पार्थेनियम घास के नुकसान और उस पर काबू पाना

पार्थेनियम को अनेक नामों से जाना जाता है जैसे गाजर घास, सफेद टोपी, गंधी बूटी, चटक चांदनी, कांग्रेस घास वगैरह, पर इस का वानस्पतिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है, इसलिए यह पार्थेनियम नाम से ही ज्यादा प्रचलित है.

यह एक सफेद फूलों वाली, सीधी खड़ी रहने वाली, बीज से पैदा होने वाली, एक से डेढ़ मीटर ऊंचाई वाली विदेशी घास या खरपतवार है. इस की पत्तियां किनारे से कटी होती हैं और वे गाजर या गुलदाऊदी फूल की पत्तियों जैसी होती हैं.

पार्थेनियम के फूल छोटे, आकर्षक और बहुत ज्यादा तादाद में होते हैं. प्रति पौधा तकरीबन 2,000 से ले कर 6,000 बीज और कभीकभार उस से भी ज्यादा बीज बनाता है, जो छोटे, हलके व काले रंग के होते हैं. ये फूल कई सालों तक सुषुप्तावस्था में पड़े रह सकते हैं.

माकूल हालात आने पर भी यह पौधा सालभर फलताफूलता रहता है और यह 3 से 4 महीनों में अपना जीवनचक्र पूरा कर लेता है. इस के तनों व पत्तियों पर बहुत छोटेछोटे रोएं पाए जाते हैं, जो बहुत तरह से नुकसान पहुंचाते हैं.

गाजर घास से नुकसान

* यह घास अपने छोटेछोटे हलके बीजों से, जिन की अंकुरण कूवत बहुत ज्यादा होती है, बहुत जल्दी हवा, पानी, पक्षी व जानवरों की मदद से फैलता है. इस के चलते यह फसलों के साथसाथ दूसरे वनस्पतियों को भी खत्म कर देती है.

रिसर्च में यह पाया गया है कि इस घास की जड़ों में जहरीले कैमिकलों का रिसाव होता है, जिस से दूसरी वनस्पति बहुत ज्यादा प्रभावित होती है. फसलोत्पादन में 40 फीसदी से भी ज्यादा हानि होती है और इस के नियंत्रण में होने वाले खर्च को अगर देखें, तो किसानों को बहुत कम मुनाफा होता है और कभीकभार नुकसान भी उठाना पड़ता है.

* दुनिया के तकरीबन 20 देशों में इस पार्थेनियम नामक खरपतवार का प्रकोप देखा गया है. भारत में यह खरपतवार पहली बार साल 1955 में पूना, महाराष्ट्र में दिखाई दिया था.

ऐसा माना जाता है कि अमेरिका से आयात किए गए गेहूं के साथ यह खरपतवार हमारे देश में आया था और अब भीषण प्रकोप की तरह पूरे देश में 35 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा चुका है. यह घास खेती के लिए ही नहीं, बल्कि जैव विविधता के लिए भी घातक बनती जा रही है.

* इस खरपतवार की जड़ों से एक तरह का तरल पदार्थ निकलता रहता है, जो मिट्टी को खराब करता है. यह पोषक तत्त्व व नमी का लगातार अवशोषण भी करता रहता है.

आमतौर पर वनस्पति या फसलों की तुलना में अवशोषण करने की क्षमता इस में ज्यादा होती है. मिट्टी धीरेधीरे अपनी उर्वरता खो कर बंजर जमीन में बदल जाती है.

* गाजर घास में पार्थेनिन नामक कैमिकल पाया जाता है, जो बहुत ही नुकसानदायक होता है. गाजर घास के संपर्क में आने से एक्जिमा, डर्मेटाइटिस, एलर्जी, बुखार, दमा जैसी कई बीमारियां हो जाती हैं. बहुत ज्यादा प्रभावित होने पर इनसान की मौत तक हो जाती है.

* बहुत ज्यादा हरा दिखने के चलते पशु इसे खाने के लिए दौड़ते हैं. कुछ पशु बहुत भूखे होने के चलते इसे खा भी लेते हैं, पर इस की खराब गंध होने के चलते ज्यादातर पशु नहीं खाते.

* जो पशु इसे खा लेते हैं, उन के मुंह में अल्सर हो जाता है. मुंह से लार निकलने लगती है और कभीकभार तो पशु मर भी जाते हैं, वहीं दुधारू पशुओं के दूध में गंध आ जाती है और एक जहरीला पदार्थ घुस जाता है, जिसे लेने से इनसानों में भी अनेक तरह की बीमारियां हो जाती हैं. इस से होने वाली दूसरी बीमारियों में त्वचा पर धब्बे, फफोले पड़ जाते हैं और आंख से पानी आने लगता है.

* कभीकभी यह घास सड़कों के मोड़ पर, पगडंडियों पर दोनों ओर उग कर गाडि़यों को चलाने में रुकावट पैदा करती है, तो कभीकभी पैदल चलने वालों के लिए परेशानी का सबब बन जाती है.

नियंत्रण के उपाय

गाजर घास के जहरीलेपन को देखते हुए उस के प्रभावी नियंत्रण के बारे में सभी को सामूहिक कोशिश करने की जरूरत है. जैसे, कोई दूसरी मुहिम चलाई जाती है, उसी तरह से पार्थेनियम मुहिम चलाने की जरूरत है.

वैसे, हर साल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सभी संस्थानों और उस के अधीन सभी केंद्रों व कार्यालयों को 16 से 22 अगस्त तक पार्थेनियम जागरूकता अभियान मनाने का निर्देश रहता है. इस के तहत पूरे हफ्ते अनेक कार्यक्रम किए जाते हैं. किसानों, आम नागरिकों, छात्रों को पार्थेनियम या गाजर घास के नुकसान व नियंत्रण के तरीकों के बारे में बताया जाता है.

नियंत्रण की विधियां

निवारक विधि : पार्थेनियम के पौधों को इस के वानस्पतिक बढ़वार वाली अवस्था यानी फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

जड़ उखाड़ने से पहले हाथों में दस्ताने पहन लेने चाहिए और शरीर के संपर्क से दूर रखते हुए उखाड़ना चाहिए, पर यह किसी एक की कोशिश से नहीं होगा. इस के लिए सामूहिक अभियान चलाने की जरूरत है.

गरमियों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए, ताकि इस के बीज ऊपर आ जाएं और नष्ट हों. गाजर घास की मार झेल रहे खेत की मिट्टी को दूसरे खेतों में न ले जाएं, जहां से पार्थेनियम के पौधों को उखाड़ कर नष्ट किया गया हो. उन जगहों का निरीक्षण करते रहना चाहिए, क्योंकि वहां पहले से पड़े बीजों से पौधे फिर से आ सकते हैं.

रासायनिक विधि : शाकनाशी दवाओं का इस्तेमाल बहुत ही आसानी से इसे नियंत्रित कर सकता है. इन कैमिकलों में एट्राजिन, एलाक्लोर, डाययुरान, मैट्रिब्युजिन, 2-4 डी, ग्लाइफोसेट वगैरह खास हैं.

गाजर घास के पौधे जब छोटे हों, तब अगर इन दवाओं का इस्तेमाल किया गया है तो बहुत ही कारगर होता है, वरना बाद में इस की शाखाएं कड़ी हो जाती हैं और नियंत्रण मुश्किल होता है.

गाजर घास के साथ उगी दूसरी घासों या वनस्पतियों के नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट 1 से 1.5 फीसदी (10 से 15 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) और घास कुल के पौधों को नष्ट करने के लिए मैट्रिब्युजिन 0.3 से 0.5 फीसदी (3 से 5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का छिड़काव किया जा सकता है.

जैविक विधि : गाजर घास पर काबू पाने के लिए कुछ वनस्पतियां जैसे चकोड़, जंगली चौलाई, हिप्टिस वगैरह को इस्तेमाल में लाया जा सकता है. चकोड़ के बीज अक्तूबरनवंबर माह में इकट्ठा कर लें और अप्रैलमई माह में गाजर घास के क्षेत्रों में बिखेर दें. बरसात शुरू होते ही चकोड़ के पौधे निकलेंगे और जल्दी ही बढ़ कर गाजर घास को नियंत्रित करेंगे.

चकोड़ एक चौड़ी पत्ती वाली घास है. इसे साग के रूप में खाया भी जाता है. यह लैग्यूमिनस कुल का पौधा है और जमीन को फायदा भी पहुंचाता है.

गाजर घास को एक बीटल यानी कीट, जिसे मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा वाइकोलोराटा) कहा जाता है का इस्तेमाल करने से भी नियंत्रण पाया जा सकेगा. इस के पूरे पौधे यानी पत्तियों, तना व फूल को खा कर ये पौधों को सुखा कर मार देते हैं.

ये बीटल सिर्फ गाजर घास को ही खाते हैं और इन की तादाद बहुत तेजी से बढ़ती है. एक जगह पर पौधों को चट करने के बाद ये बीटल दूसरी जगह गाजर घास के पौधों पर अपना भरणपोषण करने के लिए चले जाते हैं. नतीजतन, फसल का सफाया होने लगता है. साथ ही, इस का प्रयोग कंपोस्ट बनाने में भी किया जा सकता है. इस के फूल आने से पहले उखाड़ कर कंपोस्ट पिट में डाल कर कंपोस्ट बनाया जा सकता है. वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने में भी इसे उपयोग में ला सकते हैं.

सामूहिक अभियान चला कर ही इस खतरनाक गाजर घास को समूल नष्ट किया जा सकता है.

किसान राजाराम को मिला ‘महिंद्रा रिचेस्ट फार्मर औफ इंडिया अवार्ड’

नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा, नई दिल्ली के मेला ग्राउंड में आयोजित एक भव्य समारोह में ‘महिंद्रा मिलेनियर फार्मर औफ इंडिया अवार्ड 2023’ में छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को केंद्रीय पशुपालन मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने देश के सब से अमीर किसान की ट्रौफी दे कर सम्मानित किया और उन्हें ‘भारत के सब से अमीर किसान‘ के खिताब से नवाजा.

इस अवसर पर केंद्रीय पशुपालन मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने कहा कि देश के किसान अब समृद्धि की राह पर चल पड़े हैं, इन सफल प्रगतिशील करोड़पति किसानों के बारे में जान कर हम सब को बड़ी प्रसन्नता हुई है. डा. राजाराम त्रिपाठी जैसे उद्यमी किसान देश के किसानों के लिए रोल मौडल हैं.

इस अवसर पर ब्राजील के राजदूत ने डा. राजाराम त्रिपाठी को अपने देश में आमंत्रित करते हुए ब्राजील यात्रा का टिकट भी प्रदान किया. इस अवसर पर ब्राजील के उच्चाधिकारी, नीदरलैंड के कृषि सलाहकार माईकल, संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत, आईसीएआर के निदेशक, कृषि जागरण की प्रमुख एमसी डोमिनिक, शाइनी डोमिनिक डा. पीसी पंत, ममता जैन, पीसी सैनी, हर्ष राठौर, आशुतोष पांडेय हिंदुस्तान के साथ ही देशभर के कृषि वैज्ञानिक, कृषि क्षेत्र के उद्योगपति और सैकड़ों की तादाद में अलगअलग राज्यों से पधारे प्रगतिशील किसान व कृषि उद्यमी मौजूद थे.

अवार्ड मिलने के बाद डा. राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि वह अपना यह अवार्ड मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के सभी साथियों और बस्तर के अपने आदिवासी भाइयों को अर्पित करते हैं. वे अपने समूह की आमदनी का पूरा हिस्सा बस्तर के आदिवासी भाइयों के विकास में ही खर्च कर रहे हैं और आगे इन के विकास के लिए एक ट्रस्ट बना कर अपनी सारी खेती को उस के साथ जोड़ कर उन की बेहतरी के लिए अपनी आखिरी सांस तक काम करते रहेंगे.

यों तो जैविक खेती और औषधीय पौधों की खेती के पुरोधा माने जाने वाले डा. राजाराम त्रिपाठी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. बीएससी (गणित), एलएलबी के साथ हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान सहित 5 विषयों में एमए और डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त डा. राजाराम त्रिपाठी को देश का सब से ज्यादा शिक्षित किसान माना जाता है. खेती में नएनए नवाचारों के साथ ही ये आज भी पढ़ाई कर रहे हैं और इन दिनों ये सामाजिक विज्ञान में स्नातकोत्तर की परीक्षा दे रहे हैं. इन्हें हरित योद्धा, कृषि ऋषि, हर्बल किंग, फादर औफ सफेद मूसली आदि की उपाधियों से नवाजा जाता है. मिसाइलमैन एपीजे अब्दुल कलाम ने इन्हें ‘‘हर्बलमैन औफ इंडिया‘‘ की उपाधि दी थी.

देश के सब से पिछड़े भाग बस्तर में पिछले 30 सालों की उन की कठिन तपस्या व संघर्षों के बारे में यह दुनिया बहुत कम जानती है. बस्तर के एक बेहद पिछड़े क्षेत्र, कुख्यात झीरम घाटी वाले दरभा विकास खंड के गांव ‘ककनार‘ में जन्मे और वहीं पलेबढ़े डा. राजाराम त्रिपाठी का बचपन बस्तर के जंगलों में आदिवासी सखाओं के साथ गाय चराते और खेती करते बीता है. ये अपने गांव से प्रतिदिन 50 किलोमीटर साइकिल चला कर पढ़ने के लिए जगदलपुर आते थे. इन्होंने अपने बूते देश की विलुप्त हो रही दुर्लभ वनौषधियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए बस्तर, कोंडागांव में लगभग 30 साल मेहनत कर के तकरीबन 10 एकड़ का जैव विविधता से भरपूर एक जंगल उगा कर वनौषधियों के लिए प्राकृतिक रहवास में ही ‘‘इथिनो मैडिको गार्डन‘‘ यानी  ‘‘दुर्लभ वनौषधि उद्यान‘‘  विकसित कर दिखाया है, जहां आज 340 से ज्यादा प्रजातियों की 5,100 दुर्लभ वनौषधियां फलफूल रही हैं.

Dr. Rajaramप्रगतिशील किसान डा. राजाराम त्रिपाठी की कुछ विशेष उपलब्धियां:-

– डा. राजाराम त्रिपाठी के नेतृत्व में ‘‘मां दंतेश्वरी हर्बल‘‘ को आज से 22 साल पहले देश के पहले ‘‘सर्टिफाइड और्गैनिक स्पाइस एंेड हब्र्स फार्मिंग का अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणपत्र हासिल करने का गौरव प्राप्त है.

– 2 दशकों से अपने मसालों और हर्बल उत्पादों का यूरोप, अमेरिका आदि देशों में निर्यात में विशिष्ट गुणवत्ता नियंत्रण हेतु ‘राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड‘ भारत सरकार द्वारा ‘बैस्ट ऐक्सपोर्टर’ का अवार्ड भी मिल चुका है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी 2 दर्जन से ज्यादा देशों की यात्रा कर के वहां की कृषि एवं विपणन पद्धति का अध्ययन कर चुके हैं.

– डा. राजाराम त्रिपाठी ने भारत सरकार के सर्वोच्च शोध संस्थान सीएसआईआर और आईएचबीटी के साथ करार कर जीरो कैलोरी वाली ‘स्टीविया‘ की बिना कड़वाहट और ज्यादा मिठास वाली प्रजाति के विकास करने और इस की पत्तियों से शक्कर से 250 गुना मीठी स्टीविया की ‘जीरो कैलोरी शक्कर‘ बनाने का  करार किया है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी ने जैविक पद्धति से देश के सभी भागों में विशेष रूप से गरम क्षेत्रों में न्यूनतम देखभाल में परंपरागत प्रजातियों से ज्यादा उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता देने वाली काली मिर्च की नई प्रजाति ‘‘मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16, पीपली की नई प्रजाति ‘‘मां दंतेश्वरी पीपली-16‘‘ एवं स्टीविया की नई प्रजाति ‘‘मां दंतेश्वरी स्टीविया-16’’ आदि नई प्रजातियों को विकसित किया है और बड़ी संख्या में किसान इन का फायदा उठा रहे हैं. इस की सराहना स्पाइस बोर्ड के वैज्ञानिकों और देश के कृषि विशेषज्ञों ने भी की है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी देश के पहले ऐसे किसान हैं, जिन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ किसान होने का अवार्ड अब तक 4 बार, भारत सरकार के अलगअलग कृषि मंत्रियों के हाथों मिल चुका है.

– अब तक 7 लाख से अधिक लहलहाते पेड़ उगाने वाले डा. राजाराम त्रिपाठी को आरबीएस ‘अर्थ हीरो‘ (एक लाख की पुरस्कार राशि), ग्रीन वारियर यानी हरित योद्धा अवार्ड सहित कई अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड और प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अवार्ड मिल चुके हैं.

– हालफिलहाल डा. राजाराम त्रिपाठी के मार्गदर्शन में ‘‘मां दंतेश्वरी फार्म एंेड रिसर्च सैंटर‘‘ द्वारा 40 लाख रुपए में तैयार होने वाले एक एकड़ के ‘पौलीहाउस‘ का ज्यादा टिकाऊ, प्राकृतिक, सस्ता और हर साल पौलीहाउस से ज्यादा फायदा देने वाला सफल और बेहतर विकल्प ‘‘नैचुरल ग्रीनहाउस‘‘ कोंडागांव मौडल महज ‘‘डेढ़ लाख रुपए‘‘ में. जी हां, 40 लाख रुपए के पौलीहाउस का विकल्प महज डेढ़ लाख रुपए में तैयार किया है. किसानों की आमदनी को कई गुना बढ़ाने वाले इस मौडल ने तो पूरे देश में तहलका मचा दिया है. इसे देश की खेती का ‘‘गेमचेंजर‘‘ माना जा रहा है. साथ ही, इस नैचुरल ग्रीनहाउस को ‘‘क्लाइमेटचेंज‘‘ के खिलाफ सब से कारगर हथियार माना जा रहा है.

– डा. राजाराम त्रिपाटी के द्वारा स्थापित ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह‘ के साथ अब इन परिवारों की दूसरी पीढ़ी भी कंधे से कंधा मिला कर पसीना बहा रही है. इस नव युवा पीढ़ी की अगुआई कर रही इन की बिटिया अपूर्वा त्रिपाठी, जो कि 25 लाख रुपए का पैकेज ठुकरा कर बस्तर की आदिवासी महिला समूहों के साथ मिल कर उगाए गए विशुद्ध प्रमाणित जैविक जड़ीबूटियों, मसालों और उत्कृष्ट खाद्य उत्पादों की श्रंखला ‘‘एमडी-बोटैनिकल्स‘‘  ब्रांड के जरीए एक विश्वसनीय वैश्विक ब्रांड का तमगा हासिल कर चुकी हैं. इन के बस्तरिया उत्पाद अब ‘फ्लिपकार्ट‘ और ‘अमेजन‘ पर ट्रेंड कर रहे हैं.

– यह भी उल्लेखनीय है कि बस्तर स्थित इनके हर्बल-फार्म जिसे ये किसान की प्रयोगशाला कहते हैं, पर अब तक माननीय महामहिम  राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आजाद राज्यपाल श्री दिनेश नंदन सहाय मुख्यमंत्री श्री अजीत जोगी, अमेरिका, नीदरलैंड, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, इथोपिया सहित विश्व के विभिन्न देशों के कई माननीय मंत्रीगण, प्रतिनिधि गण, उच्चाधिकारी तथा वैज्ञानिक पधार चुके हैं।

– देश के हजारों प्रगतिशील किसानों, स्कूलों के बच्चों और मैडिसिनल प्लांट के शोधार्थियों, वैज्ञानिकों, नवउद्यमी युवाओं के लिए इस किसान की प्रयोगशाला यानी ‘‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म और रिसर्च सैंटर फार्म‘‘ पर निरंतर आनाजाना लगा रहता है.

– वर्तमान में डा. राजाराम त्रिपाठी ‘‘नैशनल मैडिसिनल प्लांट बोर्ड‘‘ आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सदस्य हैं. साथ ही, भारत सरकार के ‘‘भारतीय गुणवत्ता संस्थान यानी बीआईएक की ‘‘कृषि मशीनरी तकनीकी अप्रूवल कमेटी‘‘ के भी सदस्य हैं.

– डा. राजाराम त्रिपाठी ‘‘सैंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन औफ इंडिया (चाम्फ) ूूू.बींउ.िवतह ‘‘ जो कि जैविक किसानों का देश का सब से बड़ा संगठन है, उस के चेयरमैन हैं.

– डा. राजाराम त्रिपाठी को हाल ही में देश के अग्रणी 223 किसान संगठनों के द्वारा बनाए गए ‘‘एमएसपी गारंटी-किसान मोरचा‘‘ का ‘मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता‘ भी बनाया गया है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी वर्तमान में देश के सब से 45 किसान संगठनों के पूरी तरह से गैरराजनीतिक मंच, ‘अखिल भारतीय किसान महासंघ ( आईफा)‘ के ‘राष्ट्रीय संयोजक‘ के रूप में देशभर के किसानों की सशक्त आवाज के रूप में जाने जाते हैं.

– खेतीकिसानी में झंडे गाड़ने से इतर आदिवासी बोली, भाषा और उन की संस्कृति के संरक्षण के लिए डा. राजाराम त्रिपाठी का काम देशभर में उन की अलग पहचान बनाता है. इन के द्वारा लिखी किताबों में ‘‘बस्तर बोलता भी है‘‘ और ‘‘दुनिया इन दिनों‘‘  की गणना देश की चर्चित कृतियों में होती है. विगत एक दशक से दिल्ली से प्रकाशित हो रही जनजातीय सरोकारों की मासिक पत्रिका ‘‘ककसाड़‘‘ के जरीए छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की विलुप्त हो रही बोली, भाषा, संस्कृति और सदियों के संचित अनमोल परंपरागत ज्ञान को संजोने, व बढ़ाने के काम में अथक जुटे ‘‘कृषि ऋषि‘‘ डा. राजाराम त्रिपाठी को लोक संस्कृति का चलताफिरता ध्वजावाहक कहा जाना भी अतिशयोक्ति न होगा. इन का काम बहुआयामी है. इन के बारे में अगर और अधिक जानना हो, तो कृपया गूगल पर जाएं, गूगल बाबा की लाइब्रेरी में इन के ऊपर हजारों पेज आप को मिल जाएंगे.

कौन सी हैं देशी कपास की खास प्रजातियां

नई दिल्ली: सरकार द्वारा कराए गए विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि देशी कपास की प्रजाति ‘गासिपियम आर्बोरियम‘ कपास की पत्ती मोड़ने वाले वायरस रोग से सुरक्षित है, तुलनात्मक रूप से चूसने वाले कीटों (सफेद मक्खी, थ्रिप्स और जैसिड्स) और बीमारियों ( बैक्टीरियल ब्लाइट और अल्टरनेरिया रोग) के प्रभाव को सहन कर सकती है, ग्रे यानी फफूंदी रोग के प्रति संवेदनशील है. देशी कपास की प्रजातियां नमी को भी सहन कर सकती हैं. यह जानकारी पिछले दिनों राज्यसभा में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चैधरी ने दी.

जारी की गई 77जी आर्बोरियम कपास किस्म

व्यावसायिक खेती के लिए जारी की गई 77जी आर्बोरियम कपास किस्मों में से, वसंतराव नाइक मराठवाड़ा के वैज्ञानिकों ने 4 लंबी रोएंदार किस्में विकसित की हैं, जो पीए 740, पीए 810, पीए 812 और पीए 837 हैं. कृषि विद्यापीठ (वीएनएमकेवी), परभणी (महाराष्ट्र) की स्टेपल लंबाई 28-31 मिलीमीटर है और बाकी 73 किस्मों की मुख्य लंबाई 16-28 मिलीमीटर तक है.

वसंतराव नाइक मराठवाड़ा, कृषि विद्यापीठ, परभणी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – आल इंडिया कौटन रिसर्च प्रोजैक्ट औन कौटन के परभणी केंद्र ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – सैंट्रल इंस्टीट्यूट फौर रिसर्च औन कौटन टैक्नोलौजी, नागपुर केंद्र में ऊपरी आधी औसत लंबाई, जिनिंग आउट टर्न, माइक्रोनेयर वैल्यू सहित कताई परीक्षणों के लिए देशी कपास की किस्मों का परीक्षण किया है. परीक्षणों में कताई की किस्मों को सफल घोषित किया गया है.

देशी कपास स्टेपल फाइबर की लंबाई बढ़ाने के लिए अनुसंधान प्रयास जारी है. वर्ष 2022-23 के दौरान इन किस्मों के 570 किलोग्राम बीजों का उत्पादन किया गया. अगले बोआई सत्र में बोआई के लिए किसानों के पास पर्याप्त मात्रा में बीज उपलब्ध है.

दालों से मिलेगी अधिक उपज

नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तत्वावधान में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) ने दालों सहित विभिन्न फसलों की क्षेत्र विशिष्ट, उच्च उपज देने वाली और जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित की हैं.

वर्ष 2014 के बाद से, देश में 14 दलहनी फसलों की कुल 369 किस्में जारी और अधिसूचित की गई हैं, जिन में सितंबर, 2023 तक बिहार के लिए 7 दलहनी फसलों की 24 किस्में शामिल हैं, जैसे काबुली चना की 6 किस्में, फील्डपी की 6 किस्में, अरहर की 6 किस्में, फैबाबीन की 3 किस्में, मूंग की 2 किस्में, उड़द की एक और मसूर की एक किस्में शामिल हैं.

किसानों को खेती के लिए नई उन्नत किस्मों के बीज जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिन में उन्नत किस्मों के ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति. पिछले 5 वर्षों के दौरान, आईसीएआर द्वारा आधार और प्रमाणित बीज के डाउनस्ट्रीम गुणन के लिए विभिन्न सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीज उत्पादक एजेंसियों को 15.60 लाख क्विंटल दालों के ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति की गई.

इस के अलावा वर्ष 2016 में ब्रीडर बीज उत्पादन बढ़ाने के लिए 150 दलहन बीज हब और 12 केंद्रों की स्थापना की गई, जिन्होंने वर्ष 2016-17 से 2022-23 के दौरान 7.09 लाख गुणवत्ता वाले बीज और 21713 क्विंटल ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति की है. इसी के साथ 6.39 लाख गांवों को मिला कर कुल 1587.74 लाख क्विंटल गुणवत्ता वाले बीज का उत्पादन किया गया.

ग्राम स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने के लिए बीज ग्राम योजना के तहत वर्ष 2014-23 के दौरान 98.07 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया गया और वर्ष 2018-19 से 2022-23 के दौरान दालों के 6000 फ्रंट लाइन प्रदर्शनों और 1,51,873 क्लस्टर फ्रंटलाइन प्रदर्शनों के माध्यम से नई उच्च उपज वाली किस्मों के बीजों का वितरण किया गया.

देशदुनिया में श्रीअन्न को बढ़ावा देगा ये शोध केंद्र

नई दिल्ली: 29 नवंबर 2023. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेष पहल पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय श्रीअन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद में स्थापित किया जा रहा ‘‘श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र’’ सर्वसुविधायुक्त रहेगा, जिस के जरीए देशदुनिया में श्रीअन्न को बढ़ावा मिलेगा.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मार्गदर्शन में इस केंद्र के लिए कार्यवाही चल रही है. उन्होंने संबंधित अधिकारियों से कहा कि हमारे किसानों को इस केंद्र का अधिकाधिक लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए, खासकर छोटे व सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाने के मकसद से श्रीअन्न को बढ़ावा देने के लिए भारत की पहल पर अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष 2023 मनाया जा रहा है.

18 मार्च, 2023 को पूसा परिसर, नई दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रीअन्न सम्मेलन में ‘‘श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र” की उद्घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई थी, जिस का मुख्य उद्देश्य श्रीअन्न अनुसंधान एवं विकास के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं व उपकरणों से सुसज्जित बुनियादी ढांचे की स्थापना करना है, जिस में मूल्य श्रृंखला, मानव संसाधन विकास, श्रीअन्न के पौष्टिक गुणों के बारे में आम लोगों में जागरूकता फैलाना एवं वैश्विक स्तर पर पहुंच एवं पहचान बनाना है, ताकि किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके.

इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए इस केंद्र में जीन बैंक, प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र, श्रीअन्न मूल्य श्रृंखला एवं व्यापार सुविधा केंद्र, अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान, कौशल व क्षमता विकास केंद्र और वैश्विक स्तर की अनुसंधान सुविधाओं की स्थापना का प्रावधान किया गया है.

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा “श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र” की प्रगति की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक में बताया गया कि यहां अनुसंधान से संबंधित विभिन्न सुविधाओं में जीनोम अनुक्रमण, जीन संपादन, पोषक जीनोमिक्स, आणविक जीव विज्ञान, मूल्य संवर्धन और जीनोम सहायता प्रजनन के लिए उन्नत अनुसंधान उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशालाओं की स्थापना के साथसाथ स्पीड ब्रीडिंग, फाइटोट्रौन, जलवायु नियंत्रित कक्ष, ग्रीनहाउस व ग्लासहाउस एवं रैपिड फेनोमिक्स सुविधा की भी स्थापना की जा रही है.

इसी क्रम में संस्थान के नवस्थापित बाड़मेर, राजस्थान एवं सोलापुर, महाराष्ट्र स्थित 2 क्षेत्रीय केंद्रों को भी सुदृढ़ बनाया जा रहा है. केंद्र को वैश्विक स्तर का अनुसंधान और प्रशिक्षण परिसर बनाने के लिए उन्नत अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं, सम्मेलन कक्षों और अंतर्राष्ट्रीय अतिथिगृह की स्थापना का भी प्रावधान किया गया है. केंद्र की गतिविधियों को समयसीमा में पूरा करने व पूरे देश में लागू करने के लिए आईसीएआर के 15 संस्थान सहयोग करेंगे.

बैठक में कृषि सचिव मनोज आहूजा, डेयर के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक के साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे. श्रीअन्न वैश्विक उत्कृष्ट शोध केंद्र की स्थापना के लिए केंद्रीय बजट में 250 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. इस संबंध में केंद्र सरकार के स्तर पर कार्यवाही तेजी से प्रगति पर है, साथ ही नियमित बैठकें भी हो रही हैं.

समकलित खेती पर पांचदिवसीय प्रशिक्षण

अविकानगर (राजस्थान): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संस्थान केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर, तहसील मालपुरा, जिला टोंक (राजस्थान) के दक्षिण क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, माननावनूर जिला- कोडईकनाल राज्य-तमिलनाडु  द्वारा राज्य के पहाड़ी जिलों के एससी तबके के किसानों को अनुसूचित जाति उपयोजना के माध्यम से किसानवैज्ञानिक संवाद द्वारा समकलित खेती पर पांचदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

वैज्ञानिक संवाद एवं स्थापना दिवस के कार्यक्रम मे मुख्य अतिथि संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर, प्रशासनिक अधिकारी भीम सिंह, माननावनूर सैंटर के प्रभारी डा. पी थिरूमुरुगान, वैज्ञानिक डा. एस. जगवीरा पांडेयन एवं केंद्र के समस्त कर्मचारियों द्वारा कार्यक्रम में हिस्सा लिया गया.

कार्यक्रम में पधारे मुख्य अतिथि निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर एवं अन्य अतिथि का केंद्र द्वारा दक्षिण परंपरा से स्वागतसत्कार किया गया.

Farmingकार्यक्रम को संबोधन करते हुए निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने सभी को समेकित खेती की ओर जाने का निवेदन करते हुए कहा कि इस से सालभर परिवार की आजीविका बनी रहेगी.

उन्होंने जानकारी देते हुए यह भी बताया कि आप भेड़, खरगोश, गाय आदि पशुओं के पालन के साथ ही सब्जी, फल और मसाले का और्गैनिक तरीके से उत्पादन कर के अच्छी आमदनी ले सकते हैं.

डा. अरुण कुमार तोमर ने आगे कहा कि आप उत्तरी भारत के हिमाचल प्रदेश के किसानों की बागबानी, सब्जी और टूरिस्ट आधारित पारिवारिक आजीविका से सीख कर कुछ अपने फार्मिंग सिस्टम को ऐसी दिशा देने की जरूरत है.

इस अवसर पर तमिलनाडु राज्य के किसानों के खरगोश मांस संगठन के साथ एमओयू किया गया, जिस से अविकानगर संस्थान की खरगोशपालन उन्नत तकनीकी को राज्य के पहाड़ी क्षेत्र के सभी तबके के लोगों तक पहुंचाया जाएगा.

केंद्र के कार्यालय प्रभारी डा. पी. थिरूमुरुगान ने बताया कि अनुसूचित जाति के  तबके के किसानों को तमिलनाडु राज्य की कृषि और पशुपालन संस्थान के साथ उन्नत खेती और पशुपालन पर भ्रमण और लेक्चर्स करवाया जाएगा.

खरीफ फसलों में एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन पर प्रशिक्षण

बडवानी : आकांक्षी जिला किसान हब बायोटैक परियोजना के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, बड़वानी द्वारा खरीफ फसलों में एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन पर प्रशिक्षण आयोजित किया गया.

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डा. एसके बड़ोदिया के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केंद्र के सभागार में किया गया. इस औनलाइन/औफलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम में सर्वप्रथम प्रधान वैज्ञानिक डा. एसके बड़ोदिया द्वारा उपस्थित किसानों को वर्तमान में वर्षा की संभावनाओं एवं जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों की जानकारी दे कर खरीफ फसलों में नाशीजीव प्रबंधन विषय की संक्षिप्त जानकारी एंव जल संरक्षण हेतु आधुनिक ड्रिप सिंचाई फर्टिगेशन तकनीकी का उपयोग करने की बात कही.

इस अवसर पर विषय विशेषज्ञ के रूप में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली से प्रधान वैज्ञानिक डा. मुकेश सहगल औनलाइन गूगल मीट के माध्यम से जुड़ कर खरीफ में कपास, सोयाबीन एवं मक्का फसल में नाशीजीव कीट प्रबंधन के लिए अच्छी किस्मों के बीजों का प्रयोग, बीजोपचार कर बोआई करने की बात कही. कपास/सोयाबीन फसल में बीजोचार हेतु जैव उर्वरकों राईजोबियम कल्चर, ट्राईकोडर्मा विरडी का प्रयोग एवं नाशीजीव प्रबंधन हेतु प्रक्षेत्र पर 2-4 फैरोमौन ट्रैप प्रति एकड लगाने की बात कही, जिस से कीट व रोग के प्रकोप से फसल सुरक्षित रहती है. इस के साथ ही साथ बोआई करते समय पौध से पौध की निश्चित दूरी रखें.

किसानों को कपास/सोयाबीन की फसल में लगने वाले पत्ती धब्बा व झुलसा रोगों व अन्य कीटों/रोगों से बचाव के लिए जैविक एवं रासायनिक दवाओं के अनुशंसित मात्रा के प्रयोग एवं कृषि के मित्र कीटों के संरक्षण हेतु भी जानकारी प्रदान की गई.

इस अवसर पर केंद्र के मौसम वैज्ञानिक रविंद्र सिकरवार द्वारा वर्तमान में जलवायु परिर्वतन आधारित कृषि हेतु केंद्र की इकाई से जुड़ने की बात कही व समयसमय पर केंद्र द्वारा जारी कृषि सलाह की जानकारी दी.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफलतापूर्वक आयोजन में तकनीकी रूप से सहयोग केंद्र के तकनीकी अधिकारी उदय सिंह अवास्या एवं रंजीत बारा कार्यालय अधीक्षक सहलेखपाल द्वारा दिया गया. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिले के लगभग 50 किसानों/महिला किसानों ने भागीदारी की.

छोटे पैमाने पर मछली चारा मिल स्थापित करने के लिए पहल

चेन्नई : 19 जुलाई, 2023. भाकृअनुप-केंद्रीय खारा जल जीवपालन संस्थान (सीबा), चेन्नई ने लघु कृषि आधारित चारा मिल स्थापित करने के लिए महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक उद्यमी राजू भोगिल के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की. जलीय कृषि का विविधीकरण सामान्य रूप से भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र में काफी गति पकड़ रहा है. महाराष्ट्र में अंतर्देशीय और खारे पानी में फिन फिश की विभिन्न प्रजातियों को पालने का प्रयास किया जा रहा है. जलीय कृषि के बड़े पैमाने पर प्रसार के लिए प्रमुख बाधा, लागत प्रभावी और गुणवत्ता वाले फीड की उपलब्धता है, क्योंकि तैयार फीड पूरी तरह से पूर्वी तट से ले जाया जाता है. देश में जलीय कृषि को बढ़ावा देने के प्रयास में सीबा ने विभिन्न प्रजातियों के लिए स्वदेशी रूप से विकसित तैयार फीड के उत्पादन के लिए राज्य सरकार/निजी उद्यमियों के साथ समझौता ज्ञापनों की एक श्रृंखला में प्रवेश किया है. इस संदर्भ में वर्तमान पहल भाकृअनुप-सीबा, मुख्यालय, चेन्नई में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर के उस राज्य में खेती की गई प्रजातियों के लिए उपयोग किए जाने वाले स्वदेशी तैयार किए गए. कार्यात्मक और ग्रोआउट फीड को संसाधित करने के लिए एक फार्म आधारित लघुस्तरीय फीड मिल स्थापित करना है.

Fish Food
Fish Food

 

 

 

 

 

डा. केके लाल, निदेशक, भाकृअनुप-सीबा ने उत्पादन की लागत के साथसाथ फीड की गुणवत्ता के बारे में जानकारी दी. इस के अलावा उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह कृषि आधारित फीड मिल पहल महाराष्ट्र राज्य में अपनी तरह की पहली पहल है और इस क्षेत्र में जलजीव पालने वाले किसानों के लिए एक वरदान होगी.स्टार्टअप उद्यमी भोगिल ने कहा कि राज्य में जलीय कृषि में उपयोग के लिए गुणवत्तापूर्ण फीड की काफी मांग है और इस पहल से छोटे और मध्यम किसानों को मदद मिलेगी.

भाकृअनुप-सीटीसीआरआई का डायमंड जुबली समारोह

तिरुवनंतपुरम : 22 जुलाई,2023. मुख्य अतिथि, डा. हिमांशु पाठक, सचिव, डेयर एवं महानिदेशक, भाकृअनुप ने अपने उद्घाटन संबोधन में भारतीय कृषि के आधार के रूप में भाकृअनुप की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि कृषि को केवल एक व्यवसाय के रूप में नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि राष्ट्र की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के साधन के रूप में भी माना जाना चाहिए.

उन्होंने आगे बताया कि भाकृअनुप ने 3 मुख्य पहल की हैं, जैसे- प्रौद्योगिकियों का प्रमाणीकरण, भाकृअनुप अनुसंधान संस्थानों में शिक्षा का विस्तार एवं प्रौद्योगिकी विकास और व्यावसायीकरण के लिए निजी कंपनियों के साथ घनिष्ठ सहयोग की आवश्यकता भी सम्मिलित है.

उन्होंने किसान सुविधा केंद्र, जलवायु नियंत्रित पौध विकास सुविधा, ईफसल आधारित स्मार्ट फर्टिगेशन प्रणाली, कृषि व्यवसाय इन्क्यूबेशन (एबीआई) केंद्र, ‘डायमंड जुबली हाल’ और प्रदर्शनी स्टालों का उद्घाटन किया. हीरक जयंती समारोह के हिस्से के रूप में सीएमडी प्रतिरोधी कसावा की एक किस्म ‘श्री कावेरी’ और उच्च उपज देने वाली तारो किस्मों की 2 किस्में ‘श्री हीरा और श्री तेलिया’ जारी की गईं.

डा. जी. बायजू, निदेशक, भाकृअनुप-सीटीसीआरआई ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में भाकृअनुप-सीटीसीआरआई की अनुसंधान उपलब्धियों पर प्रकाश डाला, जैसे कि एक कसावा किस्म और दो उच्च उपज देने वाली तारो किस्मों को जारी करना, भारत के 12 कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए अनुशंसित 15 नई किस्मों और इस वर्ष भाकृअनुप द्वारा अनुमोदित 8 प्रौद्योगिकियों के बारे में भी जानकारी दी.

डा. केबी हेब्बार, निदेशक, भाकृअनुप-सीपीसीआरआई, कासरगोड, डा. आर. दिनेश, भाकृअनुप-आईआईएसआर, कोझिकोड, डा. ए. गोपालकृष्णन, निदेशक, भाकृअनुप-सीएमएफआरआई, कोच्चि, डा. जार्ज निनान, निदेशक, भाकृअनुप-सीआईएफटी, कोच्चि और डा. जैकब जान, विस्तार निदेशक, केरल कृषि विश्वविद्यालय, त्रिशूर ने उपस्थित हो कर इस अवसर की शोभा बढ़ाई.

कार्यक्रम के दौरान भाकृअनुप-सीटीसीआरआई और मार बेसिलियोस कालेज औफ इंजीनियरिंग एंड टैक्नोलौजी, तिरुवनंतपुरम और रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोट्टायम के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए.

पूरे भारत में 7 प्रगतिशील कंद फसल किसानों को भी सम्मानित किया गया और स्कूली बच्चों के लिए भाकृअनुप/ राज्य संस्थानों द्वारा प्रदर्शनियों का आयोजन किया गया.

इस समारोह में सौ से अधिक किसानों और 500 छात्रों ने भाग लिया.

कृषि विकास के साथ देश को आगे बढ़ाने का लक्ष्य

नई दिल्ली : 7 जुलाई 2023. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा आयोजित कृषि पर चिंतन शिविर का शुभारंभ आज केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुख्य आतिथ्य में और राज्य मंत्री कैलाश चौधरी एवं शोभा करंदलाजे और नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद की विशेष उपस्थिति में हुआ.

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि हमारे देश में कृषि की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है. राष्ट्रीय फलक पर देखें, तो वैश्विक मंदी एवं कोरोना के संकटकाल में भी हमारा कृषि क्षेत्र मजबूत बना रहा, इसे सामूहिक प्रयासों से और भी सशक्त बनाया जाए. हमारे कृषि क्षेत्र ने देश का पेट तो भरा ही, हम दुनिया के कई देशों की मदद भी कर सकें. चिंतन शिविर में विचार होना चाहिए कि सरकार की किसान हितैषी योजनाएं और अधिक पारदर्शी कैसे हों, किसान हित में कामकाज और सरल हों, हमारे लक्ष्य कैसे पूरे हों. हमारी कार्यपद्धति प्रशंसा की पात्र हों.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस संबंध में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना का उदाहरण भी दिया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य वर्ष 2047 तक अमृतकाल में भारत को विकसित भारत के रूप में प्रतिष्ठित करना है, जिस के लिए जरूरी पैरामीटर्स को फुलफिल करना हमारी जिम्मेदारी है. उसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह चिंतन किया जा रहा है कि कृषि क्षेत्र में क्याक्या बढ़ेगा, वर्ष 2047 में हम कहां खड़े होंगे, उत्पादन क्षमता क्या होगी, उत्पादकता क्या होगी, फसलों के प्रकार क्या होंगे, इस बारे में सोच कर किसानों के साथ समन्वय हमारी जिम्मेदारी है.

उन्होंने कहा कि अमृतकाल में हमें समग्र रूप से विचार करते हुए तय करना पड़ेगा कि सरकार के काम की दिशा व गति क्या होगी. चुनौतियों का आकलन व उन्हें चिन्हित करते हुए लक्ष्यावधि में काम करते आगे बढ़ना होगा.

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि हमें आगामी 5 साल के बजाय 25 साल का रोडमैप तैयार करना है. वर्ष 2047 तक देश को आत्मनिर्भर बनाने में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान होगा और तब तक के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, इस अमृतकाल में कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाने के संबंध में यह चिंतन शिविर आयोजित किया गया है.

उन्होंने कृषि क्षेत्र की कमियों को दूर करते हुए नई टैक्नोलौजी के माध्यम से और तेज प्रगति किए जाने पर भी जोर दिया.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन के मुताबिक हमें अमृतकाल के लिए ठोस योजना बना कर नई पीढ़ी के लिए कृषि क्षेत्र के विकास की सौगात देना है.

उन्होंने यह भी कहा कि आत्मनिर्भर कृषि के लिए हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुसार आगे बढ़ें. हम देश के लिए मिलजुल कर काम करेंगे, तो लक्ष्य को अवश्य हासिल कर पाएंगे.

नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद, केंद्रीय कृषि सचिव मनोज अहूजा, डेयर के सचिव व आईसीएआर के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक ने भी शिविर में विचार रखें.

प्रारंभ में कृषि मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव राकेश रंजन ने कृषि पर 2 दिवसीय चिंतन शिविर की प्रस्तावना रखी. शिविर में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, डेयर व आईसीएआर के अधिकारियों के साथ विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं.

शिविर में इन विषयों पर चिंतन किया गया.

i. कृषि को जलवायु अनुकूल बनाने के लिए रणनीतियां विकसित करना.

ii. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन से जुड़े मुद्दों व चुनौतियों का समाधान करना, उर्वरक के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना,  मृदा की उर्वरता को बढ़ाना और एक अनुकूल टिकाऊ कृषि प्रणाली की स्थापना में योगदान देना.

iii. वनस्‍पति संरक्षण के पर्यावरण अनुकूल दृष्टिकोण में सामंजस्य स्थापित करने के लिए विभिन्न संगठनों व हितधारकों के बीच तालमेल बनाना.

iv. स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए उन्नत प्राकृतिक कृषि प्रणालियां.

v. प्रभावशीलता व अधिकाधिक पहुंच बढ़ाने, विस्तार सेवाओं को मजबूत करना व विस्तार प्रणाली के डिजिटलीकरण पर ध्यान केंद्रित करना.

vi. निर्यात को बढ़ावा देने व निर्यातोन्मुख आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने के लिए राज्यस्तरीय कार्यनीति तैयार करना.

vii. उत्पादक भागीदारी के माध्यम से क्षेत्र के हरसंभव हस्तक्षेप में संभावित प्राइवेट प्‍लेयर्स का लाभ उठा कर फोकस को  ‘उत्पादन केंद्रित दृष्टिकोण’ से “विपणन केंद्रित दृष्टिकोण” में परिवर्तित करना.