किसानों की मेहनत, वैज्ञानिकों की कुशलता व सरकार की नीतियों से रिकौर्ड उत्पादन

नई दिल्ली : 26 जून 2023. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय/विभाग, राज्यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों एवं अन्य सरकारी स्रोत एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलित, बागबानी फसलों के क्षेत्र व उत्पादन के संबंध में वर्ष 2021-22 के अंतिम आंकड़े और वर्ष 2022-23 के प्रथम अग्रिम अनुमान जारी किए गए हैं. वर्ष 2021-22 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 347.18 मिलियन टन हुआ है, जो वर्ष 2020-21 के उत्पादन से 12.58 मिलियन टन (3.76 फीसदी) अधिक है. वर्ष 2022-23 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 350.87 मिलियन टन होने का (प्रथम अग्रिम) अनुमान है, जो वर्ष 2021-22 (अंतिम) की तुलना में 3.69 मिलियन टन की वृद्धि (1.06 फीसदी से अधिक) है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में हमारे किसान भाईबहनों की अथक मेहनत, वैज्ञानिकों की कुशलता और केंद्र सरकार की किसान हितैषी नीतियों व राज्य सरकारों के सहयोग से देश में रिकौर्ड उत्पादन संभव हो रहा है.

बागबानी फसलों के क्षेत्र व उत्पादन के संबंध में वर्ष 2021-22 (अंतिम आंकड़े) की मुख्य बातें:

वर्ष 2021-22 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 347.18 मिलियन टन हुआ, जो वर्ष 2020-21 के उत्पादन से लगभग 12.58 मिलियन टन (3.76 फीसदी) अधिक है. वहीं वर्ष 2021-22 में फलों का उत्पादन 107.51 मिलियन टन हुआ, जबकि वर्ष 2020-21 में 102.48 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था.

सब्जियों का उत्पादन पिछले वर्ष के 200.45 मिलियन टन की तुलना में 4.34 फीसदी की वृद्धि के साथ वर्ष 2021-22 में 209.14 मिलियन टन हुआ.

वर्ष 2021-22 में प्याज का उत्पादन 31.69 मिलियन टन हुआ, जबकि वर्ष 2020-21 में 26.64 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था.

वर्ष 2021-22 में आलू का उत्पादन 56.18 मिलियन टन हुआ, जो इस के गत वर्ष करीब इतना ही था.

वर्ष 2022-23 (प्रथम अग्रिम अनुमान) की मुख्य बातें :

वर्ष 2022-23 में कुल बागबानी उत्पादन 350.87 मिलियन टन होने का अनुमान है, जो वर्ष 2021-22 (अंतिम) की तुलना में लगभग 3.69 मिलियन टन (1.06 फीसदी अधिक) की वृद्धि है.

फलों, सब्जियों, मसालों, फूलों, सुगंधित और औषधीय पौधों और वृक्षारोपण फसलों के उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि का अनुमान है.

फलों का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 107.51 मिलियन टन की तुलना में 107.75 मिलियन टन होने का अनुमान है.

सब्जियों का उत्पादन 212.53 मिलियन टन होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2021-22 में 209.14 मिलियन टन था.

प्याज का उत्पादन पिछले वर्ष के 31.69 मिलियन टन की तुलना में 31.01 मिलियन टन होने का अनुमान है.

आलू का उत्पादन 59.74 मिलियन टन होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2021-22 में यह 56.18 मिलियन टन था.

टमाटर का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 20.69 मिलियन टन की तुलना में 20.62 मिलियन टन होने का अनुमान है.

सुगंधित व औषधीय पौधों का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 664 हजार टन की तुलना में 680 हजार टन होने का अनुमान है.

कुल बागबानी
2020-21 (अंतिम)
2021-22(अंतिम)
2022-2023 (प्रथम अग्रिम अनुमान)

क्षेत्रफल (मिलियन हेक्टेयर में)
27.48
28.04
28.28

उत्पादन (मिलियन टन में)
334.60
347.18
350.87

हरी खाद ढैंचा : बढ़ाए पैदावार

फसलों से ज्यादा उत्पादन प्राप्त करने के लिए रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाता है, जिस से मिट्टी में जीवाश्म की कमी हो जाती है और मिट्टी की सेहत लगातार नीचे गिर रही है. ऐसे हालात में किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए ऐसे उर्वरक (खाद) का प्रयोग करना चाहिए, जिस से मिट्टी में जीवाणुओं की कमी न हो.

खेत में जीवाश्म की मात्रा को बढ़ाने व उर्वराशक्ति के विकास में जैविक व हरी खाद का प्रयोग काफी लाभदायक रहता है. हरी खाद के रूप में प्रयोग की जाने वाली ढैंचा की फसल से मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ती है. इस से फसल उत्पादन बढ़ा कर लागत कम की जा सकती है.

ढैंचा की फसल बोने के 55-60 दिनों के बाद खेत में पलटाई कर दी जाती है. इस के बाद खेत में पानी भर दिया जाता है, जिस से ढैंचा खेत में अच्छी तरह सड़ जाए.

ढैंचा से हरी खाद को लगभग 75-80 किग्रा नाइटोजन और 200-250 किग्रा कार्बनिक पदार्थ प्राप्त होता है, जिस से खेतों में पोषक तत्त्वों का संरक्षण होता है. मृदा में नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के साथ मृदा की क्षारीय व लवणीय शक्ति बढ़ती है. ढैंचा के अन्य हरी खादों के मुकाबले नाइट्रोजन की ज्यादा मात्रा मिलती है.

ढैंचा की उन्नत किस्में

वर्तमान में ढैंचा की अनेक उन्नत किस्में हैं, जैसे पंजाबी ढैंचा -1, सीएसडी-137, हिसाब ढैंचा -1, पंत ढैंचा -1 आदि.

अनुकूल मृदा

वैसे तो हरी खाद के लिए ढैंचा की बोआई किसी भी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन जलमग्न, क्षारीय व लवणीय व सामान्य मिट्टियों में ढैंचा की फसल लगाने से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद मिलती है.

बोआई का समय व बीज की मात्रा

ढैंचा की बोआई से पहले खेत की एक बार जुताई कर लेनी चाहिए इस के बाद 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज की बोआई अप्रैल के अंतिम सप्ताह से ले कर जून के अंतिम सप्ताह तक करनी चाहिए. जब फसल 20 दिनों की हो जाए तो 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया का छिड़काव करें. इस से फसल में नाइट्रोजन की मात्रा बनती है.

सिंचाई

इन के पौधों के अंकुरण के बाद सिंचाई की जरूरत कम होती है, परंतु अधिक उत्पादन के लिए 4-5 सिंचाई करनी चाहिए.

फसल के रोग व रोकथाम

ढैंचा की फसल में कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन कीट की सूंडि़यों के आक्रमण से पौधों की पैदावार कम होती है. इस के पौधे पर लार्वा इस की पत्तियों व कोमल शाखाओं को खा कर पौधे का विकास रोक देती है, जिस के कारण पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार गिर जाती है.

रोग व कीट की रोकथाम के लिए पौधे पर नीम औयल 5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के घोल के साथ छिड़काव करना चाहिए.

उपरोक्त बिंदुओं पर ध्यान रखते हुए हरी खाद के लिए ढैंचा की खेती उपयुक्त होती है.

कृषि यंत्रों से खेती: रोजगार का जरीया भी

कम होती खेती की जमीन, युवाओं का खेती से मुंह मोड़ कर शहरों की ओर कामधंधे की तलाश में पलायन करना आम बात है. सरकार युवाओं के लिए ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर मुहैया कराने में भी नाकाम साबित हो रही है. हालांकि कुछ लोग इन में ऐसे भी हैं, जो हाथ के दस्तकार हैं. वे अपने गांवों के आसपास ही कमाखा रहे?हैं.

कुछ लोग ऐसे भी?हैं, जिन के पास खेती की जमीन?है, पर वे भी खेती से संतुष्ट नहीं?हैं. वे लोग खेती से अधिक कमाई के लिए परदेश चले जाते हैं. जिन लोगों के पास खेती है, उन्हें खेती को ही बेहतर रोजगार का जरीया बनाना चाहिए.

कृषि के पारंपरिक तौरतरीकों को छोड़ कर नई तकनीकों से खेती करनी चाहिए. सरकारी स्कीमों का फायदा लेना चाहिए.

देश के?ज्यादातर किसानों के हालात ऐसे नहीं?हैं, जो ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसे महंगे यंत्र खरीद सकें. ऐसे किसानों के लिए आज अनेक ऐसे कृषि यंत्र हैं, जो उन की पहुंच में?हैं और बड़े यंत्रों की जगह उन छोटे यंत्रों को इस्तेमाल कर फायदा ले सकते?हैं.

मशीनों के इस्तेमाल से समय और पैसे की भी बचत होती?है. उस बचे हुए समय को अन्य किन्हीं कामों में लगा सकते हैं. कृषि से जुड़े अनेक काम होते?हैं, उन्हें कर सकते?हैं.

उन कृषि यंत्रों से दूसरों के खेतों में काम कर के भी आमदनी कर सकते?हैं.

यहां हम आप को कुछ ऐसे ही कृषि यंत्रों के बारे में जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं, जो आप के बड़े काम की?हैं:

ह्वीट कटर

यह एक ऐसी मशीन है, जिस की मदद से गेहूं, जौ, धान, चारा वगैरह फसलों को आसानी से काटा जा सकता है.

ह्वीट कटर से किसान फसल के अलावा घासफूस और छोटीमोटी ?ाड़ी, जंगल को भी साफ कर सकते हैं. यह मशीन पैट्रोल से चलती है और एक आदमी इस मशीन को बैल्ट की मदद से अपनी कमर में बांध कर आसानी से फसल को काट सकता है.

स्प्रे पंप

अच्छी फसल हासिल करने के लिए समयसमय पर कीटनाशक, बीमारीनाशक और खरपतवारनाशक दवाओं का छिड़काव बहुत ही जरूरी है. फसल की लागत में बीज, खाद, पानी के बाद सब से ज्यादा लागत कैमिकलों पर आती है. इस स्प्रे पंप की खास बात यह है कि इस में दवा का पूरापूरा इस्तेमाल होता है. यह बागबगीचों में कैमिकल का स्प्रे बहुत ही अच्छी तरह से करता है.

कैमिकल निकालने के लिए एक सूई की नोक के बराबर पौइंट होता है और इस में प्रैशर से फौग बनता है. थोड़ा सा कैमिकल धुएं का गुबार बन कर गिरता है. इस तकनीक से 50 फीसदी तक कैमिकल की बचत होती है.

पावर टिलर

इस को छोटा ट्रैक्टर भी कहते हैं. छोटे खेत और पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेतों में पावर टिलर बहुत ही कारगर है. इस से ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाले तमाम काम किए जा सकते हैं. मसलन, जुताई, सिंचाई, ढुलाई, कटाई, मेंड़ बनाने वगैरह खेती के सभी कामों में यह इस्तेमाल होता है.

टिलर छोटा, हलका और असरदार होता है. इस का रोटावेटर न केवल जुताई करता है, बल्कि खेत की मिट्टी को अच्छी तरह से मिला देता है. बागबगीचों, आलू, गन्ना, औषधीय पौधों वगैरह के खेतों में मेंड़ बनाना, नाली तैयार करना, निराईगुड़ाई या खरपतवार निकालना वगैरह कामों में टिलर कामयाब है. केले या अंगूर के बागों में दवा का छिड़काव या सिंचाई जैसे काम टिलर से ही मुमकिन हैं.

टिलर से पेड़पौधों के चारों तरफ थाले बनाए जा सकते हैं. इस से खेत की जुताई, रीजर द्वारा नाली बनाना, धान की फसल की मचाई करना जैसे काम किए जा सकते हैं. ट्रैक्टर की तरह ही टिलर में तकरीबन एक दर्जन औजार जोड़ कर बहुत सारे काम किए जा सकते हैं.

पावर वीडर 

फसल में उगे खरपतवारों को निकालने के लिए पावर वीडर बहुत ही कामयाब मशीन है. हाथ से खेत की निराईगुड़ाई करने में समय और पैसा बहुत लगता है. इस के अलावा खेती में मजदूरों की लगातार होती कमी भी एक बड़ी परेशानी है. ऐसे में पावर वीडर बहुत ही मददगार साबित हो रहा है.

यह पावर वीडर 60-65 किलोग्राम वजनी है और यह पैट्रोल से चलने वाली मशीन है.

2 पहियों पर रखी मशीन को चलाने के लिए हैंडिल दिए हुए हैं. यह 18-20 इंच चौड़ाई में निराईगुडाई करती हुई आगे बढ़ती है.

एक आदमी इसे बड़ी आसानी से चलाता हुआ तकरीबन डेढ़ घंटे में एक एकड़ खेत की निराईगुड़ाई कर सकता है. यह गन्ना और सब्जी की खेती में निराईगुड़ाई में बहुत ही कारगर है.

इस तरह और भी बहुत सारी छोटी मशीनें जैसे गन्ना सफाई मशीन, पावर रीपर, कल्टीवेटर, पेड़ वगैरह की कटाई के लिए चैनसा और बागबानी के लिए गड्ढे खोदने के लिए अर्थ औगर वगैरह हैं, जिन की मदद से कम लागत में खेती के काम को आसान कर पैदावार को कई गुना बढ़ा सकते हैं.

मिट्टी की जांच कराएं

अच्छी पैदावार लेने के लिए समयसमय पर खेत की मिट्टी की जांच जरूर करानी चाहिए, जैसे जमीन में होने वाले पोषक तत्त्वों के बारे में जानकारी व अनेक उन कमियों का पता चल सके, जिस से फसल पैदावार पर असर पड़ रहा है. समय रहते हम खेत की मिट्टी की जांच करा कर खेत की मिट्टी को सुधार सकते हैं और अपनी जमीन से अच्छी पैदावार ले सकते हैं.

मिट्टी की जांच कब

फसल की कटाई हो जाने अथवा परिपक्व खड़ी फसल में प्रत्येक 3 साल में फसल मौसम शुरू होने से पहले एक बार भूमि में नमी की मात्रा कम से कम हो.

क्यों

सघन खेती के कारण खेत की मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी. मिट्टी में विभिन्न पोषक तत्त्वों की उपलब्धता की दशा का बोधक. बोई जाने वाली फसल के लिए पोषक तत्त्वों की आवश्यकता का अनुमान. संतुलित उर्वरक प्रबंध द्वारा अधिक लाभ.

कैसे

एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 8-10 स्थानों से ‘ङ्क’ आकार के 6 इंच तक के गहरे गड्ढे बनाएं. एक खेत के सभी स्थानों से प्राप्त मिट्टी को एकसाथ मिला कर एक संयुक्त नमूना बनाएं. नमूने की मिट्टी से कंकड़, घास इत्यादि अलग करें. सूखे हुए नमूने को कपड़े की थैली में भर कर किसान का नाम, पता, खसरा संख्या, मोबाइल नंबर, आधार संख्या, उगाई जाने वाली फसलों आदि का ब्योरा दें. नमूना प्रयोगशाला को भेजें अथवा ‘परख’ मृदा परीक्षण किट द्वारा स्वयं परीक्षण करें.

पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों का वर्गीकरण

पौधे जड़ों द्वारा भूमि से पानी और पोषक तत्त्व, वायु से कार्बनडाईऔक्साइड और सूर्य से प्रकाश ऊर्जा ले कर अपने विभिन्न भागों को बनाते हैं. पोषक तत्त्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है :

मुख्य पोषक तत्त्व : नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश.

गौण पोषक तत्त्व : कैल्शियम, मैग्नीशियम और गंधक.

सूक्ष्म पोषक तत्त्व : लोहा, जिंक, कौपर, मैग्नीज, मौलिब्डेनम, बोरोन और क्लोरीन.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क करें.

परवल और धनियां में कीटरोग प्रबंधन

परवल

फल मक्खी कीट : प्रोन कीट कोमल अवयस्क फलों की त्वचा के नीचे अंडे देती है, जिस से यह गिडार निकल कर गूदे को खा कर फलों को सड़ा देती है. फल पीले पर कर सड़ने लगते हैं.

प्रबंधन : कीट आने से पहले नीम तेल 1500 पीपीएम की 3 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

यदि कीट आ गया है तो क्विनालफास 25 ईसी की 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

गलन रोग : इस रोग का प्रकोप अविकसित फलों पर अधिक होता है, जिस के कारण पूरा फल सड़ कर गिर जाता है.

प्रबंधन : इस रोग के नियंत्रण के लिए कौपर औक्सिक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी की 3 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

खर्रा रोग : इस के प्रकोप से पत्तियों और फलों पर सफेद चूर्ण दिखाई देते हैं. परिणामस्वरूप पत्तियां पीली पड़ कर नीचे गिर जाती हैं.

प्रबंधन : इस रोग के नियंत्रण के लिए कसुगमायसिन्न 3 फीसदी की 2 मिलीलिटर दवा प्रतिलिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

धनिया

माहू कीट : यह कीट फूल आने के समय शिशु एवं प्रोण दोनों ही रस चूस कर नुकसान करते हैं. इस से प्रभावित फलों व बीजों का आकार छोटा हो जाता है.

प्रबंधन : कीट आने से पहले नीम तेल 1500 पीपीएम की 3 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

यदि कीट आ गया है तो इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 10 मिलीलिटर दवा प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

स्टेम गाल रोग : यह धनिया का प्रमुख रोग है. इस में पत्तियों के ऊपरी भाग, तना, शाखाएं, फूल और फूल व फल पर रोग के लक्षण कुछ उभरे हुए फफोलों जैसे दिखाई देते हैं. आरंभ में रोग से संक्रमित तना पीला होने लगता है और मिट्टी के पास से तने पर छोटी गाल उभार लिए हुए भूरे रंग की होती है.

प्रबंधन : बीज को बोने से पूर्व थीरम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें. पौधों के अवशेष को नष्ट कर दें.

यदि रोग आ गया है तो कार्बंडाजिम 1.5 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

उकठा रोग : इस रोग से प्रभावित पौधे शुरू में पीला पड़ने लगते हैं. कुछ ही दिनों में इन का शीर्ष मुर?ा कर सूख जाता है और पौधा मर जाता है.

प्रबंधन : खेत की अप्रैलमई माह में सिंचाई कर के गरमियों की गहरी जुताई करें और खाली छोड़ दें. 2 वर्ष का फसल चक्र अपनाएं. धनिया के स्थान पर अदरक या सरसों उगाएं.

बोआई से पहले और आखिरी जुताई के साथ ट्राइकोडर्मा 4 से 5 किलोग्राम और गोबर की 50 से 60 किलोग्राम सड़ी हुई खाद मिला कर 1 हेक्टेयर खेत में फैला कर जुताई कराएं.

बुकनी रोग : इसे खर्रा रोग भी कहते हैं. इस रोग के कारण पत्तियों और तनों पर सफेदी आ जाती है व पत्तियां पीली पड़ जाती हैं.

प्रबंधन : इस के उपचार के लिए घुलनशील गंधक (सल्फैक्स) 3 किलोग्राम अथवा 600 मिलीलिटर डाई कूनो कैप प्रति हेक्टेयर की दर से 800 लिटर पानी में घोल कर फसल पर छिड़काव करें.

अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क करें.

मात्स्यिकी महाविद्यालय में छात्रसंघ कार्यालय का उद्घाटन

उदयपुर : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संगठक, मात्स्यिकी महाविद्यालय में छात्रसंघ कार्यालय का उद्घाटन मुख्य अतिथि डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, एमपीयूएटी ने एवं कालेज के डीन डा. बीके शर्मा एवं छात्र प्रतिनिधियों की उपस्थिति में किया.

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश सचिव एनएसयूआई, सत्येंद्र यादव, छात्रसंघ अध्यक्ष, एमपीयूएटी, महासचिव मनीष बुनकर, रिसर्च रिप्रेजेंटेटिव मनोज मीणा, दीपेंद्र सिंह, अध्यक्ष, आरसीए, प्रदीप मेहरा महासचिव, सीसीएएस, एवं अन्य महाविद्यालयों के अनेक छात्रछात्राएं उपस्थित थे.

महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डा. सुबोध शर्मा एवं प्रशासनिक अधिकारी डा. एमएल ओझा एवं कालेज के सभी अध्यापक और स्टाफ सदस्य उपस्थित थे.

छात्रसंघ कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर महाविद्यालय के निर्विरोध चुने गए महासचिव जयराम जाट एवं संयुक्त सचिव सौरभ मीणा को आपसी सहयोग व भाईचारे की मिसाल कायम करने पर बधाई दी.

इस अवसर पर कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने विद्यार्थियों को मात्स्यिकी सेवाओं और उच्च अध्ययन में उज्ज्वल भविष्य के बारे में बताते हुए अपने स्वयं के, प्रदेश के और राष्ट्र के निर्माण में जुट जाने का आह्वान किया. उन्होंने राज्य के एकमात्र महाविद्यालय के विकास एवं यहां फैकल्टी लाने का आश्वासन भी दिया. साथ ही, उन्होंने महाविद्यालय के दो विद्यार्थियों का आईसीएआर की राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना में संस्थागत विकास कार्यक्रम के अंतर्गत चयन होने एवं उन्हें उच्चस्तरीय मात्स्यिकी संस्थान में थाईलैंड में प्रशिक्षण के लिए भेजने के लिए अधिष्ठाता को बधाई दी.

मात्स्यिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. बीके शर्मा ने छात्रसंघ के पदाधिकारियों को महाविद्यालय के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने, शिक्षण सुविधाओं का लाभ उठाने एवं लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने में अपनी पूरी शक्ति से जुट जाने का आह्वान किया.

फेस औथेंटिकेशन फीचर वाला पीएम किसान मोबाइल एप लौंच

नई दिल्ली : 22 जून 2023. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी व किसानों को आय सहायता के लिए लोकप्रिय योजना “प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि” के अंतर्गत फेस औथेंटिकेशन फीचर का पीएम किसान मोबाइल एप केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लौंच किया.

आधुनिक टैक्नोलौजी के बेहतरीन उदाहरण इस एप से फेस औथेंटिकेशन फीचर का उपयोग कर किसान दूरदराज, घर बैठे भी आसानी से बिना ओटीपी या फिंगरप्रिंट के ही फेस स्कैनर के जरीए ईकेवाईसी पूरा कर सकता है और सौ अन्य किसानों को भी उन के घर पर ईकेवाईसी करने में मदद कर सकता है. भारत सरकार ने ईकेवाईसी को अनिवार्य रूप से पूरा करने की आवश्यकता समझते हुए किसानों का ईकेवाईसी करने की क्षमता को राज्य सरकारों के अधिकारियों तक भी बढ़ाया है, जिस से हरेक अधिकारी 500 किसानों के लिए ईकेवाईसी प्रक्रिया को पूरा कर सकता है.

कृषि भवन, नई दिल्ली में आयोजित इस समारोह से देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों में उपस्थित हजारों किसानों के साथ ही केंद्र व राज्य सरकारों के अधिकारी और विभिन्न सरकारी एजेंसियों एवं कृषि संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में वर्चुअल जुड़े थे.

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि भारत सरकार की बहुत ही व्यापक एवं महत्वाकांक्षी योजना है, जिस के क्रियान्वयन में राज्य सरकारों ने काफी परिश्रमपूर्वक अपनी भूमिका का निर्वहन किया है, इसी का परिणाम है कि लगभग साढ़े 8 करोड़ किसानों को केवाईसी के बाद हम योजना की किस्त देने की स्थिति में आ गए हैं. यह प्लेटफार्म जितना परिमार्जित होगा, वह पीएम किसान के काम तो आएगा ही, और किसानों को कभी भी कोई लाभ देना हो, तब भी केंद्र व राज्य सरकारों के पास पूरा डेटा उपलब्ध होगा, जिस से कोई परेशानी खड़ी नहीं हो सकेगी.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि पीएम किसान एक अभिनव योजना है, जिस का लाभ बिना किसी बिचौलियों के केंद्र सरकार किसानों को दे पा रही है. आज इतनी बड़ी संख्या में किसानों को टैक्नोलौजी की मदद से ही लाभ देना संभव हो पाया है. इस पूरी योजना के क्रियान्वयन पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं कर सकता है, जो बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि है. भारत सरकार ने टैक्नोलौजी का उपयोग कर के यह जो एप बनाया है, उस से काम काफी आसान हो गया है. भारत सरकार ने सभी आवश्यक सुविधाएं राज्यों को उपलब्ध करा दी हैं, अब राज्य ज्यादा तेजी से काम करेंगे, तो सभी हितग्राहियों तक हम पहुंच जाएंगे और निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे.

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार यह आग्रह करते रहे हैं कि योजना के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध है तो हम सेचुरेशन पर पहुंचे. उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में इस दिशा में काम चल रहा है, जिसे शीघ्र पूरा करने पर ज्यादा से ज्यादा संख्या में सभी पात्र किसानों को योजना की 14वीं किस्त मिल सकेगी. उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि इस संबंध में सभी राज्य सरकारें प्रवृत्त हों.

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि टैक्नोलौजी से कृषि क्षेत्र को लाभ हो रहा है और इस एप की नई सुविधा से भी किसानों को काफी सहूलियत होगी.

केंद्रीय कृषि सचिव मनोज अहूजा ने भी अपने विचार रखे. अतिरिक्त सचिव प्रमोद कुमार मेहरदा ने एप की विशेषताएं बताईं. कार्यक्रम का संचालन विभागीय सलाहकार मनोज कुमार गुप्ता ने किया.

इस अवसर पर कुछ राज्य सरकारों के अधिकारियों ने योजना व एप के लाभ से संबंधित अपने अनुभव भी साझा किए. युवाओं के जरीए भी एप से अधिकाधिक किसानों को जोड़ने का प्रयास किया जाएगा और निर्धारित मापदंडों के आधार पर इस में सहायक युवाओं को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा सर्टिफिकेट दिया जाएगा.

पीएम किसान दुनिया की सब से बड़ी डीबीटी योजनाओं में से एक है, जिस में किसानों को आधारकार्ड से जुड़े बैंक खातों में 6 हजार रुपए सालाना राशि, 3 किस्तों में सीधे हस्तांतरित की जाती है. 2.42 लाख करोड़ रुपए, 11 करोड़ से ज्यादा किसानों के खातों में शिफ्ट किए जा चुके हैं, जिन में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं हैं. कोविड के समय लौकडाउन के दौरान भी किसानों के लिए पीएम किसान योजना एक मजबूत साथी साबित हुई थी. योजना ने किसानों को सीधे वित्तीय सहायता प्रदान कर आवश्यक सुविधाओं को सुनिश्चित किया व कठिन समय में आत्मविश्वास प्रदान किया है. अब पीएम किसान पोर्टल पर आधार सत्यापन व बैंक खाता विवरण अपडेशन से संबंधित कठिनाइयों का डिजिटल पब्लिक गुड्स के प्रभावी उपयोग से समाधान हो गया.

पहली बार देखा गया है कि 8.1 करोड़ से अधिक किसानों को पीएम किसान की 13वीं किस्त का भुगतान सीधे उन के आधारकार्ड से जुड़े बैंक खातों में केवल आधार इनेबल्ड पेमेंट के जरीए सफलतापूर्वक किया गया, जो अपनेआप में एक कीर्तिमान है. नया एप उपयोग में बहुत सरल है, गूगल प्ले स्टोर पर आसानी से डाउनलोड हेतु उपलब्ध है. एप किसानों को योजना व पीएम किसान खातों से संबंधित बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारी भी प्रदान करेगा. इस में नो यूअर स्टेटस मौड्यूल उपयोग कर किसान लैंडसीडिंग, आधारकार्ड को बैंक खातों से जोड़ने व ईकेवाईसी का स्टेटस जान सकते हैं.

विभाग ने लाभार्थियों के लिए उन के दरवाजे पर आधारकार्ड से जुड़े बैंक खाते खोलने के लिए इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) को भी शामिल किया है और सीएससी को राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की मदद से ग्रामस्तरीय ईकेवाईसी शिविर आयोजित करने को कहा.

खरीफ में सब्जी,धान व दलहनी फसलों की उन्नत किस्में लगाएं

हर वर्ष की तरह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने खरीफ फसलों की बुआई को लेकर जरूरी सलाह व दिशानिर्देश जारी किए हैं. कृषि संस्थान ने किसानों को धान की नर्सरी तैयार करने की सलाह दी है, इसके साथ ही, अधिक उपज देने वाली किस्मों के चयन और बीजों के उपचार के लिए भी सलाह दी है

अगेती फसल से अधिक मुनाफा

कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार, यह समय अगेती फूलगोभी, टमाटर, हरी मिर्च और बैंगन की पौधशाला तैयार करने का उचित समय है.

मिट्टी जाँच कराने से फायदा

फसल लगाने से पहले अपने खेत की मिट्टी जांच करवाने का भी काम किसानों को कर लेना चाहिए. खेत की मिट्टी की जांच किसी प्रमाणित स्रोत से करवाएं. मिट्टी जांच के बाद मिले नतीजों के आधार पर खेत में खादबीजऔर उचित पोषक तत्वों वाले उर्वरक जमीन में डालें.

इसके अलावा अगर आप के खेत एकसार नहीं हैं तो लेजर लैंड लेबलर की मदद से खेत को समतल भी करा सकते हैं.

ऐसा करने से खेत में कहीं जलभराव भी नहीं होता और फसल से अधिक पैदावार भी मिलती है.

अपने क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजाति का चयन

इस समय धान की फसल का भी समय है. धान की अधिक पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों का चयन करे .अपने क्षेत्र के लिए धान की अधिक पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों का चयन करें. इस की जानकारी के लिए नजदीकी कृषि संस्थान से भी जानकारी ले सकते हैं.

खास किस्में : धान की खास किस्मों में पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1509,
पूसा बासमती 1885, पूसा बासमती 1886,
पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1637,
पूसा 44, पूसा 1718, पूसा बासमती 1401,
पूसा सुगंध 5, पूसा सुगंध 4 (पूसा 1121),
पंत धान 4, पंत धान 10 जैसी किस्में शामिल हैं.

ये सभी प्रजातियां किसानों को अच्छी पैदावार देने वाली हैं.

धान की नर्सरी

धान की नर्सरी तैयार करने के लिए नर्सरी की क्यारियों को लगभग 1.25 से 1.5 मीटर की लंबाई चौडाई के अनुसार बनाएं.

करें बीज उपचार

पौधशाला में पौध तैयार करते समय बुवाई से पहले, बीजों को उपचारित करें. इसके बाद, बीजों को बाहर निकालकर किसी छायादार स्थान में 24-36 घंटे तक टाट, बोरी आदि से ढककर रखें और हल्के-हल्के पानी की छिड़काव करते रहें. ताकि नमीं बनी रहे और बीजों का अंकुरण अच्छा हो सके.

अरहर की खेती के लिए

अरहर की अधिक उपज वाली किस्मों का चयन करें. इन दिनों अरहर की बुवाई कर सकते हैं. ध्यान रहे, जिस खेत अरहर की खेती करनी है उसमें पानी का ठहराव न हो. पानी निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए.
बीज से अच्छे अंकुरण के लिए बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का ध्यान रखना आवश्यक होता है.

अरहर की अधिक उपज देने वाली किस्में:

पूसा अरहर-16, पूसा 2001, पूसा 2002, पूसा 991, पूसा 992 आदि.

बीजोपचार करें

बीजों को बोने से पहले अरहर के लिए राईजोबियम और फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जीवाणुओं (पीएसबी) के टीकों से उपचार करें .इस उपचार से फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है.

मूंग उड़द की खेती

मूंग और उड़द की भी बोआई भी इस समय कर सकते हैं.

मूंग की उन्नत किस्में
मूंग की उन्नत किस्मों में
पूसा-1431, पूसा-1641,
पूसा विशाल,
पूसा-5931, एस एम एल-668.

उड़द की उन्नत और नई किस्में

उड़द की उन्नत किस्मों में टाईप-9, टी-31, टी-39 आदि की बुवाई कर सकते हैं.
सभी दलहनी फसलों को बोने से पहले उपचारित जरूर करें.

जरूरी सावधानियाँ

किसानों को फसल से अच्छी उपज लेने के लिए चाहिए कि वह समय से फसल बोयें. साथ ही खेत में जलभराव न होने दें. खेत में खरपतवार न पनपने दें. समय से निराईगुड़ाई करते रहें. साथ ही कीटबीमारी का भी ध्यान रखें.

लेजर लैंड लैवलर: खेत करे एकसार

फसल से बेहतर पैदावार लेने के लिए खेत का समतल होना जरूरी है. अगर खेत कहीं से ऊंचा या नीचा नहीं है तो उस खेत की पैदावार दूसरे असमतल खेतों से कहीं ज्यादा होगी. साथ ही, लागत भी कम होगी.

ऊंचेनीचे खेत में सिंचाई करते समय पानी पूरी तरह से समान रूप से नहीं फैल पाता है. इस वजह से खेत में कुछ जगहों पर खरपतवार पनपने लगते हैं और सभी पौधों व बीजों को सही अनुपात में पानी नहीं मिल पाता है, जिस से पैदावार पर बुरा असर पड़ता है. लेजर लैंड लैवलर मशीन का इस्तेमाल कर के किसान इस समस्या को दूर कर सकते हैं.

लेजर लैंड लैवलर

यह लैवलर 4 उपकरणों से मिल कर बनता है, जिन्हें लेजर ट्रांसमीटर, लेजर रिसीवर, कंट्रोल बौक्स व लैवलर कहते हैं.

लेजर ट्रांसमीटर : लेजर ट्रांसमीटर एक तिपाई स्टैंड पर लगा होता है, जो लेजर यानी तरंगों को ट्रैक्टर पर तेजी से भेजता है. इन तरंगों की मदद से खेत के ऊंचेनीचे हिस्सों का पता लगता है. यह औजार खेत के किसी भी हिस्से में रखा जा सकता है.

लेजर रिसीवर : यह औजार लैवलर के ऊपर लगा होता है. ट्रांसमीटर द्वारा भेजी गई तरंगों को यह लगातार पकड़ता रहता है और इस की सूचना कंट्रोल बौक्स को भेजता रहता है.

कंट्रोल बौक्स : यह औजार ट्रैक्टर के ऊपर लगाया जाता है. लेजर रिसीवर द्वारा हासिल तरंगों के मुताबिक ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक सिस्टम की मदद से लैवलर को ऊपरनीचे करता रहता है.

लैवलर : यह औजार ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक सिस्टम से जोड़ा जाता है, जो तीनों औजारों की मदद से खेत को एकसमान रूप से समतल करता है.

काम करने का तरीका

जब ट्रांसमीटर से तरंगें निकल कर रिसीवर से टकराती हैं, जो बकेट के ऊपर लगे स्टैंड पर बंधा होता है, तो रिसीवर किरणों के मध्य में रहते हुए चेन द्वारा जुड़े हुए कंट्रोल बौक्स को ऊपर या नीचे जाने के लिए सिग्नल भेजता है. कंट्रोल बौक्स में से उसी समय करंट हाइड्रोलिक सिस्टम को जाता है, जिस से हाइड्रोलिक तेल की सप्लाई बकेट के पीछे टायरों के बीच में लगे हाइड्रोलिक सिलैंडर को मिलती है. यह सिलैंडर टायरों को ऊपरनीचे करता है, जिस के विपरीत बकेट ऊपरनीचे होती रहती है.

बकेट आगेपीछे दोनों तरफ पिनों के साथ जुड़ी होती है, इसलिए उस पर जमीन के ऊंचानीचा होने का कोई असर नहीं पड़ता. बकेट को एक सीमित ऊंचाई पर बंधे होने से उस के आगे आने वाली मिट्टी कट कर आगे खिंची चली जाती है और जहां पर गड्ढा मिलता है, मिट्टी खुद ही बकेट के नीचे से निकल कर फैलती रहती है. इस तरह खेत समतल हो जाता है. ट्रैक्टर को ऊंचाई की तरफ से निचाई की दिशा में चलाना होता है, बाकी काम लेजर लैवलर द्वारा अपनेआप किया जाता है.

लेजर लैंड लैवलर के फायदे

* खेत में पानी, खाद और कीटनाशक दवाओं का एकसमान फैलाव होने से पैदावार बढ़ती है और मिट्टी समतल करने से समय की बचत होती है.

* पानी का पूरापूरा इस्तेमाल होता है और पानी की 30-40 फीसदी तक बचत होती है.

* फसल की पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* खरपतवारों में कमी आती है और खरपतवार काबू करने में काफी मदद मिलती है.

*  फसल एकसमान पकती है.

यंत्र की खरीद पर सरकार द्वारा सब्सिडी

लेजर लैंड लैवलर एक महंगा कृषि यंत्र है. इस यंत्र को इस्तेमाल करने के लिए ट्रैक्टर की भी जरूरत होती है.

इस यंत्र की खरीद पर सरकार द्वारा किसानों को सब्सिडी भी दी जाती है, जो अलगअलग राज्यों में कम या ज्यादा हो सकती है. आमतौर पर छोटे, सीमांतक महिला किसानों के लिए सरकार द्वारा 50 फीसदी तक सब्सिडी दी जाती है. बडे़ किसानों को यह सब्सिडी 40 फीसदी तक भी हो सकती है.

इस के अलावा कुछ शर्तें भी हैं, जिन का पालन करना भी जरूरी है. जैसे, किसानों को पोर्टल पर आवेदन करते समय यह निश्चित करना होगा कि वह अपने खेत में फसल अवशेष नहीं जलाएंगे.

ट्रैक्टरचालित यंत्रों के लिए यदि आवेदन किया है तो किसान के पास ट्रैक्टर भी होना चाहिए, जो उसी के नाम रजिस्टर्ड हो.

आवेदक के नाम या उस की पत्नी/पति/पिता/माता/पुत्र/पुत्री के नाम पर कृषि जमीन होनी चाहिए.

संबंधित वैबसाइट पर कृषि यंत्र निर्माताओं व यंत्र बेचने वालों की सूची भी होती है. अपनी सुविधानुसार मनपसंद डीलर से यंत्र लिया जा सकता है.

आम के फलों पर कीट नियंत्रण के उपायों को ले कर कार्यशाला का आयोजन

मुंबई : एशिया पैसिफिक प्लांट प्रोटेक्शन कमीशन ने भारत को नवंबर, 2022 के दौरान बैंकौक में आयोजित एशिया और पैसिफिक प्लांट प्रोटेक्शन कमीशन (एपीपीपीसी) के 32वें सत्र के दौरान 2023-24 के लिए कीट नियंत्रण उपायों को ले कर (आईपीएम) सर्वसम्मति से स्थायी समिति के द्विवार्षिक अध्यक्ष के रूप में चुना गया था. आम के फलों पर कीट नियंत्रण उपायों के प्रबंधन के लिए सिस्टम दृष्टिकोण पर कार्यशाला का आयोजन एपीपीपीसी और कृषि मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से 19 जून से 23 जून, 2023 तक वाशी, नवी मुंबई में किया जा रहा है.

भारत सरकार की कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने आशीष कुमार श्रीवास्तव, संयुक्त सचिव (पीपी), कृषि और किसान कल्याण विभाग, डा. युबकधोज जीसी, कार्यकारी सचिव, एपीपीपीसी सचिवालय, डा. एसएन सुशील, निदेशक, आईसीएआर-एनबीएआईआर, एमओए एंड एफडब्ल्यू और डा. जेपी सिंह, पीपीए, डीपीपीक्यूएस की उपस्थिति में कार्यशाला का उद्घाटन किया.

उद्घाटन भाषण में शोभा करंदलाजे ने विश्वभर में बाजार उपलब्ध कराने के लिए कीटनाशक और अवशेषमुक्त फलों और सब्जियों के उत्पादन पर जोर दिया है, ताकि किसानों की आय में वृद्धि की जा सके.

उन्होंने कामना की कि कार्यशाला से मिलने वाले लाभ वसुधैव कुटुंबकम के भारत के आदर्श वाक्य का प्रसार करेंगे.

उन्होंने आगे कृषि निर्यात/व्यापार, किए जाने वाले उपायों और निर्यात प्रोत्साहन के लिए मिल कर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया.

संयुक्त सचिव (पीपी) आशीष कुमार श्रीवास्तव ने अंतर्राष्ट्रीय पादप संरक्षण सम्मेलन (आईपीपीसी), एपीपीपीसी और जिंसों के सुरक्षित ट्रांसबाउंड्री मूवमेंट के लिए फाइटोसैनेटरी मिटिगेशन में उन की भूमिका के बारे में जानकारी दी है.

इतना ही नहीं, उन्होंने भारत में आम के लिए सिस्टम के कार्यान्वयन पर अपने अनुभव साझा किए. इस सिलसिले में उन्होंने कृषि पंजीकरण/राज्य कृषि विभाग के साथ बाग पंजीकरण, किसान स्तर पर एकीकृत कीट प्रबंधन के आवेदन, कीट की नियमित निगरानी और कीट के समय पर प्रबंधन द्वारा सभी महत्वपूर्ण कृषि वस्तुओं के लिए सिस्टम दृष्टिकोण के विकास पर जोर दिया, जिस से सभी किसान यहां तक कि छोटे और सीमांत किसान भी निर्यात गुणवत्ता वाली उपज का उत्पादन कर सकें और कड़े उपचार से बचा जा सके.

आईसीएआर-एनबीएआईआर के निदेशक डा. एसएन सुशील ने पादप स्वच्छता उपायों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुरूप भारत में सिस्टम दृष्टिकोण के सफल कार्यान्वयन की जानकारी दी और विशेष रूप से ग्रेपनेट के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यताप्राप्त सिस्टम दृष्टिकोण को याद किया.

डीपीपीक्यू एंड एस के पौध संरक्षण सलाहकार और एपीपीपीसी-आईपीएम की स्थायी समिति के अध्यक्ष डा. जेपी सिंह ने अपने स्वागत भाषण में किसानों के पंजीकरण, किसानों द्वारा अच्छी कृषि पद्धतियों को अपनाने, कीट निगरानी और फाइटोसैनेटरी के माध्यम से भारत में सिस्टम और कीटनाशकमुक्त वैश्विक व्यापार के लिए उपचार के कार्यान्वयन की यात्रा साझा की.

एपीपीपीसी सचिवालय के कार्यकारी सचिव डा. युबकधोज ने कहा कि यह क्षमता विकास कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कृषि उत्पाद के सीमापारीय आवागमन के दौरान फ्रूटफ्लाई के प्रबंधन के लिए व्यावहारिक उपाय प्रदान करेगा.

एपीडा के निदेशक तरुण बजाज, कृषि के निर्यात में एपीडा (एपीईडीए) की भूमिका और भारत द्वारा लगभग 60 मिलियन डालर के ताजा आम का निर्यात करने की व्याख्या की.

बंगलादेश, इंडोनेशिया, लाओ, मलेशिया, नेपाल, फिलीपींस, समोआ, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम, भूटान के प्रतिभागियों ने कार्यशाला में प्रत्यक्ष रूप से और शेष देशों ने वर्चुअल रूप से भाग लिया. इस के अलावा, डीपीपीक्यूएस, फरीदाबाद, एपीईडीए, एमएसएएमबी के अधिकारियों और गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के राज्य के बागबानी विभाग के अधिकारियों ने कार्यशाला में हिस्सा लिया.

5 दिनों की कार्यशाला के दौरान आम के फलों पर कीट नियंत्रण उपायों के लिए सिस्टम के दृष्टिकोण पर विचारविमर्श, सभी प्रासंगिक आईएसपीएम की समीक्षा, आम कीट के लिए प्रीहार्वेस्ट इंटीग्रेटेड प्लांट हेल्थ मैनेजमेंट और एनपीपीओ केस स्टडी पर चर्चा की जाएगी और उक्त कार्यशाला में उपचार सुविधा और आम के बगीचे का दौरा भी किया जाएगा.