच्छा रहता है. एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए तकरीबन 800-1000 वर्गमीटर क्षेत्रफल में नर्सरी डालना सही होता है.

नर्सरी की बोआई से पहले 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालते हैं.

नर्सरी में यदि जस्ता (जिंक) या लोहे (आयरन) की कमी दिखाई पड़े, तो 0.5 फीसदी जिंक सल्फेट व 0.2 फीसदी के रस सल्फेट के घोल का छिड़काव करना अच्छा होता है.

प्रजातियों का चयन

काला नमक 101, काला नमक 102 व काला नमक 103 ये किस्में बौनी, खुशबूदार व ज्यादा उपज देने वाली प्रजातियां हैं, जो भारतीय राइस इंस्टीट्यूट फिलीपींस द्वारा विकसित की गई हैं. इन में से काला नमक 101 का नतीजा बहुत अच्छा है.

बीज शोधन

नर्सरी डालने से पहले बीज शोधन जरूर कर लें. इस के लिए जहां पर जीवाणु ?ालसा या जीवाणुधारी रोग की समस्या हो, वहां पर 25 किलोग्राम बीज के लिए 0.4 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 40 ग्राम प्लांटोमाइसीन को मिला कर पानी में रातभर भिगो दें. दूसरे दिन छाया में सुखा कर नर्सरी डालें.

अगर जीवाणु झुलसा की समस्या क्षेत्र में न हो तो 25 किलोग्राम बीज को रातभर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन निकालने के बाद ऐक्स्ट्रा पानी निकल जाने के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बंडाजिम को 8-10 लिटर पानी में घोल कर बीज में मिला दिया जाए. इस के बाद छाया में अंकुरित कर के नर्सरी में डाला जाए. बीज शोधन के लिए बायोपैस्टिसाइड का इस्तेमाल किया जाए.

समय से करें रोपाई

नर्सरी डालने के 21-25 दिन बाद अच्छी तरह से तैयार किए गए खेत में इस की रोपाई करनी चाहिए.

उचित गहराई व दूरी पर रोपाई

इस प्रजाति की पौध की रोपाई 3-4 सैंटीमीटर से ज्यादा गहराई पर नहीं करनी चाहिए, वरना कल्ले कम निकलते हैं और उपज कम हो जाती है. पौधों की दूरी 20310 सैंटीमीटर की दूरी पर एक जगह पर 2-3 पौधे लगाने चाहिए.

उर्वरक प्रबंधन

100-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस व 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से व सड़ी हुई गोबर की खाद 10-15 टन प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल अच्छा होता है. साथ ही, 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर अच्छा नतीजा देता है.

खरपतवार प्रबंधन

धान की फसल में 2 तरीके से खरपतवार कंट्रोल किया जाता है. एक तो रोपाई के फौरन बाद और 3 दिन के अंदर ब्यूटाक्लोर 0.3 लिटर प्रति हेक्टेयर या एनीलोफास 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें या फिर रोपाई के 20-25 दिन के अंदर विस्पाईरीबैक सोडियम (नोमनी गोल्ड) 200-250 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर के खरपतवार पर काबू पाया जा सकता है.

यांत्रिकीकरण द्वारा खरपतवार नियंत्रण

अगर रसायनों का इस्तेमाल किए बिना निराईगुड़ाई के द्वारा खरपतवार कंट्रोल किया जाए, तो इस से उपज भी अच्छी मिलती है.

सिंचाई प्रबंधन

इस प्रजाति को खेत में बराबर नमी की जरूरत पड़ती है. यह 30-60 सैंटीमीटर अस्थायी पानी में भी अच्छी पैदावार देता है. ज्यादा पानी की दशा में जल निकासी का अच्छा इंतजाम करें.

फसल सुरक्षा

काला नमक धान की इन प्रजातियों में धान का बंका, तना छेदक, धान की गंधी और सैनिक कीट का प्रकोप प्रमुख रूप से होता है. कीट रसायन का प्रयोग अधिक प्रकोप के समय करना चाहिए. जहां तक संभव हो, एकीकृत प्रबंधन की विधियां अपनाई जाएं.

कटाई व मड़ाई

इस प्रजाति की धान की कटाई 85-90 फीसदी दानों के पक जाने के बाद कर लें. तैयार फसल की मड़ाई के लिए छाया में हवादार जगह पर सुखा कर मड़ाई करें.

काला नमक की इस प्रजाति की औसत उपज 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

धान की कटाई से ले कर भंडारण तक

भारत दुनिया में धान उत्पादन की दृष्टि से सब से बड़े देशों में गिना जाता है. देश में आधे से अधिक खेती योग्य जमीनों पर धान की खेती की जाती है. धान उत्पादन को खेती में बीते वर्षो में बड़े शोध व तकनीकी का उपयोग होने से उत्पादन बड़ी तेजी से बढ़ा है, लेकिन धान की फसल के तैयार होने के बाद किसानों को कटाई, मड़ाई, सुखाई व भंडारण की सही जानकारी न होने की वजह से कुल उत्पादन का 10 फीसदी तक का नुकसान उठाना पड़ता है.

धान की कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए किसानों को उस की तकनीकी जानकारी होना बेहद जरूरी हो जाता है, जिस से कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

अगर किसान खेती से ले कर भंडारण तक की उन्नत तकनीकी का इस्तेमाल करें, तो वह धान से न केवल अच्छा उत्पादन प्राप्त करेगा, बल्कि उसे अच्छी आय भी होगी.

फसल तैयार होने पर कैसे करें धान की कटाई

देश के अलगअलग राज्यों में धान की कटाई के लिए अलगअलग विधियों का इस्तेमाल किया जाता है. छोटे और मझोले किसान अकसर धान की कटाई हंसिए के द्वारा कटाई करते हैं, जबकि बड़े किसानों द्वारा रीपर या कंबाइन हार्वेस्टर का उपयोग किया जाता है.

धान की कटाई के लिए उपयोग में लाए जाने वाले हंसिया विधि से न केवल धान की क्षति कम होती है, बल्कि पुआल की मात्रा भी अधिक मिलती है. इस पुआल का उपयोग पशुओं के लिए चारे, खुंब उत्पादन, कंपोस्ट खाद इत्यादि के लिए किया जा सकता है.

Paddy harvesting
Paddy harvesting

किसानों को फसल के साथसाथ अन्य कई तरह के लाभ हंसिया द्वारा धान की फसल कटाई से मिल जाता है, पर बड़े भाग में हंसिया द्वारा धान कटाई में न केवल अधिक समय लगता है, बल्कि अधिक मजदूरों की जरूरत भी पड़ती है, इसलिए बड़े क्षेत्रफल में धान की फसल की कटाई के लिए ट्रैक्टर रीपर या कंबाइन का उपयोग किया जाना ज्यादा उचित होता है.

रीपर विधि से काटी गई धान की फसल को रीपर खेत में एक तरफ लगाती हुई जाती है, बाद में काटी गई फसल को किसानों द्वारा इकट्ठा कर इस की मड़ाई कर ली जाती है, जबकि अगर धान की फसल को कंबाइन से काटा जाए, तो उसी दौरान किसान के फसल की कटाईमड़ाई व ओसाई एकसाथ हो जाती है. लेकिन कंबाइन से धान काटने की दशा में चावल के टूटने का डर बना रहता है. कंबाइन से कटाई की दशा में पुआल की बहुत कम मात्रा किसान को मिल पाती है.

कंबाइन द्वारा धान की फसल की कटाई में समय, मेहनत व लागत में बचत की जा सकती है, लेकिन धान की गुणवत्ता में कमी आ जाती है.

धान की कटाई के पहले यह जरूरी हो जाता है कि किसान यह तय कर लें कि धान की फसल कटाई करने योग्य हो गई है या नहीं, इस के लिए यह तय करें कि कटाई के समय फसल में उचित नमी हो. यह नमी 20-22 फीसदी तक हो सकती है. इस से अधिक नमी की दशा में धान की कटाई करने पर चावल के टूटने का डर बना रहता है.

कटाई से पहले यह भी ध्यान रखें कि वातावरण में भी नमी न हो और अगर खेत में पानी भरा हो, तो कटाई के  8-10 दिन पूर्व खेत से पानी की निकासी कर देनी चाहिए.

यह भी कोशिश करें कि धान की फसल की कटाई में देरी न होने पाए, क्योंकि इस से बालियों के टूट कर गिरने का डर बना रहता है और चूहों व पक्षियों द्वारा इसे नुकसान पहुंचाया जा सकता है.

अगर हंसिए के द्वारा फसल की कटाई की जा रही है, तो बालियों को एक दिशा व एक सीध में रखें, जिस से मड़ाई के समय व्यवधान न उत्पन्न हो.

कटाई के बाद धान की फसल को वर्षा से बचाना चाहिए. धान की अलगअलग किस्मों को अलगअलग काट कर इकट्ठा करना उचित होता है. कटाई के बाद धान की फसल को खेत में ज्यादा दिनों तक सूखने के लिए न छोड़ें.

आमतौर पर धान की अगेती किस्में 110-115 दिन पर, मध्यम किस्में 120-130 दिन तक व देर से पकने वाली फसल 130 दिन के बाद काटने योग्य हो जाती हैं.

धान की मड़ाई

डा. राकेश शर्मा के मुताबिक, धान की फसल की कटाई के पश्चात उस की बालियों व दानों का पुआल से अलग करना मड़ाई कहा जाता है. यह काम मजदूरों द्वारा, पशुओं या ट्रैक्टर से चलने वाले यंत्रों के माध्यम से किया जा सकता है.

धान की फसल की कटाई के पश्चात मड़ाई का काम जितना जल्दी हो सके, उतना जल्दी कर लेना उचित होता है. अगर धान की मड़ाई मजदूरों के द्वारा की जाती हो, तो उसे लकड़ी या लोहे के पाइपों पर पटक कर धान की बाली को छुड़ाया जा सकता है. इस विधि से धान मड़ाई करने से चावल के टूटने की संभावना बहुत कम होती है.

इस के अलावा पशुओं के द्वारा भी धान की फसल की मड़ाई की जा सकती है. इन दोनों विधियों से धान मड़ाई करने में ज्यादा मेहनत व मजदूर की आवश्यकता होती है, जबकि धान मड़ाई वाले थ्रैशर से धान की मड़ाई करने में मेहनत व लागत में बहुत कमी आ जाती है.

इस विधि से धान मड़ाई करने में धान से बेकार चीजें अलग हो जाती हैं, जिस से इस की सफाई भी साथसाथ हो जाती है.

धान की मड़ाई के बाद इस की ओसाई कर दें, जिस से धान में मिश्रित भूसा में धूलकण इत्यादि अलग हो जाएं. ओसाई के लिए ओसाई में काम आने वाले पंखे की सहायता ली जाती है.

मड़ाई के बाद धान को सुखाना

डा. राकेश शर्मा के मुताबिक, चूंकि धान की फसल की कटाई 20-22 फीसदी की नमी की अवस्था में की जाती है, परंतु इस नमी की अवस्था में न तो धान को भंडारित किया जा सकता है और न ही इस की कुटाई की जा सकती है. ऐसी स्थिति में चावल टूटने न पाए, धान की नमी को कुटाई योग्य करना अनिवार्य हो जाता है, इसलिए धान को खुली धूप में फर्श, चटाई या तिरपाल पर फैला कर सुखा लेना चाहिए. अब तो धान को सुखाने के लिए कई तरह के यंत्र भी बाजार में उपलब्ध हैं.

धान सुखाते समय यह ध्यान देना चाहिए कि सूरज की रोशनी बहुत तेज न हो, क्योंकि इस से धान के टूटने की समस्या बढ़ जाती है.

भंडारण की विधि

डा. राकेश शर्मा के मुताबिक, किसान धान की मड़ाई के तुरंत बाद उस की कुटाई नहीं करवाते और बहुत से किसान उसे अच्छे बाजार मूल्य के इंतजार में भंडारित कर के रखते हैं.

ऐसे में भंडारित किए गए धान की क्षति न होने पाए, इस की जानकारी किसानों को होना नितांत जरूरी है. अगर किसान अपने धान की फसल का भंडारण करना चाहते हैं, तो उस में नमी की मात्रा 12 फीसदी से ले कर 14 फीसदी के बीच रखनी चाहिए.

भंडारण के दौरान यह सुनिश्चित कर लें कि भंडारित किए गए अनाज को चूहे या कीड़ों के नुकसान से बचाया जा सके, इस के लिए जरूरी प्रबंध पहले ही कर लेना उचित होता है.

धान की फसल के भंडारण के लिए बोरियों या बखार का उपयोग किया जा सकता है. जिस जगह पर धान का भंडारण किया जा रहा है, वहां कोशिश करें कि हवा का आवागमन हो रहा हो और भंडारण स्थल पर नमी न हो.

धान में कंडुआ रोग से बचने पर दें ध्यान

प्रोफैसर रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि पौधे से बाली निकलने के समय धान पर कंडुआ रोग का असर बढ़ने लगता है. इस रोग के कारण धान के उत्पादन पर बुरा असर पड़ने की संभावना बनी रहती है.

धान की बालियों पर होने वाले रोग को आम बोलचाल की भाषा में लेढ़ा रोग, बाली का पीला रोग से किसान जानते हैं. वैसे, अंगरेजी में इस रोग को फाल्स स्मट और हिंदी में मिथ्या कंडुआ रोग के नाम से जाना जाता है.

यह रोग अक्तूबर माह के मध्य से नवंबर माह तक धान की अधिक उपज देने वाली प्रजातियों में आता है. परंतु मौसम में बदलाव के कारण पूर्वांचल के कई जनपदों में अभी से यह रोग बालियों में देखा जा रहा है. जब वातावरण में काफी नमी होती है, तब इस रोग का प्रकोप अधिक होता है. धान की बालियों के निकलने पर इस रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं. रोग ग्रसित धान का चावल खाने पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. प्रभावित दानों के अंदर रोगजनक फफूंद अंडाशय को एक बड़े कटु रूप में बदल देता है, बाद में जैतूनी हरे रंग के हो जाते है.

इस रोग के प्रकोप से दाने कम बनते हैं और उपज में 10 से 25 प्रतिशत की कमी आ जाती है. मिथ्या कंडुआ रोग से बचने के लिए नियमित खेत की निगरानी करते रहें. यूरिया की मात्रा आवश्यकता से अधिक न डालें.

इस के बाद भी खेत में रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत कार्बंडाजिम 50 डब्लूपी 200 ग्राम अथवा प्रोपिकोनाजोल-25 डब्ल्यूपी 200 ग्राम को 200 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने से रोग से नजात मिलेगी. बहुत ज्यादा रोग फैल गया हो, तो रसायन का छिड़काव न करें. कोई फायदा नहीं होगा. रोग वाले बीज को अगली बार प्रयोग न करे.

विलुप्त होने की कगार पर धान की देशी किस्में

वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान अब देशी प्रजातियों की धान की खेती तकरीबन छोड़ चुके हैं और किसान बाजार में उपलब्ध बीज पर निर्भर हैं. धान की पुरानी प्रजातियां तेज सुगंध, स्वाद व पोषण से भरपूर हुआ करती थीं, जिस में आयरन व जिंक प्रचुर मात्रा में होता था.

धान की देशी किस्में सैकड़ों सालों से खुद की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हुए जलवायु परिवर्तन के विपरीत हालात से लड़ते हुए तैयार हुई थीं. इस वजह से इन सभी धान की पुरानी प्रजातियों में बाढ़ और सूखा से लड़ने की क्षमता थी, परंतु जहां नई प्रजातियां 6-7 क्विंटल प्रति एकड़ उपज देती हैं, वहीं धान की पुरानी प्रजातियों की उपज केवल 3-4 क्विंटल प्रति एकड़ थी, जो कि बढ़ती हुई आबादी का पेट भरने के लिए काफी नहीं थी. धान की देशी किस्मों को उपजाने में खादपानी ज्यादा नहीं लगता था.

देशी प्रजातियों की धान की कुछ किस्में कम बारिश वाले क्षेत्र में किसान लगाते हैं, जो कि केवल 60 दिनों में ही तैयार हो जाती थीं. इस में सेलहा व साठी प्रमुख किस्में हैं. करगी, कुंआरी, अगहनी, बस्ती का काला नमक, काला जीरा, जूही बंगाल, कनक जीरा, धनिया और मोती बादाम, काला भात, नामचुनिया, दुबराज, बादशाह पसंद, शक्कर चीनी, विष्णु पराग, जिरिंग सांभा, लालमनी, सोना चूर्ण, तुलसी मंजरी, आदमचीनी, गोविंद भोग, विष्णु भोग, मोहन भोग, बादशाह भोग, साठी, कतरनी, मिर्चा, नगपुरिया, कनकजीर, सीता सुंदरी, कलमदान, जवा फूल, चिन्नावर आदि जैसी धान  की लुप्तप्राय: प्रजातियां हैं.

इन सभी किस्मों में से करगी धान की किस्म का संरक्षण अभी तक विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डा. आरएस सेंगर और शोध छात्र अभिषेक सिंह के द्वारा किया गया है. कृषि विश्वविद्यालय के शोध छात्र अभिषेक सिंह और डा. आरएस सेंगर ने करगी धान की प्रजाति को जौनपुर जिले के मछलीशहरपौहा से संकलित कर उस के बीज को राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली (एनबीपीजीआर) में संरक्षण के लिए बीज बैंक में संरक्षित करवाया है.

कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति आरके मित्तल का कहना है कि किसानों के हित में विलुप्त हो रही प्रजातियों का संरक्षण बहुत जरूरी है. इस से नई प्रजाति विकसित करने में सहायता मिलती है. देश में जर्मप्लाज्म को जीन बैंक में सुरक्षित एवं संरक्षित करने से भविष्य के लिए लाभकारी रहता है. कृषि विश्वविद्यालय का प्रयास है कि किसान हित में सराहनीय कदम उठाया जाए.

निदेशक अनुसंधान, कृषि विश्वविद्यालय  के डा. टीपी सिंह का कहना है कि विलुप्त हो रही प्रजातियों को खोज कर कृषि विश्वविद्यालय जीन बैंक में संरक्षित करवाएगा.

भविष्य में विलुप्त हो रही इस प्रजाति को बीज बैंक में संरक्षित होने से इस को बचाया जा सकेगा. इस के जीन को ट्रांसफर कर वैज्ञानिक अच्छी गुणवत्ता वाली धान को विकसित करने का काम कर सकेंगे.

करगी धान की विशेषताएं

    •  फसल की अवधि 120 दिन
    •  उत्पादन-अनुमानित उपज – 2.1 क्विंटल प्रति एकड़
    •  पौधे की ऊंचाई – 90-95 सैंटीमीटर
    •  पैनिकिल की लंबाई – 24 सैंटीमीटर
    •  झंडे के पत्ते की लंबाई – 34 सैंटीमीटर
    •  भूसी का रंग – हलका काला
    •  दाने का रंग – हलका लाल
    •  उच्च अंकुरण दर 2-5 दिन, 88 फीसदी अंकुरण दर
    •  कम मात्रा में आवश्यक उर्वरक, कीटनाशक

पोषक तत्त्वों की मात्रा

    •  कैल्शियम – 648.9 मिलीग्राम/किलोग्राम
    •  मैग्निसम – 1526 मिलीग्राम/किलोग्राम
    •  आयरन – 966 मिलीग्राम/किलोग्राम
    •  मैग्नीशियम – 21.78 मिलीग्राम/किलोग्राम
    •  कौपर – 19.45 मिलीग्राम/किलोग्राम
    •  एल्युमिनियम – 220.4 मिलीग्राम/किलोग्राम

धान की फसल : प्रमुख रोग और उन का प्रबंधन

धान एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जो पूरे विश्व की आधी से ज्यादा आबादी को भोजन प्रदान करती है. चावल के उत्पादन में सर्वप्रथम चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर आता है. भारत में धान की खेती लगभग 450 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है. छोटी होती जोत एवं कृषि श्रमिक न मिल पाने के चलते और जैविक, अजैविक कारकों की वजह से धान की उत्पादकता में लगातार कमी आ रही है.

इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग, पहचान और उन के प्रबंधन के बारे में बता रहे हैं, जिस से कि किसान धान की फसल में उस रोग की समय से पहचान कर फसल का बचाव कर सकें.

1. झोंका रोग : यह धान की फसल का मुख्य रोग है, जो एक पाईरीकुलेरिया ओराइजी नामक फफूंद से फैलता है. इस रोग के लक्षण पौधे के सभी वायवीय भागों पर दिखाई देते हैं. परंतु सामान्य रूप से पत्तियां और पुष्प गुच्छ की ग्रीवा इस रोग से अधिक प्रभावित होती हैं. प्रारंभिक लक्षण में पौधे की निचली पत्तियों पर धब्बे दिखाई देते हैं. जब ये धब्बे बड़े हो जाते हैं, तो ये धब्बे नाव अथवा आंख की जैसी आकृति के जैसे हो जाते हैं. इन धब्बों के किनारे भूरे रंग के और मध्य वाला भाग राख जैसे रंग का होता है. बाद में धब्बे आपस में मिल कर पौधे के सभी हरे भागों को ढक लेते हैं, जिस से फसल जली हुई सी प्रतीत होती है.

रोग प्रबंधन

– रोगरोधी क़िस्मों का चयन करना चाहिए.
– बीज का चयन रोगरहित फसल से करना चाहिए.
– बीज को सदैव ट्राईकोडर्मा से उपचारित कर के ही बोना चाहिए.
– फसल की कटाई के बाद खेत में रोगी पौध अवशेषों एवं ठूठों इत्यादि को एकत्र कर के नष्ट कर देना चाहिए.
– फसल में रोग नियंत्रण के लिए बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

2. जीवाणु झुलसा या झुलसा रोग : यह रोग जेंथोमोनास ओराईजी नामक जीवाणु से फैलता है. इसे साल 1908 में जापान में सब से पहले देखा गया था.

रोग की पहचान

पौधों की चोटी अवस्था से ले कर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी लग सकता है. इस रोग में पत्तियां नोंक अथवा किनारों से शुरू हो कर मध्य भाग तक सूखने लगती हैं. सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढ़ेमेढ़े या झुलसे हुए दिखाई देते हैं. इन सूखे हुए पीले पत्तों के साथसाथ राख़ के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं. संक्रमण की उग्र अवस्था में पत्ती सूख जाती है. बालियों में दाने नहीं पड़ते हैं.

रोग प्रबंधन
– शुद्ध एवं स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें.
– बीजों को बोआई से पहले 2.5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और 25 ग्राम कौपरऔक्सीक्लोराइड के घोल में 12 घंटे तक डुबोएं.
– इस रोग के लगने की अवस्था में नत्रजन का प्रयोग कम कर दें.
– जिस खेत में रोग लगा हो, उस खेत का पानी किसी दूसरे खेत में न जाने दें. साथ ही, उस खेत में सिंचाई न करें.
– रोग को और अधिक फैलने से रोकने के लिए खेत में समुचित जल निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए.

3. धान का भूरा धब्बा रोग : यह एक बीजजनित रोग है, जो हेलिमेंथो स्पोरियम ओराईजी नामक फफूंद द्वारा फैलता है. इस रोग की वजह से साल 1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया था.

रोग की पहचान

इस रोग में पत्तियों पर गहरे कत्थई रंग के गोल अथवा अंडाकार धब्बे बन जाते हैं. इन धब्बों के चारों तरफ पीला घेरा बन जाता है और मध्य भाग पीलापन लिए हुए कत्थई रंग का होता है और पत्तियां झुलस जाती हैं. दानों पर भी भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. इस रोग का आक्रमण पौध अवस्था से ले कर दाने बनने की अवस्था तक होता है.

4. शीत झुलसा या आवरण झुलसा रोग : यह एक फफूंदजनित रोग है, जिस का रोग कारक राईजोक्टोनिया सोलेनाई है. पूर्व में इस रोग को अधिक महत्व का नहीं माना जाता था. अधिक पैदावार देने वाली एवं अधिक उर्वरक उपभोग करने वाली प्रजातियों के विकास से यह रोग धान के रोगों में अपना प्रमुख स्थान रखता है, जो कि उपज में 50 फीसदी तक नुकसान कर सकता है.

रोग की पहचान

इस रोग का संक्रमण नर्सरी से ही दिखना आरंभ हो जाता है, जिस से पौधे नीचे से सड़ने लगते हैं. मुख्य खेत में ये लक्षण कल्ले बनने की अंतिम अवस्था में प्रकट होते हैं. लीफ शीथ पर जल सतह के ऊपर से धब्बे बनने शुरू होते हैं. इन धब्बों की आकृति अनियमित और किनारा गहरा भूरा व बीच का भाग हलके रंग का होता है. पत्तियों पर घेरेदार धब्बे बनते हैं. अनुकूल परिस्थितियों में कई छोटेछोटे धब्बे मिल कर बड़ा धब्बा बनाते हैं. इस के कारण शीथ, तना, ध्वजा पत्ती पूरी तरह से ग्रसित हो जाती है और पौधे मर जाते हैं.

खेतों में यह रोग अगस्त एवं सितंबर माह में अधिक तीव्र दिखता है. संक्रमित पौधों में बाली कम निकलती है और दाने भी नहीं बनते हैं.

रोग प्रबंधन
– धान की रोगरोधी प्रजातियों को चुनें.
– शुद्ध एवं स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें.
– बीजों को फफूंदनाशक से उपचारित कर के बोएं.
– मुख्य खेत एवं मेंड़ों को खरपतवार से मुक्त रखें.
– संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए.
– नाइटोजन उर्वरकों को 2 या 3 बार में देना चाहिए.
– खेतों से फसल अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए.
– फसल में रोग नियंत्रण के लिए बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

5. खैरा रोग : यह रोग जस्ता की कमी के कारण होता है. इस रोग के लगने पर पौधे की निचली पत्तियां पीली पड़नी शुरू हो जाती हैं और बाद में पत्तियों पर कत्थई रंग के अनियमित धब्बे उभरने लगते हैं. रोग की उग्र अवस्था में पौधे की पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगती हैं. कल्ले कम निकलते हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है.

रोग प्रबंधन
– धान की फसल में यह रोग न लगे, उस के लिए 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ की दर से रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय डालना चाहिए.
– रोग लगने के बाद इस की रोकथाम के लिए 2 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 1 किलोग्राम चूना 250 से 300 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ में छिड़काव करें. आवश्यकतानुसार 10 दिन के बाद फिर से स्प्रे करें.

6. आभासी कंड या ध्वज कंड या हलदी रोग : यह रोग क्लेविसेप्स ओराईजी नामक फफूंद से फैलता है. पहले यह रोग ज्यादा महत्व का नहीं माना जाता था, बल्कि इसे किसान के लिए शुभ संकेत माना जाता था. परंतु अधिक पैदावार देने वाली एवं अधिक उर्वरक उपयोग करने वाली प्रजातियों के विकास और जलवायु परिवर्तन से अब यह रोग धान के रोगों में अपना प्रमुख स्थान रखता है, जो कि संक्रमण के अनुसार उपज में 2 फीसदी से ले कर 40 फीसदी तक नुकसान करता है.

रोग की पहचान

इस रोग के लक्षण पौधों की बालियों में केवल दानों पर ही दिखाई देते हैं. रोगजनक के विकसित हो जाने के कारण बाली में कहीं कहीं बिखरे हुए दाने बड़़े मखमल के समान चिकने हरे समूह में बदल जाते हैं, जो अनियमित रूप में गोल अंडाकार होते हैं. इन का रंग बाहरी और नारंगी पीला और मध्य में लगभग सफेद होता है. इस रोग से बाली में कुछ ही दाने प्रभावित होते हैं.

रोग प्रबंधन

– सदैव बीजोपचार कर के ही बोना चाहिए.
– खेत को खरपतवारमुक्त रखना चाहिए.
– खेत की तैयारी के वक्त खेत की सफाई कर उस की गहरी जुताई कर के तेज धूप लगने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए.
– फसल में रोग नियंत्रण के लिए बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

कृषि से जुड़ी काम की बातें

धान की नर्सरी

* धान की नर्सरी डालने के लिए खेत की तैयारी करें. साथ ही, उन्नतशील किस्मों में नरेंद्र धान-359, नरेंद्र धान-2026, नरेंद्र धान-2064, नरेंद्र धान-2065, नरेंद्र धान-3112, सरजू-52, सीता आदि हैं और संकर किस्मों में एराइज-6444, प्रो. एग्रो-6201, पीएचबी-71, पायनियर-27 पी 31, 27 पी 37, 28 पी 67, आरआरएक्स-113, कावेरी-468, केआरएच-2, यूएस-312, आरएच-312, आरएच-1531 आदि हैं और सुगंधित धान की किस्म-टाइप-3, पूसा बासमती-1, मालवीय सुगंध-105, मालवीय सुगंध-3-4, नरेंद्र सुगंध एवं सीएलआर-10 आदि में से किसी एक किस्म के बीजों एवं खाद की व्यवस्था कर नर्सरी डालें.

* धान के बीजों की नर्सरी डालने के 15 दिन पूर्व खेत में हलकी सिंचाई करें, ताकि खेत में निकलने वाले खरपतवार खेत तैयार करते समय नष्ट हो जाएं.

अरहर

* अरहर की बोआई के लिए खेत को तैयार करें. बीज किसी प्रमाणित संस्था या कृषि विज्ञान केंद्र से ही खरीदें. किसानों को सलाह है कि वे बीजों को बोने से पहले अरहर के लिए उपयुक्त राईजोबियम और फास्फोरस में घुलनशील बैक्टीरिया से अवश्य उपचार कर लें.

अरहर की उन्नत किस्में

* पूसा-2001, पूसा-991, पूसा-992, पारस, मानक, यूपीएएस यानी उपास 120.

* खरीफ मक्का की बोआई के लिए खेतों की तैयारी करें, साथ ही उन्नतशील संस्तुति संकुल एवं संकर प्रजातियां-प्रकाश, वाई-1402, बायो-9681, प्रो.-316, डी-9144, दिकाल्ब-7074, पीएचबी-8144, दक्कन 115, एमएमएच-133 आदि में से किसी एक प्रजाति की बोआई के लिए खाद एवं बीज की व्यवस्था करें.

* मक्के की संकुल प्रजाति की बोआई के लिए 20-25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और संकर प्रजाति के लिए 18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई करें.

फसल सुरक्षा

* मूंग की फसल में फली बेधक कीट का प्रकोप दिखाई देने की संभावना है. अत: इस की रोकथाम के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट 5 फीसदी एसजी 220 ग्राम प्रति हेक्टेयर या डाईमेथोएट 30 फीसदी ईसी 1 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600-700 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव आसमान साफ होने पर करें.

* सब्जियों की फसलों में फल छेदक/पत्ती छेदक कीट की रोकथाम के लिए नीम औयल 1.5-2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 3-4 छिड़काव 8-10 दिन के अंतराल पर करें. सब्जियों की खड़ी फसलों में निराईगुड़ाई करें और सिंचाई का काम 8-10 दिन के अंतराल पर शाम के समय करें.

* फल मक्खी कीट की संख्या जानने और उस के नियंत्रण के लिए कार्बारिल 0.2 फीसदी+प्रोटीन हाईड्रोलाइसेट या सीरा 0.1 फीसदी अथवा मिथाइल यूजीनाल 0.1 फीसदी+मैलाथियान 0.1 फीसदी के घोल को डब्बे में डाल कर ट्रैप लगाएं.

Animalपशुपालन में बरतें सावधानी

* पशुओं को दिन के समय छायादार जगह पर बांध कर रखें. पशुशाला में बोरे का परदा डाल कर रखें और उस पर पानी का छिड़काव कर ठंडा रखें.

* पशुओं को पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में ताजा और शुद्ध पानी उपलब्ध कराएं. तेज धूप से काम कर के आए पशुओं को तुरंत पानी न पिलाएं. आधा घंटा सुस्ताने के बाद पानी दें. पशुओं को सुबह और शाम नहलाएं.

* पेट में कीड़ों से बचाव के लिए पशुओं को कृमिनाशक दवा दें. खुरपकामुंहपका रोग की रोकथाम के लिए एफएमडी वैक्सीन से और लंगडि़या बुखार की रोकथाम के लिए बीक्यू वैक्सीन से पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. पशुओं में गलघोंटू और फड़ सूजन की रोकथाम के लिए टीकाकरण कराएं. शाम के समय पशुओं के पास नीम की पत्तियों का धुआं करें, ताकि मच्छर व मक्खी भाग जाएं.

Farmingमुरगीपालन

* मुरगियों को भोजन में पूरक आहार दें. विटामिन व ऊर्जा खाद्य सामग्री इस में मिलाएं और साथ ही साथ कैल्शियम सामग्री भी मुरगियों को आहार में दें.

* पेट में कीड़ों की रोकथाम के लिए दवा दें. मुरगियों को गरमी से बचाव के लिए मुरगीघर में परदे, पंखे और वैंटिलेशन की व्यवस्था करें.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए मुरगीघर में लगे हुए जूट के परदों पर पानी के छींटे मारें, जिस से ठंडक बनी रहे.