वैज्ञानिक विधि से करें केले की खेती

उत्पादन के सकल मूल्य के मामले में चावल, गेहूं और मक्का के बाद केला विश्व स्तर पर चौथे स्थान पर है. लाखों लोगों के लिए यह एक प्रमुख प्रधान खाद्य फसल है. साथ ही, स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से आय प्रदान करता है.

केले के पाउडर का इस्तेमाल बच्चे के भोजन के रूप में किया जाता है. नियमित रूप से उपयोग किए जाने पर यह हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में मदद करता है और उच्च रक्तचाप, गठिया, अल्सर, आंत्रशोथ और गुरदे की बीमारियों से पीडि़त मरीजों के लिए अनुशंसित है.

केले से चिप्स, केला प्यूरी, जैम, जैली, जूस और हलवा जैसे प्रोसैस्ड प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं. कोमल तना, जो पुष्पक्रम को सहन करता है, कटी हुई स्यूडोस्टैम की पत्ती को हटा कर सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है.

भारत दुनिया में सब से बड़ा केला उत्पादक है. 2017-18 के दौरान भारत ने 8.6 लाख हेक्टेयर जमीन से लगभग 304.7 लाख टन केले का उत्पादन किया था.

एक साल से भी कम समय में केले की फसल तैयार की जा सकती है. केला बारहमासी फसल है, जो जल्दी उगता है और पूरे साल इसे काटा जा सकता है. उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से उगाई जाने वाली केले की किस्म ग्रैंड नाइन (जी 9) है.

उत्तर प्रदेश के प्रमुख क्षेत्रों में जहां केले की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, वे हैं सिद्धार्थ नगर, बस्ती, संत कबीरनगर, महाराजगंज, कुशीनगर, फैजाबाद, बाराबंकी, सुलतानपुर, लखनऊ, सीतापुर, कौशांबी, इलाहाबाद वगैरह. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान भी केले की खेती के प्रति गहरी रुचि ले रहे हैं.

केले की खेती को बढ़ावा देने और लोकप्रिय बनाने के लिए ‘टिशू कल्चर तकनीक के माध्यम से रोगमुक्तकेला पौधों का उत्पादन व नर्सरी’ नामक एक शोध परियोजना वर्तमान में कृषि जैव प्रौद्योगिकी विभाग, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय, मेरठ, उत्तर प्रदेश में डाक्टर आरएस सेंगर की देखरेख में चल रही है.

इस अनुसंधान परियोजना के लागू होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई किसान जागरूक हुए हैं और पत्रपत्रिकाओं और स्थानीय अखबारों में केले की खेती के बारे में पढ़ कर और व्यक्तिगत बैठकों के माध्यम से या रोगमुक्त केले के पौधों के उत्पादन पर प्रशिक्षण और प्रदर्शन के माध्यम से लाभान्वित हुए हैं.

इस अनुसंधान परियोजना की निरंतरता की मदद से कई किसानों ने अपने खेतों में केले की खेती शुरू की है. आने वाले समय में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अधिक से अधिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आमदनी बढ़ाने और अपनी आजीविका को बनाए रखने के लिए केले की खेती को अपनाने में कामयाब होंगे.

Bananaकेले की खेती के लिए मिट्टी

केला सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है, लेकिन व्यावसायिक रूप से खेती करने के लिए अच्छे जल निकास वाली गहरी दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच हो, सही रहती है. अधिक रेतीली मिट्टी, जो पोषक तत्त्वों को अधिक देर तक रोकने में असमर्थ होती है और अधिक चिकनी मिट्टी, जिस में पानी की कमी के चलते दरारें पड़ जाती हैं, केले की खेती के लिए सही नहीं होती है.

जलवायु

केला उष्ण जलवायु का पौधा है. यह गरम और आर्द्र जलवायु में भरपूर उत्पादन देता है. केले की खेती के लिए 20-35 डिगरी सैल्सियस तापमान सही रहता है. 500 से 1,00 मिलीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में इस की खेती की जा सकती है. केले को पाला और शुष्क तेज हवाओं से नुकसान होता है.

केले की खास किस्में

* ड्वार्फ कैवेंडिश : यह सब से अधिक क्षेत्र में उगाई जाने वाली एक व्यावसायिक प्रजाति है. पौधे लगाने के बाद 250-260 दिनों के बाद फूल आना शुरू हो जाता है. फूल आने के 110-115 दिनों के बाद घार काटने योग्य हो जाती है.

इस प्रकार पौधे लगाने के कुल 12-13 महीने बाद घार तैयार हो जाती है. फल का आकार 15-20 सैंटीमीटर लंबा और 3.0-3.5 सैंटीमीटर मोटे पीले से हरे रंग के होते हैं. घार का भार 20-27 किलोग्राम तक होता है, जिस में औसतन 130 फल होते हैं. यह प्रजाति पनामा रोग प्रतिरोधी है, पर शीर्ष गुच्छा रोग के प्रति संवेदनशील है.

* रोबस्टा (एएए) : इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं. फल 12-13 माह में पक कर तैयार हो जाते हैं. फल आकार में 20-25 सैंटीमीटर लंबे व 3-4 सैंटीमीटर मोटे होते हैं. घार का वजन तकरीबन 25-30 किलोग्राम तक रहता है. यह प्रजाति पनामा रोग प्रतिरोधी है और सिगाटोका रोग के प्रति संवेदनशील है.

* रस्थली (सिल्क एएबी): इस किस्म के फल आकार में बड़े और पकने पर सुनहरे पीले रंग के होते हैं. घार का वजन 15-18 किलोग्राम तक होता है. फसल 13-15 माह में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म में फल फटने की समस्या आती है.

* पूवन (एबी) : यह दक्षिण और उत्तरपूर्वी राज्यों में उगाई जाने वाली एक लोकप्रिय प्रजाति है. इस के पौधों की लंबाई अधिक होने के कारण उन्हें सहारे की जरूरत नहीं होती है. पौधा लगाने के 12-14 माह बाद घार काटने योग्य हो जाती है.

घार में मध्यम लंबाई वाले फल सीधे ऊपर की दिशा में लगते हैं. फल पकने पर रंग में पीले और स्वाद में थोड़ा खट्टापन लिए हुए मीठे होते हैं. फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है, इसलिए फल एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से भेजे जा सकते हैं. घार का औसत वजन 20-24 किलोग्राम तक होता है. यह प्रजाति पनामा रोग प्रतिरोधी है और स्ट्रीक विषाणु रोग से प्रभावित होती है.

* नेंद्रन (एएबी) : इस किस्म का उपयोग मुख्य रूप से चिप्स और पाउडर बनाने के लिए किया जाता है. इसे सब्जी केला भी कहा जाता है. इस के फल लंबे, मोटे छाल वाले थोड़े से मुड़े हुए होते हैं. फल पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं. घार का औसत वजन 8-12 किलोग्राम तक होता है. प्रत्येक घार में 30-35 फल होते हैं. इस की खेती केरल व तमिलनाडु के कुछ भागों में की जाती है.

* मांथन (एएबी) : इस किस्म के पौधे ऊंचे और मजबूत होते हैं. घार का भार 18-20 किलोग्राम होता है. प्रति घार औसतन 60-70 फल होते हैं. यह किस्म पनामा उकटा रोग से प्रभावित होती है, लेकिन पत्ती धब्बा और सूत्रकृमि रोग के प्रति सहिष्णु होती है.

* ग्रेंड नाइन (जी-9) : इस किस्म के पौधों की ऊंचाई मध्यम और उत्पादकता अधिक होती है. फसल की अवधि 11-12 माह की होती है. घार का भार 25-30 किलोग्राम होता है. सभी फल समान लंबाई के होते हैं.

* करपूरावल्ली (एबीबी) : इस किस्म के पौधों की बढ़वार काफी अच्छी होती है. घार का भार 25-30 किलोग्राम होता है. प्रति घार 10-12 हस्त और 200 फल लगते हैं. फलों में मिठास और पैक्टिन की मात्रा दूसरी किस्मों की अपेक्षा अधिक पाई जाती है.

फलों की भंडारण क्षमता बहुत अच्छी होती है. यह किस्म पनामा मिल्ट रोग और तना छेदक कीट के प्रति संवेदनशील और पत्ती धब्बा रोग के प्रति सहिष्णु है. यह तमिलनाडु और केरल की एक खास किस्म है.

संकर किस्में

* एच 1 : इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई लिए होते हैं. घार का भार 14-16 किलोग्राम होता है. फल लंबे व पकने पर सुनहरे पीले रंग के हो जाते हैं. फल थोड़े से अम्लीय प्रकृति के होते हैं. इस किस्म से 3 साल के फसल चक्र में 4 बार फसल ली जा सकती है.

* एच 2 : इस के पौधे मध्यम ऊंचाई (2.3 मीटर से 2.4 मीटर) के होते हैं. फल छोटे, कसे हुए और गहरे हरे रंग के होते हैं. फल थोड़ा खट्टापन लिए मीठी सुगंध वाले होते हैं.

* को 1 : इस के फल में विशिष्ट अम्लीय, सेब सुगंध बीरूपक्षी केले की भांति होती है. यह किस्म अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए अधिक सही है.

* एफएचआर 1 (गोल्ड फिंगर) : यह किस्म पोम समूह से संबंधित है. घार का वजन 18-20 किलोग्राम होता है. यह किस्म सिगाटोका और फ्यूजेरियम बिल्ट रोग के प्रति अवरोधी होती है.

प्रवर्धन

केले का प्रवर्धन मुख्य रूप से अंत:भूस्तारी द्वारा किया जाता है. केले के कंद से 2 प्रकार के सकर निकलते हैं, तलवार सकर और जलीय सकर.

व्यावसायिक नजरिए से तलवार सकर प्रवर्धन के लिए सब से सही होते हैं. तलवार सकर की पत्तियां तलवारनुमा पतली और ऊपर की ओर उठी रहती हैं. 0.5-1 मीटर ऊंचे और 3-4 महीने पुराने तलवार सकर रोपने के लिए सही होते हैं. सकर ऐसे पौधों से लेना चाहिए, जो परिपक्वहों और किसी प्रकार के रोग से ग्रसित न हों.

सूक्ष्म प्रवर्धन

वर्तमान समय में केला का प्रवर्धन शूट टोप कल्चर, इन विंट्रो, ऊतक प्रवर्धन विधि से भी किया जा रहा है. इस विधि से तैयार पौधे मात्र वृक्ष के समान गुणधर्म और विषाणु रोगरहित होते हैं.

रोपण का समय

पौध रोपण का उचित समय जलवायु, प्रजाति के चयन, बाजार की मांग वगैरह वजहों पर निर्भर करता है. तमिलनाडु में ड्वार्फ कैवेंडिश और नेंद्रन किस्मों को फरवरी से अप्रैल महीने में, जबकि पूवन व करपूरावल्ली किस्मों को नवंबरदिसंबर माह में रोपित किया जाता है. महाराष्ट्र में रोपण साल में 2 बार जूनजुलाई और सितंबरअक्तूबर माह में किया जाता है.

रोपण का तरीका

खेत को 2-3 बार कल्टीवेटर चला कर समतल कर लें. पौध रोपने के लिए 60×60×60 सैंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदें. प्रत्येक गड्ढे में मिट्टी, रेत और गोबर की खाद 1:1:1 के अनुपात में भरें. सकर को गड्ढे के बीच में रोपित कर उस के चारों ओर मिट्टी को अच्छी तरह से दबाएं. पौधों को लगाने की दूरी किस्म, जमीन की उपजाऊ कूवतऔर प्रबंधन पर निर्भर करती है. सामान्य रूप से केले के पौधों को लगाने की दूरी किस्मों के अनुसार सारणी में बताई गई है.

Bananaसघन रोपण

सघन रोपण पद्धति आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है. इस पद्धति में खरपतवारों की वृद्धि कम होती है और तेज हवाओं के बुरे असर से भी नुकसान कम होता है. बोनी या मध्यम ऊंचाई वाली किस्मों जैसे कैवेंडिश, बसराई, रोबस्टा वगैरह सघन रोपाई के लिए सही होती हैं. रोबस्टा और ग्रेंड नाइन को 1.2×1.2 मीटर की दूरी पर रोप कर क्रमश: 68.98 और 94.07 टन प्रति हेक्टेयर की उपज हासिल होती है.

खाद और उर्वरक

केला एक अधिक पोषण तत्त्व ग्रहण करने वाली फसल है. खाद और उर्वरक की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ कूवत, रोपण पद्धति, किस्म, उर्वरक देने की विधि और खेती की जलवायु दशा पर निर्भर करती है.

सामान्य वृद्धि और विकास के लिए 100-250 ग्राम नाइट्रोजन, 20-25 ग्राम स्फुर औैर 200-300 ग्राम पोटाश प्रति पौधा जरूरी होता है. नाइट्रोजन और पोटाश को 4-5 भागों में बांट कर देना चाहिए और स्फुर की पूरी मात्रा को रोपते समय देना चाहिए.

सिंचाई के साथ उर्वरक उपयोग

टपक पद्धति द्वारा सिंचाई के साथ पानी में घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग फर्टिगेशन कहलाता है.

जल प्रबंधन

केला में रोपने से ले कर तुड़ाई तक 1,800-2,200 मिलीमीटर पानी की जरूरत होती है. केले में मुख्यत: कूंड़, थाला और टपक सिंचाई पद्धति द्वारा सिंचाई की जाती है. केले को गरमी के मौसम में 3-4 दिन और सर्दियों में 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जरूरत होती है.

ड्रिप पद्धति द्वारा सिंचाई की विधि भी किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है. इस पद्धति से सिंचाई करने पर 40-50 फीसदी तक पानी की बचत होने के साथ ही प्रति इकाई क्षेत्रफल से उत्पादन भी अधिक हासिल होता है. ड्रिप सिंचाई पद्धति में 5 से 18.6 लिटर पानी प्रतिदिन प्रति पौधा की दर से विभिन्न अवस्थाओं में जरूरी होता है.

मल्च का प्रयोग

मल्च के प्रयोग से जमीन में नमी का संरक्षण होता है. साथ ही, खरपतवारों की बढ़वार भी रुकती है.

गुजरात कृषि विश्वविद्यालय, नवसारी में ड्रिप सिंचाई पद्धति के साथ गन्ने की खोई अथवा सूखी पत्ती 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मल्च द्वारा केले के उत्पादन में 49 फीसदी तक की बढ़वार दर्ज की गई है और 30 फीसदी पानी की बचत भी होती है. इस के अलावा पौलीथिन शीट द्वारा मल्चिंग से भी अच्छे नतीजे हासिल हुए हैं.

देखभाल

* मिट्टी चढ़ाना : पौधों पर मिट्टी चढ़ाना जरूरीहोता है, क्योंकि इस की जड़ें उथली होती हैं. कभीकभी कंद जमीन से बाहर आ जाते हैं और इस वजह से उन की बढ़वार रुक जाती है.

* अनावश्यक सकर निकालना : केले के पौधों में पुष्प गुच्छ निकलने से पूर्व तक सकर्स को नियमित रूप से निकालते रहना चाहिए. जब 3/4 पौधों में पुष्पन हो जाए, तब एक सकर को छोड़ कर अन्य सब काटते रहें.

* सहारा देना : केले के फलों का गुच्छा भारी होने के चलते पौधे नीचे की ओर ?ाक जाते हैं. पौधों को गिरने से बचाने के लिए बांस की बल्ली या 2 बांसों को आपस में बांध कर कैंची की तरह बना कर फलों के गुच्छों को सहारा देना चाहिए.

* गुच्छों को ढकना : गुच्छों को सूरज की सीधी धूप से बचाने और फलों का आकर्षक रंग हासिल करने के लिए गुच्छों को छेद वाले पौलीथिन बैग अथवा सूखी पत्तियों से ढकना चाहिए.

सीड ट्रे में तैयार करे पौधे

पर्यावरण के प्रति लोगों में पिछले कुछ सालों से जागरूकता बढ़ी है और बडे़ पैमाने पर वृक्षारोपण यानी पेड़ लगाने के कार्यक्रम किए जा रहे हैं. पर दुख की बात है कि हर साल लगाए जाने वाले पौधों में आधे से ज्यादा पौधे तो किसी न किसी वजह से बेकार हो जाते हैं और बाकी बचे पौधों में भी कुछ अल्पविकसित होते हैं और कुछ सही तरह से पनप पाते हैं.

उलट वातावरण के अलावा बारिश न होने, दीमक या दूसरे कीटों का हमला होने व रोगों का फैलाव वगैरह कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिन्हें टाला नहीं जा सकता है, पर अच्छी किस्म के पौधे नर्सरी यानी रोपणी में तैयार किए जा सकते हैं. अच्छी किस्म के पौधों से पौधों की उत्पादकता बढ़ती है.

इस तरह के पौधे तैयार करने के लिए पिछले कुछ सालों में कृषि वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक ईजाद की है, जिन्हें रूट ट्रेनर तकनीक या जड़ साधक कहते हैं.

भारत में वृक्षारोपण कार्यक्रम

भारत में वानिकी कार्यक्रम 100 सालों से भी कहीं ज्यादा पुराना है और अभी भी भारत का एक बड़ा इलाका वनों से वंचित है. भारत में पहले ही बीजों को सीधा बोने का चलन था. इस के बाद विभिन्न प्रकार के पात्रों यानी बरतनों में पौधे तैयार करने की तकनीक चलाई गई. ये बरतन धातु, मिट्टी, पत्तियों, बांस वगैरह सभी तरह के मुहैया स्रोतों से बनाए जाते थे. इन सभी के बाद प्लास्टिक की थैलियों यानी पौली बैग का चलन शुरू हुआ जो आज भी जारी है. ये पौली बैग आसानी से बाजार में मुहैया हो जाते हैं और काफी सस्ते भी पड़ते हैं, पर इन पौली बैग में कई तरह की कमियां भी हैं. ये हैं :

* इन में जड़ें कुंडलित यानी उलझा हुई होती हैं और पार्श्व जड़ें यानी पास की जड़ें पूरी तरह पनप नहीं पाती हैं. इस वजह से परिपक्व व विकसित जड़ तंत्र नहीं बन पाता है.

* पौधों को लाने व ले जाने के दौरान मिट्टी ढीली हो जाती है और जड़ों को बांधे रखने में नाकाम हो जाती है. इस तरह के पौधे रोपने के बाद जल्दी विकसित नहीं हो पाते और इन पर रोगों का हमला भी ज्यादा होता है.

* पौली बैग के इस्तेमाल में हर रोज जांच करनी पड़ती है और ज्यादा मजदूरों की जरूरत नहीं पड़ती है.

* पौली बैग दोबारा उपयोग में नहीं लाए जा सकते और वे फिर से वातावरणीय तंत्र में विघटित भी नहीं होते, इसलिए पर्यावरण संतुलन में भी बाधक होते हैं.

जड़ साधक यानी रूट ट्रेनर तकनीक के प्रयोग द्वारा ये सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं. पश्चिमी देशों में इन का कामयाबी से प्रयोग होने के बाद भारत में इस का उपयोग शुरू किया जा चुका है.

क्या है जड़ साधक तकनीक

जड़ साधक ऊंचे लैवल के बने बरतन हैं, जिन में यूवी अवरोधक भी लगा होता है. ये एक टे्र के रूप में होते हैं और पूरी दुनिया में ऊंची क्वालिटी के पादपों को तैयार करने में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. आसान परिवहन और सुविधा के लिए 20 बरतनों के एक सैट को 5×4 की लाइनों में व्यवस्थित किया जाता है.

प्रत्येक बरतन 150 सीसी की कूवत वाले होते हैं. इन बरतनों के तल में एक छेद होता है. इन बरतनों में ऊपर से नीचे तक पूरे भाग में 5 खांचे एकदूसरे के समानांतर लगे रहते हैं. इन खांचों के चलते ही जडें़ कुंडलित नहीं हो पाती हैं और सीधे नीचे चली जाती हैं.

ये जड़ें पैदे में स्थित छेद से बाहर निकलने पर हवा और रोशनी के संपर्क में आती हैं और विकसित हो जाती हैं. इस तरह पूरी तरह विकसित होने पर ये पौधे को नई जड़ें भेजने के लिए संदेश भेजती हैं और यह प्रक्रिया चलती रहती है.

Root Trainerइस तरह से पार्श्व जड़ों यानी पास की जड़ों का एक जाल विकसित हो जाता है. ये पादप जब मिट्टी में रोपे जाते हैं, तब यह जड़ तंत्र जमीन से ज्यादा मात्रा में पोषक तत्त्व हासिल करता है और पौधे की बढ़वार तेजी से होती है. जड़ साधकों के प्रयोग से कई प्रकार के फायदे हैं. ये इस तरह हैं :

* यह एक ट्रे के रूप में होते हैं और कम जगह घेरते हैं, इसलिए छोटी जगह में भी कई हजार पौधे रोपणी यानी नर्सरी में तैयार हो सकते हैं.

* इन में कम मात्रा में पोषक पदार्थ की जरूरत होती है और बारबार इन्हें देखने की जरूरत नहीं होती है. इस से खर्च में भी कमी आती है.

* इस में हवा के आनेजाने की पर्याप्त जगह होती है और हवा द्वारा जडें़ विकसित हो जाने के चलते पूरा विकसित जड़ तंत्र बनता है.

* इस में पार्श्व जड़ों यानी पास की जड़ों से भरापूरा जड़ तंत्र होने से पादप में पोषण के लिए उपयुक्त जडें़ विकसित हो जाती हैं, जो पौध रोपने के बाद तेजी से बढ़वार में मददगार साबित होती है.

* इस में पादपों के लाने व ले जाने के दौरान नुकसान नहीं होता है और इन में कवक या दूसरे रोग भी नहीं लगते, जिस से उच्च क्वालिटी के पौध नर्सरी में तैयार होते हैं.

* जड़ साधक यानी सीड ट्रे में जड़ों का सर्पिलीकरण या कुंडलन नहीं होता है और इस से जड़ या स्तंभ अनुपात में इजाफा होता है.

* ऐसे जड़ साधक में पादप रोपने के बाद जल्दी विकसित होते हैं और इन में जिंदा रहने की दर भी ज्यादा होती है.

* जड़ साधकों में रोपित पौधों की बढ़वार समान रूप से होती है और उच्च क्षमता के पौधे विकसित होते हैं, जो पौधों की उत्पादकता में बढ़वार करते हैं.

* ये जड़ साधक यानी सीड ट्रे आसानी से कई सालों तक इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं.

* बडे़ लैवल पर ये सीड ट्रे वृक्षारोपण कार्यक्रमों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं.

दुनिया के कई नर्सरी माहिरों ने पौली बैग में पौध तैयार करने को अनुपयुक्त करार दिया है और उन्हें टाइम बम कहा है. जड़ साधकों में तैयार पौधों को वैज्ञानिक फोर्स मल्टीप्लाय यानी तेजी से गुणन करने वाला बताते हैं.

ये न केवल जल्दी विकसित होते हैं, बल्कि अच्छी क्वालिटी के भी होते हैं, जिन से पेड़ों के उत्पाद यानी खाद्य, लकड़ी, ईंधन वगैरह में भी बढ़वार होती है. ये जड़ साधक कई सालों तक उपयोग में लाए जा सकते हैं, इसलिए पर्यावरण संतुलन में भी सहायक होते हैं.

यों भी कह सकते हैं कि पौलीथिन में तैयार पौधों की लागत कम आती है, पर अगर हम जड़ साधकों का प्रयोग करें तो पहले साल में कीमत ज्यादा पड़ती है, पर ये बारबार प्रयोग किए जा सकते हैं और इन में पादप पोषक की मात्रा कम लगती है व मजूदरों की भी कम जरूरत होती है.

इस तरह से अगर हम कई सालों के खर्च की तुलना करें तो जड़ साधक सस्ते पड़ते हैं और इन से अच्छी क्वालिटी के पौध तैयार होते हैं. जड़ साधकों का प्रयोग नर्सरी में पौध तैयार करने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव है.

ओरोबैंकी से बचाएं सरसों की समस्या

कई फसलों खासकर  सरसों, बैगन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, तंबाकू,  शलजम वगैरह पर हमला करने वाले ओरोबैंकी यानी ब्रूमरेप खरपतवार की खास बात यह है कि इस की हर किस्म पूरी तरह से परजीवी होती है.

ओरोबैंकी सेरेनुआ इस की एक दूसरी किस्म है, जो बिहार इलाके में सरसों की फसल पर परजीवी है. सरसों की फसल में इस के प्रकोप से 10 से 70 फीसदी तक का नुकसान होता है. यह परजीवी सरसों उगाए जाने वाले सभी इलाकों जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल व ओडिशा में पाया जाता है.

ओरोबैंकी से ग्रस्त सरसों के पौधे छोटे रह जाते हैं और कभीकभी मर भी जाते हैं. ओरोबैंकी के चूपकांग यानी हास्टोरिया सरसों की जड़ों में घुस कर पोषक तत्त्व हासिल करते हैं. पौधों को उखाड़ कर देखें, तो ओरोबैंकी की जड़ें सरसों की जड़ों के अंदर घुसी हुई दिखती हैं. सरसों के पौधों के नीचे मिट्टी से निकलते हुए ओरोबैंकी परजीवी दिखाई पड़ते हैं.

ओरोबैंकी का तना गूदेदार होता है और इस की लंबाई 15 से 50 सैंटीमीटर होती है. तना हलका पीला या बैगनीलालभूरे रंग का होता है, जो पतली भूरी पत्तियों की परतों से ढका रहता है. फूल पत्तियों के कक्ष से निकलते हैं, जो सफेद नली के आकार के होते हैं.

यह अंडाकार बीजयुक्त फलियां बनाता है, जो तकरीबन 5 सैंटीमीटर लंबा होता है व जिन में सैकड़ों की संख्या में छोटेछोटे काले बीज होते हैं. ये बीज मिट्टी में कई सालों तक जिंदा रहते हैं.

ओरोबैंकी के बीज मिट्टी में 10 साल से भी ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते हैं. इस के बीजों का जमाव तभी होता है, जब सरसों कुल के पौधों की जड़ें सरसों की जड़ों की ओर बढ़ती हैं व करीबी संबंध बना कर उन से जुड़ जाती हैं. इस से ओरोबैंकी फसल द्वारा बनाए गए भोजन को ले कर अपनी बढ़वार करता है. वह तकरीबन एक महीने तक मिट्टी में ही बढ़वार कर अंगूठे के आकार के जमीनी तने में भोजन इकट्ठा करता रहता है.

इस के बाद सरसों की 50 से 60 दिन की अवस्था के दौरान यह मिट्टी से बाहर निकल कर बढ़ता है. बाहर आने के बाद भी यह हरे पत्ते नहीं बना कर परजीवी ही बना रहता है. इस के बाद इस में फूल आ जाते हैं और अनगिनत छोटेछोटे बीज बन जाते हैं. यह सारी प्रक्रिया तनों के उगने से ले कर बीज बन कर बिखरने तक 2 महीने में पूरी हो जाती है.

रोकथाम के उपाय

 

Sarson

*           नए इलाकों में ओरोबैंकी के बीज का प्रवेश नहीं होने देना चाहिए और परजीवी के बीजरहित सरसों के शुद्ध बीज का इस्तेमाल करना चाहिए.

*           ओरोबैंकी परजीवी को हाथ से उखाड़ कर या निराईगुड़ाई द्वारा जमीन के ऊपर के तने को काट कर बीज बनने से पहले ही खत्म कर देना चाहिए.

*           यदि बीज बन गए हों, तो पौधों को सावधानी से निकालना चाहिए, जिस से बीज मिट्टी में नहीं मिलें.

*           जिन इलाकों में बहुत ज्यादा हमला होता है, वहां सरसों की फसल टै्रप क्रौप के रूप में बोनी चाहिए. 30 से 40 दिन में परजीवी के पौधे बाहर निकलते दिखाई दें, तो गहरी जुताई कर के सरसों सहित इस के जमीनी तने को खत्म कर इस के बाद दूसरी फसल बो दें.

*           जब तक ओरोबैंकी पर पूरी तरह काबू नहीं हो जाता, सरसों की जगह पर अरंडी की फसल बोएं, क्योंकि अरंडी एक सालाना फसल है. इस से परजीवी को रोकने में मदद मिलेगी.

*           कुछ पौधों, जैसे मिर्च को बोने से ओरोबैंकी के बीजों का जमाव हो जाता है, लेकिन मिर्च की फसल को इस परजीवी से कोई नुकसान नहीं होता है. इस तरह मिट्टी में मौजूद ओरोबैंकी के बीजों को जमा कर इस फसल का टै्रप फसल के रूप में इस्तेमाल कर परजीवी के पौधों को खत्म किया जा सकता है. इस तरह मिर्चसरसों का फसल चक्र अपनाने से इस परजीवी पर कुदरती तौर पर काबू पाया जा सकता है.

*           लंबे समय तक फसल चक्र अपना कर इस की ज्यादती को रोका जा सकता है.

*           पौधों की मिट्टी की सतह के पास 25 फीसदी ताम्रघोल का छिड़काव कर के यह परजीवी खत्म किया जा सकता है.

*           ओरोबैंकी पौधों पर सोयाबीन के तेल की 2 बूंदें डाल देने से पौधा मर जाता है.

*           सरसों की रोगरोधी किस्म दुर्गामणि की बोआई करें.

गाजरघास की बनाएं खाद

गाजरघास, जिसे कांग्रेस घास, चटक चांदनी, कड़वी घास वगैरह नामों से भी जाना जाता है, न केवल किसानों के लिए, बल्कि इनसानों, पशुओं, आबोहवा व जैव विविधता के लिए एक बड़ा खतरा बनती जा रही है. इस को वैज्ञानिक भाषा में पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस कहते हैं.

ज्यादा फसल लेने के चक्कर में कैमिकल खादों का ज्यादा इस्तेमाल करने से इनसान की सेहत व आबोहवा पर होने वाला असर किसी से छिपा नहीं है. उस से मिट्टी की उर्वरा कूवत में भी लगातार गिरावट आती जा रही है. कैमिकल खादों का आबोहवा व इनसान पर होने वाला असर देखते हुए जैविक खादों का महत्त्व बढ़ रहा है. ऐसे में गाजरघास से जैविक खाद बना कर हम आबोहवा को महफूज करते हुए इसे आमदनी का जरीया भी बना सकते हैं, लेकिन किसान ऐसा करने से डरते हैं.

क्यों डरते हैं किसान? : सर्वे में पाया गया है कि किसान गाजरघास से कंपोस्ट खाद बनाने में इसलिए डरते हैं कि अगर गाजरघास कंपोस्ट का इस्तेमाल करेंगे तो खेतों में और ज्यादा गाजरघास हो जाएगी.

दरअसल हुआ यह कि कुछ किसानों से जब गाजरघास से अवैज्ञानिक तरीके से कंपोस्ट खाद बना कर इस्तेमाल की गई, तो उन के खेतों में ज्यादा गाजरघास हो गई. इस में हुआ यह कि इन किसानों ने फूलों सहित गाजरघास से नाडेप तकनीक द्वारा कंपोस्ट खाद बना कर इस्तेमाल की. इस से उन के खेतों में ज्यादा गाजरघास हो गई.

इस के अलावा उन गांवों में, जहां गोबर से खाद खुले हुए टांकों यानी गड्ढों में बनाते हैं, जब फूलों सहित गाजरघास को खुले गड्ढों में गोबर के साथ डाला गया तो भी इस खाद का इस्तेमाल करने पर खेतों में ज्यादा गाजरघास हो गई.

कृषि वैज्ञानिकों ने अपने तजरबों में पाया कि नाडेप तकनीक द्वारा खुले गड्ढों में फूलों सहित गाजरघास से खाद बनाने पर इस के छोटे बीज खत्म नहीं हो पाते हैं. एक तजरबे में नाडेप तकनीक द्वारा गाजरघास से बनी हुई केवल 300 ग्राम खाद में ही 350-500 गाजरघास के पौधे अंकुरित होते हुए पाए गए. यही वजह है कि किसान गाजर घास से कंपोस्ट बनाने में डरते हैं. पर, अगर वैज्ञानिक तकनीक से गाजरघास से कंपोस्ट बनाई जाए तो यह एक महफूज कंपोस्ट खाद है.

खाद बनाने का तरीका : वैज्ञानिकों द्वारा हमेशा यही सलाह दी जाती है कि कंपोस्ट बनाने के लिए गाजरघास को फूल आने से पहले उखाड़ लेना चाहिए. बिना फूल वाली गाजरघास का कंपोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल बिना किसी डर के नाडेप तकनीक या खुला गड्ढा तकनीक द्वारा किया जा सकता है.

गाजरघास के सर्दीगरमी के प्रति असंवेदनशील बीजों में सुषुप्तावस्था न होने की वजह से एक ही समय में फूल वाले और बिना फूल के गाजरघास के पौधे खेतों में पैदा होते हैं.

निराईगुड़ाई करते समय फूल वाले पौधों को उखाड़ना भी जरूरी हो जाता है. फिर भी किसानों को गाजरघास को कंपोस्ट बनाने में इस्तेमाल करने के लिए यह कोशिश करनी चाहिए कि वे उसे ऐसे समय उखाड़ें, जब फूलों की मात्रा कम हो. जितनी छोटी अवस्था में गाजरघास को उखाड़ेंगे, उतनी ही ज्यादा अच्छी कंपोस्ट खाद बनेगी और उतनी ही फसल की उत्पादकता बढ़ेगी.

Compostऐसे बनाएं खाद : अपने खेत में थोड़ी ऊंचाई वाली जगह पर, जहां पानी जमा न हो,  3×6×10 फुट (गहराई × चौड़ाई × लंबाई) आकार का गड्ढा बना लें. अपनी सहूलियत और खेत में गाजरघास की मात्रा के मुताबिक लंबाईचौड़ाई कम कर सकते हैं, लेकिन गहराई 3 फुट से कम नहीं होनी पाएंगे.

*           अगर मुमकिन हो सके तो गड्ढे की सतह और साइड की दीवारों पर पत्थर की चीपें इस तरह लगाएं कि कच्ची जमीन का गड्ढा एक पक्का टांका बन जाए. इस का फायदा यह होगा कि कंपोस्ट के पोषक तत्त्व गड्ढे की जमीन नहीं सोख पाएगी.

*           अगर चीपों का इंतजाम न हो पाए, तो गड्ढे के फर्श और दीवार की सतह को मुगदर से अच्छी तरह पीट कर समतल कर लें.

*           खेतों की फसलों के बीच से, मेंड़ों और आसपास की जगहों से गाजरघास को जड़ के साथ उखाड़ कर गड्ढे के पास इकट्ठा कर लें.

*           गड्ढे के पास ही 75 से 100 किलोग्राम कच्चा गोबर, 5-10 किलोग्राम यूरिया या रौक फास्फेट की बोरी, 1 या 2 क्विंटल भुरभुरी मिट्टी और एक पानी के ड्रम का इंतजाम कर लें.

*           तकरीबन 50 किलोग्राम गाजरघास को गड्ढे की पूरी लंबाईचौड़ाई में सतह पर फैला लें.

*           5-7 किलोग्राम गोबर को 20 लिटर पानी में घोल बना कर उस का गाजरघास की परत पर छिड़काव करें.

*           इस के ऊपर 500 ग्राम यूरिया या 3 किलोग्राम रौक फास्फेट का छिड़काव करें.

*           ट्राइकोडर्मा विरिडि या ट्राइकोडर्मा हार्जीनिया नामक कवक के कल्चर पाउडर को 50 ग्राम प्रति परत के हिसाब से डाल दें. इस कवक कल्चर को डालने से गाजरघास के बड़े पौधों का अपघटन भी तेजी से हो जाता है और कंपोस्ट जल्दी बनती है.

*           इन सब मिलाए हुए अवयवों को एक परत या लेयर मान लें.

*           इसी तरह एक परत के ऊपर दूसरी, तीसरी और अन्य परत तब तक बनाते जाएं, जब तक गड्ढा ऊपरी सतह से एक फुट ऊपर तक न भर जाए. ऊपरी सतह की परत इस तरह दबाएं कि सतह गुंबद के आकार की हो जाए. परत जमाते समय गाजरघास को अच्छी तरह दबाते रहना चाहिए.

*           यहां पर गाजरघास को जड़ से उखाड़ कर परत बनाने को कहा गया है. जड़ से उखाड़ते समय जड़ों के साथ ही काफी मिट्टी आ जाती है. अगर आप महसूस करते हैं कि जड़ों में मिट्टी ज्यादा है, तो 10-12 किलोग्राम भुरभुरी मिट्टी प्रति परत की दर से डालनी चाहिए.

*           अब इस तरह भरे गड्ढे को गोबर, मिट्टी, भूसा वगैरह के मिश्रण से अच्छी तरह बंद कर दें. 5-6 महीने बाद गड्ढा खोलने पर अच्छी खाद हासिल होती है.

*           यहां बताए गए गड्ढे में 37 से 42 क्विंटल ताजा उखाड़ी गाजरघास आ जाती है, जिस से 37 से 45 फीसदी तक कंपोस्ट हासिल हो जाती है.

कंपोस्ट की छनाई : 5-6 महीने बाद भी गड्ढे से कंपोस्ट निकालने पर आप को महसूस हो सकता है कि बड़े व मोटे तनों वाली गाजरघास अच्छी तरह से गली नहीं है, पर वास्तव में वह गल चुकी होती है. इस कंपोस्ट को गड्ढे से बाहर निकाल कर छायादार जगह में फैला कर सुखा लें.

हवा लगते ही नम व गीली कंपोस्ट जल्दी सूखने लगती है. थोड़ा सूख जाने पर इस का ढेर बना लें. अगर अभी भी गाजरघास के रेशे वाले तने मिलते हैं, तो इस के ढेर को लाठी या मुगदर से पीट दें. जिन किसानों के पास बैल या ट्रैक्टर हैं, वे उन्हें इस के ढेर पर थोड़ी देर चला दें. ऐसा करने पर घास के मोटे रेशे व तने टूट कर बारीक हो जाएंगे, जिस से और ज्यादा कंपोस्ट हासिल होगी.

इस कंपोस्ट को 2-2 सैंटीमीटर छेद वाली जाली से छान लेना चाहिए. जाली के ऊपर बचे ठूंठों के कचरे को अलग कर देना चाहिए. खुद के इस्तेमाल के लिए बनाए कंपोस्ट को बिना छाने भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरह हासिल हुई कंपोस्ट को छाया में सुखा कर प्लास्टिक, जूट के बड़े या छोटे थैलों में भर कर पैकिंग कर दें.

पोषक तत्त्व : कृषि वैज्ञानिकों ने अपने तजरबों में यह पाया है कि गाजरघास से बनी कंपोस्ट में पोषक तत्त्वों की मात्रा गोबर खाद से दोगुनी और केंचुआ खाद के बराबर होती है. इसलिए गाजरघास से कंपोस्ट बनाना उन का एक अच्छा विकल्प है.

इन बातों पर दें खास ध्यान

*           गड्ढा छायादार, ऊंची और खुली हवा वाली जगह में, जहां पानी का भी इंतजाम हो, बनाएं.

*           गाजरघास को हर हाल में फूल आने से पहले ही उखाड़ना चाहिए. उस समय पत्तियां ज्यादा होती हैं और तने कम रेशे वाले होते हैं. खाद का उत्पादन ज्यादा होता है और खाद जल्दी बन जाती है.

*           गड्ढे को अच्छी तरह से मिट्टी, गोबर व भूसे के मिश्रण के लेप से बंद करें. अच्छी तरह बंद न होने पर ऊपरी परतों में गाजरघास के बीज मर नहीं पाएंगे.

*           एक महीने बाद जरूरत के मुताबिक गड्ढे पर पानी का छिड़काव करते रहें. ज्यादा सूखा महसूस होने पर ऊपरी परत पर सब्बल वगैरह की मदद से छेद कर पानी अंदर भी डाल दें. पानी डालने के बाद छेदों को बंद कर देना चाहिए.

पराली से प्रदूषण जमीनी स्तर पर हो काम तभी फायदे में होगा किसान

हमारे देश की राजधानी दिल्ली व आसपास के इलाकों में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को लेकर खूब होहल्ला मचा. यह केवल इसी साल की बात नहीं है, पिछले कई सालों से धान की कटाई होने के बाद और इसे जलाने को ले कर प्रदेश की सरकारों में एकदूसरे पर आरोप लगाने का दौर चलता है और देश की अदालत को भी इस में अपना दखल देना पड़ता है. आखिरकार नतीजा भी कुछ खास नहीं निकलता और समय के साथ और मौसम में बदलाव होने पर यह मामला अपनेआप खत्म हो जाता है.

हां, इस प्रदूषित वातावरण के माहौल को ले कर राजनीतिक दलों में जरूर बन आती है, जो एकदूसरे पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं और लेदे कर निशाना किसानों को बनाते हैं.

पराली प्रदूषण को ले कर देश की राजधानी दिल्ली में नियम लागू कर दिए जाते हैं, जिस में आम जनता जरूर परेशान होती है, पर नतीजा नहीं निकलता. भवन निर्माण जैसे कामों पर रोक लगा दी जाती है. इस का फायदा वे सरकारी कर्मचारी उठाते हैं, जो लोगों से अच्छीखासी रकम वसूलते हैं और चोरीछिपे यह काम भी चलता है.

प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर भी रोक लगाई जाती है, लेकिन लेदे कर चोरीछिपे वह भी चलती है और जब कभी ऊपर से बड़े अधिकारियों का दबाव आता है तो बिचौलियों के माध्यम से फैक्टरी मालिकों को पहले ही आगाह कर दिया जाता है कि फलां दिन फलां समय अधिकारियों का दौरा है, इसलिए फैक्टरियां बंद रखें.

कहने का मतलब है कि सरकार का काम नियम बनाना है, लेकिन उस को अमलीजामा पहनाना सरकारी मुलाजिमों का काम है, इसलिए सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, चाहे वे आम आदमी हो या सरकारी मुलाजिम, सरकार हो या किसान, तभी इस तरह की समस्या का समाधान संभव है.

किसानों का कहना है कि धान की फसल कटाई और गेहूं बोआई के बीच का समय कम रहा है और सभी किसानों के पास ऐसे संसाधन नहीं हैं जो पराली को इतने कम समय में ठिकाने लगा सकें. ज्यादातर किसानों की पहुंच ऐसे कृषि यंत्रों या ऐसी तकनीक तक नहीं है, जो पराली नष्ट करने में काम आते हैं.

पराली की खाद बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने अनेक तरीके बताए हैं. उस की जानकारी भी समय पर किसानों तक नहीं पहुंच पाती. इस दिशा में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा पराली से खाद बनाने के लिए वेस्ट डीकंपोजर व पूसा संस्थान, नई दिल्ली द्वारा कैप्सूल बनाए हैं, जिन में बहुत ज्यादा असरकारक बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो तय समय में पराली को सड़ा कर खाद बनाने का काम करते हैं.

4 कैप्सूल से 1 एकड़ की पराली बनेगी खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली के कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कैप्सूल तैयार किया है, जिस की कीमत महज 5 रुपए है. इस के 4 कैप्सूल ही एक एकड़ खेत की पराली को खाद बनाने में सक्षम है. इस के इस्तेमाल से पराली की खाद तो बनती ही है, इस के अलावा जमीन में नमी भी बनी रहती है. यह कैप्सूल जो एक तरफ तो पराली को सड़ा कर खाद बनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ खेत की मिट्टी को उपजाऊ भी बनाते हैं.

कैसे इस्तेमाल करें 

कृषि वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह के मुताबिक, सब से पहले हमें 150 ग्राम पुराना गुड़ लेना है. उसे पानी में उबालना है. उबालते समय उस में जो भी गंदगी आती है, उसे निकाल कर फेंक देना है. फिर उस घोल को ठंडा कर के लगभग 5 लिटर पानी में घोल देना है. इस में लगभग 50 ग्राम बेसन भी घोल कर मिला दें. इस के बाद इस में पूसा संस्थान से खरीदे गए 4 कैप्सूलों को खोल कर उसी घोल में मिला दें. इस काम के लिए बड़े आकार यानी चौड़ाई वाला प्लास्टिक या मिट्टी का बरतन लेना है.

अब इस घोल को हलके गरमाहट वाले किसी स्थान पर लगभग 5 दिनों के लिए रख दें. अगले दिन इस घोल की ऊपरी सतह पर एक परत जम जाएगी. इस परत को डंडे की मदद से उसी घोल में फिर मिला देना है. यह प्रक्रिया लगातार 5 दिनों तक करनी है. इस तरीके से आप का कंपोस्ट घोल तैयार हो जाएगा. यह

5 लिटर घोल लगभग 10 क्विंटल पराली को खाद बनाने के लिए काफी है.

अब इस तैयार घोल को आप खेत में फैली पराली पर छिड़क दें. फिर खेत में रोटावेटर चला दें. लगातार 20-25 दिनों में पराली की खाद बन जाएगी. इस के अलावा सिंचाई द्वारा भी इस घोल को पानी में डाल सकते हैं. यह घोल समान रूप से पानी में मिल कर पराली वाले खेतों में पहुंच जाए. 20-25 दिनों में ही पराली को खाद में बदल देते हैं.

कृषि यंत्रों का होना जरूरी

Paraliइस काम में कृषि यंत्रों का होना बेहद जरूरी है जो पराली को खेत में मिला सके. उन्नत किस्म के कृषि यंत्रों को किसानों तक पहुंचाने के लिए कस्टम हायरिंग सैंटर बनाए गए हैं, जिन्हें किसान समितियों द्वारा मिल कर चलाया जा रहा है. इस स्कीम के तहत 80 फीसदी अनुदान पर यह यंत्र किसानों की समितियों को मुहैया कराए जाते हैं, जिन्हें किसान अपनी खेती में तो इस्तेमाल करेंगे ही, बल्कि दूसरे किसानों के लिए भी यंत्र किराए पर दे सकेंगे.

पराली में काम आने वाले यंत्रों में मल्चर, एमबी प्लाऊ, रोटावेटर व सीडर है, जो पराली को काट कर मिट्टी में दबा देते हैं या अवशेषों को जमीन में दबा देते हैं. जीरो टिलेज या हैप्पी सीडर जैसे यंत्र से धान के कटने के बाद खेत में गेहूं की सीधे बोआई कर सकते हैं. हैप्पी सीडर यंत्र धान की पराली को छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर खेत में मिला देता है, जिस की खाद बन जाती है और साथ ही, गेहूं की बोआई भी करता है. इस तरीके से किसान के एकसाथ 2 काम हो जाते हैं.

क्या कहते हैं कृषि मंत्री

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है औैर चिंता की बात है. सभी लोग इस मसले पर गंभीर हैं खासकर दिल्ली व एनसीआर में बुरे हालात बने हैं. इस सिलसिले में पराली प्रोसैस के लिए कृषि मंत्रालय ने एक स्कीम तैयार की है. इस के तहत किसानों को अनुदान पर ऐसे कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराया जा रहा है, जो इस समस्या के समाधान का सहायक है.

20 रुपए में वेस्ट डीकंपोजर से खाद

20 रुपए में मिलने वाले इस वेस्ट डीकंपोजर को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित नैशनल सैंटर औफ आर्गेनिक फार्मिंग द्वारा तैयार किया गया है. इस के इस्तेमाल से लगभग 30 से 40 दिनों में यह पराली की खाद बना देता है.

यह वेस्ट डीकंपोजर पर्यावरण और किसान दोनों के लिए फायदेमंद है. खाद बनाने के साथसाथ खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और दीमक वगैरह में भी खेत का बचाव करता है और खेत में नमी बनाए रखता है.

इस का इस्तेमाल करने के लिए एक बडे़ प्लास्टिक के ड्रम में 200 लिटर पानी भर लें और इस में डीकंपोजर की डब्बी को खोल कर मिला दें. इसे किसी छायादार जगह पर रख लें. फिर 3 दिनों तक इस घोल को सुबहशाम रोज डंडे से मिला दिया करें. इस के बाद 11-12 दिनों तक इसे ऐसे ही छोड़ दें. यह घोल तैयार हो जाएगा औैर अच्छे नतीजों के लिए इस घोल को बनाते समय इस में गुड़ व बेसन भी मिला सकते हैं.

तैयार इस घोल को पहले की तरह ही पानी के जरीए खेत में पहुंचाना है, जो पराली को सड़ा कर खाद बना देगा.

कृषि यंत्र पैडी स्ट्रा चौपर

हार्वेस्टर मशीनें धान की कटाईर् में खेत की सतह से लगभग 1 फुट की ऊंचाई पर करती हैं, बाकी फसल अवशेष खेत में खड़ा रह जाता है जो किसानों के लिए समस्या बन जाता है. इस के समाधान के लिए पैडी स्ट्रा चौपर यंत्र है जो खेत में खड़ी पराली को छोटेछोटे टुकड़ों में काट देता है. इस यंत्र को ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. यंत्र की कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपए है.

चना की नई उन्नत किस्म से फायदा पाएं

दलहनी फसलों में चने की खेती अपना खास स्थान रखती है. भारत दुनिया का सब से ज्यादा चना पैदा करने वाला देश है. चने की तकरीबन 70-75 फीसदी पैदावार हमारे देश में होती है. उत्तर से मध्य व दक्षिण भारत के राज्यों में चना रबी फसल के रूप में उगाया जाता है. चना उत्पादन की नई उन्नत तकनीक व उन्नतशील किस्मों का इस्तेमाल कर किसान चने का उत्पादन और भी बढ़ा सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, अखिल भारतीय समन्वित चना अनुसंधान परियोजना ने हाल ही में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) में आयोजित अपने 24वें वार्षिक बैठक में जीनोमिक्स की मदद से विकसित चना की 2 बेहतर किस्मों ‘पूसा चिकपी-10216’ और ‘सुपर एनेगरी 1’ को जारी किया है, जो चने की दूसरी किस्मों से कहीं बेहतर है.

पूसा चिकपी 10216

* चना की यह एक खास किस्म है. इसे डाक्टर भारद्वाज चेल्लापिला, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के नेतृत्व में चिकपी ब्रीडिंग ऐंड मोलेकुलर ब्रीडिंग टीम द्वारा डाक्टर वार्ष्णेय के. राजीव, इक्रिसैट के नेतृत्व वाली जीनोमिक्स टीम के सहयोग से विकसित किया गया है.

* इस किस्म को आणविक मार्करों की मदद से ‘पूसा 372’ की आनुवांशिक पृष्ठभूमि में आनुवांशिक ‘क्यूटीएल हौटस्पौट’ के बाद विकसित किया गया है.

* ‘पूसा 372’ देश के मध्य क्षेत्र, उत्तरपूर्व मैदानी इलाकों और उत्तरपश्चिम मैदानी इलाकों में उगाई जाने वाली चना की एक खास किस्म है. इस का इस्तेमाल लंबे समय यानी देर से बोई जाने वाली स्थितियों के लिए राष्ट्रीय परीक्षणों में मापक (नियंत्रण किस्म) के रूप में किया जाता रहा है. इस किस्म का विकास साल 1993 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा तैयार किया गया था. हालांकि इस का उत्पादन कम हो गया था.

* इस को प्रतिस्थापित करने के लिए साल 2014 में चना के ‘आईसीसी 4958’ किस्म में ‘सूखा सहिष्णुता’ के लिए पहचाने गए जीनयुक्त ‘क्यूटीएल हौटस्पौट’ को आणविक प्रजनन विधि से ‘पूसा 372’ के आनुवांशिक पृष्ठभूमि में डाल कर विकसित किया गया है.

* नई किस्म की औसत पैदावार 1447 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. भारत के मध्य क्षेत्र में नमी कम होने की स्थिति में यह किस्म ‘पूसा 372’ से तकरीबन 11.9 फीसदी ज्यादा पैदावार देती है.

* इस किस्म के पकने की औसत अवधि 110 दिन है. दाने का रंग उत्कृष्ट होने के साथसाथ इस के 100 बीजों का वजन तकरीबन 22.2 ग्राम होता है.

* खास रोगों मसलन फुसैरियम विल्ट, सूखी जड़ सड़ांध और स्टंट के लिए यह किस्म मध्यम रूप से प्रतिरोधी है और इसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाकों में खेती के लिए चुना गया है.

डाक्टर भारद्वाज चेल्लापिला ने बताया है कि ‘पूसा चिकपी 10216’ भारत में चना की वाणिज्यिक खेती के लिए पहचानी जाने वाली खास सहिष्णुतायुक्त पहली आणविक प्रजनन किस्म बन गई है.

सुपर एनेगरी 1

* इस किस्म को कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, रायचूर (कर्नाटक) और इक्रिसैट के सहयोग से विकसित किया गया है.

* इस किस्म को चना के ‘डब्लूआर 315’ किस्म में फुसैरियम विल्ट रोग के लिए पहचाने गए प्रतिरोधी जीनों को आणविक प्रजनन विधि से कर्नाटक राज्य की प्रमुख चना किस्म एनेगरी 1 की आनुवांशिक पृष्ठभूमि में डाल कर विकसित किया गया है.

* इस किस्म की औसत पैदावार 1898 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है और यह एनेगरी किस्म से तकरीबन 7 फीसदी अधिक पैदावार देती है. साथ ही, दक्षिण भारत में उपज कम करने वाले कारक फुसैरियम विल्ट रोग के लिए बेहद प्रतिरोधी है.

* यह किस्म औसतन 95 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस के 100 बीजों का वजन तकरीबन 18 से 20 ग्राम तक होता है.

* इस किस्म को आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में खेती के लिए चुना गया है.

उपयुक्त जलवायु

चने की खेती तकरीबन 78 फीसदी असिंचित इलाकों और 22 फीसदी सिंचित इलाकों में की जाती है. सर्दी में फसल होने के कारण चना की खेती कम बारिश वाले इलाकों और कम ठंडक वाले इलाकों में की जाती है. फूल आने की दशा में यदि बरसात हो जाए तो फूल झड़ने के कारण फसल को बहुत नुकसान होता है.

चने के अंकुरण के लिए कुछ अधिक तापमान की जरूरत होती है, जबकि पौधों की सही बढ़वार के लिए आमतौर पर ठंडे मौसम की जरूरत होती है.

उपयुक्त जमीन

चने की खेती बलुई से ले कर दोमट और मटियार मिट्टी में की जा सकती है. इस के अलावा चने की खेती के लिए भारी दोमट और मडुआ, पड़आ, कछारी जमीन, जहां पानी जमा न होता हो, वह भी ठीक मानी जाती है.

काबुली चने की खेती के लिए मटियार दोमट और काली मिट्टी, जिस में पानी की सही मात्रा धारण करने की कूवत होती है, उस में सफलतापूर्वक खेती की जाती है. लेकिन जरूरी यह है कि पानी के भरने की समस्या न हो. जल निकासी का सही प्रबंध होना चाहिए.

खेत की तैयारी

चने की खेती के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो से करनी चाहिए. इस के बाद एक क्रास जुताई हैरो से कर के पाटा लगा कर जमीन समतल कर लें.

फसल को दीमक व कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए आखिरी जुताई के समय उस की रोकथाम का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए. जमीन की पैदावार कूवत बनाए रखने और फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए.

बोआई का उचित समय

उत्तर भारत के असिंचित इलाकों में चना की बोआई अक्तूबर माह के दूसरे पखवारे में करें और सिंचित इलाकों में नवंबर माह के पहले पखवारे में करनी चाहिए.

पछेती बोआई दिसंबर माह के पहले हफ्ते कर लेनी चाहिए. देश के मध्य भाग में अक्तूबर का पहला और दक्षिण राज्य में सितंबर के आखिरी हफ्ते से अक्तूबर का पहला सप्ताह चने की बोआई के लिए उचित है.

बीजोपचार : चने की खेती में कई तरह के कीट और रोगों से बचाव के लिए बीज को उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए. बीज को उपचारित करते समय ध्यान रखें कि सब से पहले उसे फफूंदीनाशी, फिर कीटनाशी और आखिर में राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें.

जड़ गलन व उकटा रोग की रोकथाम के लिए बीज को कार्बंडाजिम या मैंकोजेब या थाइरम की 1.5 से 2 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित करें.

दीमक और दूसरे जमीनी कीटों की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी या इंडोसल्फान 35 ईसी की 8 मिलीलिटर मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए.

बीजों को उपचारित कर के एक लिटर पानी में 250 ग्राम गुड़ को गरम कर के ठंडा होने पर उस में राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस घुलनशील जीवाणु को अच्छी तरह मिला कर उस में बीज उपचारित करना चाहिए. उपचारित बीज को छाया में सुखा कर शीघ्र बोआई कर देनी चाहिए.

उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के मुताबिक करें तो ज्यादा अच्छा होगा. वैसे, सामान्य तौर पर 20-25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि असिंचित अवस्था में 2 फीसदी यूरिया या डीएपी का फसल पर छिड़काव करने से अच्छी पैदावार मिलती है.

सिंचाई प्रबंधन : चने की खेती मुख्यत: असिंचित अवस्था में की जाती है, जहां पर सिंचाई के लिए सीमित पानी मुहैया हो, वहां फूल आने के पहले (बोआई के 50-60 दिन बाद) एक हलकी सिंचाई करें. सिंचित इलाकों में दूसरी सिंचाई फली बनते समय जरूर करें.

सिंचाई करते समय यह ध्यान दें कि खेत के किसी भी हिस्से में पानी जमा न होने दें, वरना फसल को नुकसान हो सकता है. फूल आने की स्थिति में सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण 

खरपतवार चने की खेती को 50 से 60 फीसदी तक नुकसान पहुंचाते हैं इसलिए खरपतवार नियंत्रण जरूरी है.

खरपतवार नियंत्रण के लिए पैंडीमिथेलिन 30 ईसी को 3 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लिटर पानी में घोल कर बोआई के 48 घंटे के अंदर छिड़काव यंत्र द्वारा छिड़काव करना चाहिए. फसल में कम से कम 2 बार निराईगुड़ाई करें. पहली गुड़ाई फसल बोने के 35-40 दिन बाद और दूसरी गुड़ाई 50-60 दिनों बाद कर देनी चाहिए.

कीट नियंत्रण : चने की खेती में मुख्य रूप से फली भेदक कीट का हमला ज्यादा होता है. देर से बोआई की जाने वाली फसलों में इस का प्रकोप अधिक होता है.

फली भेदक के नियंत्रण के लिए इंडोसकार्ब (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या स्पाइनोसैड (0.4 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या इमामेक्टीन बेंजोएट (0.4 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का छिड़काव करें. एनपीवी उपलब्ध होने पर इस का 250 लार्वा समतुल्य 400 से 500 लिटर पानी में घोल कर 2-3 बार छिड़काव कर सकते हैं. इसी तरह 5 फीसदी नीम की निबौली के सत का प्रयोग भी इस के नियंत्रण के लिए कारगर है.

रोग नियंत्रण : चने की खेती में मुख्य रूप से उकटा और शुष्क मूल विगलन रोग होता है. फसल को इन से बचाने के लिए बोआई से पहले बीज को फफूंदीनाशक जैसे 1.0 ग्राम बीटावेक्स और 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. जिन इलाकों में इन रोगों का अधिक प्रकोप हो, वहां पर उकटा और शुष्क मूल विगलन रोगरोधी किस्में बोएं.

इस के अलावा चने की फसल में कीट रोगों का भी प्रकोप होता है. इस का समयसमय पर खात्मा करना जरूरी है. चने की फसल में खासतौर से फली भेदक कीट का प्रकोप अधिक होता है जो शुरुआती दौर में पत्तियों को खाता है, बाद में फली बनने पर छेद बना कर उस में घुस जाता है और दानों को खोखला कर देता है.

इस के अलावा झुलसा रोग, उकटा रोग वगैरह फसल में आते हैं जिन की समय से रोकथाम जरूरी है और अपनी रोगग्रस्त फसल को कृषि विशेषज्ञ को दिखा कर कीट बीमारी पर काबू पाया जा सकता है.

पाले से बचाव : पाले से भी फसल को बहुत अधिक नुकसान होता है. पाला पड़ने की संभावना दिसंबर माह से जनवरी माह में अधिक होती है. पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के लिए फसल में गंधक के तेजाब की 0.1 फीसदी मात्रा यानी एक लिटर गंधक के तेजाब को 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. पाला पड़ने की संभावना होने पर खेत के चारों ओर धुआं करना भी लाभदायक रहता है.

फसल की कटाई और गहाई : चने की फसल की पत्तियां व फलियां पीली व भूरे रंग की हो जाएं और पत्तियां गिरने लगें और दाने सख्त हो जाएं तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए. काटी गई फसल जब अच्छी तरह सूख जाए, तो थ्रेशर द्वारा दाने को भूसे से अलग कर लेना चाहिए और पैदावार को सुखा कर भंडारित करना चाहिए.

Chanaविभिन्न राज्यों के लिए अन्य किस्में

मध्य प्रदेश : जेजी 74, जेजी 315, जेजी 322, पूसा 391, विश्वास (फुलेजी 5), विजय, विशाल, जेजी 16, जेजी 130, जेजीजी 1, जवाहर ग्राम काबुली 1, बीजीडी 128 (के), आईपीसीके 2002-29, आईपीसीके 2004-29 (के), पेकेवी काबुली 4 आदि खास हैं.

राजस्थान : हरियाणा चना 1, डीसीपी 92-3, पूसा 372, पूसा 329, पूसा 362, उदय, सम्राट, जीपीएफ 2, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), आरएसजी 888, आलोक (केजीडी 1168), बीजीडी 28 (के), जीएनजी 1581, आरएसजी 963, राजास, आरएसजी 931, जीएनजी 143, पीबीजी 1, जीएनजी 663 वगैरह किस्में प्रमुख हैं.

हरियाणा : डीसीपी 92-3, हरियाणा चना 1, हरियाणा काबुली चना 1, पूसा 372, पूसा 362, पीबीजी 1, उदय, करनाल चना 1, सम्राट, वरदान, जीपीएफ 2,  चमत्कार, आरएसजी 888, हरियाणा काबुली चना 2, बीजीएम 547, फुलेजी 9425-9, जीएनजी 1581 आदि प्रमुख हैं.

पंजाब : पूसा 256, पीबीजी 5, हरियाणा चना 1, डीसीपी 92-3, पूसा 372, पूसा 329, पूसा 362, सम्राट, वरदान, जीपीएफ 2, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), आरएसजी 888, बीजीएम 547, फुलेजी 9425-9, जीएनजी 15481, आलोक (केजीडी 1168), पीबीजी 3, आरएसजी 963, राजास और आरजी 931 वगैरह खास हैं.

उत्तर प्रदेश : डीसीपी 92-3, केडब्लूआर 108, पूसा 256, पूसा 372, वरदान, जेजी 315, आलोक (केजीडी 1168), विश्वास, पूसा 391, सम्राट, जीपीएफ 2, विजय, पूसा काबुली 1003, गुजरात ग्राम 4 आदि प्रमुख हैं.

बिहार : पूसा 372, पूसा 256, पूसा काबुली 1003, उदय, केडब्लूआर 108, गुजरात ग्राम 4 और आरएयू 52 वगैरह प्रमुख हैं.

छत्तीसगढ़ : जेजी 315, जेजी 16, विजय, वैभव, जवाहर ग्राम काबुली 1, बीजी 372, पूसा 391, बीजी 072 और आईसीसीवी 10 वगैरह खास हैं.

गुजरात : पूसा 372, पूसा 391, विश्वास, जेजी 16, विकास, विजय, विशाल, धारवाड़ प्रगति, गुजरात ग्राम 1, गुजरात ग्राम 2, जवाहर ग्राम काबुली 1, आईपीसीके 2009-29 और आईपीसीके 2004-29 वगैरह प्रमुख हैं.

महाराष्ट्र : पूसा 372, विजय, जेजी 16, विशाल, पूसा 391, विश्वास (फुलेजी 5) धारवाड़ प्रगति, विकास, फुलेजी 12, जवाहर ग्राम काबुली 1, विहार, केएके 2, बीजीडी 128, (के), आईपीसीके 2002-29, आईपीसीके 2004-29, फुलेजी-0517 (के) और पेकेवी काबुली 4 वगैरह खास हैं.

झारखंड : पूसा 372, पूसा 256, पूसा काबुली 1003, उदय, केडब्लूआर 108 और गुजरात ग्राम 4 वगैरह खास हैं.

उत्तराखंड : पंत जी 186, डीसीपी 92-3, सम्राट, केडब्लूआर 108, पूसा चमत्कार (बीजी 1053) बीजीएम 547 और फुलेजी 9425-9 वगैरह खास हैं.

हिमाचल प्रदेश : पीबीजी 1, डीसीपी 92-3, सम्राट, बीजीएम 549 और फुलेजी 9425-9 वगैरह खास हैं.

आंध्र प्रदेश : भारती (आईसीसीवी 10) जेजी 11, फुलेजी 95311 (के) और एमएनके 1 वगैरह प्रमुख हैं.

असम : जेजी 73, उदय (केपीजी 59), केडब्लूआर 108 और पूसा 372 वगैरह खास हैं.

जम्मू और कश्मीर : डीसीपी 92-3, सम्राट, पीबीजी 1, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), बीजी एम 547 और फुलेजी 9425-9 वगैरह खास हैं.

कर्नाटक : जेजी 11, अन्नेगिरी 1, चाफा, भारती (आईसीसीवी 10), फुलेजी 9531, श्वेता (आईसीसीवी 2) एमएनके 1 वगैरह खास हैं.

मणिपुर : जेजी 74, पूसा 372, बीजी 253 वगैरह हैं.

मेघालय : जेजी 74, पूसा 372 और बीजी 256 वगैरह हैं.

ओडिशा : पूसा 391, जेजी 11, फुलेजी 95311, आईसीसीवी 10 वगैरह खास हैं.

तमिलनाडु : आईसीसीवी 10, पूसा 372 और बीजी 256 प्रमुख है.

पश्चिम बंगाल : जेजी 74, गुजरात ग्राम 4, केडब्लूआर  108, पूसा 256, महामाया 1 और महामाया 2 वगैरह खास हैं.

काबुली चना की नई किस्म एसआर 10

हाल ही में काबुली चना की नई किस्म एसआर 10 विकसित की गई है. इस किस्म से 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल सकेगी. इस किस्म के 100 दानों का वजन तकरीबन 50 ग्राम से अधिक होगा. इस की बोआई नवंबर के पहले हफ्ते में कर सकते हैं. यह फसल मार्च तक पक कर तैयार हो जाती है.

राजस्थान में विकसित चना किस्म एसआर 10 का कृषक पौध अधिकार प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा पंजीकृत किया गया है.

हरा चना की किस्म आरएसजी 991

किस्म आरएसजी 991 रोग प्रतिरोधी होने के साथ प्रसंस्करण के लिए भी बेहतर है. राजस्थान के झुंझुनूं, टोंक और राज्य के अन्य जिलों में इस किस्म को उगा कर किसान बाजार से अच्छी आमदनी ले रहे हैं.

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान मटर की तरह इस के हरे दानों को बेच सकते हैं. यह हरे चने की एक किस्म है. इस की कटाई के बाद हरे दानों का वैज्ञानिक विधि से भंडारण भी कर सकते हैं. भंडारित उपज से समय के मुताबिक हरे छोले तैयार कर बाजार में बेच सकते हैं. हरे छोले तैयार करने के लिए इन्हें रातभर पानी में भिगोना होता है और उस के बाद सुबह पानी निकाल कर इन को बाजार में बेचा जा सकता है.

हरे चने की यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों ही इलाकों के लिए सही मानी गई है, जो 135 से 140 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

जंगल की आग – पलाश

पलाश को हिंदी में ढाक, बंगाली में पलाश, मराठी में पलस, गुजराती में खाखरो, तेलुगु में मोंदुगा, तमिल में परस, कन्नड़ में मुलुगा, मलयालम में पलास औैर वैज्ञानिक भाषा में ब्यूटिया मोनोस्पर्मा कहते हैं. मार्च माह में पूरा पेड़ सिंदूरी यानी लाल रंग के फूलों से लद जाता है और मीलों दूर से यह अपनी मौजूदगी की सूचना देता है. इसी वजह से इसे फ्लेम औफ फौरेस्ट यानी जंगल की आग भी कहते हैं.

भारत में लाख के कीड़े के परपोषी पेड़ के रूप में पलाश का स्थान कुसुम के बाद है. पलाश पर पैदा लाख अच्छी किस्म की नहीं होती, पर मात्रा दूसरी किसी परपोषी जाति पर पैदा लाख से ज्यादा होती है.

पलाश के पेड़ से हासिल लाख के कीडे़ के भू्रण से बेर और दूसरे लाख पोषियों को निवेशित भी किया जाता है, पर कुसुम पर निवेशित नहीं किया जाता है. इसे जड़ चूषकों यानी रूट सकर्स द्वारा पुनर्जीवित यानी फिर से जिंदा किया जा सकता है. इस के विभिन्न भाग भिन्नभिन्न रूपों में उपयोगी हैं :

पत्तियां : पलाश की पत्तियां फरवरी माह में झड़ जाती हैं और नई पत्तियां फूल खिलने के बाद मार्चअप्रैल माह में निकलती हैं. इस की पत्ती में 20-30 सैंटीमीटर वृत्ताकार माप के 3 पत्रक पाए जाते हैं. पत्तियां शीतल, रुक्ष, ग्राही और कफरात शामक होने से प्राचीन काल से ही रेशभर में दोनापत्तल बनाने के काम आती हैं.

ऐसा माना जाता है कि इन में भोजन करने से भूख बढ़ती हैं और पाचन क्रिया ठीक रहती है. आंखों और दिमाग को भी इस से ऊर्जा मिलती है. इन का उपयोग करने के बाद आसानी से अलग कर नष्ट कर सकते हैं.

पूरी तरह से विकसित एक पेड़ से तकरीबन 2,500 से 4,000 तक पत्तियां हासिल होती हैं जो 350 से 400 पत्तलें बनाने के लिए पर्याप्त है. पत्तियों का उपयोग फोड़ाफुंसी, मुहांसे, गिलटी, हीमोराइड्स वगैरह के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है. इस की पत्तियों में मौजूद ग्लूकोसाइड के चलते ये पौष्टिक चारे के रूप में भी इस्तेमाल होती हैं.

बीज : पलाश की फली मई माह में पक कर तैयार हो जाती है. फली की नोक पर पाया जाने वाला बीज लालकथई रंग का, अंडाकार या गुरदाकार होता है. इस के बीजों में 8-10 फीसदी काइनो तेल, 18 फीसदी एल्युमिनाइड व कुछ फीसदी शर्करा पाई जाती है. बीज और तेल में कृमिनाशक गुणों के चलते इन का इस्तेमाल बुखार, मलेरिया, फीताकृमि व गोलकृमि के इलाज में किया जाता है. तेल व इस की खली में पाया जाने वाला लिपिडरहित पदार्थ कीटनाशक होता है. इसे तेल और खली से अलग कर कीटनाशक के रूप में उपयोगी बनाने के लिए अनुसंधान जारी है. पलाश के बीजों का इस्तेमाल तेल, साबुन उद्योग में भी किया जाता है, जबकि इस की खली प्रोटीन से भरपूर होती है.

फूल : इस के फूल बाहर से मखमली भूरे पीले व भीतर की ओर सिंदूरी लाल रंग के होते हैं और मार्च माह में पूरे वनों में अपनी मौजूदगी दिखाते हैं. इस वजह से ही इन्हें फ्लेम औफ फौरेस्ट कहते हैं. इस के फूलों में सुगंध न होने के चलते लुभावने रंग, पौष्टिक परागण और रस के कारण अनेक कीटों को लुभाते हैं.

Palashअर्क के रूप में पलाश के सूखे फूलों से पीला रंग हासिल होता है जिस में फिटकरी, चूना मिला कर गहरा सिंदूरी या नारंगी रंग हासिल करते हैं जो सिल्क, दूसरे कपड़े यानी फैब्रिक, लकड़ी या खाद्य पदार्थों को रंगने के काम आता है. इस रंग से रंगे हुए कपड़े पांडुरोगी को पहनाने से इस रोग की बढ़वार पर रोक लगती है और चर्म रोग व चेचक के प्रकोप से भी बचाव होता है. फूल सूजन, प्रदाह या जलन को कम करते हैं. होली पर आज भी पलाश के फूलों से रंग बनाया जाता है.

जड़ : पलाश की नई जड़ों से रेशा निकलता है, जो मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में रस्सियां वगैरह बनाने के काम आता है. इस की जड़ की छाल ब्लडप्रैशर के इलाज में फायदेमंद है.

लकड़ी : इस की लकड़ी आमतौर पर गांवदेहात में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होती है. इस की छाल से हासिल अर्क का इस्तेमाल नजला और खांसी के इलाज में किया जाता है.

गोंद : इस की छाल की दरारों और कृत्रिम चीरों से लाल रस निकलता है जो सूख कर लाल गोंद बन जाता है. इसे ढाक का गोंद या बंगाल कीनो कहते हैं. इस में कार्नटिक अम्ल और गौलिक अम्ल 50 फीसदी पिच्छल द्रव्य व 2 फीसदी क्षार पाए जाते हैं. इस गोंद को पुनिया गोंद या कमरकस कहते हैं. यह त्वचा की बीमारियों, मुंह से संबंधित बीमारी, अतिसार, पेचिस, पेट संबंधी बीमारी और दूसरी बीमारियों में बेहद उपयोगी है.

लाख : लाख एक रेजिन स्राव है, जो लेसिफर लेक्का नामक कीट द्वारा स्रावित किया जाता है. यह कीट पलाश के पेड़ परजीवी के रूप में रहता है. एक साल में 2 बार यह हासिल किया जा सकता है.

अप्रैलमई माह में लाख का उत्पादन कम होता है, लेकिन सुनहरे रंग के कारण इस की कीमत ज्यादा होती है, जबकि अगस्तसितंबर माह में हासिल होने वाला लाख गहरे रंग का होने के चलते अपेक्षाकृत कम कीमत में बिकता है.

लाख का उपयोग खोखले गहनों के अंदर भरने, लाख के गहने, खिलौने व ग्रामोफोन रिकौर्ड बनाने में किया जाता है.

इस तरह पलाश दोना, पत्तल कारोबार व लाख उत्पादन के चलते किसानों के लिए कृषि वानिकी के तहत उपयुक्त होता है और प्रयोगों द्वारा इस से खेती की पैदावार पर भी कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होने की पुष्टि हो चुकी है. यह लवणीय मिट्टी के सुधार के लिए भी काफी उपयोगी है.

गेहूं की उन्नत खेती कैसे करें

धान्य फसलों में गेहूं की फसल काफी महत्त्वपूर्ण है. भारत में इस का भूसा पशुओं को खिलाते हैं. गेहूं के आटे में खमीर पैदा कर के इस का इस्तेमाल डबलरोटी, बिसकुट वगैरह तैयार करने के लिए किया जाता है. गेहूं प्रोटीन का मुख्य स्रोत है, जिस में औसतन 14.7 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है.

भारत में गेहूं का ज्यादातर क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश वगैरह राज्यों में है. उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक क्षेत्र 82.19 लाख हेक्टेयर में गेहूं पैदा करने वाला राज्य है. उत्तर प्रदेश गेहूं का सालाना उत्पादन 152.85 लाख टन करता है.

फसल की पूरी अवधि के लिए 10-15 सैंटीमीटर बारिश (पानी) और 25-26 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान सही है.

गेहूं को बलुई दोमट, बलुई, भारी दोमट या चिकनी मिट्टी वगैरह में उगा सकते हैं, लेकिन इन सभी मिट्टी में दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है. जमीन का पीएच मान 5.0 से 7.5 तक मुफीद होता है.

खेत की तैयारी

* बोआई के समय जमीन में 16 फीसदी नमी हो.

* खेत खरपतवाररहित हो.

* 21-22 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान हो, इस से कम या ज्यादा तापमान बीजों के अंकुरण के लिए सही नहीं होता है. खेत की अच्छी तैयारी के लिए खेत को एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए और 3-4 जुताई देशी हल, हैरो या कल्टीवेटर से करनी चाहिए.

* जमीन में नमी बनाए रखने के लिए हर जुताई के बाद पाटा चलाना चाहिए. गेहूं के लिए खेत तब तैयार मानना चाहिए, जब खेत में गीली मिट्टी का लड्डू बना कर ऊपर से छोड़ा जाए तो वह टूटे नहीं.

* छत्तीसगढ़ राज्य के लिए गेहूं की संस्तुति किस्में सुजाता, संगम, राजकंचन डब्लूएच 147, सी 306 वगैरह हैं.

बोआई का सही समय

गेहूं की बोआई का सही समय 15-30 नवंबर है, लेकिन इस के बाद बोआई की जाए तो उपज में भारी कमी आने लगती है. बोआई में देरी होने पर सामान्य अरहर और गेहूं फसल चक्र अपनाना सही होता है.

बीज दर : यह बोने की विधि और समय पर निर्भर है. आमतौर पर 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर सही होता है.

बीजोपचार : बीजों को 2.5 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लेना चाहिए. इस से फसलों को बीजजनित रोगों से बचाया जा सकता है.

बोआई की गहराई : गेहूं के बीज की बोआई के लिए 5 सैंटीमीटर गहराई सही मानी जाती है. इस से ज्यादा गहराई में बीजों का अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता है.

सीड ड्रिल से अच्छी बोआई

 

Seed Drill

गेहूं की बोआई आमतौर पर छिटकवां विधि से, हल के पीछे कूंड़ में, सीड ड्रिल द्वारा या हल के पीछे नाई बांध कर डिब्बर विधियों द्वारा की जाती है. इन सभी विधियों में सीड ड्रिल द्वारा बोआई सब से अच्छी विधि मानी जाती है.

 

खाद और उर्वरक : मिट्टी जांच के बाद ही खाद की जरूरत का निर्धारण किया जाना चाहिए.

गेहूं की फसल में आमतौर पर 100-200 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40-50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर दिया जाना चाहिए. पोषक तत्त्वों को निम्न ढंग से दिया जाना चाहिए:

* आधा नाइट्रोजन और पूरी फास्फोरस व पोटाश बोआई के समय छिड़काव के रूप में.

* एकचौथाई भाग नाइट्रोजन पहली सिंचाई के बाद (25-30 दिन की अवस्था पर) टौप ड्रैसिंग के दौरान.

* बाकी एकचौथाई भाग नाइट्रोजन पर्णीय छिड़काव के समय.

जल प्रबंधन : साधारण गेहूं की फसल में 5-6 बार सिंचाई की जरूरत होती है.

* क्राउन रूट इनिटिएशन पर -बोआई के 20-25 दिन बाद.

* कल्ले फूटने पर – बोआई के 40-50 दिन बाद.

* गांठ बनने की अवस्था पर – बोआई के 60-65 दिन बाद.

* फूल आने के समय – बोआई के 90-95 दिन बाद.

* दानों में दूध पड़ने पर – 110-115 दिन बाद.

* दाना कड़ा होने पर – बोआई के 120-125 दिन बाद.

फसल सुरक्षा

Wheatखरपतवार पर नियंत्रण : गेहूं की खरपतवार मुख्य रूप से पोआ घास, जंगली जई, कृष्णनील, हिरनखुटी, गेहूं का मामा (गुल्लीडंडा, बंदराबंदरी) वगैरह पाए जाते हैं. इन की रोकथाम खुरपी से की जा सकती है, इन खरपतवारों को रासायनिक विधि से खत्म करने के लिए भी खरपतवानाशी का उपयोग किया जाता है. कम चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों जैसे गेहूं का मामा व जंगली जई के लिए आइसोप्रोट्यूरौन की 0.75 से 1.0 किलोग्राम दवा को 800-1000 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से अंकुरण से पहले या बाद में 30-35 दिन की अवस्था में करना सही होता है.

रोग नियंत्रण:गेहूं में मुख्य रूप से गेरूई और कंडुआ रोग का प्रकोप अधिक होता है.

गेरूई : इसे रतुआ रोग भी कहते हैं. इस रोग में पत्तियों पर जंग लगा हुआ जैसा लवण दिखाई देता है, इस की रोधक किस्में हैं:

* एचडी 2009 (अर्जुन), यूपी 262, सोनालिका.

* इस की रोकथाम डाइथेन एम 45 या डाइथेन जैड 78 की दवा को 0.2 फीसदी के हिसाब से पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

कंडुआ रोग : इस रोग में बालियों पर काला चूर्ण बन जाता है, जिस से पूरी बाली खराब हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए केवल प्रमाणित बीज ही बोएं.

बीजोपचार के लिए 0.25 फीसदी की दर से थीरम या बीटावैक्स का इस्तेमाल करना चाहिए.

कीट नियंत्रण

गेहूं का एफिड : यह कीट पौधों में दाना पड़ने की अवस्था में लगता है, जो बालियों में पड़े दानों का रस चूसता है. इस की रोकथाम बीएचसी या 0.2 फीसदी फौलीडौल के छिड़काव से की जाती है.

दीमक : इस कीट की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन की 5 फीसदी धूल 20-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करनी चाहिए.

कटाई : फसल पकने पर पत्तियां व बालियां सूख जाती हैं और बालियां मुड़ कर झुक जाती हैं. ऐसी अवस्था में फसल की कटाई की जानी चाहिए.

उपज : बौनी किस्मों में 40-50 क्विंटल दाना प्रति हेक्टेयर और 60-65 क्विंटल भूसा हासिल किया जा सकता है. देशी किस्मों से 25-30 क्विंटल दाना ही मिल पाता है.

हाइड्रोजैल : जल प्रबंधन और अधिक उपज

बढ़ती आबादी के साथसाथ कृषि, उद्योग और शहरी आबादी के बीच पानी की कमी होना अब चिता की बात है. इस समस्या से कैसे निबटा जाए, इस के लिए हर रोज नए प्रयोग भी हो रहे हैं.

जल प्रबंधन की अनेक तरकीबें जैसे ड्रिप व फव्वारा सिंचाई, छोटे पैमाने पर जल संचयन यानी पानी जमा करना मल्चिंग, शून्य या कम से कम जुताई जैसे तरीकों को अपनाया जा रहा है.

खेती में कम से कम पानी की जरूरत हो, इसी संदर्भ में विशेषज्ञों ने ऐसा पदार्थ ईजाद किया जिन्हें हाइड्रोजैल कहा जाता है. यह जल संरक्षण के लिए बेहद उपयोगी तकनीक है.

पूसा हाइड्रोजैल : कृषि की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि रसायन संभाग के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजैल तैयार किया है जिसे पूसा हाइड्रोजैल का नाम दिया गया है.

यह कृषि रसायन प्राकृतिक पौलीमर सैल्यूलोस पर आधारित है. यह अपने शुष्क वजन के मुकाबले 350-500 गुना अधिक पानी ग्रहण कर फूल जाता है और पौधे की जरूरत के मुताबिक धीरेधीरे जड़ क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ता है, जिस से पौधे की जड़ में नमी बनी रहती है. यह उत्पाद उच्च तापमान (40 से 50 डिगरी सैल्सियस) पर भी प्रभावी रहता है, इसलिए यह हमारे देश के गरम इलाकों के लिए भी बेहद लाभदायक है.

पूसा हाइड्रोजैल के लाभ : पौधों की जड़ों के आसपास की मिट्टी में नमी बनी रहती है. बारानी क्षेत्रों व सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए पानी की बचत होती है. मिट्टी में पूसा हाइड्रोजैल डालने से सभी तरह की फसलों, जिन में खाद्यान्न व बागबानी फसलें शामिल हैं, में कम सिंचाई करनी पड़ती है. इस प्रकार यह तकनीक सिंचाई, पैसा और समय की लागत को कम करती है.

गेहूं की फसल में इस के असर को जानने लिए पूसा संस्थान व देश के अन्य कई संस्थानों द्वारा परीक्षण किए गए. इन परीक्षणों के नतीजों में पाया गया कि सामान्य तौर पर गेहूं के लिए 5-6 सिंचाइयों की जरूरत रहती है, जबकि पूसा हाइड्रोजैल का इस्तेमाल कर के उपज में नुकसान के बिना आसानी से 2 सिंचाई बचाई जा सकती हैं. इसी तरह मूंगफली, आलू, सोयाबीन, फूलों, शाकीय व अन्य फसलों में भी इस के अच्छे नतीजे देखे गए हैं.

नर्सरी व पौध रोपाई के अच्छे नतीजे : नर्सरी लगाते समय व पौध रोपण के समय पूसा हाइड्रोजैल का प्रयोग अंकुरण व जड़ फुटाव को बढ़ावा देता है. संस्थान के संरक्षित कृषि व प्रौद्योगिकी केंद्र के पौलीहाउस व खेतों में किए गए परीक्षणों में देखा गया है कि गुलदाउदी में पूसा हाइड्रोजैल के इस्तेमाल से अच्छी गुणवत्ता की नर्सरी मात्र 18-20 दिन में तैयार हो जाती है जबकि आमतौर पर नर्सरी तैयार होने में 28-30 दिन का समय लगता है.

मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए पूसा हाइड्रोजैल न केवल बीज के फुटाव, फसल विकास में भी सहायक है, बल्कि  यह पौधे को स्थायी रूप से मुरझाने की स्थिति में लंबे समय तक बचाता है.

कैसे काम करता है पूसा हाइड्रोजैल : मिट्टी में डालने पर पूसा हाइड्रोजैल इसी का एक हिस्सा बन जाता है. इस हाइड्रोजैल के चीनी के दानों जैसे छोटेछोटे कण जड़ के आसपास में सिंचाई या बारिश के बाद अतिरिक्त पानी, जो कि पौधों को नहीं मिल पाता है, को पा कर फूल जाते हैं और पौधों के विकास के दौरान पानी की कमी से पैदा होली वाली स्थिति में जड़ें इन फूले हुए कणों से जरूरत के मुताबिक पानी व पोषक तत्त्व लेती हैं.

कहां और किस कीमत पर : अनेक परिस्थितियों में उगाई जाने वाली अधिकांश फसलों के लिए पूसा हाइड्रोजैल 2.5 से 5.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना सही माना गया है. बाजार में यह उत्पाद निम्नलिखित कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा है:

# कार्बोरंडम यूनिवर्सल प्रा. लि. बैंगलुरु, ब्रांड का नाम कावेरी, मोबाइल नंबर 9449081339.

# अर्थ इंटरनैशनल प्रा. लि., नई दिल्ली, ब्रांड का नाम वारिधर, जी 1, मोबाइल नंबर 9868259735.

इस के अलावा 2 और कंपनियां, हंटिन आर्गेनिक्स प्राइवेट लि., फरीदाबाद व नागार्जुन फर्टिलाइजर्स प्रा. लि., हैदराबाद भी इस उत्पाद को जल्दी ही बाजार में उपलब्ध कराएंगी.

पूसा हाइड्रोजैल की शुरुआती कीमत 1,200 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 1,400 रुपए प्रति किलोग्राम रखी गई है. कंपनियों से मिली जानकारी के आधार पर मांगानुसार कीमत के कम या ज्यादा होने की संभावनाएं हैं.

हाइड्रोजैल का इस्तेमाल : पूसा हाइड्रोजैल का इस्तेमाल तय किए गए तौरतरीकों के अनुसार ही करें. जरूरत के मुताबिक तय की जाने वाली प्रत्येक विधि में यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाइड्रोजैल के कण बीज या पौध के एकदम नीचे या आसपास ही डालें, जिस से पौधें को पूरी नमी मिले.

खास तरीका:

गेहूं, मक्का, दालों, तिलहन वगैरह जैसी फसलों के लिए:

* खेती की तैयारी, पूर्व बोआई व सिंचाई, उर्वरक आदि का प्रयोग सामान्य रूप

से करें.

* हाइड्रोजैल का प्रयोग बोआई के समय सब से ज्यादा लाभदायक है.

* खेत से 20-25 किलोग्राम सूखी मिट्टी लें व उसे एकसमान कर लें. इस में जरूरत के मुताबिक 2.5-5.0 किलोग्राम हाइड्रोजैल व बीज मिलाएं.

* यदि आप डीएपी का प्रयोग कर रहे हैं तो इसे भी खेत में डालने की अपेक्षा मिट्टी जैल के मिश्रण में मिलाना फायदेमंद रहता है.

* तैयार किए गए मिश्रण को सीड ड्रिल या हल द्वारा लाइनों में डालें, बाद में फसल की अवस्था व मिट्टी में नमी के आधार पर सिंचाई करें.

Hydrogelपौध तैयार करने के लिए

कुछ फसलों के लिए पौध भी तैयार करनी होती है जिस के लिए सही वातावरण व पोषण तत्त्वों की तय मात्रा बेहद जरूरी है. पूसा हाइड्रोजैल इस संदर्भ में बहुत उपयोगी है. बोआई से पहले मिट्टी की तैयारी के समय भी इस के इस्तेमाल की सिफारिश की जाती है.

ट्रे में पौध तैयार करने के लिए हाइड्रोजैल (2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है) को सूखे मिट्टी रहित माध्यम में अच्छी तरह मिलाएं. ट्रे को इस मिश्रण से भर लें और ट्रे में बीज बो दें और सामान्य रूप से प्रथम सिंचाई या फर्टीगेशन करें. बाद की सिंचाइयां बीज अंकुरण व समयसमय पर नमी की स्थिति को देखते हुए करनी चाहिए. खेत में पौध तैयार करने के लिए हाइड्रोजैल (2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) और बीज जरूरत के मुताबिक उतनी सूखी मिट्टी में मिलाएं जिसे आसानी से नर्सरी क्षेत्र में समान रूप से फैलाया जा सके.

पौध की खेत में रोपाई के समय

हाइड्रोजैल को सूखी मिट्टी में मिलाएं. तैयार मिश्रण को खेत में बनाई गई कुंड पंक्तियों में समान रूप से डालें. बाद में पौध रोपाई इस तरीके से करें कि डाला गया जैल जड़ के आसपास ही रहे.

डिबलिंग विधि द्वारा फसल (आलू, गन्ना) की रोपाई के समय जैल मिट्टी मिश्रण बीज कलम लगाने के लिए बनाए गए गड्ढों या कुंडों में समान रूप से बांट कर के डालें. बाद में बीज कलम रोप कर कुंड या गड्ढे को ढक दें.

सावधानियां

* पैकेट को अच्छी तरह से बंद कर के रखें, ताकि इस पर नमी का असर न हो.

* बोआई या पौध रोपण के समय हाइड्रोजैल मिट्टी मिश्रण को पूर्ण रूप से नमी रहित सूखी मिट्टी में तैयार करें.

* बीज व मिट्टी के साथ जैल का सभाग मिश्रण करना जरूरी है.

* जैल मृदा मिश्रण का खेत में समान रूप से प्रयोग सुनिश्चित करें.

* नमी रहित स्थान पर ही इस का भंडारण करें.

इसबगोल की जैविक खेती

इसबगोल एक महत्त्वपूर्ण नकदी व औषधीय फसल है. इसबगोल को स्थानीय भाषा में घोड़ा जीरा भी कहते हैं. विश्व की कुल पैदावार की 80 फीसदी इसबगोल की पैदावार भारत में होती है. इस की खेती मुख्य रूप से राजस्थान व गुजरात में की जाती है. इसबगोल को मुख्यतया दानों के लिए उगाया जाता है, पर इस का कीमती भाग इस के दानों पर पाई जाने वाली भूसी है, जिस की मात्रा बीज के भार की 27-30 फीसदी तक होती है.

इसबगोल के भूसी रहित बीजों का इस्तेमाल पशुओं व मुरगियों के लिए आहार बनाने में किया जाता है.

साथ ही, इसबगोल का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी और एलोपैथिक इलाजों में किया जाता है. इस के अलावा इस का इस्तेमाल रंगाईछपाई, आइसक्रीम, ब्रेड, चौकलेट, गोंद और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में भी होता है.

उन्नत किस्में

आरआई 89 : यह किस्म राजस्थान की पहली उन्नत किस्म है. इस के पौधों की ऊंचाई 30-40 सैंटीमीटर होती है. यह 110-115 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरआई 1 : सूखे और कम सूखे इलाकों के लिए मुनासिब इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 29-47 सैंटीमीटर होती है. यह 115-120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 12-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

जलवायु व जमीन

इसबगोल के लिए ठंडी व शुष्क जलवायु अच्छी मानी जाती है. बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 20-25 डिगरी सैल्सियस के बीच का तापमान अच्छा माना जाता है. इस के पकने की अवस्था पर साफ, सूखा व धूप वाला मौसम बहुत अच्छा रहता है. पकाव के समय बारिश होने पर इस के बीज सड़ने लगते हैं और बीजों का छिलका फूल जाता है. इस से इस की पैदावार व गुणवत्ता में कमी आ जाती है. इस की खेती के लिए दोमट, बलुई मिट्टी, जिस में पानी के निकलने की अच्छी व्यवस्था हो, अच्छी रहती है.

खेत की तैयारी

खरीफ फसल की कटाई के बाद खेत की 2-3 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बनाएं और फसल से ज्यादा पैदावार लेने के लिए 5-6 टन सड़ी गोबर की खाद या 3 टन सड़ी देशी खाद व फसल के अवशेष 3 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं. जैव उर्वरकों के रूप में 5 किलोग्राम पीएसबी व 5 किलोग्राम एजोटोबेक्टर प्रति हेक्टेयर की दर से 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर खेत में डालें.

बीज दर व बोआई

इसबगोल का बीज बहुत छोटा होता है. इसे क्यारियों में छिटक कर मिट्टी में मिलाना चाहिए. इस के फौरन बाद सिंचाई कर देनी चाहिए. इस प्रकार छिटक कर बोआई करने के लिए 4-5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

बीजोपचार : इसबगोल की जैविक खेती के तहत फसल को तुलासिया रोग से बचाने के लिए बीजों में नीम, धतूरा व आक की सूखी मिश्रित पत्तियों (1:1:1) से बना पाउडर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से मिलाएं.

Isabgolखरपतवारों की रोकथाम

इसबगोल में 2-3 निराइयों की जरूरत होती है. पहली निराई बोआई के तकरीबन 20 दिनों बाद व दूसरी निराई 40-45 दिनों बाद कर के फसल को खरपतवारों से बचाएं. इस से तुलासिया रोग का हमला भी कम होता है.

सिंचाई

इसबगोल में बोआई के समय, उस के 8 दिनों, 30 दिनों व 65 दिनों बाद सिंचाई करने से अच्छी उपज हासिल होती है.

इसबगोल की फसल में क्यारी विधि के बजाय फव्वारा विधि द्वारा 6 सिंचाइयां (बोआई के समय और 8, 20, 40, 55 व 70 दिनों बाद) करने से अच्छी उपज मिलती है.

कीट व रोग

रोगग्रस्त फसल के अवशेषों को खेत से बाहर कर के नष्ट कर देना चाहिए. गरमी में गहरी जुताई कर के खेत खाली छोड़ें. फसल चक्र अपनाएं यानी बारबार एक ही खेत में इसबगोल की खेती न करें. स्वस्थ, प्रमाणित व रोगरोधी किस्मों का चयन करें.

खेत में इस्तेमाल की जाने वाली गोबर की खाद अच्छी तरह से सड़ी हुई होनी चाहिए. खेत में ट्राइकोडर्मा कल्चर 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम जुताई के समय मिलाएं. इसबगोल की जैविक खेती में नीम, धतूरा, आक की सूखी पत्तियों के पाउडर को 1:1:1 के अनुपात में मिला कर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें.

फसल को रोगों व मोयले से बचाने के लिए 12 पीले चिपचिपे पाश यानी फैरोमौन ट्रैप प्रति हेक्टेयर लगाएं. दीमक से बचाव के लिए जमीन में बेवेरिया बेसियाना या मोटाराइजियम (मित्र फफूंद) 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिलाएं. पर्णीय छिड़काव के रूप में नीम की पत्तियों का अर्क, धतूरा (10 फीसदी) व गौमूत्र (10 फीसदी) का इस्तेमाल मृदरोमिल आसिता और मोयले की रोकथाम के लिए करें. जरूरत के मुताबिक दोबारा छिड़काव करें.

कटाई, मड़ाई व ओसाई

इसबगोल में 25 से 125 तक कल्ले निकलते हैं. पौधों में 60 दिनों बाद बालियां निकलना शुरू होती हैं. तकरीबन 115-130 दिनों में फसल पक कर तैयार हो जाती है.

फसल पकने पर सुनहरी पीली बालियां गुलाबीभूरी हो जाती हैं और बालियों को दबाने पर दाने बाहर आ जाते हैं.

Isabgolफसल के पूरी तरह पकने के 1-2 दिन पहले ही फसल को काट लेना चाहिए. कटाई सुबह के समय करें, जिस से बीजों के बिखरने का डर न रहे. कटी हुई फसल को 2-3 दिन खलिहान में सुखा कर जीरे की तरह झड़का लें व निकले हुए बीजों की सफाई कर के व सुखा कर बोरियों में भर कर सूखी व ठंडी जगह पर भंडारण करें.

उपज व उपयोगी भाग

इसबगोल की औसत उपज 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इस की भूसी की मात्रा बीज के भार की 30 फीसदी होती है, जो सब से कीमती व उपयोगी भाग है. बाकी 65 फीसदी गोली, 3 फीसदी खली और 2 फीसदी खारी होती है. भूसी के अलावा सभी भाग जानवरों को खिलाने के काम आते हैं.