कलमी साग (Kalmi Saag) या करमुआ की उन्नत खेती

पोषक गुणों से भरपूर प्रचलित शाकसब्जियों के अलावा कुछ ऐसी भी सब्जियां हैं, जो आमतौर पर मिट्टी और पानी दोनों जगहों पर बहुत कम लागत और मेहनत में उगाई जा सकती हैं.

चूंकि ऐसी शाकसब्जियों का बहुत ज्यादा व्यावसायिक उत्पादन नहीं किया जा रहा है. ऐसे में अगर किसान कम चलन वाली पोषक गुणों से भरपूर इन शाकसब्जियों की खेती करें, तो अच्छा मुनाफा कमा सकते है.

ऐसा नहीं है कि ऐसी शाकसब्जियों की खेती बड़े लेवल पर नहीं होती है, तो बाजार नहीं मिलेगा, क्योंकि इस में से कुछ ऐसी भी हैं, जिन्हें आमतौर पर हर व्यक्ति जानता है और उस के खास स्वाद व पोषक गुणों के चलते पसंद भी करता है. मगर बाजार में ज्यादा आवक न होने के कारण लोगों तक इन की पहुंच नहीं हो पा रही है. इन्हीं में एक है करमुआ का साग, जिसे आमतौर पर जलीय पालक, वाटर पालक, कलमी साग, स्वेम्प कैबेज, करेमू साग, वाटर स्पिनेच या नारी साग के नाम से भी जाना जाता है. यह साग आमतौर पर तालाबों में अपनेआप उगता है और विकसित होता है. लेकिन इस की कई उन्नत किस्में भी हैं, जिन का तालाब और खेत दोनों में खेती किया जाना आसान है.

कलमी साग खाने में जितना लजीज होता है, उस से कहीं ज्यादा इस में मौजूद पोषक तत्व इसे खास बनाते हैं. कलमी साग के संपूर्ण भाग का उपयोग खाने में किया जाता है.

आमतौर पर इस के पौधे लतादार होते हैं, जो पानी पर तैरते रहते हैं. यह मुख्यतया उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिसा एवं कर्नाटक में साग के लिए उगाया जाता है. विश्व स्तर पर कलमी साग को थाईलैंड एवं मलयेशिया में भी व्यावसायिक स्तर पर उगाया जाता है, जिस का निर्यात जरमनी, बेल्जियम एवं कनाडा को किया जाता है. सामान्यतः इसे 2 वर्षीय या बहुवर्षीय साग के रूप में उगाया जा सकता है. कलमी साग के पत्ते एवं तने से सब्जी एवं मुलायम भाग को सलाद के रूप में प्रयोग करते हैं.

पोषक तत्वों से है भरपूर

कलमी साग में प्रचुर मात्रा में विटामिन्स पाए जाते हैं, जिस में विटामिन ए, विटामिन सी, ई, के, विटामिन के अलावा डायटरी फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, कौपर, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, जिंक आदि भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है.

यह एक शुगर फ्री साग है, इसलिए इसे डायबिटीज के मरीज भी आसानी से खा सकते हैं. इस साग में वसा एवं ऊर्जा मूल्य कम होती है, जबकि जटिल कार्बोहाइड्रेटस की मात्रा अधिक होती है. यह शरीर में कोलेस्ट्रोल के स्तर को कम करने में मददगार है. शाकाहारी व्यक्तियों के लिए यह साग सस्ते प्रोटीन का एक उपयुक्त विकल्प है.

कलमी साग में लौह तत्व यानी आयरन (3.9 (1,980 माइक्रोग्राम), विटामिन सी (37 मिलीग्राम) एवं राइबोफ्लेविन (0.13 मिलीग्राम) प्रति 100 ग्राम खाने योग्य वजन में पाया जाता है. कलमी साग के सभी भागों में औषधीय गुण पाया जाता है, जो प्रमुख रूप से उच्च रक्त चाप यानी हाई ब्लड प्रेशर को ठीक करने में लाभदायक होता है.

यह साग अफीम एवं आर्सेनिक की विषाक्तता को दूर करने के उपायों में भी काफी लाभप्रद होता है. बहुधा यह घबराने की बीमारी, सामान्य कमजोरी, बवासीर, कीटों द्वारा संक्रमण, ल्यूकोडरमा, कुष्ठ रोग, पीलिया, आंख की बीमारी एवं कब्जियत के निदान में भी लाभदायक पाया गया है.

खेती के लिए मिट्टी का चयन

कलमी साग आमतौर पर तालाब और पोखरों में उगाया जाता रहा है, लेकिन बीते कुछ सालों में इस की उन्नत किस्मों के विकास ने इसे सामान्य खेत में उगाए जाने के रास्ते खोल दिए हैं. अब इसे आसानी से अपनी गृहवाटिका में सिंचाई की व्यवस्था द्वारा उगाया जा सकता है.

वर्षा ऋतु में यह हरी पत्तेदार सब्जी के रूप में बाजार में उपलब्ध होता है. इस की खेती के लिए अधिक नमी वाली भूमि की आवश्यकता होती है. ऐसी भूमि, जिस में पानी अधिक देर तक रुकता है, इस की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है. भारी चिकनी मिट्टी, जिस का पीएच मान 5.5-7.0 के मध्य होता है, इस की बढ़वार के लिए उपयुक्त होती है.

उन्नत किस्में

आमतौर पर देश में कलमी साग की खेती देशी किस्मों पर निर्भर रही है, लेकिन उन्नत किस्मों के विकास ने इस के व्यावसायिक खेती के दरवाजे खोल दिए हैं. बीते सालों में भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर), वाराणसी द्वारा कलमी साग की ‘काशी मनु’ नाम से एक उन्नत किस्म विकसित की गई है, जिसे पानी के अलावा गमलों या गीली जमीन पर भी आसानी से उगाया जा सकता है.

कलमी साग (Kalmi Saag)

बोआई या पौध रोपण

अगर किसान कलमी साग की व्यावसायिक खेती करना चाहते हैं, तो ‘काशी मनु’ प्रजाति के बीजों से पहले नर्सरी तैयार कर रोपाई करें, तो इस का बेहतर परिणाम मिलता है. यह ध्यान रखें कि 2 साल से ज्यादा पुराना बीज न हो, अन्यथा जमाव की समस्या हो सकती है.

नर्सरी में बीज डालने के 24 घंटे पहले पानी में बीज भिगोने से जमाव अच्छा होता है. पौध तैयार करने के लिए जूनजुलाई का महीना सर्वोत्तम होता है. नर्सरी में बीज की बोआई के बाद 5-6 दिनों में जमाव होता है और 5-6 सप्ताह पुरानी पौध रोपण के लिए उपयुक्त होती है.

पौधों की रोपाई 30 x 20 सैंटीमीटर की दूरी पर की जानी चाहिए. कलमी साग का प्रसारण जड़युक्त लताओं द्वारा भी होता है. कलम तैयार करने के लिए 10-20 सैंटीमीटर लंबे, 4-8 गांठ वाले तने उपयुक्त होते हैं. एक हेक्टेयर के खेत में रोपण के लिए 1,70,000 कलमों की जरूरत होती है.

अप्रैलजून का महीना कलम रोपण के लिए अच्छा माना जाता है. इस समय लगाई गई कलमों में बढ़वार अधिक होती है. सूखे खेत में रोपण के लिए ऊंची क्यारियों और उन के साथ नालियां  बनानी चाहिए.

रोपण के पहले फसल को पर्याप्त पोषक तत्व दिए जाने चाहिए. पौध लगाने के बाद नाइट्रोजन 40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए. प्रत्येक फसल कटाई के बाद एक जैविक तरल उर्वरक के प्रयोग से अच्छी पैदावार होती है. नालियों में पानी भर कर सिंचाई का काम एवं अत्यधिक पानी भरने की दशा में जल निकासी का इंतजाम करना चाहिए. गीले खेत में रोपण के लिए खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खेत में कलमों को लगा दिया जाता है और कलमों को लगाने के बाद 15-20 सैंटीमीटर गहरा पानी भर दिया जाता है.

कीट एवं बीमारियों का नियंत्रण

कलमी साग के मुख्य फफूंदजनित रोगों में स्टेम राट एवं ब्लैक राट आते हैं. इन रोगों की रोकथाम के लिए रोगरहित भूमि का उपयोग करना चाहिए और तीसरेचौथे साल के अंतराल पर फसल चक्र अपनाना चाहिए. इस में लगने वाले महत्वपूर्ण कीट पत्ती बीटल, एफिड्स और तार कीड़े हैं.

अगर फसल में उपरोक्त कीट व बीमारियों का प्रकोप दिखाई देता है, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक फसल सुरक्षा से संपर्क कर सकते हैं.

कटाई एवं उपज

कलमी साग के पौधे नर्सरी से खेत में रोपने 35-40 दिनों बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. कटाई के दौरान ऊपर की हरी पत्तियों के साथ टहनियों को पानी की सतह से काट लिया जाता है. इस से नई शाखाएं निकलती हैं और पौधे की बढ़वार तेज गति से होती है.

सामान्यतया गरमी एवं बरसात के मौसम में हर एक सप्ताह बाद कटाई की जाती है. सब्जी के रूप में एक महीने में 4-5 कटाई की जाती है. जब पौधे में फूल आना शुरू हो जाता है, तब कटाई रोक दी जाती है.

दक्षिण एवं मध्य भारत में कलमी साग में अक्तूबरनवंबर महीने में फूल आता है. जुलाई से सितंबर के बीच इस के एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 50-60 क्विंटल हरी पत्तियों की उपज प्राप्त होती है. कलमी साग का आमतौर पर बाज़ार मूल्य 40 से 50 रुपया प्रति किलोग्राम होता है.

बजट 2024: एक बार फिर हाशिए पर किसान

    •  प्रधानमंत्री के नाम से जुड़ी किसानों की लगभग सभी योजनाओं की बजट राशि में भारी कटौती की गई है. यही वजह है कि कई कृषि व किसान योजनाएं बंद होने की कगार पर हैं.
    • कर्जमाफी और एमएसपी कानून का कहीं कोई जिक्र तक नहीं है.
    • प्राकृतिक खेती के लिए 366 करोड़ रुपए, जबकि रासायनिक उर्वरकों के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपए यानी प्राकृतिक खेती की तुलना में तकरीबन 500 गुना ज्यादा का प्रावधान.

‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां फिर भी कम निकले..’ बजट 2024 के संदर्भ में मिर्जा गालिब का यह शेर देश के किसानों पर बिलकुल सटीक बैठता है. इस बजट से सब से ज्यादा निराशा देश के किसानों को हुई है.

यों तो पिछले कुछ सालों से सरकार दूसरे सैक्टरों की तुलना में कृषि एवं किसानों की योजनाओं और अनुदानों पर लगातार डंडी मारती आई है, किंतु चूंकि यह बजट आगामी लोकसभा चुनाव के ठीक पहले का बजट था, इसलिए देश की आबादी के सब से बड़े तबके के किसानों ने इस बजट से कई बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं.

जले पर नमक यह है कि अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यों तो कई बार देश के अन्नदाता किसानों का जिक्र किया और उन्हें देश की तरक्की का आधार भी बताया, किंतु उन के बजट का अध्ययन करने पर यह साफ हो जाता है कि उन के इस जिक्र का और किसानों को ले कर उन की तथाकथित फिक्र का बजट आबंटन पर रत्तीभर भी असर नहीं है. सच तो यह है कि कृषि से जुड़ी अधिकांश योजनाओं के बजट में इस बार बड़ी बेरहमी से कटौती की गई है.

हमारे यहां का किसान इस देश का पेट भरने के प्रयास में गले तक कर्ज में डूबा हुआ है, पर बजट में कर्जमाफी का जिक्र तक नहीं है. किसानों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की नाराजगी को दूर करने के लिए कर्जमाफी के साथ ही देशभर के किसानों की बहुप्रतीक्षित जरूरी मांग, हरेक किसान की हर फसल को  अनिवार्य रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने के लिए एक ‘सक्षम न्यूनतम समर्थन मूल्य गारंटी कानून‘ की घोषणा अवश्य करेंगे.

किसान ज्यादा आशावान इसलिए भी थे, क्योंकि नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुए स्वयं किसानों के लिए ‘एमएसपी गारंटी कानून‘ की अनिवार्यता की लगातार वकालत तत्कालीन केंद्र सरकार के सामने करते रहे हैं. अब जबकि पिछले 10 साल से गेंद उन के ही पाले में अटकी पड़ी हुई है, तो किसानों को उम्मीद थी कि शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार उन के हित में गोल दाग ही दें. परंतु उन्होंने तो गोल करने की तो बात ही छोड़िए, गेंद की ओर देखा तक नहीं.

किसानों से संबंधित कुछ योजनाओं और उन्हें आवंटित बजट का ईमानदारी से हम बिंदुवार विश्लेषण करेंगेः

– पीएम किसान सम्मान निधि की राशि 6,000 रुपए से बढ़ कर 12,000 करने और इस के दायरे में सभी किसानों को लाने की बात भी, जब से यह योजना लागू हुई है, तब से की जा रही है, जबकि हुआ उलटा. इस संदर्भ में मीडिया के आंकड़े कहते हैं कि इस योजना की शुरुआत में तकरीबन 13.50 करोड़ किसानों को स्वनाम धन्य प्रधानमंत्री के नाम से ‘पीएम किसान सम्मान निधि‘ दिया जाना प्रारंभ हुआ था अर्थात जब योजना शुरू हुई, तो मानो पूर्णमासी के चंद्रमा की तरह थी, किंतु 11वीं किस्त पहुंचतेपहुंचते क्रमशः घटतेघटते द्वितीया के चांद की तरफ एकदम सिकुड़ के रह गई.

जी हां, इस योजना के लाभार्थियों की संख्या घटतेघटते केवल साढे़ 3 करोड़ रह गई. सरकार ने लगातार इस योजना से बहुसंख्य किसानों को अपात्र घोषित कर बाहर का रास्ता दिखाया और इस के लाभार्थी  किसानों की संख्या और इस की राशि और किस्त दर किस्त कम होती चली गई.

कोढ़ में खाज तो यह कि बहुसंख्यक किसानों को अपात्र घोषित करते हुए पहले उन के खातों में जमा की गई राशि अब कड़ाई से वसूली करने की कार्यवाही भी जारी है. इन किसानों का सम्मान भी गया और निधि भी जा रही है.

सवाल यह है कि इन लाभार्थी किसानों की सूची सरकारी विभागों ने बनाई, उन के बैंक खाते बैंक के अधिकारियों ने खोले और उन में राशि प्रधानमंत्री ने डाली, फिर इन में हुई गलतियों का जिम्मेदार किसान कैसे हो गया?

यद्यपि गत वर्ष के समान इस बार भी इस योजना के लिए 60,000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान है, पर आगे कितने किसानों तक यह पहुंचेगी, यह अभी भी पूरी तरह से तय नहीं है. मतलब साफ है कि अब इस योजना में शेष सभी वंचित किसानों के लिए दरवाजे बंद हैं और आगे सम्मान निधि की राशि बढ़ाए जाने के भी फिलहाल कोई आसार नहीं हैं.

– कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की अगर बात करें, तो इस का पिछला बजट 1.25 लाख करोड़ रुपए का था, जबकि इस वर्ष का बजट 1.27 लाख रुपए रखा गया है.

अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से देखें, तो वर्तमान महंगाई दर एवं मुद्रा स्फीति को देखते हुए यह बजट पिछले साल के बजट से भी कम है.

– किसानों को बाजार के उतारचढ़ाव से बचाने के लिए 2022-23 में शुरू की गई ‘मार्केट इंटरवेंशन स्कीम एंड प्राइस सपोर्ट स्कीम‘ के लिए 4,000 करोड़ रुपए दिए गए थे. इस वर्ष इस की राशि और बढ़ाए जाने का अनुमान था, किंतु इस बार इस योजना के लिए राशि आवंटित नहीं की गई. शायद, यह योजना भी अब लपेट के किनारे रखी जाने वाली योजनाओं में शामिल होने वाली है.

– बजट का एक और दिलचस्प पहलू देखिए. पहली बात तो यह कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने  बजट में दावा किया कि 4 करोड़ किसानों को बीमा लाभ के दायरे में लाया गया, जबकि देश में तकरीबन 20 करोड़ किसान परिवार हैं अर्थात केवल 20 फीसदी किसान ही बीमा लाभ प्राप्त कर पाते हैं, बाकी 80 फीसदी किसानों की फसल पूरी तरह चैपट भी हो जाए, उन्हें तबाही से बचाने की कोई स्कीम नहीं है.
दूसरी बात यह कि प्रधानमंत्री के नाम पर ही घोषित इस ‘पीएम फसल बीमा योजना‘ के बजट में भी कटौती कर दी गई है. इस योजना के लिए 14,600 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है, जबकि पिछले साल इस के लिए 15,000 करोड़ रुपए का प्रावधान था.

– इसी तरह प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण योजना (पीएम आशा) का बजट मौजूदा वित्त वर्ष में 2,200 करोड़ रुपए के संशोधित अनुमान से 463 करोड़ की कटौती कर के 1,737 करोड़ रुपए किया गया है.

-प्रधानमंत्री की ही किसानों के लिए एक और योजना ‘पीएम किसान संपदा योजना‘ पर कैंची चली है. इस के लिए 729 करोड़ का बजट प्रावधानित किया गया है, जबकि पिछली बार 923 करोड़ रुपए था.

-प्रधानमंत्री के ही नाम पर चलने वाली एक और महत्वाकांक्षी योजना  ‘पीएम किसान मान धन योजना‘ का बजट 138 करोड़ रुपए के संशोधित अनुमान से घटा कर 100 करोड़ रुपए कर दिया है. जाहिर है, यह योजना भी सिकुड़ती जा रही है.

– देश में शाकाहारियों के भोजन में प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं दालें. राज्यों में दालों के लिए सरकार ने पिछले बजट में 800 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था, लेकिन इस बार इस योजना को भी बजट नहीं मिला है. मतलब, यह योजना भी अब बंद होने के कगार पर है.

– अजबगजब: आश्चर्यजनक तथ्य है कि सरकार सालभर जैविक व प्राकृतिक खेती का गाना गाती है, खूब ढोल पीटती है, खूब सैमिनार वगैरह का आयोजन करती है, पर बजट देते समय रासायनिक खाद पर दी जा रही सब्सिडी की तुलना में चिड़िया के चुग्गा बराबर बजट भी जैविक खेती को नहीं देती. प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बजट में कटौती हुई है.

goatजरा इन आंकड़ों पर गौर फरमाएं ‘प्राकृतिक राष्ट्रीय मिशन‘ का पिछले साल का बजट 459 करोड़ रुपए था, जिसे घटा कर 366 करोड़ रुपए कर दिया गया है, जबकि रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी के लिए इस बजट में 1.64 लाख करोड़ रुपए यानी प्राकृतिक खेती की तुलना में लगभग 500 गुना ज्यादा का प्रावधान किया गया है. (हालांकि यह भी पिछले बजट में 1.75 लाख करोड़ रुपए और संशोधित अनुमान में 1.89 लाख करोड़ से लगभग 10 फीसदी कम है). पोषक तत्वों के लिए इस वित्तीय वर्ष के लिए संशोधित अनुमान 60,000 करोड़ रुपए का था, जबकि इस बजट में 45 हजार करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया है, सीधेसीधे 25 फीसदी की कटौती.

– खेतीकिसानी के उत्थान और ग्रामीण बाजार को मजबूत बनाने के दृष्टिकोण से देश में 10,000 एफपीओ गठित करने की योजना भी इस बजट में कटौती की कैंची से नहीं बच पाई है. पिछले बजट में एफपीओ  के लिए 955 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, इस बार इसे भी घटा कर 582 करोड़ रुपए कर दिया है अर्थात एफपीओ योजना भी अब सरकार की प्राथमिकता में नहीं है.

कुलमिला कर यह आईने की तरफ साफ है कि बजट भाषण में अन्नदाता किसान का चाहे जितनी बार जिक्र हुआ हो, पर असल में देश का किसान सरकार की प्राथमिकता में कहीं नहीं है. सरकार इन किसानों को अपनी प्राथमिकता में भला रखे भी क्यों? सरकार को आखिरकार मतलब होता है वोटों से, वोट बैंक से, जिस से उन की सरकार बनती है. जबकि आज भी देश में किसानों का वोट बैंक नाम की कोई चीज ही नहीं है.

किसान मौसम की मार, बाजार की मार, महंगाई की मार सब कमोबेश एक बराबर, एकसाथ झेलते हैं, पर जब वोट देने मतदान केंद्र के भीतर पहुंचते हैं, तो वे किसान नहीं रह जाते. अचानक वे किसान के बजाय ठाकुर, ब्राह्मण, यादव, भूमिहर, कुर्मी, सवर्ण, दलित, आदिवासी, गैरआदिवासी, हिंदू, मुसलिम आदि अनगिनत खांचो में बंट जाते हैं. इन्हीं अनगिनत खांचों में बंट जाता है किसानों का वोट बैंक. ये शातिर राजनीतिक पार्टियां किसानों की इस कमजोरी का लगातार फायदा उठाती आई हैं.

इस के अलावा छोटे, बड़े ,मझोले, सीमांत किसान आदि अलगअलग किसान तबकों में बांट कर अनुदान की बोटी फेंक कर इन किसानों को आपस में लड़ाती रहती है, क्योंकि केवल 38-40 फीसदी वोट पा कर देश की सत्ता की गद्दी पर बैठने वाली ये सरकारें भलीभांति जानती हैं कि देश के किसान और किसानों से जुड़े परिवारों की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 70 फीसदी है. यह 70 फीसदी समग्र किसान मतदाता जिस दिन एकमत हो कर तय कर लेंगे, वे इन किसान विरोधी पार्टियों को अपनी उंगलियों पर नचाएंगे. वे जिसे चाहेंगे, उसे अपनी शर्तों पर सत्ता में बिठाएंगे और जो कृषि और किसान विरोधी होगा, उसे जब चाहेंगे तब सत्ता से बेदखल कर देंगे.

हालांकि हालफिलहाल ऐसा कोई चमत्कार घटित होता नहीं दिखाई देता, परंतु यह भी निश्चित रूप से तय है कि एक दिन यह अवश्य होगा, हो कर रहेगा… और वह दिन बहुत ज्यादा दूर नहीं है.

गरमियों में उड़द की खेती: 15 फरवरी से 15 मार्च तक करें बोआई

गरमियों में विभिन्न दलहनी फसलों में उड़द की खेती का विशेष स्थान है. उड़द की खेती के फायदों को देखते हुए जहां पानी की व्यवस्था हो, वहां उड़द की खेती इस समय जायद में की जा सकती है. इस की खेती करने से अतिरिक्त आय, खेतों का खाली समय में सदुपयोग, भूमि की उपजाऊ शक्ति में सुधार, पानी का सदुपयोग आदि के कई फायदे बताए गए हैं और यह भी बताया कि रबी दलहनी फसलों में हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई भी हो जाएगी.

जलवायु

उड़द में गरमी सहन करने की कूवत अधिक होती है. इस की वृद्धि के लिए 27-35 सैंटीग्रेट तक तापमान अच्छा रहता है.

मिट्टी एवं खेत की तैयारी

उपजाऊ एवं दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 6.3 से 7.3 तक हो और जल निकास की व्यवस्था हो तो अच्छी होती है.

बोआई का उचित समय

उड़द फसल की बोआई 15 फरवरी से 15 मार्च तक अवश्य कर दें. देर से बोआई करने से फूल एवं फलियां गरम हवा के कारण और वर्षा होने से क्षतिग्रस्त हो सकती है.

उन्नतशील किस्में

वल्लभ उड़द -1, प्रताप उड़द-1, पंत उड़द-10, आईपीयू-11-2, आईपीयू-13-1 है. यह किस्में सिंचित इलाकों में गरमियों के मौसम में उगाई जाती है, जो 75 से 80 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. इस की पैदावार प्रति एकड़ 4 से 5 क्विंटल है.

बीज की मात्रा, बीजोपचार एवं दूरी

गरमियों में उड़द का पौधा कम बढ़ता है. 10 -12 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में डालना चाहिए. कूंड़ों में 4-5 सैंटीमीटर की गहराई पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25- 30 सैंटीमीटर और पौधों से पौधों की दूरी 10 सैंटीमीटर पर बोने से जमाव ठीक होता है.

उड़द के बीजजनित रोगों से बचाव के लिए उपचार हेतु प्रति किलोग्राम बीज में 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करें. इस के बाद बोने के 8-10 घंटे पहले 100 ग्राम गुड़ को आधा लिटर पानी में घोल कर गरम कर लें. ठंडा होने के बाद उड़द

के राईजोबियम कल्चर के एक पैकेट को गुड़ वाले घोल में डाल कर मिला लें और उसे बीजों पर छिड़क कर हाथ से अच्छी तरह से मिला दें, जिस से प्रत्येक दाने पर टीका चिपक जाए. इस के बाद बीज को छाया में सुखा कर बोआई करनी चाहिए.

खाद ए्वं उर्वरक प्रबंधन

मिट्टी जांच के आधार पर खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करें. आमतौर पर 40 किलोग्राम डीएपी, 13 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश एवं 50 किलोग्राम. फास्फोजिप्सम प्रति एकड़ में प्रयोग से उपज मे विशेष बृध्दि होती है. बोआई के समय उर्वरक कूड़ों में देनी चाहिए.

सिंचाई

सिंचाई भूमि के प्रकार, तापमान एवं हवा की तीव्रता पर निर्भर करती है. 3-4 सिंचाई प्रर्याप्त होती है, पहली सिंचाई बोआई के 30 से 35 दिन के पश्चात करें. पहली सिंचाई बहुत जल्दी करने से जड़ों और ग्रंथियों का विकास ठीक से नहीं होता है. बाद में जरूरत के मुताबिक 10-15 दिन पर हलकी सिंचाई करें. बोआई के 50-55 दिन बाद सिंचाई न करें. स्प्रिंकलर से सिंचाई ज्यादा लाभप्रद होती है.

खरपतवार प्रबंधन

गरमी में खरपतवार कम उगते हैं, फिर भी बोआई के क्रांति काल (बोआई के 20-25 दिन पश्चात) तक खरपतवारमुक्त फसल रखना आवश्यक है.

तोड़ाई

जब फलियां अच्छी तरह से पक जाएं, तो उन फलियों की तुड़ाई कर सकते हैं. फलियां तोड़ने के बाद फसल को खेत में दबाने से फसल हरी खाद का काम करती है और खेत को मजबूती मिलती है.

औषधीय फसल पीली सतावर की उन्नत खेती

हमारे देश की जलवायु ऐसी है, जो तमाम तरह के औषधीय पौधों की खेती के लिए उपयुक्त है. इस से तमाम तरह के लाभदायक औषधीय पौधों की खेती कर के अत्यधिक मुनाफा कमाया जा सकता है, क्योंकि वर्तमान परिवेश में लोगों का हर्बल दवाओं की तरफ रुझान भी तेजी से बढ़ा है. इस की एक प्रमुख वजह इन दवाओं का शरीर पर किसी तरह का बुरा प्रभाव न पड़ना भी है.

औषधीय पौधों की खेती में कम जोखिम होने के कारण हाल के दशक में किसानों का रुझान काफी तेजी से इस की तरफ बढ़ा है. इस की एक वजह यह भी है कि सरकार की तरफ से औषधीय फसल के लिए जरूरी अनुदान मुहैया कराना भी रहा है. इसी के साथ प्रोसैसिंग, पैकेजिंग व मार्केटिंग में भी सरकार जरूरी सहयोग समयसमय पर मुहैया कराती रहती है.

कई जागरूक किसानों ने औषधीय पौधों की खेती में कामयाबी हासिल की है, जिस से उन की खेती की तकनीकी, बीज, रोपाई व मार्केटिंग में दिलचस्पी लेने लगे हैं.

इन्हीं औषधीय पौधों में पीली सतावर की खेती को अपना कर किसान दूसरी फसलों की अपेक्षा अत्यधिक मुनाफा ले सकते हैं. इस का वानस्पतिक नाम एस्पेरेगस रेसमोसुस है. इस के दूसरे नाम शतावर, सतमूली, सतवीर्या या बहुसुता भी है.

पीली सतावर एक कांटेदार आरोही लता है. इस की पत्तियां नुकीली व चिकनी होती हैं. इस की लंबाई 3-5 फुट तक और जडे़ं गुच्छों में 15-50 सैंटीमीटर तक लंबी होती हैं, जिस में एक पौधे से औसतन 10-14 किलोग्राम जड़ हासिल की जा सकती है.

सतावर की जड़ व बीजों की मांग बाजार में अत्यधिक बनी हुई है. इस की सूखी जड़ों की प्रोसैसिंग कर के इन को विदेशी बाजारों में बेच कर अत्यधिक लाभ कमाया जा सकता है, जबकि नामीगिरामी दवा कंपनियां भारत में भी किसानों को सतावर की उपज की अच्छी कीमत दे रही हैं. सतावर की जड़ का प्रयोग कई तरह के टौनिक, कैप्सूल व बलवर्धक दवाआंे को बनाने में इस्तेमाल किया जाता है.

मिट्टी का चयन

सतावर के नर्सरी और रोपाई के लिए बलुई दोमट और जीवांश के मात्रा की अधिकता वाली जमीन उपयुक्त होती है. साथ ही, सतावर की फसल में पानी की उचित व्यवस्था भी जरूरी है.

उपयुक्त जलवायु

सतावर की खेती के लिए भारत की समस्त जलवायु उपयुक्त है. इस की खेती मैदानी, पहाड़ी, पठारी आदि सभी जगहों पर की जा सकती है.

बीजों का शोधन

नर्सरी में सतावर के बीजों को डालने से पहले बीजों का शोधन बहुत जरूरी है. 5 किलोग्राम बीजों को 15 ग्राम थीरम या कार्बंडाजिम से शोधित करें. बीजों के शोधन के लिए बायोपैस्टी साइड का प्रयोग करना चाहिए. अगर सतावर में उकठा रोग की आशंका है, तो राइजोबियम कल्चर का प्रयोग भी उपयुक्त होता है.

सतावर की नर्सरी

सतावर की खेती के लिए सब से पहले इस की नर्सरी तैयार की जाती है. इस के लिए दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. इस की 2 जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरा बना लिया जाता है, फिर इस में गोबर की सड़ी खाद नाडेप कंपोस्ट या केंचुआ खाद को मिला कर जीवांशयुक्त बना लेते हैं. इस के उपरांत 5ग्5 फुट की क्यारियां बना कर मध्य मई से मध्य जून तक सतावर के बीजों को नर्सरी में डाल दिया जाता है.

जब पौधा एक से डेढ़ सैंटीमीटर का हो जाए, तो इस में जैव खाद को छिटकवां विधि से डाल देना चाहिए. इस से नर्सरी में पौधा स्वस्थ होता है. 75 दिनों के पश्चात सतावर के पौधे को खेत में 15 अगस्त के पहले रोपा जाता है, तो 18 माह में इस की खुदाई कर ली जाती है और 15 अगस्त के बाद रोपित करने पर 24 माह बाद खोदा जाता है.

खेती की तैयारी

सतावर को खेत में रोपने से पहले खेत की अच्छी तरह से एक जुताई हैरो या रोटावेटर से कर के उस के पश्चात 2 जुताई कल्टीवेटर से की जाती है. जुताई के बाद 80 टन प्रति हेक्टेयर कंपोस्ट की सड़ी खाद और 50 ग्राम डीएपी और 50 किलोग्राम एमओपी को खेत में मिला दें.

अगर खेत में दीमक के प्रकोप की संभावना हो, तो 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मैलाथियान या 10 किलोग्राम फोरेटेक्स थाइमैंटेंजी या टेमैंटेंजी का उपयोग करें.

पौध रोपण

सतावर की नर्सरी से खेत में रोपित करने की 3 विधियां हैं:

पहली विधि, अति उपजाऊ खेत में लाइन से लाइन की दूरी 25 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 60 सैंटीमीटर रखें. वहीं दूसरी विधि में सामान्य उपजाऊ खेत में लाइन से लाइन की दूरी 20 सैंटीमीटर और पौधे से पौध की दूरी 60 सैंटीमीटर रखें.

तीसरी विधि, कम उपजाऊ खेत में लाइन से लाइन की दूरी 15 सैंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 45 सैंटीमीटर रखी जाती है.

इस प्रकार एक एकड़ खेत में पौध रोपने के लिए 25,000 पौध प्रति हेक्टेयर की जरूरत पडे़गी, जबकि अधिक उपजाऊ खेत में 21,000 व कम उपजाऊ खेत में 30,000 पौधों को खेत में रोपने की जरूरत होती है. सतावर के पौध रोपण के तुरंत बाद खेत की सिंचाई इस प्रकार से करें कि खेत में पानी न रुके.

गैप फिलिंग

सतावर की रोपाई के बाद जो पौधे सूख जाते हैं, उन के स्थान पर दूसरे पौधों को तुरंत लगा देना चाहिए, ताकि पौधों की संख्या कम न होने पाए. अच्छी उपज के लिए खेत में निर्धारित मात्रा में पौधे अवश्य होने चाहिए.

खाद व उर्वरक

पौध रोपने के 2 माह बाद 50 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ की दर से सिंचाई करने के 2 दिन बाद छिटकवां विधि से बोआई करें. फसल की अच्छी पैदावार व बढ़वार के लिए जैविक खादों का प्रयोग करना चाहिए. औषधि निर्माता कंपनियां भी सतावर की फसल में जैव खादों का प्रयोग करने से अच्छा मूल्य देती हैं.

सिंचाई

वर्षा के समय सतावर की फसल को सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. यदि वर्षा कम हो, तो खेत की नमी को देखते हुए 1-2 सिंचाई करनी पड़ सकती है. जाड़े के दिनों में सतावर की फसल की एक माह पर सिंचाई की जानी चाहिए. मार्च माह से हर 15 दिन पर सिंचाई करते रहना चाहिए.

निराई, गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण

सतावर की फसल में निराई, गुड़ाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्यांेकि यह कंद वाली फसल है. इसे बढ़ने के लिए खेत का खरपतवार से मुक्त रखना जरूरी है. सतावर की फसल की हर एक माह पर गुड़ाई करते रहें, जिस से मिट्टी हलकी बनी रहे. इस से कंद का तेजी से विकास होता है और कल्ले भी ज्यादा मात्रा में निकलते हैं, इसलिए पौधों में कंदों की मात्रा ज्यादा लगती है. फसल में समयसमय पर निराई कर के खरपतवार को निकाल देना चाहिए. सतावर में खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायनांे का प्रयोग न करें. इस से इस की औषधीय गुणवत्ता में कमी आ जाती है.

कीट व बीमारियां

सतावर की फसल में कोई विशेष कीट या बीमारियां नहीं लगती हैं. कभीकभी देखा गया है कि कुछ पौधों में उकठा बीमारी आ जाती है. इस के नियंत्रण के लिए पौध रोपण के समय 1 ग्राम थीरम या बाविस्टीन का घोल बना कर नर्सरी से उखाडे़ गए पौधों की जड़ों की 5 मिनट तक डुबो कर पानी सूखने पर रोपाई करें. अगर फिर भी फसल में किसी प्रकार का कीट लग जाए, तो जैव कीटनाशी या मक्का कीटनाशी का ही प्रयोग करें. अगर पौधों में उकठा का प्रकोप ज्यादा होने लगे, तो लहसुन का घोल बना कर 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें. इस के अलावा तंबाकू व मदार की पत्तियों का घोल भी उकठा व कीट नियंत्रण में लाभदायक हैं.

बीज की तुड़ाई

सतावर की फसल में नवंबर या दिसंबर माह में फूल आता है और मार्च के अंतिम सप्ताह तक इस के बीज पक जाते हैं. जब पौधों में बीज का रंग काला हो जाए और यह काली मिर्च की तरह सूख कर हो जाए, तो इन को पौधों से तोड़ कर सुखा लेना चाहिए. इस से अगली फसल लेने के लिए नर्सरी का जमाव अच्छा होता है. बीज को सुखाने के बाद सीलन वाली जगह पर न रख कर सूखी जगह पर भंडारित कर देना चाहिए.

जड़ों की खुदाई

सतावर की जड़ों की खुदाई 18 माह से 24 माह के बीच में की जा सकती है. अगर सतावर के पौधों से अगले साल भी उपज लेनी है, तो पौधों के अगलबगल खुदाई कर के कंद को पौधों से अलग कर लेना चाहिए और पुनः पौधों की जड़ को मिट्टी से ढक कर सिंचाई कर दें.

जड़ों की प्रोसैसिंग

खुदाई करने के तुरंत बाद सतावर की जड़ों को पौधे से तोड़ कर अलग कर इस को आधा घंटे में उबाल कर इस का छिलका अलग कर लिया जाता है. फसल की अच्छी स्थिति होने पर 1 एकड़ खेत में 30-40 क्विंटल सूखी जड़ प्राप्त होती है.

औषधीय फसल सतावर की मांग विदेशों में काफी अधिक है. रसायनयुक्त खेती करने से पैदावार तो अधिक होती है, पर कीमत कम मिलती है और देश के अंदर ही इस की बिक्री हो पाती है.

भंडारण

सतावर की प्रोसैसिंग के बाद उस का सही तरीके से भंडारण करना बहुत जरूरी हो जाता है. भंडारण के लिए एयरटाइट बैग में जड़ों को पैक कर हाट स्टोर में भंडारित कर दें. अगर स्थानीय स्तर पर हाट स्टोर उपलब्ध नहीं हैं, तो भूसे के अंदर भी रख कर भंडारित किया जा सकता है. भंडारित किए गए सतावर की जड़ में हवा नहीं लगनी चाहिए, क्योंकि इस से जड़ें पसीज कर आपस में चिपक जाती हैं, जिस से इस में फफूंदी लग जाती है और जड़ें खराब हो जाती हैं. छिलकारहित जड़ को एयरटाइट बैग में पैक कर हाट स्टोर में भंडारित किया जाता है.

यदि सतावर की खेती जैविक विधि से की जाए, तो इस की मांग व मूल्य दोनों हर्बल कंपनियों में सब से ज्यादा है, जो अच्छे मुनाफे का एक माध्यम भी है. इस प्रकार सतावर की खेती न केवल अधिक मुनाफा देने वाली साबित होगी, बल्कि अच्छी सेहत के लिए एक अमूल्य खजाना भी है.

खेती पर अंधविश्वास की मार

पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के तमाम किसान रविवार व मंगलवार के दिन खेतों की बोआई की शुरुआत नहीं करते हैं, क्योंकि उन का मानना है कि मंगलवार व रविवार को धरती माता सोती हैं. इन दिनों में बीज बोने से बीज अंकुरित नहीं होता है. वहीं कुछ किसानों का यह भी मानना है कि इस दिन ग्राम देवता खेतों का भ्रमण करते हैं, जिस से बीज बोआई करने से उन के शरीर से बीज टकरा सकता है और ग्राम देवता को चोट लग सकती है. इस से ग्राम देवता नाराज हो जाते हैं, जिस के चलते फसल का उत्पादन सही नहीं होता है.

इस तरह के अंधविश्वास आज भी अनेक किसानों को घेरे हुए हैं. इस तरह के अनेक उदाहरण आप को जगहजगह देखने को मिल जाएंगे.

बसंत लाल बस्ती जिले के अच्छे किसानों में गिने जाते हैं. पिछले साल उन्होंने गेहूं फसल की कटाई के बाद फसल की मड़ाई का काम इसलिए नहीं किया, क्योंकि उस दिन बुधवार था और बुधवार के ही दिन 2 साल पहले उन के पिता की मौत हो गई थी. इस के चलते वे बुधवार के दिन को अशुभ मानते थे और उस दिन वे कोई ऐसा काम नहीं करते थे, जिस में उन्हें नुकसान होने का डर हो.

उन्होंने सोचा कि अगले दिन की सुबह यानी बृहस्पतिवार को वे काटी गई गेहूं की फसल की मड़ाई करेंगे, लेकिन बुधवार की रात में अचानक बादल छा जाने से भारी बारिश होने लगी. अचानक आई इस विपदा से निबटने के लिए बसंत लाल को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था, क्योंकि काटी गई फसल 2 एकड़ से ज्यादा की थी और उस को ढकने के लिए उन के पास कोई व्यवस्था नहीं थी. वे अपनी मेहनत की कमाई से उगाई गई गेहूं की फसल को बरबाद होते देख रहे थे. उन्हें अपने निर्णय पर पछतावा हो रहा था कि काश, वे बुधवार के दिन को अशुभ नहीं मानते, तो उन के गेहूं की तैयार फसल की समय पर मड़ाई हो गई होती और अनाज घर के अंदर होता. खेत में तैयार गेहूं खराब होने से बच जाता.

बसंत लाल जैसे तमाम ऐसे किसान हैं, जो खेतीबारी के मामले में अंधविश्वास से जकडे़ हैं. इस के चलते किसान भारी नुकसान उठाते हैं.

इसी तरह का एक और अंधविश्वास किसानों को जकडे़ हुए है. इस में किसान फसल कटने के पूर्व व बोआई के समय ग्राम देवता को खुश करने के लिए खेतों में आग जला कर मिट्टी की हांड़ी में चावल और गुड़ मिला कर जेवनार पकाते हैं. किसानों का मानना है कि जेवनार चढ़ाने से उन के ग्राम देवता खुश रहते हैं और जंगली और विषैले जानवरों से फसल व किसान की हिफाजत करते हैं. साथ ही, खेत में रह कर फसल की रखवाली करने वाले किसानों की भूतप्रेतों से भी रक्षा करते हैं.

इसी तरह का एक अंधविश्वास का मामला संत कबीरनगर जिले के तामा गांव में देखने को मिला. गांव का किसान गिरीश अपने खेत में आग जला कर ग्राम देवता को जेवनार चढ़ा रहा था कि अचानक कंडे की आग से उड़ी चिनगारी ने गेहूं की फसल में आग पकड़ ली. जब तक लोग आग पर काबू पाते, तब तक गिरीश व आसपास के किसानों की 2 बीघा गेहूं की फसल जल कर राख हो गई थी. जिन किसानों की गेहूं फसल उस किसान के जेवनार चढ़ाने की वजह से जल कर बरबाद हुई थी, उन्होंने इस का दोषी उस किसान को ही माना. किसानों ने उस किसान के खिलाफ फसल जलाने के आरोप में थाने में एफआईआर कराने की धमकी दी. तब उस किसान ने जेल जाने से बचने के लिए किसानों की आग से बरबाद हुई फसल की भरपाई पैसा दे कर की. इस के बाद भी उस किसान के आंख पर बंधी अंधविश्वास की पट्टी नहीं हटी, बल्कि उस किसान का कहना था कि मुझ से कोई गलती हो गई थी, जिस की वजह से ग्राम देवता नाराज हो गए और उन की नाराजगी की वजह से खेत में आग लगी.

खेतीबारी में व्याप्त इस तरह के तमाम अंधविश्वास के उदाहरण मिल जाएंगे, जिस की वजह से किसानों की फसल बरबाद होती है. इस तरह के अंधविश्वास के मामले में पेशे से चिकित्सक व समाजसेवी डा. वीके वर्मा का कहना है कि किसान पोगापंथ व अंधविश्वास के चलते अपनी घर की माली हालत बिगाड़ लेते हैं. उस से होने वाले नुकसान के बावजूद किसानों की आंख नहीं खुलती है.

डा. वीके वर्मा के मुताबिक, खेतीबारी में व्याप्त अंधविश्वास के मामलों पर कृषि महकमों द्वारा आज तक कोई जागरूकता का कदम नहीं उठाया गया है. कृषि महकमे को चाहिए कि किसानों के लिए आयोजित होने वाले कृषि मेलों व गोष्ठियों में अंधविश्वास को खत्म करने पर भी चर्चा हो. साथ ही, अंधविश्वास के चलते किसानों की फसलों पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव पर भी चर्चा की जाए. इस से अंधविश्वास जैस रूढ़िवादिता को खत्म करने वाले उपाय खोजे जा सकेंगे.

किसान राममूर्ति मिश्र का कहना है कि खेती से अच्छी उपज लेने के लिए समय से नर्सरी डालना, जुताई करना, बोआई, सिंचाई, खाद डालना, मड़ाई व भंडारण करना जरूरी होता है. शुभअशुभ के चक्कर में पड़ कर किसान द्वारा खेती के मसले पर देरी करना सदैव नुकसानदायक रहा है.

किसान आज्ञाराम वर्मा इस तरह के किसी भी अंधविश्वास को नहीं मानते. इस के बावजूद उन्हें खेती में कभी कोई नुकसान नहीं हुआ. इसलिए सभी किसानों को खेतीबारी में समय का ध्यान दे कर उचित तकनीकी व वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि अंधविश्वास में पड़ कर अपना नुकसान करें.

कई गुना लाभ देती आर्टीमिसिया यानी क्वीन घास की खेती

आर्टीमिसिया (क्वीन घास) के बारे में लोगों को कम ही जानकारी होगी. बता दें कि मच्छरों से होने वाली बीमारी मलेरिया से बचाव के लिए जिन दवाओं का प्रयोग किया जाता है, वह आर्टीमिसिया (क्वीन घास) नाम के औषधीय पौधें की सूखी पत्तियों से तैयार की जाती है. इसी वजह से दवा बनाने वाली कंपनियों में आर्टीमिसिया की सूखी पत्तियों की भारी मांग बनी रहती है. भारी मांग के चलते आर्टीमिसिया की खेती बेहद फायदे का सौदा साबित हो रही है.

आर्टीमिसिया की खेती भारत के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़ देश की सभी जगहों की जलवायु के लिए उपयुक्त है. आर्टीमिसिया (क्वीन घास) के पौधे की लंबाई औसतन 3-5 फुट तक होती है. इस की पत्तियां गाजर की पत्तियों की तरह होती है और पत्तियों से तीव्र सुगंध निकलती है.

आर्टीमिसिया की खेती के लिए सब से पहले नर्सरी तैयार की जाती है, जो नवंबर से दिसंबर माह तक डाली जाती है. नर्सरी में बीज डालने से पहले गोबर की सड़ी खाद की परत बिछा दें. उपयुक्त नमी बनाने के लिए नर्सरी के लिए दोमट मिट्टी सब से उपयुक्त होती है.

आर्टीमिसिया को खेत में रोपित करने से पहले खेत की हैरो द्वारा जुताई कर 3 ट्रौली सड़ी गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से बिछा देनी चाहिए. उस के बाद कल्टीवेटर से 2 जुताई कर के पाटा लगा दें. फिर 15 जनवरी से 15 फरवरी तक आर्टीमिसिया के पौधों को खेत में 60ग्30 सैंटीमीटर की दूरी पर रोपित करें और उसी दिन खेत की सामान्य सिंचाई कर दें. पौधों को रोपित करने के 15वें दिन दूसरी सिंचाई कर के 60 किलोग्राम यूरिया व 65 किलोग्राम डीएपी प्रति एकड की दर से बोआई करें.

अगर इस की फसल में वर्मी कंपोस्ट, नाडेप खाद या अन्य जैविक खाद को खेतों में डाला जाता है, तो आर्टीमिसिया का औसत से अधिक उत्पादन किया जा सकता है. आर्टीमिसिया की फसल महज 110 दिनों में तैयार हो जाती है, जिस में आमतौर पर 5-6 सिंचाई की जरूरत पड़ती है.

आर्टीमिसिया की फसल की कटाई अप्रैल के अंतिम सप्ताह से मई माह तक कर देनी चाहिए. इस के बाद इस के पौधों को 24 घंटे धूप में सुखाना पड़ता है. फिर साफ जगह पर डंडे द्वारा या पटक कर इस की सूखी पत्तियों को छुड़ा लेना चाहिए.

आर्टीमिसिया की खेती से आमतौर पर प्रति एकड़ 12-18 क्विंटल या 4-5 क्विंटल  प्रति बीघे की सूखी पत्तियों का उत्पादन मिलता है.

आर्टीमिसिया की खेती से लाभ

आर्टीमिसिया न्यूनतम लागत वाली व अधिक लाभ देने वाली फसल है, क्योंकि इस में कीट व बीमारियों का प्रकोप बहुत कम होता है. इस को किसी जानवर द्वारा नुकसान भी नहीं पहुंचाया जाता है. आर्टीमिसिया की फसल से गेहूं  की तुलना में डेढ़ से दोगुना ज्यादा आमदनी मिल रही है. इस की सूखी पत्तियां 3,200 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बिक रही हैं.

औषधीय पौधों को बढ़ावा देने के लिए देश में तमाम सरकारी और गैरसरकारी संस्थान कार्यरत हैं, जो तमाम तरह के औषधीय पौधों की नर्सरी तैयार कर लोगो को औषधीय पौधों की खेती के प्रति प्रेरित कर रही हैं. इन संस्थाओं में औषधीय पौधों को लगाने की जानकारी, पौधों की उपलब्धता, भंडारण व क्रयविक्रय संबंधित सेवाएं भी प्रदान की जाती हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि औषधीय पौधों की खेती किसानों को अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में 7-8 गुना अधिक लाभ दे रही है. आर्टीमिसिया की खेती के सवाल पर विशेषज्ञों का कहना है कि आप जनवरी में खाली होने वाली गन्ने की पेड़ी, लाही, अगेती गोभी व आलू के खेत में आर्टीमिसिया की खेती कर अतिरिक्त लाभ कमा सकते हैं.

लार्ड बुद्धा ज्ञानविज्ञान संस्थान द्वारा किसानों  को आर्टीमिसिया के बीज व नर्सरी को निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है. साथ ही, फसलों के भंडारण हेतु खाली बोरे को भी निःशुल्क दिया जाता है. संस्थान के विशेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा समयसमय पर खेत का निरीक्षण कर जो संस्थाएं औषधीय खेती से जुड़ी हैं, उन के द्वारा किसानों को उपयुक्त सलाह भी निःशुल्क प्रदान की जाती है. ये संस्थाए किसानों द्वारा लगाए गए आर्टीमिसिया के सूखे पत्तों को अधिक मुनाफे पर सीधे तौर बिकवाया जा रहा है. जहां से किसान अपने उत्पाद का अधिकतम मूल्य कमा रहे हैं.

सरसों फसल की नाशीजीवों से करेंं सुरक्षा

इस समय तापमान में उतारचढ़ाव, छाई हुई बदली एवं बूंदाबांदी होने के कारण सरसों की फसल पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. इस फसल की खेती करने वाले किसान ध्यान दें कि इन दिनों सरसों में माहू यानी चेपा कीट के मुख्य रूप से लगने का ज्यादा डर है. इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ पीलापन लिए हुए हरे रंग के होते हैं, जो झुंड के रूप में पौधों की पत्तियों, फूलों, डंठलों, फलियों में रहते हैं.

यह कीट छोटा, कोमल शरीर वाला और हरे मटमैले भूरे रंग का होता है. बादल घिरे रहने पर इस कीट का प्रकोप तेजी से होता है. इस की रोकथाम के लिए कीटग्रस्त पत्तियों को प्रकोप की शुरुआती अवस्था में ही तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

सरसों के नाशीजीवों के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे इंद्रगोप भृंग, क्राईसोपा, सिरफिड फ्लाई का फसल वातावरण में संरक्षण करें. पीला स्टिकी ट्रेप 30 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं. इस पर माहू कीट आकर्षित हो कर चिपक जाते हैं. एजाडिरेक्टीन (नीम तेल) 0.15 फीसदी 2.5 लिटर या इमिडाक्लोप्रिड 200 मिलीलिटर को 600-700 लिटर पानी मे घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से फसल को कीटों से सुरक्षित रखा जा सकता है.

Sarson Rogसरसों में झुलसा रोग का प्रकोप ज्यादा हो सकता है. इस रोग में पत्तियों और फलियों पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बन जाते हैं, जिन में गोल छल्ले केवल पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं, जिस से पूरी पत्ती झुलस जाती है.

इस रोग पर नियंत्रण करने के लिए 2 किलोग्राम मैंकोजेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी या 2 किलोग्राम जीरम 80 फीसदी डब्ल्यूपी या 2 किलोग्राम जिनेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी या 3 किलोग्राम कौपर औक्सीक्लोराइड 50 फीसदी डब्ल्यूपी को 600-700 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

पहला छिड़काव रोग का लक्षण दिखाई देने पर और दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 15 से 20 दिनों के अंतराल पर करें. अधिकतम 4 से 5 बार छिड़काव करने से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है.

आदिवासियों का उत्थान जरूरी

नई दिल्ली: 21 दिसंबर 2023. केंद्रीय जनजातीय कार्य और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा ने राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान द्वारा आयोजित “आदि- व्याख्यान” सीरीज-2 के दोदिवसीय कार्यक्रम का आज दिल्ली में शुभारंभ किया. यह जनजातीय पहचान व हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता में जनजातीय योगदान का पता लगाने की एक पहल है.

कार्यक्रम का उद्देश्य आदिवासी परंपरा व संस्कृति की जटिलताओं को गहराई से समझना और उन के अस्तित्व की चुनौतियों का पता लगाना है.

शुभारंभ सत्र में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने आदिवासी पहचान, उन के संवर्धन, संरक्षण पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि आदिवासी पहचान को बनाए रखने के लिए आदिवासी भाषा और साहित्य महत्वपूर्ण हैं. आदिवासी लोगों के उत्थान के लिए उन्होंने विशेष रूप से पीवीटीजी हेतु अत्यधिक महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम जनमन) पहल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में केंद्र सरकार द्वारा किए गए प्रयासों पर प्रकाश डाला.

उन्होंने वन अधिकार अधिनियम (1986), पीईएसए (1996), एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) पर चर्चा को आगे बढ़ाने व आदिवासियों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए “राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान” जैसे अनुसंधान संस्थानों की आवश्यकता के लिए “आदि-व्याख्यान” कार्यक्रम की सराहना की.

उन्होंने जनजातीय लोगों को संविधान में निहित संवैधानिक सुरक्षाओं से अवगत कराने की आवश्यकता पर बल दिया और आदिवासी समुदाय के कल्याण के लिए अतीत, वर्तमान व भविष्य पर पुनर्विचार की आवश्यकता को स्वीकार किया.

प्रो. नूपुर तिवारी, निदेशक, एनटीआरआई, नई दिल्ली ने ओरिएंटेशन कार्यक्रम की रूपरेखा पेश करते हुए कहा कि आदि मंथन भारत में आदिवासी समुदायों के साथ चर्चा को प्रोत्साहित करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है.

इटवा मुंडा, अध्यक्ष, भारत मुंडा समाज ने देश की विभिन्न जनजातियों के बीच सहयोग व समझ की आवश्यकता पर प्रकाश डाला एवं आदिवासी संस्कृति व विरासत के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया.

उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से आदिवासियों की भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने में मदद मिलेगी और उन्हें भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने में मदद मिलेगी.

रूप लक्ष्मी मुंडा, उपाध्यक्ष, भारत मुंडा समाज ने आदिवासी महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए विचार रखे.

उन्होंने आदिवासी समाज में महिलाओं की प्रगति और उन की चुनौतियों पर प्रकाश डाला. उन के लिए आदि मंथन चर्चा आदिवासी महिलाओं की मुक्ति के लिए एक मंच के रूप में मदद कर सकती है.

ओरिएंटेशन कार्यक्रम जनजातीय कार्य मंत्रालय के तहत जनजातीय विकास में सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रदर्शन करेगा.

इस के अलावा राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान के नेतृत्व में कला निधि और जनजातीय संग्रहालय का दौरा भी होगा, जो हमारी जनजातीय विरासत की सांस्कृतिक समृद्धि की एक ठोस झलक पेश करेगा. उद्घाटन कार्यक्रम में 5 राज्यों (छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम) के मुंडा समुदायों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल से करें बोआई

अमूमन बीज की बोआई छिटकवां तरीके से या कृषि यंत्रों द्वारा की जाती है. छिटकवां तरीके में बीज खेत में एकसमान नहीं गिरता और न ही सही गहराई पर पहुंच पाता है. इस से फसल में अंकुरण भी सही नहीं होता. इस का सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है.

खास बात यह है कि कुछ फसलों में निराईगुड़ाई की जरूरत पड़ती है, पर वह भी ठीक तरीके से नहीं हो पाती. जबकि कृषि यंत्रों द्वारा बीज की बोआई की जाए तो खेत में बीज तय दूरी पर और सही गहराई पर गिरता है.

साथ ही, बोआई भी लाइनों में ही होती है. इस का फायदा खेत में निराईगुड़ाई के समय भी होता है.

लाइन में बोई गई फसल में निराईगुड़ाई भी आसानी से होती है. इतना ही नहीं, निराईगुड़ाई यंत्रों का भी इस्तेमाल बेहतर तरीके से किया जाता है और अच्छी पैदावार मिलती है.

खेत में बोआई के लिए अनेक तरह के कृषि यंत्र मौजूद हैं. इन में से किसान अपनी सुविधानुसार चुन कर खरीद सकता है. जिन किसानों के पास ट्रैक्टर मौजूद हैं, उन के लिए आटोमैटिक सीड ड्रिल यंत्र बेहतर है. आजकल इन यंत्रों द्वारा खेत में बीज के साथसाथ खाद भी डाली जाती है, जिन्हें हम सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल मशीन कहते हैं.

सीड ड्रिल द्वारा एकसाथ कई लाइनों में बोआई की जा सकती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि यंत्र कितनी लाइनों में बोआई करने वाला है.

आमतौर पर 5, 7, 9, 11 लाइनों में बोआई करने वाले यंत्र मौजूद हैं. इन यंत्रों में लाइन से लाइन की दूरी और बीज गिरने की गहराई फसल के हिसाब से घटाईबढ़ाई जा सकती है. इन बोआई यंत्र को इस्तेमाल करने के लिए 35 हौर्सपावर से ज्यादा हौर्सपावर के ट्रैक्टर की जरूरत पड़ती है.

अनेक फसलोें के लिए उपयोगी

इस यंत्र से गेहूं, चना, मक्का, सोयाबीन, जीरा, सूरजमुखी, धान की सीधी बोआई तकनीक, कपास वगैरह अनाज की बोआई आसानी से की जा सकती है.

इन कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा सब्सिडी भी दी जाती है. प्रदेश सरकारें भी इस के तहत किसानों को छूट देती हैं, इसलिए सब से पहले किसान यह तय कर ले कि उसे कौन सी मशीन, किस कंपनी की खरीदनी है. इस के लिए अन्य जानकार किसानों से सलाहमशवरा लें. इस के बाद वह कृषि यंत्र पर सरकारी छूट पाने के लिए अपने जिले या ब्लौक स्तर पर कृषि कार्यालय में अधिकारियों से मिले. सरकार द्वारा कितनी छूट दी जा रही है, इस की जानकारी वहां से मिल जाएगी और मशीन की जानकारी में बड़ी कंपनियों के कृषि यंत्रों की जानकारी इंटरनैट पर भी मिल जाती है.

भारत एग्रो की सीड ड्रिल मशीनें

भारत एग्रो सीड ड्रिल में 9 तरह के मौडल उपलब्ध हैं, जिस में 5 मौडल ट्रैक्टर से चलते हैं.

रैगुलर मौडल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल

इस मौडल से 9 लाइनों के खादबीज डाला जाता है. इस में 18 पाइप लगे हैं. इन पाइपों के जरीए ही ऊपर लगे  बौक्स (हौपर) से खाद व बीज खेत में गिरता है.

खादबीज के लिए 63 इंच लंबाई में 2 बौक्स (हौपर) लगे होते हैं. इन में लगभग 50 किलोग्राम बीज और 55 किलोग्राम फर्टिलाइजर अलगअलग डाला जा सकता है.

वैसे, इस यंत्र का औसतन वजन 310 किलोग्राम है और इसे 35 हौर्सपावर के अधिक हौर्सपावर में टै्रक्टर द्वारा चलाया जा सकता है.

इस के अलावा 9 लाइनों में बोआई करने वाला ‘हुबली मौडल’ और 7 व 11 लाइनों में बोआई करने वाला आटोमैटिक सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल भी मौजूद है.

स्प्रिंगटाइप कल्टीवेटर

यह आटोमैटिक सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल 9 लाइनों में बोआई करता है. इस में कल्टीवेटर तकनीक का इस्तेमाल है, इसीलिए इस मौडल को स्प्रिंगटाइप कल्टीवेटर कहा गया है.

सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल

छोटे साइज के ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल होने वाला यह सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल 5 लाइनों में बोआई करता है, जिस में 34 इंच लंबाई के खादबीज के लिए बौक्स (हौपर) लगे हैं.

पावर टिलर चालित सीड ड्रिल 5 लाइनों में बोआई करने वाले इस सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल को पावर टिलर द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. छोटी जोत व पहाड़ी इलाकों के किसानों के लिए यह अच्छा यंत्र है.

हाथ से चलने वाला सीड ड्रिल

कुछ खास फसलों के लिए भारत एग्रो का हाथ से चलने वाला आटोमैटिक बोआई यंत्र भी है. यह एक लाइन में केवल बोआई करता है. इसे सब्जी की खेती में बोआई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

इन मौडलों के अलावा पशु चालित सीड ड्रिल भी आते हैं. इसलिए किसान अपनी जरूरत के अनुसार यंत्र का चुनाव कर सकते हैं. इन में कुछ दूसरे मौडल भी हैं, जैसे मिनी पावर वीडर आटोमैटिक सीड ड्रिल 9 दांतों वाला, 17 दांतों वालों एमपी मौडल, 8 दांतों वाला एपी मौडल और 17 दांत वाला कोटा मौडल भी मौजूद है.

इन कृषि यंत्रों के बारे अधिक जानकारी हासिल करने के लिए आप फोन नंबर 02827-253858 या फिर मोबाइल नंबर 09428035616, 09427733881 पर बात कर सकते हैं.

सूरन की खेती में समझदारी

सूरन यानी जिमीकंद की पहले गांवों में घूरे के आसपास, दालान या मकान के पीछे, बागबगीचों में थोड़ीबहुत बोआई की जाती थी, पर अब अच्छी उपज लेने के लिए वैज्ञानिक तरीका अपनाया जा रहा है.

सूरन की खेती लाभप्रद होती है. इस में औषधीय तत्त्व भी मौजूद होते हैं. इस का प्रयोग सब्जी और अचार के लिए ज्यादा होता है. सूरन की पकौड़ी भी खूब पसंद की जाती है.

सूरन की खेती में लाभ को देखते हुए किसान इस को उगाना पसंद कर रहे हैं. सही तरह से सूरन की खेती की जाए तो एक सीजन से एक बीघे में एक लाख रुपए तक कमाए जा सकते हैं. सब से अच्छी बात यह है कि सूरन की खेती में बहुत समय भी नहीं लगता. किसान चाहे तो उसी खेत में सहफसली कर के 3 फसलें भी उगा सकते हैं.

सूरन की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि तमाम किसान इस की खेती बहुत बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं. वे 1 या 2 बीघे में ही इस की खेती करते हैं और 1 लाख रुपए से ढाई लाख रुपए तक की बचत कर लेते हैं. किसानों के लिए अच्छी बात यह है कि इस की खेती में ज्यादा खर्च भी नहीं आता है.

वैसे, सूरन की खेती मुख्यत: पहाड़ी क्षेत्र में होती है, पर अब मैदानी क्षेत्र के किसान भी इस की खेती करने लगे हैं. किसानों के बीच काम करने वाला ‘पानी संस्थान’ किसानों को सूरन की खेती के लिए जागरूक कर रहा है.

सूरन की बोआई

सूरन की खेती करने वाले किसान गुरुदीन कहते हैं कि वे 2 साल से इस की खेती कर रहे हैं. एक बीघे में 5,000 रुपए से 8,000 रुपए तक खर्च आता है. इस की बिक्री कर 80,000 रुपए से ले कर 1 लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है. अब इस के बेचने में कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि हर सीजन में इस की सब्जी बनने लगी है. सब्जी के थोक व्यवसायी घर पर आ कर ही खरीद लेते हैं.

किसान बताते हैं कि इसे 30-40 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा जाता है. सूरन को फरवरीमार्च महीने में खेत में बोया जाता है और सितंबरअक्तूबर महीने में इस की खुदाई कर ली जाती है.

खेत की जुताई ऐसी हो कि मिट्टी भुरभुरी हो जाए, 2-2 फुट पर नाली बना कर उस में कंपोस्ट खाद डालें. फिर 1-1 फुट की दूरी पर सूरन के टुकड़े गाड़ दें. इसे केवल 3 बार पानी चाहिए. जून महीने के बाद पानी की जरूरत नहीं होती.

सूरन का आकार बड़ा होने के लिए उचित देखभाल के साथसाथ समयसमय पर निराईगुड़ाई जरूर करें. 3 से 4 महीने में यह 3 से 4 किलोग्राम तक के वजन का हो जाता है.

सहफसली खेती लाभकारी

किसान चाहें तो इस के बीच के हिस्से में दूसरी सब्जी भी उगा सकते हैं. इस के खोदने के बाद आलू, चना, मटर आदि की खेती भी की जा सकती है. जरूरत इस बात की होती

है कि किसानों को परंपरागत तरीका छोड़ कर वैज्ञानिक विधि को अपनाना होगा. इस के महत्त्व को देखते हुए केंद्र और प्रदेश सरकार विभिन्न योजनाओं में शामिल कर खेती के लिए अनुदान दे कर प्रोत्साहित कर रही है.

सूरन की फसल गरम जलवायु में 25-35 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान के बीच होती है. आर्द्र जलवायु प्रारंभ में पत्तियों की वृद्धि में सहायक और कंद बनने की अवस्था में सूखी जलवायु उपयुक्त होती है. अच्छे बिखराव के साथ 1000-1500 मिलीमीटर वर्षा फसल वृद्धि व कंद उत्पादन में भी सहायक है.

सूरन की प्रमुख प्रजातियों में गजेंद्रा, संतरागाची, श्रीपद्मा, आजाद, श्रीआतिरा, एनडीए-9 आदि हैं. इन की उत्पादन क्षमता 40 टन से 100 टन प्रति हेक्टेयर है.

रोपण का समय

सूरन आमतौर पर 6 से 8 महीने में तैयार होने वाली फसल है. सिंचाई की सुविधा रहने पर इसे 15 मार्च से 15 मई के बीच लगाया जाता है. जहां पर पानी की सुविधा नहीं रहती, वहां जून के अंतिम सप्ताह में मानसून शुरू होने पर लगाया जाता है.

सूरन की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है. इस में उत्तम जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए. खेती योग्य भूमि तैयार करने के लिए 2 जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 3-4 जुताई देशी हल से अच्छी तरह कर के मिट्टी को भुरभुरा, मुलायम और समतल कर लेना चाहिए.

सूरन का उत्पादन लागत प्रति हेक्टेयर तकरीबन 3 लाख, 36 हजार रुपए है और आमदनी तकरीबन 12 लाख रुपए है.