जड़ वाली सब्जियों (Root Vegetables) की जैविक खेती

शलजम, मूली, गाजर, अरवी, चुकंदर, शकरकंद वगैरह सब्जियां हरी पत्तेदार व जड़ वाली हैं. इन सब्जियों में विटामिन ए, एस्कार्बिक अम्ल, लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम व अमीनो एसिड की अच्छी मात्रा पाई जाती है. इन चीजों की कमी में भारत की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा खासकर औरतें व बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

संतुलित आहार में प्रतिदिन इनसान को 285 ग्राम हरी पत्तेदार सब्जियां लेनी चाहिए, जिस में 100 ग्राम जड़ वाली सब्जियां, 115 ग्राम पत्तेदार सब्जियां और 75 ग्राम दूसरी सब्जियां होनी चाहिए.

इन सब्जियों को खाने से कुपोषण की समस्या नहीं होगी और शारीरिक व मानसिक कमजोरी भी दूर होगी. विभिन्न प्रकार की इन सब्जियों में पेट के विकार को दूर करने के साथसाथ खाने को पचाने की ताकत भी होती है.

इन सब्जियों के उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की उपजाऊ ताकत कम होने से उर्वरताशक्ति के साथसाथ सब्जियों की क्वालिटी और भंडारण की कूवत प्रभावित हो रही है.

इस की वजह यह है कि इन जड़ वाली सब्जियों व दूसरी खाने की चीजों को उगाने में नाइट्रोजन का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है. ज्यादा नाइट्रेट उर्वरकों के इस्तेमाल होने से मिट्टी और जमीन लगातार प्रदूषित हो रही है जो मनुष्य की सेहत के लिए हानिकारक है इसलिए कार्बनिक खादों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरताशक्ति व उत्पादन के टिकाऊपन को बढ़ाया जा सकता है.

इस के अलावा कार्बनिक खादों की कीमत कम होने के अलावा उस के उत्पाद की कीमत ज्यादा मिलती है. इन के इस्तेमाल से कम लागत पर जड़ वाली सब्जियां उगाई जा सकती हैं और सब्जियों की बेहतर क्वालिटी, ज्यादा उत्पादन व जमीन की उर्वरताशक्ति को बनाए रखा जा सकता है.

जड़ वाली सब्जियों में कार्बनिक खादों को बोआई या रोपाई के 10-15 दिन पहले इस्तेमाल करना चाहिए. कार्बनिक खाद अच्छी तरह से तैयार होनी चाहिए वरना कीट व रोग लग सकता है.

कार्बनिक खेती में जैविक उर्वरकों जैसे एजोस्पाइरिलम, एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, बायोजाइम (दानेदार व तरल), घुलनशील बनाने वाले सूक्ष्म जीव, वैस्कुलर आरवैस्कुलर कवक वगैरह को बढ़ावा दिया जाता है. इस के इस्तेमाल से क्वालिटी ज्यादा अच्छी न होने, ज्यादा उत्पादन होने के साथसाथ हानिकारक रासायनिक उर्वरकों की मात्रा में भी कटौती की जाती है.

जैविक खेती को कुदरती खेती, कार्बनिक खेती व रसायनविहीन खेती वगैरह नामों से भी जाना जाता है. इस का मकसद इस तरह से फसल उगाना है कि मिट्टी, पानी व हवा को प्रदूषित किए बगैर लंबे समय तक उत्पादन हासिल किया जा सके. इस के लिए कई जैविक स्रोतों का इस्तेमाल किया जाता है. जैसे हरी खाद या कंपोस्ट खाद, जैविक उर्वरक, दलहनी फसलों में फसल चक्र अपनाना, फसल अवशेषों का इस्तेमाल, जैविक कीटनाशक व कवकनाशी का इस्तेमाल शामिल है.

जैविक खेती के घटक

प्राथमिक स्रोत : गोबर की खाद यानी कंपोस्ट, हरी खाद, सनई, ढैंचा, लोबिया वगैरह. जैव उर्वरक राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम, पीएसबी, बायोजाइम वगैरह. केंचुए की खाद (वर्मी कंपोस्ट), मुरगी खाद, कीड़े व रोग का जैविक नियंत्रण ट्राइकोग्रामा ट्राइकोडर्मा, एनपीवी, फेरोमोन ट्रेप, नीम उत्पाद, ट्रेप फसल वगैरह.

पूरक स्रोत : वानस्पतिक अवशिष्ट जैसे खली, पुआल, भूसा व फसल अवशेष वगैरह. जानवरों के अवशिष्ट, हड्डी का चूरा, मछली की खाद वगैरह. चीनी मिल की खाद यानी प्रेसमड वगैरह.

बरतें सावधानी

* राइजोबियम जीवाणु फसल विशिष्ट होता है, इसलिए फसल में पैकेट पर लिखी मात्रा का इस्तेमाल करें.

* जैव उर्वरक के पैकेट को धूप व गरमी से दूर किसी ठंडी जगह पर रखें.

* जैव उर्वरक या जैव उर्वरक से उपचारित बीजों को किसी भी रसायन या रासायनिक खाद के साथ न मिलाएं.

* अगर बीजों पर फफूंदनाशी का इस्तेमाल करना हो तो बीजों को पहले फफूंदनाशी से उपचारित करें, फिर जैव उर्वरक से उपचारित करें.

* जैव उर्वरक का इस्तेमाल पैकेट पर लिखी अंतिम तारीख से पहले ही कर लें.

सब्जी उत्पादन में जैविक खेती का महत्त्व

* मिट्टी में ये सालभर ढकी रहती है, जिस वजह से नुकसान कम से कम होता है.

* कम जुताई की वजह से मिट्टी सख्त नहीं हो पाती है.

* जानवरों के अवशिष्ट, फसलों के अवशेषों और दूसरी संपदाओं के चलते मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है. मिट्टी में जैविक पदार्थों, अंशों की मात्रा बढ़ जाती है.

* फसल चक्र अपनाने से वैराइटी बढ़ जाती है.

* बेहतरीन प्रबंधन की तकनीकों को अपना कर पौधे को संतुलित पोषक तत्त्वों की आपूर्ति की जाती है, पर इतना ध्यान भी रखा जाता है कि पानी प्रदूषित न होने पाए.

* खेत में दालें और चारे की फसल लगाई जाती है.

* मित्र कीटों और सूक्ष्मजीवियों की तादाद बढ़ाने के लिए खेत के चारों तरफ उगे पौधों और दूसरी वनस्पतियों पर भी ध्यान दिया जाता है.

* मित्र कीटों की सुरक्षा, भोजन, आश्रय पर पूरा ध्यान दिया जाता है.

* वातावरण में रसायनों से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है.

जलवायु व मिट्टी

सब्जियों का उत्पादन वैज्ञानिक ढंग से किया जाने वाला काम है. जड़ वाली सब्जियों की अच्छी फसल ठंडी व नम जलवायु में होती है. इस के बीज का अंकुरण 10-15 सैंटीमीटर जमीनी तापमान पर होता है लेकिन छोटी, जल्दी बढ़ने वाली किस्में रेतीली दोमट मिट्टी में और बड़ी पछेती किस्में दोमट, मटियारदोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती हैं.

खेतों में जल निकास की सही व्यवस्था होनी चाहिए. उन्नतशील किस्मों के बीजों को ही बोएं. बीज विश्वसनीय संस्थान से ही खरीदें. बीज प्रमाणित, शुद्ध, अच्छी तरह जमने व रोगरहित होने चाहिए.

बीज खरीदते समय पैकेट पर पैकिंग तिथि जरूर देख लें. पैकेट पर लिखी आखिरी तारीख से पहले इस्तेमाल कर लें वरना फसल खराब हो सकती है या कीट व रोग का हमला हो सकता है. बोआई के लिए उन्नतशील किस्मों के बीज या संकर बीज सही होते हैं.

खेत की तैयारी

खेत की जुताई 3-4 बार कर मिट्टी को भुरभुरा व समतल बना लें. जुताई के पहले गोबर की सड़ी खाद व उर्वरकों को मिट्टी में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए. अच्छे जल निकास वाली जीवांशयुक्त उपजाऊ दोमट जमीन जड़ वाली सब्जियों की खेती के लिए मुफीद होती है.

खेत की अच्छी तरह जुताई कर उस में गोबर की सड़ी खाद मिलानी चाहिए. पूरे खेत को छोटीछोटी क्यारियों में बांट लेना चाहिए. क्यारी 10 मीटर लंबी, 1-1.5 मीटर चौड़ी और जमीन से 15 सैंटीमीटर ऊंची होनी चाहिए, जिस से निराईगुड़ाई में परेशानी न हो और क्यारी में भी 15-20 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद डाल दें.

ऐसे करें बोआई

जिस खेत में इन फसलों को लगाना हो, उस की अच्छी तरह से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा व समतल बना लेना चाहिए. बोआई से पहले ही लाइन बना देनी चाहिए यानी अच्छी पैदावार से बोआई करनी चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण

जड़ वाली सब्जियों की अच्छी फसल लेने के लिए खेत में नमी का होना जरूरी है. अगर बोते समय जमीन में नमी की कमी है तो पहली सिंचाई बोने के तुरंत बाद करें. दूसरी सिंचाई पहली सिंचाई के 15-20 दिन बाद करें. पूरी फसल में 3-4 सिंचाई करने की जरूरत होती है.

पहली निराईगुड़ाई बोआई के 20 से 25 दिन बाद करनी चाहिए ताकि जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे. पौधों की जड़ों पर मिट्टी भी चढ़ानी चाहिए ताकि पौधे की जड़ मिट्टी पकड़ सके.

खरपतवार नियंत्रण के लिए अंकुरण से पहले खरपतवारनाशी पेंडीमिथेलीन 1200 एमएल प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करते हैं. इस के अलावा 2 लाइनों के बीच व्हील हो का इस्तेमाल भी फायदेमंद होता है.

खाद

उत्पादन व क्वालिटी बढ़ाने के लिए 20-25 किलोग्राम बायोजाइम दानेदार और 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी खाद खेत की तैयारी के समय इस्तेमाल करें और बायोजाइम वेजीटेबल यानी तरल की 400-500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर में 3 छिड़काव 20-25 दिन के अंतराल पर करें.

जड़ वाली सब्जियों (Root Vegetables)

कीट व रोग नियंत्रण

किसान 200 ग्राम ट्राइकोडर्मा को 100 किलोग्राम सड़ी व नम गोबर की खाद या कंपोस्ट में अच्छी तरह से मिला लें और उसे 1-2 दिनों तक के लिए छाया में पौलीथिन से ढक कर रखें. इस से ट्राइकोडर्मा में मिली कंपोस्ट को फैला कर 6 इंच मोटी परत बना लें और उस पर बीज बोएं.

इस विधि से पौधे की बढ़वार भी अच्छी होती है और उस में आर्द्रगलन या पौध गलन रोग का हमला भी नहीं होता.

बोआई का समय

बोने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी कर लें. खेत की तैयारी के समय मिलने वाली व्हाइट ग्रब व कट वर्म की सूंडि़यों को इकट्ठा कर नष्ट करें. बीजों को बोने से पहले ट्राइकोडर्मा की 250 ग्राम मात्रा 10 लिटर पानी में मिला कर पौधों की जड़ों को 10 मिनट के लिए घोल में उपचारित करें.

फसलों में नुकसान पहुंचाने वाली सभी मिट्टी से संबंधित बीमारियों के नियंत्रण के लिए 1-2 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 500 किलोग्राम नम गोबर की खाद कंपोस्ट में अच्छी तरह मिला लें और 1-2 दिन के लिए छाया में पौलीथिन से ढक दें.

बोआई से पहले ट्राइकोडर्मा और कंपोस्ट के इस मिश्रण को एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में छिड़काव कर दें या फैला दें.

ध्यान दें कि कंपोस्ट के छिड़काव के बाद मिट्टी में समुचित नमी बनी रहे. व्हाइट बटरफ्लाई पीले रंग के अंडे समूहों में देती है. व्हाइट कैटरपिलर के प्रौढ़ भी अपने अंडे समूह में देते हैं जो भूरे रंग की रोएंदार संरचना से ढके रहते हैं.

इन कीटों की सूंडि़यां भी शुरू की अवस्था में समूह में रहती हैं इसलिए किसानों को फसल की निगरानी के समय मिलने वाले अंडों और सूंडि़यों के समूहों को पत्तियों के साथ तोड़ कर नष्ट कर दें. इस से इन कीटों का प्रकोप कम हो जाता है.

फसल की निगरानी के समय अगर काला धब्बा और काला सड़न रोग दिखाई दे तो शुरू की अवस्था में ही ऐसी पत्तियों को तोड़ कर नष्ट कर दें. इस से इन रोगों का प्रकोप कम हो जाता है.

अगर फसल में काला सड़न रोग लगने की आशंका हो तो स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 1 ग्राम और कौपर औक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लिटर पानी में मिला कर पौधों की जड़ों में डालें.

फसल की निगरानी के समय यदि जड़ गलन और मृदु रोमिल आसिता में से किसी भी रोग के प्रकोप से नुकसान होने का डर हो तो ट्राइकोडर्मा की 2-3 ग्राम प्रति लिटर पानी में मिला कर फसल पर या जड़ के पास छिड़काव करें. जरूरत पड़ने पर दूसरा छिड़काव 7-10 दिनों के बाद करें.

अगर माहू कीट (एफिड) का हमला हो तो क्राइसोपरला (परभक्षी कीट) को लार्वा अवस्था में बुरादे के साथ मिला कर फसलों में 50,000 प्रति हेक्टेयर की दर से 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार इस्तेमाल करें.

यदि फसल निगरानी के समय लीफ वेबर, डायमंड बैक माथ, व्हाइट बटरफ्लाई, एफिड, कैबेज बोरर, कैबेज सेमीलूपर या तंबाकू की सूंड़ी में से किसी भी कीट का हमला दिखाई दे तो बेसीलम थूरिनजिएंसिस पर आधारित जैविक कीटनाशकों जैसे हाल्ट, बायोलेप वगैरह में से किसी एक का 2 ग्राम मात्रा का प्रति लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

यदि जैविक कीटनाशक के छिड़काव के बाद भी पत्ती खाने वाले कीटों और माहू में से किसी का प्रकोप हो तो जैविक कीटनाशक का दोबारा छिड़काव 10-12 दिनों बाद नीम पर आधारित कीटनाशकों जैसे निंबीसिडीन, बायोनीम वगैरह में से किसी एक का 5 मिलीलिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

किसी भी प्रकाशस्रोत के नीचे चौड़े मुंह वाले किसी बरतन या टब वगैरह में मिट्टी का तेल मिला हुआ पानी रख देना चाहिए, जिस से प्रकाश की ओर आकर्षित हो कर गुबरैले यानी सड़े गोबर में लगने वाला कीड़ा जमीन पर रखे बरतन में गिर कर नष्ट हो जाएं.

रात के समय खेतों में फसल अवशेषों को जला कर भी गुबरैलों को आकर्षित किया जा सकता है. जलते हुए फसल अवशेषों को ढेर के पास भी चौड़े मुंह के बरतन में मिट्टी का तेल मिला कर पानी रखना चाहिए. इस से आग के प्रकाश की ओर आकर्षित होने वाले गुबरैले बरतन में गिर कर नष्ट हो जाएं. खेतों में पड़े पुराने ठूंठों और जड़ों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें. इस से कीट का हमला कम हो जाता है.

इस तरह जैविक विधि से जड़ वाली सब्जियों की खेती किसानों के लिए अच्छे उत्पादन के साथसाथ मिट्टी की उत्पादकता व उर्वराशक्ति को बढ़ाने में मददगार है.

तुलसी की खेती (Basil Cultivation)

तुलसी एक औषधीय पौधा है, जिस का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं, तेल वगैरह में होता है. घरेलू तौर पर भी तुलसी का काफी इस्तेमाल किया जाता है.

जलवायु : तुलसी को हर तरह की जलवायु में पैदा किया जा सकता है. उत्तर भारत के मैदानी भागों में तुलसी को गरमी के दिनों में उगाया जा सकता है.

तुलसी की खेती के लिए दोमट और बलुई मिट्टी जिस में पानी सोखने की कूवत अच्छी हो, सही मानी जाती है. अधिक रेतीली और भारी दोमट मिट्टी इस के लिए ठीक नहीं है.

खेत की तैयारी : खेत को मिट्टी पलटने वाले हल से या कल्टीवेटर से जोत कर तैयार करें. गोबर की सड़ीगली खाद अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें और मईजून के महीने में तुलसी की पौध को खेत में रोप दें.

नर्सरी की तैयारी : मैदानी इलाकों में अप्रैलमई के महीने में नर्सरी तैयार करने के लिए तकरीबन 1 मीटर चौड़ी और 4 मीटर लंबी क्यारियां बनाएं जो थोड़ी ऊंचाई पर हों. हर क्यारी में गोबर की सड़ी हुई खाद मिलाएं. इस के बाद तुलसी का बीज लें. उस में थोड़ा रेत भी मिला लें क्योंकि तुलसी का बीज काफी हलका होता है जो क्यारी में बिखेरने पर उड़ सकता है.

1 एकड़ में रोपाई के लिए 200 से 250 ग्राम बीज काफी रहता है. बीज बोने के बाद नर्सरी को पुआल से ढक दें और उस की सिंचाई करें. तुलसी का बीज तकरीबन 5 से 10 दिनों में जम जाता है. बीज अंकुरित होने के बाद क्यारी से पुआल को हटा दें.

ज्यादा गरमी के दिनों में क्यारी में हलका पानी दोनों समय लगाएं और जब पौधा 10-15 सैंटीमीटर ऊंचा हो जाए तो उसे ध्यान से उखाड़ कर खेत में रोप दें.

रोपाई : नर्सरी से पौध को निकालने के बाद गीले बोरे से ढक कर रखें, जिस से नमी बनी रहे और पौधे मुरझा न पाएं. जब पौध की रोपाई करनी हो तो कोशिश करें कि उसी समय नर्सरी से पौध को उखाड़ें.

पौधों की रोपाई शाम के समय करनी चाहिए. पौधों की लाइन से लाइन की दूरी 45 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 सैंटीमीटर रखें. पौधे की रोपाई करने के तुरंत बाद खेत की सिंचाई करें जिस से पौधे की जड़ों को जमने में आसानी हो.

उर्वरक : अधिक पैदावार के लिए 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 16 किलोग्राम फास्फोरस, 16 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ के हिसाब से काफी है. अंतिम जुताई के समय 8 किलोग्राम नाइट्रोजन और बाकी दूसरे उर्वरकों की पूरी मात्रा मिट्टी में मिला दें. रोपाई के तकरीबन 20-25 दिन बाद 8 किलोग्राम नाइट्रोजन डालें. उस के बाद बाकी बचे हुए नाइट्रोजन को पहली कटाई के तुरंत बाद डालें.

सिंचाई और निराईगुड़ाई : 10-12 दिन के फासले पर खेत की सिंचाई करते रहें और ज्यादा बारिश हो तो खेत में पानी न रुकने दें. निराईगुड़ाई का भी ध्यान रखें.

पहली निराईगुड़ाई फसल बोने के 20-25 दिन बाद और दूसरी 40-45 दिन बाद करें.

तुलसी के खास कीट

तुलसी में भी कीटों व रोगों का प्रकोप हो सकता है. जैसे तुलसी का पर्ण बेलक, रोमयुक्त सूंड़ी. इस के अलावा झुलसा, पत्तियों का झुलसा, उकटा जैसे रोग भी फसल को खराब कर सकते हैं. इन की रोकथाम भी जरूरी है. इस के लिए खराब फसल का नमूना दिखा कर अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या किसी कृषि विशेषज्ञ से सलाह ले कर समय पर उस का निदान करें.

तुलसी या किसी आयुर्वेदिक पौधों की खेती करने से पहले बेहतर होगा कि आप उस के बारे में अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से जानकारी लें. इस के बाद ही खेती करें, जिस से वह आप के इलाके के हिसाब से आप को सही जानकारी मिल सके. साथ ही, इस उत्पाद को बेचने की जानकारी ले लें. इस से फसल पैदावार मिलने के बाद उसे आसानी से बेच कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सके. हालांकि आजकल अनेक आयुर्वेदिक कंपनियां हैं जो किसानों से सीधा माल खरीदती हैं और बाजार में उतारती हैं.

तुलसी की कटाई : तुलसी की फसल तकरीबन 3 महीने में तैयार हो जाती है. तुलसी की साल में 3 कटाई ली जा सकती हैं. पौधों की पत्तियां जब पीली पड़ने लगें तभी फसल की कटाई करें और अंतिम कटाई के समय पूरे पौधे को काट सकते हैं. उस का तेल भी निकलवा सकते हैं. हरे पौधों में तेल की मात्रा तकरीबन 0.4 से 0.5 फीसदी होती है और पहले साल तकरीबन 50 से 60 लिटर तेल प्रति एकड़ हासिल किया जा सकता है. बाद में तेल की मात्रा बढ़ कर 80 से 100 लिटर प्रति एकड़ तक बढ़ सकती है.

आलू की खेती (Potato Cultivation) और किस्म ‘कुफरी मोहन’

आलू की एक किस्म केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला, हिमाचल प्रदेश ने ईजाद की है, जिसे ‘कुफरी मोहन’ नाम दिया गया है. यह मध्यम अवधि वाली यानी 90 दिन में उगने वाली किस्म है. इस किस्म के कंद देखने में सफेद क्रीम रंग के, अंडाकार व एकरूपता लिए होते हैं.

यह किस्म पछेती अंगमारी यानी लेट ब्लाइट की प्रतिरोधी है. यह किस्म उत्तरी व पूर्वी मैदानों में उगाने के लिए सही पाई गई है. उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में ‘कुफरी बहार’ और पूर्व मैदानी इलाकों में ‘कुफरी ज्योति’ की तुलना में यह किस्म ज्यादा उपज देती है.

साल 2017-18 में इस किस्म को सिंधुगंगा केमैदानी इलाकों में कारोबारी खेती करने के लिए सिफारिश की गई है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 क्विंटल तक उपज दे देती है.

ऐसी हो जलवायु

आलू के सफल उत्पादन के लिए ठंडी जलवायु की जरूरत होती है. आलू की ज्यादा पैदावार लेने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है, क्योंकि 20 डिगरी सैल्सियस से ज्यादा तापमान पर कंदों का बनना रुक जाता है.

कम तापमान, मध्यम प्रकाश अवधि के दिनों और नाइट्रोजन की कमी वाली अवस्था में कंद की प्रक्रिया जल्दी शुरू हो जाती है. आलू की फसल पर पाले का बुरा असर पड़ता है.

चुनें सही जमीन

वैसे तो आलू को तमाम तरह की जमीनों में उगाया जा सकता है, पर इस की उच्च गुणवत्ता वाली ज्यादा पैदावार लेने के लिए सही जलनिकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली दोमट जमीन अच्छी मानी गई है. जैसेजैसे जमीन के पीएच मान में बढ़ोतरी होती जाती है, वैसेवैसे ही पैदावार में कमी होती जाती है.

खेत की तैयारी

आलू के कंदों की बढ़वार जमीन के अंदर होती है इसलिए खेत की तैयारी का विशेष ध्यान देना होता है, जबकि ज्यादातर आलू उत्पादक इस ओर सही ध्यान नहीं देते हैं. इस के चलते उन्हें आलू की कम पैदावार मिलती है.

आलू के खेत की तैयारी बड़ी सावधानी से करनी चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद दूसरीतीसरी जुताई हैरो या देशी हल से आरपार करें. आखिरी जुताई के बाद पाटा जरूर लगाएं ताकि मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाए और नमी बरकरार रहे.

मिट्टी का उपचार

एक हेक्टेयर खेत के लिए 25 किलोग्राम ऐश्वर्या जैविक खाद में 2.5 किलोग्राम प्रोटैक्टर (ट्राइकोडर्मा विरडी) मिला कर छाया में 2-3 दिन तक रखने के बाद मिट्टी में मिला कर जुताई कर दें. ऐसा करने पर आलू की पैदावार में बढ़ोतरी हो जाती है.

खाद और उर्वरक

आलू की भरपूर पैदावार लेने के लिए मिट्टी जांच बहुत ही जरूरी है, पर आलू उत्पादक इस ओर ध्यान नहीं देते हैं इसलिए मिट्टी जांच के बाद ही खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

अगर किसी कारणवश मिट्टी का उपचार न हो सके तो ऐसी हालत में कृषि विभाग द्वारा सिफारिश की गई मात्रा में खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय कूंड़ों में डालें. नाइट्रोजन की आधी बची मात्रा को बोआईर् के 25-30 दिन बाद डालें.

खेत की तैयारी के समय 15-20 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए.

बोआई का सही समय

आलू की बोआई का सही समय उस की किस्म व जलवायु पर निर्भर करती है. उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में आलू की मुख्य फसल की बोआई का सही समय सितंबर से नवंबर तक माना जाता है. लेकिन आलू की बोआई दिसंबर तक की जाती है.

बीज की मात्रा

आलू के कंदों की प्रति हेक्टेयर मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे कंदों का आकार, पंक्ति से पंक्ति की दूरी, पौधों की आपसी दूरी वगैरह.

आमतौर पर आलू की एक हेक्टेयर फसल बोने के लिए 15-20 क्विंटल कंद काफी हैं. आलू के कंदों का वजन 30-40 ग्राम होना चाहिए.

बीजोपचार

आलू की फसल को रोगों से बचाने के लिए कंदों को बोआई से पहले कार्बंडाजिम नामक दवा (1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का घोल बना कर आधा घंटे तक डुबो कर रखें.

बीजोपचार के बाद कंदों को 3 फीसदी बोरिक एसिड (300 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी) के घोल से उपचारित करें. एक बार बनाए गए घोल का 3 बार इस्तेमाल करें. इस के बाद दूसरा घोल बनाएं.

बीजोपचार के बाद कंदों को छाया में सुखा कर बोएं.

बोने की विधियां

भारत में आलू के कंदों को बोने के लिए कई विधियों का इस्तेमाल किया जाता है जो जमीन की किस्म, खेत में नमी, मजदूर और कृषि यंत्रों पर निर्भर करती है.

किसान आलू के कंदों को बोने के लिए निम्न विधियों का इस्तेमाल करते हैं:

समतल जमीन में आलू बोना : इस विधि में खेत भलीभांति तैयार कर रस्सी की मदद से सीधी कतारें बना ली जाती हैं और आपसी दूरी 50-60 सैंटीमीटर रखी जाती है. कतारों में 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर कंद बो दिए जाते हैं. इन्हीं कतारों पर हैंड हो की मदद से उथले कूंड़ बना कर इन कूंड़ों में कंद बोने के बाद मिट्टी डाल कर खेत को समतल कर दिया जाता है.

मेंड़ों पर आलू के कंद बोना : खेत को तैयार करने के बाद 50-60 सैंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ों को बनाया जाता है. उस के बाद 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर 4-5 सैंटीमीटर की गहराई पर कंद बो दिए जाते हैं.

आलू बोने के बाद मिट्टी चढ़ाना : इस विधि में 50-60 सैंटीमीटर की दूरी पर कतारें खींच ली जाती हैं. इस के बाद इन कतारों में 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर आलू के कंद रख दिए जाते हैं. इस के बाद फावड़े की मदद से इन कंदों को ढक दिया जाता है.

नोट : बोने के लिए पूरे कंदों का ही इस्तेमाल करें क्योंकि कटे हुए कंदों में फफूंदीजनित रोगों के लगने का डर रहता है. किसी कारणवश बोने के लिए बड़े कंदों का इस्तेमाल करना पड़े तो पौधे से पौधे की दूरी 30 सैंटीमीटर कर देनी चाहिए.

सिंचाई और जल निकास : आलू उत्पादन में सिंचाई एक महत्त्वपूर्ण काम है. इस ओर सही ध्यान देना जरूरी है.

* आलू के कंदों को हमेशा पलेवा कर के ही बोएं.

* पहली सिंचाई आलू के कंद बोने के 25 दिन बाद करनी चाहिए.

* अगर जमीन में नमी की कमी हो तो सिंचाई पहले भी की जा सकती है.

* पहली सिंचाई हलकी करनी चाहिए और बाद की सिंचाइयां गहरी करनी चाहिए, पर इस बात का ध्यान रखें कि मेंड़ें पूरी तरह से न डूबें.

* 15-20 दिन के बाद फिर सिंचाई करनी चाहिए.

* हलकी जमीन में 6-10 और भारी जमीन में 3-4 सिंचाइयों की जरूरत होती है.

* अगर किसी कारणवश आलू के खेत में पानी जमा हो जाए तो उसे निकालने का इंतजाम करें वरना फसल पीली पड़ कर खराब हो जाती है.

आलू की खेती (Potato Cultivation)

पौध संरक्षण उपाय

खरपतवार नियंत्रण : आलू की फसल के साथ तमाम तरह के खरपतवार उग आते हैं जो फसल के साथ पोषक तत्त्वों, नमी, धूप, स्थान वगैरह के लिए होड़ करते हैं. इस के अलावा कीड़ों व रोगों के लगने की आशंका भी बनी रहती है. इस के चलते फसल के विकास, बढ़ोतरी और उत्पादन पर उलटा असर पड़ता है.

आलू के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए निराईगुड़ाई की जाती है, जबकि उन के जल्दी नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है.

कीटों पर नियंत्रण

माहू : यह कीट हरे या काले रंग का होता है जो 2 मिलीमीटर लंबा होता है. यह कीट पत्तियों और शाखाओं को चूसता है. इस कीट का ज्यादा प्रकोप होने पर पत्तियां नीचे की ओर मुड़ जाती हैं. इस के पंखदार कीट विषाणु रोग फैलाने में सहायक होते हैं.

इस कीट के नियंत्रण के लिए फोरेट 10जी नामक दवा प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई करते समय कूंड़ों में डालें.

हरा तेला : इस कीट के निम्फ और प्रौढ़ दोनों ही पौधों के कोमल अंगों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं. इस वजह से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों के किनारे जल जाते हैं.

इस कीट के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटाफास का 0.3 फीसदी घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

एपीलेकना कीट : यह कीट सफेद या सलेटी रंग का होता है. इस का शरीर मुड़ा हुआ व सिर भूरे रंग का होता है. यह कीट जमीन के अंदर रहता है जो पौधों की जड़ों को खाता है.

इस के अलावा यह कीट आलू के कंदों में उथले गोलाकार छेद बना देता है जिस के चलते कंदों के बाजार भाव पर बुरा असर पड़ता है.

इस कीट के नियंत्रण के लिए खेत की तैयारी के समय 30 किलोग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला देना चाहिए.

रोग नियंत्रण

अगेता झुलसा : यह रोग आल्टरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंदी की वजह से होता है. नीचे की पत्तियां सब से पहले रोग का शिकार होती हैं. वहां से यह रोग ऊपर की ओर बढ़ता है. इस के चलते पत्तियों पर जहांतहां छोटेछोटे धब्बे उभर आते हैं जो बाद में भूरे या काले रंग के हो जाते हैं. नीचे की पत्तियां सूख कर गिरने लगती हैं. यह रोग कंद बनने से पहले लगता है.

इस रोग के नियंत्रण के लिए ‘डायथेन जैड 78’ 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पत्तों पर छिड़काव करना चाहिए. यदि जरूरत हो तो 15 दिन के बाद दोबारा छिड़काव करना चाहिए.

शुष्क विगलन : यह रोग फ्यूजेरियम केरूलियम नामक फफूंदी के चलते फैलता है. यह रोग भंडारण के समय होता है. रोग की शुरुआती अवस्था में कंदों पर छोटेछोटे भूरे रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं, जो बाद में बढ़ कर चिपके दिखाई देते हैं. छिलका सिकुड़ जाता है.

अगर कंदों को बीज के लिए इस्तेमाल में लाना हो तो उन्हें ऐगालोल 3 (0.3 फीसदी) घोल से 10 मिनट तक उपचारित कर के बोएं.

भूरा विगलन : यह रोग स्यूडोमोनास सोलानेसियम नामक फफूंदी द्वारा फैलता है. नतीजतन, सारा पौधा मुरझा कर गिर जाता है. कंद काटने पर भूरे दिखाई देते हैं.

रोगरहित कंदों को बोने से इस रोग से छुटकारा पाया जा सकता है.

सामान्य स्कैब : यह रोग स्टेप्टोमाइसिन स्कैबीज नामक जीवाणु की वजह से फैलता है. इस रोग के कारण कंदों पर 3 मिलीमीटर गहरे और 1 सैंटीमीटर से कम व्यास के धब्बे दिखाई पड़ते हैं.

बोआई से पहले कंदों को 3 फीसदी बोरिक एसिड से आधा घंटे तक उपचारित करना चाहिए. लंबा फसल चक्र अपनाएं. बोआई के लिए सेहतमंद कंदों का इस्तेमाल करना चाहिए.

कब करें खुदाई

जब आलू के पौधे की पत्तियां सूखने लगें तब उन की खुदाई करने के 2 हफ्ते पहले पौधों की शाखाओं को सतह से काट देना चाहिए. इस तकनीक को अपनाने से कंदों की त्वचा कठोर हो जाती है और खुदाई के समय कंदों की त्वचा उतरने की आशंका नहीं रहती है.

आलू की खुदाई खुरपी, फावड़ा या पोटैटो डिगर से की जाती है.

उपज

आलू की उपज कई बातों पर निर्भर करती है. इन में मिट्टी की किस्म, जलवायु, उगाई जाने वाली किस्में और फसल सुरक्षा खास हैं.

यदि इस नई किस्म ‘कुफरी मोहन’ को सही तरीके से बोया जाए तो प्रति हेक्टेयर 40 क्विंटल तक उपज हासिल हो सकती है.

आलू को बोते समय इन बातों का रखें ध्यान

जब पौधे 15-20 सैंटीमीटर ऊंचे हो जाएं तब उन पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए ताकि सभी कंद जमीन में ही दबे रहें. आलू पर मिट्टी चढ़ाने का दूसरा फायदा यह होता है कि कंदों में सोलेनिन नामक जहरीला पदार्थ नहीं होता है.

मिट्टी चढ़ाने का काम निराईगुड़ाई करते समय ही कर देना चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी आधी बची मात्रा भी इसी समय देनी चाहिए.

औषधीय फसल सतावर (Medicinal Crop Satavar) की उन्नत खेती

तकरीबन पिछले एक दशक में औषधीय पौधों की कारोबारी खेती की ओर देश के किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है. विभिन्न राज्यों में अनेकों प्रगतिशील किसानों ने इन फसलों की खेती में कामयाबी पाई है, जिस से प्रेरित हो कर बड़ी तादाद में किसान इन फसलों की खेती की नई तकनीक, इन के बीज, रोपण सामग्री, इन के बाजार व इन से हासिल फायदे वगैरह के बारे में जानकारी लेने के लिए लगातार कोशिश में रहते हैं.

क्षेत्र विशेष के लिए किस औषधीय फसल को चुना जाए, इस की खेती में आने वाली दिक्कतों, परंपरागत फसलों की अपेक्षा इन फसलों को अपनाने की वजह व अपेक्षाकृत ज्यादा फायदा वगैरह ऐसे पहलू हैं जिन के बारे में किसान लगातार जानकारी चाहते रहते हैं.

सतावर जो न केवल एक महत्त्वपूर्ण औषधीय फसल है, बल्कि इस की खेती आसान व कम जोखिम भरी है. सतावर की खेती के बारे में जरूरी जानकारी इस प्रकार है:

पौधे का ब्योरा : सतावर लिलिएसी कुल का आरोही पौधा है. इस की सालभर तक उपज ली जा सकती है. आमतौर पर 3 से 5 फुट लंबाई वाले इस पौधे की शाखाएं पतली और पत्तियां बारीक सूई की तरह होती हैं. इस की कंदीय जड़ें गुच्छों में 15-40 सैंटीमीटर तक लंबी और भूरी व सफेद रंग की होती हैं. इस के फूल सफेद व गुच्छों में लगते हैं.

सतावर के फल छोटेछोटे गोल व पकने पर लाल हो जाते हैं. इन के पकने पर काले रंग के बीज बनते हैं. औषधीय फसल के साथसाथ इसे सजावटी पौधों की तरह गमलों व बगीचों की क्यारियों में भी लगाया जाता है.

औषधीय महत्त्व : सतावर की सूखी जड़ों का इस्तेमाल कई तरह के रोगों को दूर करने के लिए किया जाता है. ये पुष्टिदायक, बलकारक, माताओं में दूध बढ़ाने वाली, आंखों के लिए हितकारी, शुक्रवर्धक, शीतवीर्य, मेघाकारक, अतिसार, वात, पित्तरक्त व शोध दूर करने वाली होती हैं. इन से बलवर्धक टौनिक, सैक्स टौनिक, ल्यूकोरिया व एनीमिया के उपचार व दिमागी तनाव को दूर करने के लिए कई तरह की दवाएं बनाई जाती हैं.

रासायनिक संघटन : सतावर की जड़ों व पौधों के दूसरे भागों में 100 से भी ज्यादा कार्बनिक और अकार्बनिक योगिक तत्त्व पाए जाते हैं.

कार्बनिक समूह के उपसमूह सैपोनिन चिकित्सीय गुणों के कारण महत्त्वपूर्ण हैं. इस में पाए जाने वाले सतावरिन, एलेनाइन, कोनिफेरिन, आर्जीनीन सार्सपोजिनि, अनेक शर्करा व वसीय अम्ल महत्त्वपूर्ण योगिक हैं.

जलवायु और जमीन : सतावर की खेती के लिए उष्ण आर्द्र जलवायु उत्तम रहती है. सतावर के पौधे समुद्रतल से 1200 मीटर की ऊंचाई तक बहुतायत में मिलते हैं.

मैदानी क्षेत्रों में इस की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है. इस के लिए अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 7-8 के बीच हो, सही रहती है.

खेती की तैयारी : जून महीने में 1 गहरी जुताई कर 2-3 बार दोबारा जुताई व पाटा लगा कर खेत को समतल कर लें और आखिरी जुताई के समय खेत में 200 से 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद मिला दें. वर्मी कंपोस्ट या नाडेप कंपोस्ट का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

बीज और पौध की उपलब्धता : सतावर के बीज और पौधे सीमैप, लखनऊ, कृषि विश्वविद्यालयों के हर्बल गार्डन, एनवीपीजीआर, पूसा, नई दिल्ली या क्षेत्रीय प्रगतिशील किसानों या हर्बल नर्सरियों से हासिल किए जा सकते हैं.

प्रवर्धन : सतावर के पौधे तैयार करने के लिए बीज और पुरानी फसल के मुख्य तने के पास से अंकुरित नए पौधों का इस्तेमाल किया जाता है. आमतौर पर बीजों का अनुकरण 40 फीसदी से ज्यादा नहीं होता. इस तरह 1 एकड़ के लिए तकरीबन 5 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

बीजों को मईजून में उठी हुई क्यारियों या पौलीथिन की थैलियों में बोया जाना चाहिए. पौधे रोपने का सही समय बरसात का मौसम है.

वैसे, सिंचाई सुविधा होने पर जून में भी इस की रोपाई की जा सकती है. रोपाई 60 सैंटीमीटर की दूरी पर बनी मेंड़ों पर करनी चाहिए. पौधे से पौधे की दूरी जमीन की उर्वरता के अनुसार 45 से 60 सैंटीमीटर रखनी चाहिए.

सिंचाई और खरपतवार पर नियंत्रण : पौध रोपने के तुरंत बाद हलकी सिंचाई जरूर करें. बारिश शुरू होने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि ज्यादा व लगातार बारिश होने पर पानी के निकलने का सही इंतजाम होना चाहिए.

पौध रोपने के बाद की गई सिंचाई के चलते खरपतवार तेजी से उगते हैं इसलिए रोपने के 20-25 दिन बाद एक निराई जरूरी है. बाद में खरपतवार समयसमय पर निकालते रहें. गरमियों में 10-15 दिन में और सर्दियों में एक माह पर पानी लगाना सही रहता है.

कीट और बीमारियां : सतावर की फसल में ग्राह हापर, जड़ गलन व रूटनाट निमेटोड का हमला हो सकता है. जड़ गलन के लिए पानी के निकास का सही प्रबंध करें और स्वस्थ पौध का रोपण करें.

जमीन को ट्राइकोडर्मा से भी उपचारित किया जा सकता है. ग्राह हापर के लिए खेत में सफाई रखें.

ज्यादा प्रकोप होने पर ही कीटनाशी का इस्तेमाल करें. रूटनाट निमेटोड के लिए नीम की खली व निमेटिसाइड का इस्तेमाल करना चाहिए. जड़ सड़न व निमेटोड की समस्या होने पर अगली फसल के लिए नए खेत का चयन करें.

औषधीय फसल सतावर (Medicinal Crop Satavar)

जड़ों की खुदाई : जड़ों की खुदाई डेढ़ से 3 साल के बाद की जा सकती है. आमतौर पर रोपने के डेढ़ साल बाद जब पौधा पीला पड़ने लगे तब जड़ें खुदाई लायक हो जाती हैं. फसल को ज्यादा समय तक जमीन में रखने से उपज में बढ़वार कम हो जाती है और जड़ों में अधिक रेशे होने के कारण क्वालिटी भी प्रभावित हो जाती है.

खुदाई के समय मिट्टी ज्यादा सख्त नहीं होनी चाहिए. जड़ों को सावधानी से खोदना चाहिए. साथ ही, अगली फसल के लिए डिस्क भी अलग कर लेनी चाहिए.

खोदने के तुरंत बाद जड़ों की मिट्टी साफ कर छिलाई करने के बाद छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर व सुखा कर बाजार में भेजना चाहिए. सूखी जड़ों को सामान्य हालत में भी काफी समय तक रखा जा सकता है.

उपज  : सतावर की अच्छी फसल से तकरीबन 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी जड़ें आसानी से हासिल की जा सकती हैं.

इन का विक्रय मूल्य 1500 रुपए प्रति क्विंटल हासिल हो जाने पर 50,000 से 75,000 रुपए तक का खालिस मुनाफा लिया जा सकता है.

शुद्ध लाभ बाजार मूल्य व जड़ों की क्वालिटी से प्रभावित होता है इसलिए इस में उतारचढ़ाव होने की संभावना ज्यादा रहती है. लिहाजा, फसल को बड़े पैमाने पर उगाने से पहले बाजार का सर्वे करना जरूरी है.

जड़ों की बिक्री के लिए विभिन्न प्रदेशों में अनेक प्राइवेट कंपनियां सक्रिय हैं. उत्तर भारत में दिल्ली की खारी बावली बाजार में बड़े पैमाने पर इस की खरीदफरोख्त की जाती है.

मूंगफली की थ्रैशर (Thresher) से करें गहाई

मूंगफली की फसल पकने के बाद उस की खुदाई कर ली जाती है. बाद में मूंगफली को पौधों की जड़ों से अलग करने के लिए उन्हें हाथ से तोड़ा जाता है या मूंगफली थ्रैशर के द्वारा अलग की जाती है. हाथ से तोड़ने के अलावा मूंगफली को अलग करने के लिए कुछ दूसरे तरीके भी अपनाए जाते हैं.

मूंगफली हाथ से तोड़ने में काफी समय भी लग जाता है. छोटे क्षेत्रफल के लिए तो यह ठीक है लेकिन देश में कई ऐसे इलाके हैं जहां मूंगफली की ज्यादा पैदावार ली जाती है. ऐसी जगह के लिए मूंगफली की गहाई के लिए मूंगफली थ्रैशर ही अच्छा जरीया है.

मूंगफली में खुदाई के बाद फसल को हवा लगने यानी सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस के बाद दूसरे अनाजों की तरह ही मूंगफली की थ्रैशर से गहाई की जाती है. इस में मूंगफली पौधों से झड़ कर अलग हो जाती हैं जो मशीन में नीचे लगी छानने वाली ट्रे में गिरती रहती हैं और मशीन के दूसरी तरफ से उस के अवशेष निकलते रहते हैं.

थ्रैशर से गहाई करने पर मूंगफली का दाना भूसे में भी नहीं जाता और मूंगफली साफ निकलती है. मूंगफली गहाई का थ्रैशर गेहूं के थ्रैशर से थोड़ा अलग हट कर होता है.

मूंगफली थ्रैशर से दूसरी फसलें जैसे मूंग, मोठ, मसूर, धनिया की भी गहाई की जाती है. पंजाब की गिल एग्रो इंडस्ट्रीज इस तरह का थ्रैशर बनाती है. कंपनी का कहना है कि उन के इस थ्रैशर की राजस्थान में बहुत मांग है. यह थ्रैशर उम्दा तकनीक से भारतीय मानकों के हिसाब से बनाया गया है. दूसरे थ्रैशरों के मुकाबले इस में लगे भारी फ्लाईह्वील के चलते यह थ्रैशर लोड नहीं लेता है और डीजल भी कम खर्च होता है. साथ ही, इस के अच्छे नतीजे भी मिले हैं. यह भारत सरकार से मान्यताप्राप्त थ्रैशर है.

अधिक जानकारी के लिए गिल एग्रो कंपनी के फोन नंबर 09417066252 या 09317100008 पर बात कर के अधिक जानकारी ले सकते हैं.

इस के अलावा महाराष्ट्र की गणेश एग्रो इक्विपमैंट्स कंपनी ‘गणेश राज’ नाम से थ्रैशर बनाती है. उन के टोल फ्री नंबर 18001200313  या 91-2764-273442/ 267446 पर भी जानकारी ली जा सकती है.

बिना तेल गाजर का अचार (Carrot Pickle)

किसी भी फसल से किसानों को तभी फायदा होगा जब उस का इस्तेमाल लंबे समय तक हो सकेगा. फसल के समय उस की कीमत घट जाती है. ऐसे में अगर किसी फसल का कुछ ऐसा इस्तेमाल हो सके जो बाद में काम दे तो उस की खेती मुनाफा देगी.

गाजर का इस्तेमाल सब्जी से ले कर सलाद और जूस तक में होता है. गाजर के गुणों के चलते ही इस को सब्जी, फल, सलाद, जूस और हलवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

गाजर अकेली ऐसी फसल है जिस का इस्तेमाल कई तरह से हो सकता है. ऐसे में अगर किसान गाजर की खेती करें और गाजर से जुड़े इन कारोबारों को करें तो उन का मुनाफा बढ़ सकता है. गाजर का इस्तेमाल अचार के रूप में खूब किया जा रहा है. इस की वजह से गाजर की खेती बढ़ रही है.

गाजर का अचार भी 2 तरह से बनता है. अगर अचार को लंबे समय तक रखना है तो उस में तेल का इस्तेमाल किया जाता है. जिन लोगों को तेल से दिक्कत होगी है, वे बिना तेल वाला गाजर का अचार खाना ज्यादा पसंद करते हैं.

गुणों से भरपूर गाजर का अचार बिना तेल के भी बनाया व खाया जा सकता है. यह सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाता और स्वाद में भी अच्छा लगता है. इस को बनाना बहुत आसान है.

कानपुर की रहने वाली नलिनी शर्मा कहती हैं कि बिना तेल वाले गाजर अचार की डिमांड सब से ज्यादा होती है. कसबों में इसे दुकानों में बेचा जा सकता है.

इस के अलावा हर कसबे में ढाबे और खानेपाने की दुकानें होती हैं. वहां पर भी इस को बेचा जा सकता है. इस तरह गाजर से जुड़े कारोबार को बढ़ावा दिया जा सकता है.

गाजर का अचार बनाने की विधि

गाजर 1 किलोग्राम, छोटी राई 6 चम्मच, लाल मिर्च का पाउडर 3 चम्मच, पिसी हलदी 2 चम्मच, हींग 1 चम्मच, नमक स्वादानुसार, सौंफ 4 चम्मच, गन्ने का सिरका 1 कप.

गाजर को पानी से अच्छे से धो कर छील लें. उस के लंबेलंबे तकरीबन 2 इंच पतलेपतले टुकड़े काट लें.

डेढ़ से 2 घंटे के लिए धूप में सुखाने रखें. अब गैस के ऊपर लोहे का तवा या कड़ाही गरम करने रखें. अब कड़ाही या तवे में छोटी राई और सौंफ डालें, धीमी आंच पर डेढ़ से 2 मिनट भून लें. जब राई चटकने लगे, तब गैस बंद कर दें और तुरंत ही हलदी, लाल मिर्च पाउडर व हींग डाल कर सारी चीजों को अच्छी तरह से मिला लें. इस के बाद ये मसाले मिक्सी में या सिलबट्टे पर पीस लें. अब एक बड़ा कटोरा लें. उस में सारे मसाले, कटी हुई गाजर, नमक और गन्ने का सिरका डालें. इन सारी चीजों को अच्छी तरह से मिला लें.

गाजर का बिना तेल अचार अब तैयार है. नमक थोड़ा तेज ही रखें, इस से अचार खराब नहीं होगा. इस को बेचने के लिए पैकिंग का सहारा लेना पड़ता है. खुले में रखा अचार जल्दी खराब हो सकता है.

हलदी (Turmeric) की उन्नत खेती

भारत सब से बड़ा हलदी उत्पादक देश है. हलदी का इस्तेमाल पुराने समय से ही किसी न किसी रूप में होता आ रहा है. हलदी का इस्तेमाल खाने के अलावा औषधियों में भी किया जाता है. सौंदर्य प्रसाधन के लिए भी हलदी का इस्तेमाल खूब जम कर हो रहा है इसलिए इस की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है.

हलदी में स्टार्च की मात्रा सब से ज्यादा होती है. इस के अलावा इस में 13.1 फीसदी पानी, 6.3 फीसदी प्रोटीन, 5.1 फीसदी वसा, 69.4 फीसदी कार्बोहाइड्रेट, 2.6 फीसदी रेशा और 3.5 फीसदी खनिज लवण पोषण तत्त्व पाए जाते हैं. इस में वोनाटाइन औरेंज लाल तेल 1.3 से 5.5 फीसदी पाया जाता है.

भारत से हलदी को यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान, जरमनी, नीदरलैंड, यूएसए, सऊदी अरब और आस्ट्रेलया भेजा जाता है.

जलवायु

हलदी का इस्तेमाल ज्यादातर मसालों के तौर पर किया जाता है. जिन इलाकों में जहां 1200 से 1400 मिलीमीटर बारिश होती है या जहां बारिश ज्यादा होती है, वहां पर इस की अच्छी खेती होती है.

हलदी की खेती के लिए 450 से 900 मीटर ऊंचाई वाले इलाके सही होते हैं. हलदी उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की फसल है. 30 से 35 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान अंकुरण के समय, 25 से 30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान कल्ले निकलते समय, 20 से 30 डिगरी सैंटीमीटर प्रकंद बनने के दौरान और 18 से 20 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान हलदी की मोटाई के लिए सब से अच्छा तापमान माना जाता है.

मिट्टी कैसी हो

आमतौर पर हलदी की खेती सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन पानी निकलने का बेहतर इंतजाम होना चाहिए. जिस जगह पानी भरने का खतरा हो, वहां पर इस की खेती नहीं की जा सकती. इस का पीएच मान 5 से 7.5 होना चाहिए. इस की खेती दोमट, जलोढ़, लैटेराइट मिट्टी, जिस में जीवांश की मात्रा ज्यादा हो, काफी अच्छी मानी गई है.

उन्नत प्रजातियां

सीएल 326 माइडुकुर : यह लीफ स्पौट बीमारी की अवरोधक प्रजाति है. लंबे पंजे वाली, चिकनी, 9 महीने में तैयार होती है. उत्पादन कूवत 200 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सूखने पर 19.3 फीसदी हलदी मिलती है.

सीएल 327 ठेकुरपेंट : इस के पंजे लंबे, चिकने और चपटे होते हैं. पकने की अवधि 5 महीने और उत्पादन कूवत 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सुखाने पर 21.8 फीसदी हलदी हासिल होती है.

कस्तूरी : इस किस्म की हलदी जल्दी तैयार होती है. इस के पंजे पतले और खुशबूदार होते हैं. उत्पादन कूवत 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सुखाने पर 25 फीसदी हलदी मिलती है.

रोपने का सही समय

अप्रैल और मई का महीना हलदी के रोपने का सब से अच्छा होता है. अगर बेहतर उत्पादन लेना हो तो हलदी की फसल के लिए सही समय का खास खयाल रखें, इस से फसल का उत्पादन ज्यादा होता है.

खेत की तैयारी

ज्यादा फसल लेने के लिए खेत की जुताई काफी अच्छी तरह से करनी चाहिए. हलदी की बोआई करने से पहले खेत को 4 से 5 बार जोत लें, फिर पाटा लगा कर मिट्टी को एकदम भुरभुरा और समतल कर लेना चाहिए. खेत में पहले फसल के अवशेषों को बाहर कर जला देना जरूरी होता है.

बोने की विधि

हलदी बोने के लिए 15 सैंटीमीटर ऊंची, एक मीटर चौड़ी और सुविधानुसार लंबी (3-4 मीटर) क्यारियां, 30 सैंटीमीटर की दूरी पर क्यारी से क्यारी बना लेनी चाहिए.

हलदी रोपते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारियों की दूरी बराबर हो.

प्रकंद की मात्रा

हलदी का रोपण प्रकंद (राइजोम) से होता है, जो 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर लगता है. इस बात का ध्यान रखें कि प्रकंद में कम से कम 2-3 आंखें हों. प्रकंदों को 0.25 फीसदी इंडोफिल एम 45 घोल में कम से कम आधा घंटे तक डुबो कर उपचारित करें. अगर कटे, सड़े और सूखे व दूसरे रोग से ग्रसित हों, तब उन प्रकंदों को छांट कर अलग कर लेना चाहिए.

ध्यान रखें कि एक वजन, एक आकार के प्रकंद एक ही कतार में लगाएं, क्योंकि छोटाबड़ा प्रकंद लगाने पर पौधे की बढ़वार भी अलगअलग होती है. 5 सैंटीमीटर गहरी नाली में 30 सैंटीमीटर कतार से कतार की दूरी और 20 सैंटीमीटर प्रकंद की दूरी रख कर रोपें. मदर राइजोम को ही बीज के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए. रोपने के बाद नाली को मिट्टी से ढक दें.

सिंचाई : अप्रैलमई में बोने के एक हफ्ते बाद सिंचाई करनी चाहिए अन्यथा 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है. पूरे फसल के दौरान 20-25 हलकी सिंचाई की जरूरत पड़ती है.

खाद और उर्वरक : हलदी की फसल के लिए जीवाश्म खाद की काफी जरूरत रहती है. 25 टन कंपोस्ट या गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन में मिला देनी चाहिए. नाइट्रोजन 60 किलोग्राम, फास्फोरस 30 किलोग्राम और पोटाश 90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जरूरी है.

फास्फोरस की पूरी मात्रा और पोटाश की आधी मात्रा रोपने के दौरान जमीन में मिला दें. नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपने के 45 दिन बाद और बाकी बची नाइट्रोजन और पोटाश की मात्रा 90 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय डालें.

हलदी रोपने के तुरंत बाद 12.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से हरी पत्ती, सूखी घास या दूसरे जैविक अवरोध की परत क्यारियों के ऊपर फैला देनी चाहिए. दूसरी और तीसरी 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर देने के बाद किसी भी अवरोध परत को बिछा दें. खरपतवार हटाने के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करना जरूरी होता है, वरना उत्पादन प्रभावित होता है.

हलदी (Turmeric)

हलदी की मिश्रित खेती : सरकार का इस पर काफी जोर है कि किसान अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए सहफसली प्रणाली का इस्तेमाल करें, जिस से एकसाथ 2 फसलें तैयार हों और मुनाफा भी ज्यादा हो.

मैदानी क्षेत्र में हलदी के साथसाथ मिर्च और इस की फसलों के साथ मुख्यतया सब्जी वाली फसलों में इसे मिश्रित फसल के रूप में लगाया जाता है. इसे अरहर, सोयाबीन, मूंग, उड़द की फसल के साथ लगाया जा सकता है.

हलदी की खेती एक तरफ जहां दूसरी फसलों के साथ की जा सकती है, वहीं इसे बगीचों में भी लगाया जा सकता है. हलदी को आम, कटहल, अमरूद, चीकू, केले वगैरह के साथ लगा कर अलग से आमदनी हासिल की जा सकती है.

फसल की खुदाई : हलदी की फसल कब तक तैयार हो जाती है, यह उस की प्रजाति पर निर्भर करता है. हलदी की खुदाई 7 महीने से शुरू हो कर 10 महीने तक कभी भी की जा सकती है. वैसे आमतौर पर हलदी की खुदाई जनवरी से मार्च के मध्य तक की जा सकती है जब पत्तियां पीली पड़ जाएं और ऊपर से सूखने लगें.

भंडारण : हलदी की खुदाई करने के बाद उसे छाया में सुखा कर मिट्टी वगैरह साफ करना जरूरी होता है. प्रकंदों को 0.25 फीसदी इंडोफिल एम 45 या 0.15 फीसदी बाविस्टिन या 0.05 फीसदी मैलाथियान के घोल में आधा घंटे तक उपचारित करें. इसे छाया में सुखा कर रखें.

हलदी के भंडारण के लिए छायादार जगह पर एक मीटर चौड़ा, 2 मीटर लंबा और 30 सैंटीमीटर गहरा गड्ढा खोदें. जमीन की सतह पर धान का पुआल या रेत 5 सैंटीमीटर नीचे डाल दें, फिर उस पर हलदी के प्रकंद रखें. इसी तरह रेत की दूसरी सतह बिछा कर हलदी की तह मोड़ाई करें. गड्ढा भर जाने पर मिट्टी से ढक कर गोबर से लीप दें.

हलदी की क्योरिंग

हलदी के प्रकंदों को सुखाने के बाद उसे बड़े कड़ाहे में उबलने के लिए डालना होता है. फिर उस कड़ाहे में चूने का पानी या सोडियम बाई कार्बोनेट को पानी में घोल लें. पानी की मात्रा उतनी ही डालें, जिस से हलदी के प्रकंद डूब जाएं. उसे 45 से 60 मिनट तक उबालें, जब सफेद झाग उठने लगें और उस में महक आनी शुरू हो जाए, तब उसे पानी से निकाल कर अलग करें.

सुखाना : उबली हुई हलदी को बांस की चटाई पर रोशनी में 5-7 सैंटीमीटर मोटी तह पर सुखाएं. शाम को ढक कर रख दें. 10-15 दिन तक पूरी तरह सुखाना होता है.

प्रमुख कीट और बीमारियां

शूटबोरर : यह कीट हलदी के तना और प्रकंद में छेद कर देता है. इस से पौधों में भोजन सामग्री तंतुओं के नष्ट होने से ठीक तरीके से अपना काम नहीं कर पाती है, जिस से पौधे कमजोर हो कर झुक जाते हैं. इस का नियंत्रण 0.05 प्रतिशत डाइमिथोएट या फास्फोमिडान का छिड़काव करने से किया जाता है.

साफ्ट रौट : यह बीमारी हलदी को काफी नुकसान पहुंचाती है. यह पीथियम स्पेसीज के प्रकोप से होती है. इस के प्रकोप से प्रकंद सड़ जाता है. इस रोग पर नियंत्रण के लिए 0.25 फीसदी इंडोफिल एम 45 से मिट्टी की ड्रेचिंग करें. प्रकंद का उपचार कर के ही लगाना बेहतर होता है.

लीफ स्पौट : यह रोग कोलिटोट्राइकम स्पेसीज फफूंद की वजह से होता हैं. इस में छोटे अंडाकार अनियमित या नियमित भूरे रंग के धब्बे पत्तियों के दोनों तरफ पड़ जाते हैं, जो बाद में धूमिल पीले या गहरे भूरे रंग के होते हैं.

इस बीमारी के प्रकोप से पौधों को बचाने के लिए पहले से ही 1 फीसदी बोर्डो मिश्रण का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर सितंबर के पहले हफ्ते में करना अहम माना जाता है.

अदरक (Zinger) की खेती से किसानों को मिलेगा मुनाफा

बहुत समय से अदरक (Zinger) का इस्तेमाल मसाले के रूप में, सागभाजी, सलाद, चटनी और अचार व अलगअलग तरह की भोजन सामग्रियों के बनने के अलावा तमाम तरह की औषधियों के बनाने में होता है. इसे सुखा कर सौंठ भी बनाई जाती है.

मिट्टी व खेत की तैयारी

उचित जल निकास वाली दोमट या रेतीली दोमट भूमि इस की खेती के लिए अच्छी होती है. जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी व समतल कर लेना चाहिए.

बोआई का समय

जहां पर सिंचाई की सुविधा हो, वहां इस की बोआई अप्रैल के मध्य पखवारे से मई महीने तक करनी चाहिए.

किस्में व अवधि

अदरक की उन्नत किस्में सुप्रभा, सुरुचि, सुरभि वगैरह हैं, जो 200 से 225 दिनों में तैयार हो जाती हैं.

बीज की मात्रा व बोने की विधि

एक कट्ठा क्षेत्रफल (125 वर्गमीटर) के लिए तकरीबन 24 से 30 किलोग्राम बीज प्रकंदों की जरूरत होती है, जिन्हें 4 से 5 सैंटीमीटर के टुकड़ों में बांट लेते हैं. हर टुकड़े का भार 25 ग्राम से 30 ग्राम होना चाहिए और उस में 2 आंखें जरूर हों.

बीज प्रकंदों को बोने से पहले 2.5 ग्राम मैंकोजेब और 1 ग्राम बाविस्टीन मिश्रित प्रति लिटर पानी के घोल में आधे घंटे तक डुबोना चाहिए. फिर छाया में सुखाने के बाद इन्हें 4 सैंटीमीटर की गहराई में  बोआई कर दें. पंक्तियों की आपसी दूरी 25 सैंटीमीटर से 30 सैंटीमीटर और पौधों से पौधों की आपसी दूरी 15 सैंटीमीटर से 20 सैंटीमीटर रखते हैं. बीज प्रकंदों को मिट्टी से अच्छी तरह ढक देना चाहिए.

बोआई के तुरंत बाद ऊपर से घासफूस, पत्तियों व गोबर की सड़ी हुई खाद से अच्छी तरह ढक देना चाहिए. ऐसा करने से मिट्टी के अंदर नमी बनी रहती है और तेज धूप के चलते अंकुरण पर बुरा असर नहीं पड़ता है.

खाद व उर्वरक

खाद व उर्वरक के इस्तेमाल के लिए मिट्टी की जांच करना बेहद जरूरी है. किसी वजह से मिट्टी की जांच न हो सके, तो उन हालात में गोबर की सड़ी हुई खाद या कंपोस्ट 200-250 किलोग्राम प्रति कट्ठा की दर से जमीन में मिला दें.

रासायनिक उर्वरक यूरिया 1.37 किलोग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट 6.25 किलोग्राम व म्यूरेट औफ पोटाश 1.06 किलोग्राम, 250 ग्राम जिंक सल्फेट व 125 ग्राम बोरैक्स रोपाई के समय जमीन में मिला दें. रोपाई  के 75 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय यूरिया 1.37 किलोग्राम देनी चाहिए.

सिंचाई

अदरक की फसल में भूमि में बराबर नमी बनी रहनी चाहिए. पहली सिंचाई बोआई के कुछ दिन बाद ही करते हैं और जब तक बारिश शुरू न हो जाए, 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहते हैं. गरमियों में हर हफ्ते सिंचाई करनी चाहिए.

खरपतवार प्रबंधन

अदरक के खेत को खरपतवाररहित रखने और मिट्टी को भुरभुरी बनाए रखने के लिए जरूरत के मुताबिक निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

अदरक की फसल अवधि में 2-3 बार निराईगुड़ाई करना सही होता है. हर गुड़ाई के बाद मिट्टी जरूर चढ़ाएं. पत्तियों का पलवार (ऊपर से ढक) देने से अंकुरण अच्छा होता है और खरपतवार भी कम उगते हैं. 3-4 बार पलवार देने से अच्छी उपज मिलती है.

50-60 किलोग्राम हरी पत्तियों का पलवार बोआई के तुरंत बाद, इतनी ही पत्तियों का पलवार 30 दिन व 60 दिन बाद देते हैं. जब पौधे 20-25 सैंटीमीटर ऊंचे हो जाएं, तो उन पर मिट्टी चढ़ा देते हैं.

खुदाई व उपज

बोआई के तकरीबन 7-8 महीने बाद फसल को खोदा जा सकता है, पर सौंठ के लिए फसल को पूरी तरह से पक जाने पर ही खोदते हैं. फसल के पकने में मौसम और किस्म के मुताबिक 7-8 महीने लगते हैं.

जब पौधों की पत्तियां सूखने लगें, तब प्रकंदों को फावड़े या खुरपी से खोद कर निकाल लेते हैं. प्रति बिस्वा 200-250 किलोग्राम प्रकंद मिल जाते हैं. सूखने पर इस से 20 से 30 किलोग्राम तक सौंठ हासिल होती है.

अंत:फसल

अदरक की अंत:फसल मिर्च व दूसरी फसलों के साथ खासतौर पर सब्जी वाली फसलों में कर सकते हैं. अंतरवर्ती फसल के रूप में बगीचों में जैसे आम, कटहल, अमरूद वगैरह लगा कर ज्यादा आमदनी हासिल की जा सकती है.

वसंतकालीन अरवी की खेती ज्यादा लाभकारी

अरवी को घुइयां के नाम से भी जाना जाता है. इस की खेती मुख्यत: खरीफ मौसम में की जाती है, लेकिन सिंचाई सुविधा होने पर वसंतकालीन में भी की जाती है. इस की सब्जी आलू की तरह बनाई जाती है और पत्तियों की भाजी और पकौड़े बनाए जाते हैं.

अरवी के कंदों में प्रमुख रूप से स्टार्च होता है. इस की पत्तियों में विटामिन ‘ए’, कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन भी पाया जाता है.

आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव, बलिया के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि अरवी वसंतकालीन और खरीफ दोनों मौसम में उगाई जाती है.

भूमि

अरवी के लिए पर्याप्त जीवांश और उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है.

उर्वरक का प्रयोग

खेत की तैयारी के समय 3 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद प्रति कट्ठा यानी 125 वर्गमीटर के हिसाब से अरवी बोआई के 15-20 दिन पहले खेत में मिला देनी चाहिए. मिट्टी की जांच के बाद ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए. अधिक उपज लेने के लिए यूरिया एक किलोग्राम, सिगल सुपर फास्फेट 4.70 किलोग्राम और म्यूरेट औफ पोटाश 2 किलोग्राम की मात्रा बोआई के पहले खेत में मिला देना चाहिए. आधा यूरिया बोआई के 35-40 दिन पर और 70 दिन बाद खड़ी फसल में टौप डै्रसिंग के रूप में देना चाहिए.

बोआई का सही समय

वसंतकालीन फरवरी महीने में और खरीफ के लिए 15 जून से 15 जुलाई तक बोआई की जाती है.

बीज/कंद की मात्रा

बोआई के लिए अंकुरित कंद 10-15 किलोग्राम प्रति बिस्बा/ कट्ठा की जरूरत पड़ती है.

बीजोपचार कैसे करें

बोने से पहले कंदों को मैंकोजेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी 1 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल में 10 मिनट तक डुबो कर उपचारित कर बोना चाहिए.

ऐसे करें बोआई

समतल क्यारियों में कतारों की आपसी दूरी 45 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सैंटीमीटर और कंदों की 5 सैंटीमीटर की गहराई पर बोआई करनी चाहिए या फिर 45 सैंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ बना कर दोनों किनारों पर 30 सैंटीमीटर की दूरी पर कंदों की बोआई करें. बोआई के बाद कंदों को मिट्टी से अच्छी तरह ढक देना चाहिए.

उन्नत किस्में

अरवी की किस्मों में नरेंद्र अरवी-1, 2,  राजेंद्र अरवी-1 प्रमुख हैं.

सिंचाई

वसंतकालीन फसलों के लिए जरूरत के मुताबिक 15 दिनों के अंतर पर 5-6 सिंचाई करें. खरीफ में अरवी की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है. अच्छे उत्पादन के लिए वर्षा न होने पर 15 दिन के अंतराल पर जरूरत पड़ने पर सिंचाई करें.

निराईगुड़ाई

खरपतवारों को नष्ट करने के लिए कम से कम 2 बार निराईगुड़ाई करें और अच्छी पैदावार के लिए 2 बार हलकी गुड़ाई जरूर करें.

पहली गुड़ाई बोआई के 40 दिन बाद व दूसरी 60 दिन के बाद करें. फसल में एक बार मिट्टी चढ़ा दें. अगर तने अधिक मात्रा में निकल रहे हों, तो एक या 2 मुख्य तनों को छोड़ कर शेष सब की छंटाई कर देनी चाहिए.

पौध स्वास्थ्य प्रबंधन

अरवी में झुलसा रोग से पत्तियों में कालेकाले धब्बे हो जाते हैं. बाद में पत्तियां गल कर गिरने लगती हैं. इस का उपज पर बुरा असर पड़ता है.  इस की रोकथाम के लिए 15-20 दिन के अंतर से कार्बंडाजिम 12 फीसदी या मैंकोजेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल का छिड़काव करते रहें. साथ ही, फसल चक्र अपनाएं.

सूंड़ी कीट का प्रबंधन

अरवी की पत्तियों को खाने वाली सूंड़ी द्वारा हानि होती है, क्योंकि यह कीडे़ नई पत्तियों को खा जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए  इमिडाक्लोप्रिड 17.8 फीसदी 1 मिलीलिटर को 3 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

स्टीकर पदार्थ मिलाएं

अरवी की पत्तियां चिकनी होती हैं, इसलिए दवाओं के छिड़काव के लिए घोल में चिपकने वाले पदार्थ जैसे गोंद मिला कर छिड़काव करें.

खुदाई और उपज

अरवी की खुदाई कंदों के आकार, प्रजाति, जलवायु और भूमि की उर्वराशक्ति पर निर्भर करती है. आमतौर पर बोआई के 130-140 दिन बाद जब पत्तियां सूख जाती हैं, तब खुदाई करनी चाहिए. उपज उन्नत तकनीक का खेती में समावेश करने पर प्रति कट्ठा 3 क्विंटल तक उपज हासिल कर सकते हैं.

भंडारण

अरवी के कंदों को हवादार कमरे में फैला कर रखें. वहां गरमी न हो. इसे कुछ दिनों के अंतराल में पलटते रहना चाहिए. सड़े हुए कंदों को निकालते रहें और बाजार मूल्य अच्छा मिलने पर जल्दी बिक्री कर दें.

मैदानी इलाकों में आलू की उन्नत खेती

आलू सब्जी वाली फसल है. इस की खेती रबी या शरद मौसम में की जाती है. इस की उपज क्षमता समय के अनुसार सभी फसलों से ज्यादा है, इसीलिए इस को ‘अकालनाशक फसल’ भी कहते हैं. इस का प्रत्येक कंद पोषक तत्त्वों का भंडार है, जो बच्चों से ले कर बड़ों तक के शरीर का पोषण करता है.

भारत में मूल रूप से आलू की खेती प्रारंभिक अवस्था में पहाड़ी इलाकों में की जाती थी. आलू के स्वाद एवं पौष्टिकता ने स्थानीय किसानों को आकर्षित किया और धीरेधीरे आलू की खेती का विस्तार मैदानी इलाकोें में भी अक्तूबर से मार्च माह तक होने लगा.

हमारे देश में आलू मुख्य रूप से सर्दियों के मौसम में उगाया जाता है. आलू की फसल तैयार होने की कम अवधि के कारण इसे आसानी से 2 फसलों के बीच में किया जा सकता है, जिस से फसल सघनता भी प्रभावित नहीं होती है. समान हालात में दूसरी फसलों की तुलना में आलू की खेती से प्रति इकाई क्षेत्रफल व समय में अधिक लाभ प्राप्त होता है. बढ़ती आबादी के लिए भोजन के साथसाथ आलू की खेती गांवों में रोजगार के अवसर का भी महत्त्वपूर्ण विकल्प हो सकता है.

खेत का चुनाव

आलू उगाने के लिए समतल खेत का चुनाव करना चाहिए. किसी भी दशा में खेत का ढलान 0.5 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. जहां तक संभव हो, आलू उन खेतों में न लगाएं, जहां पिछले साल आलू की फसल ली गई हो. फसल को अदलबदल कर लगाने से मिट्टी से पैदा होने वाली आलू की बीमारियां जैसे काली रूसी, मृदु गलन, शुष्क गलन, भूरा गलन, साधारण चूर्णी खुरंड (स्कैब), जीवाणु मुरझान और मूलग्रंथि सूत्रकृमि आदि से छुटकारा पाया जा सकता है.

मिट्टी का चुनाव

बलुई दोमट मिट्टी, जिस में जल निकासी का उचित प्रबंध हो, आलू के उत्पादन के लिए बेहतर है. अगर खाद और पानी की उचित व्यवस्था हो, तो बलुई मिट्टी में भी आलू उगाया जा सकता है. भारी मिट्टी आलू की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है.

ग्रीष्मकालीन जुताई और हरी खाद

यदि संभव हो, तो मृदाजनित बीमारियों, कीटों और खरपतवारों के प्रकोप से आलू की फसल को बचाने के लिए गरमी के मौसम (मईजून) में 1 या 2 बार खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर के इसे खाली छोड़ देना चाहिए, जिस से रोगाणु व कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है.

वर्षा के प्रारंभ होने पर ढैंचा की बोआई हरी खाद के रूप में करनी चाहिए. जब फसल 50-60 दिन की हो जाए, तब उसे मिट्टी पलटने वाले हल से मिट्टी में अच्छी तरह से दबा देना चाहिए. इस से मिट्टी की भौतिक दशा और उर्वराशक्ति में सुधार होता है. नतीजतन, कैमिकल उर्वरकों की बचत होती है और आलू की पैदावार क्वालिटी में भी बढ़ोतरी होती है.

खेत की तैयारी

मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करने के बाद जरूरत के मुताबिक 2-3 बार डिस्क हैरो या कल्टीवेटर चला कर खेत को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए. यदि पिछली फसल के अवशेष खेत में हों, तो उन को भलीभांति निकाल देना चाहिए. भूमि में आलू के कंद बनने के समय किसी भी तरह का प्रतिरोध नहीं होना चाहिए. यदि प्रतिरोध होता है, तो पैदावार कम हो जाती हे.

मैदानी इलाकों की खास किस्में

अगेती किस्में : कुफरी ख्याति, कुफरी, पुखराज, चंद्रमुखी.

मध्यम अवधि वाली किस्में : कुफरी ज्योति, कुफरी लालिमा, कुफरी अरुण, कुफरी सूर्या, कुफरी कंचन, कुफरी ललित.

पछेती किस्में : कुफरी सिंदूरी और कुफरी बहार.

अन्य किस्में : कुफरी चिप्सोना 1, 2, 3 और 4.

आलू के छिलके के रंग के आधार पर भी किस्मों को चुना जा सकता है. मुख्य रूप से सफेद और लाल छिलके वाली किस्मों को ही उगाया जाता है. कुफरी सिंदूरी, कुफरी कंचन और कुफरी लालिमा लाल छिलके वाली किस्में हैं.

बोआई का उचित समय

आलू की बोआई किस्मों के आधार पर अक्तूबर से नवंबर माह तक की जा सकती है. अगेती फसल की खेती कर के किसान अधिक आमदनी ले सकता है.

जहां तक संभव हो, आलू की बोआई ज्यादा पहले न की जाए, क्योंकि आलू के बीज के सड़ने की संभावना अधिक तापमान की वजह से बढ़ जाती है, जिस के फलस्वरूप पैदावार भी कम होती है.

अन्य किस्मों की तुलना में कुफरी सूर्या अधिक तापमान सहन करने के लिए उपयुक्त है. मुख्य फसल की बोआई का उचित समय मध्य अक्तूबर से मध्य नवंबर तक होता है.

बीज की तैयारी

बोआई के 10 से 15 दिन पहले बीज को कोल्ड स्टोरेज से निकाल कर 24 घंटे के लिए खुला छोड़ देना चाहिए, वरना आलू के सड़ने का डर रहता है. इस के बाद आलू को किसी छायादार एवं खुले स्थान पर फैला देना चाहिए. सड़ेगले कंदों को छांट कर अलग कर देना चाहिए. जब कंदों में अच्छी तरह अंकुरण हो जाए, तभी बोना चाहिए.

ध्यान रखें कि बीज को खेत में बोने के लिए ले जाते समय कंद का अंकुर न टूटने पाए, वरना बीज जमाव प्रभावित होगा.

बीज का आकार एवं मात्रा

आलू बीज उत्पादन के लिए 30 से 40 ग्राम वजन विशेष रूप से मुरगी के अंडे के आकार के आलू के कंद को लगाना चाहिए. बीज के आकार के अनुसार एक हेक्टेयर खेत के लिए 20 से 30 क्विंटल आलू कंद पर्याप्त होता है. काट कर आलू लगाने से बीज की मात्रा कम लगती है, लेकिन विषाणु और जीवाणुजनित रोगों के फैलने की संभावना अत्यधिक रहती है, जिस से आलू की पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो जाती है. बीज दर को जरूरत के मुताबिक पौधे से पौधे की दूरी या कतार से कतार की दूरी को कम या ज्यादा कर के किया जा सकता है.

आलू बीज का चुनाव

* आलू बीज रोगरहित और स्वस्थ होना चाहिए.

* बीज किसी सरकारी विभाग या रजिस्टर्ड संस्था से ही लेना चाहिए.

* आलू बीज का वजन 30-50 ग्राम का होना चाहिए.

* अंकुररहित या पतले अंकुर वाले कंदों को नहीं बोना चाहिए.

बोने से पहले सावधानियां

* यदि किसान खुद का बीज उपयोग करते हों, तो यह ध्यान रहे कि 3-4 साल बाद बदल लेना चाहिए.

* आलू बीज को कोल्ड स्टोरेज से लाने के बाद धुंधली रोशनी वाले हवादार कमरे में कुछ दिनों के लिए फैला देना चाहिए.

* कंदों में स्वस्थ अंकुर निकले होने चाहिए, जो एक सैंटीमीटर लंबे, हरे व मोटे हों.

बोने के समय सावधानियां

* स्वस्थ अंकुरित कंदों को ही खेत में लगाना चाहिए.

* बिना अंकुरित वाले कंदों (ब्लाइंड ट्यूबर्स) को नहीं लगाना चाहिए.

* सड़ेगले आलुओं को भी निकाल देना चाहिए.

* अंकुरित आलू बीजों को टोकरियों में भर कर सावधानी से खेत में ले जाना चाहिए.

* इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अंकुर टूटने न पाए, वरना खेत में कंदों को निकलने में समय लगेगा.

पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी

पूरी तरह से अंकुरित 30-40 ग्राम वजन के कंदों की बोआई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सैंटीमीटर और कंद से कंद की दूरी 30 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. कंद से कंद की दूरी को 50-60 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी को 15-25 सैंटीमीटर तक बीज के अनुसार घटाया  व बढ़ाया जा सकता है.

आलू बीज को काट कर लगाने से पंक्ति से पंक्ति की दूरी और कंद से कंद की दूरी को आमतौर पर कम रखते हैं. यदि ट्रैक्टर द्वारा आलू लगाना हो, तो पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी 60×20 सैंटीमीटर सही होती है.

आलू की खेती में पोषक तत्त्व

आलू की अच्छी उपज के लिए 16-17 पोषक तत्त्व अनिवार्य हैं. इन में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम मुख्य तत्त्व हैं. गंधक, कैल्शियम और मैगनीशियम दूसरे और मोलिब्डेनम, जस्ता, तांबा, लोहा व मैगनीज सूक्ष्म पोषक तत्त्व हैं.

पोषक तत्त्वों का काम

नाइट्रोजन के प्रयोग से कंदों की तादाद और आकार में वृद्धि होती है. इस की कमी से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पहले नीचे की पत्ती, उस के बाद सभी पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है, वहीं दूसरी तरफ नाइट्रोजन की अधिकता होने पर ट्यूबर देर से बनते हैं, पौधे की बढ़वार ज्यादा हो जाती है और कंद का आकार छोटा रह जाता है.

फास्फोरस की कमी से जड़ों का विकास कम हो जाता है और उपज कम होती है. पोटैशियम की कमी से आलू में रोगों से लड़ने की क्षमता में कमी आती है और क्वालिटी भी प्रभावित होती है.

मिट्टी की जांच

आलू की खेती करने से पहले खेत की मिट्टी की जांच करा कर खेती करें, तो बेहतर उपज भी मिलेगी.

उर्वरकों की सही मात्रा तभी आंकी जा सकती है, जब मिट्टी की जांच से पता लग सके कि मिट्टी में पोषक तत्त्वों की कमी या अधिकता है. जांच के आधार पर उचित मात्रा में उर्वरक डालने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार सुनिश्चित की जा सकती है और पर्यावरण का संतुलन भी सही रहता है.

खाद एवं उर्वरक

आमतौर पर आलू की अच्छी उपज के लिए गोबर या कंपोस्ट खाद की 10-20 टन प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. यदि मिट्टी की जांच नहीं हो पाई हो, तो नाइट्रोजन 150-200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है.

यूरिया 300-400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देना चाहिए. फास्फोरस की 80-120 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए, जिस की पूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट 400-500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देने से हो जाती है.

पोटाश की 100-150 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है, वहीं म्यूरेट औफ पोटाश 175-225 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देने से पूरी की जा सकती है.

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

अंतिम जुताई के समय खाद की आधी मात्रा खेत में बिखेर कर मिला देनी चाहिए. बची हुई खाद की आधी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटोश की पूरी मात्रा बोआई के समय बनी नालियों में देनी चाहिए.

उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिला देना चाहिए. पत्ती चूसक कीट की रोकथाम के लिए थिमेट 10जी दवा को 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से या बोआई के समय 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी भराई के समय प्रयोग करनी चाहिए.

फसल की सिंचाई

बोते समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए. अगर नमी कम हो, तो एकसमान अंकुरण के लिए बोने के दूसरे दिन ही हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.

ध्यान रहे कि सिंचाई में पानी इतना ही देना चाहिए कि मेंड़ का एकतिहाई ऊपरी भाग सूखा रहे. इस के बाद मिट्टी की बनावट एवं मौसम के मुताबिक सिंचाई करें. आलू बीज की फसल में लगभग 4 से 6 सिंचाई की जरूरत होती है. मिट्टी चढ़ाने के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए. पौधों के लतर उखाड़ने के 10 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए.

करें खरपतवार नियंत्रण

फसल में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए बोने के बाद, लेकिन आलू बीज जमने से पहले औक्सीफ्लुरोफेन (गोल) की 0.5 लिटर वा मेट्रीब्यूजिन नामक दवा 0.75 ग्राम की एकतिहाई मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. इस बात का ध्यान रखें कि दवा के छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी हो.

फसल की गुड़ाई

अच्छी पैदावार और ज्यादा आमदनी के लिए सही समय पर निराईगुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना बहुत जरूरी है. फसल की समय से गुड़ाई करने से बेहतद पैदावार मिलती है. आमतौर पर फसल की गुड़ाई 20 से 30 दिनों पर करनी चाहिए.

गुड़ाई के बाद बाकी बचे नाइट्रोजन को डाल कर मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लेना चाहिए. मिट्टी चढ़ाने का काम मशीन द्वारा या खुद भी किया जा सकता है. मशीन से करने पर पैसे व समय की बचत होती है. ऐसा करने से कंदों का विकास अच्छा होता है.

पछेती झुलसा के लिए अनुकूल मौसम

पछेती झुलसा फफूंद द्वारा लगने वाला एक रोग है. सब से ज्यादा नुकसान आलू की फसल को होता है. यह रोग पौधों की पत्तियों, डंठलों और कंदों सभी में लगता है.

जब 2-3 दिन तक लगातार तापमान 10 डिगरी-20 डिगरी सैल्सियस, हवा में नमी 85 फीसदी से ज्यादा हो, बादल छाए हों और हलकी बूंदाबांदी होती रहे या कोहरा छाया हो, ऐसे हालात में यह सुनिश्चित समझना चाहिए कि रोग लगने वाला है.

पछेती झुलसा के लक्षण

पहले पत्तियों पर छोटे, हलके भूरे अनियमित धब्बे दिखाई देते हैं, जो जल्दी ही बढ़ कर बड़े दिखने वाले धब्बे बन जाते हैं. बाद में पत्तियों की निचली सतह पर धब्बों के चारों तरफ अंगूठीनुमा सफेद फफूंद दिखाई देती है. कंद का गूदा बदरंग हो जाता है और उस में से जली हुई चीनी जैसी महक आती है. गूदे के किनारे पर जंगनुमा भूरापन आ जाता है.

पछेती झुलसा की रोकथाम

पछेती झुलसा रोग से बचाव के लिए जब 2 पंक्तियों के पौधों के पत्ते आपस में सटने लगें, तो मैंकोजेब (डाइथेन एम-45) नामक दवा का 0.20 फीसदी का घोल बना कर दिसंबर महीने के पहले मध्य सप्ताह में रोग के लगने के पहले अवश्य छिड़काव कर देना चाहिए.

पहली बार यदि खेत में झुलसा रोग का लक्षण दिखाई देता है, तो रिडोमिल/कर्जेंट एम-8 दवा का 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. मौसम बीमारी के अनुकूल होने पर इन दवाओं का छिड़काव बारीबारी से बदलबदल कर करना चाहिए.

आलू की खुदाई, ग्रेडिंग व भंडारण

जब फसल में पीलापन दिखाई पड़ने लगे, तो पौधों को भूमि की सतह के ऊपर से काट देना चाहिए. कटाई के 10 दिन बाद जब मिट्टी अनुकूल हो जाए, तब ही खुदाई करनी चाहिए. पौध काटने के बाद कंद को मिट्टी के अंदर छोड़ देने से छिलका सख्त हो जाता है और खुदाई के समय आलू नहीं छिलता है.

खुदाई से पहले 2-4 कंद को खोद कर भी देखा जा सकता है और अगर छिलका सख्त लगे, तब खुदाई कर देनी चाहिए.

खुदाई के बाद आलू को ज्यादा देर तक धूप में न छोड़ें और किसी छायादार स्थान पर ढेर लगा कर 10-12 दिनों के लिए रख दें. इस के बाद ढेर में से कटे एवं रोगग्रस्त कंदों को निकाल देना चाहिए. साथ ही, आकार के मुताबिक कंदों को अलग कर देना चाहिए.

अलगअलग साइज के आलुओं का अलगअलग वर्गीकरण करने के लिए कृषि यंत्र का भी उपयोग किया जा सकता है. इस के लिए आलू ग्रेडिंग यंत्र भी आते हैं.