किसान गोष्ठी में हुई किसानों के हित की बात

कृषि विज्ञान केंद्र, वल्लभनगर में जनजातीय उपयोजना के तहत एक किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस किसान गोष्ठी की अध्यक्षता डा. अजीत कुमार कर्नाटक, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर ने की. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डा. आरए कौशिक, निदेशक प्रसार, शिक्षा एवं डा. पीके सिंह, अधिष्ठाता कृषि प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर ने की. कार्यक्रम में छगनलाल जाट, जिला अध्यक्ष भारतीय किसान संघ ने भी शिरकत की.

डा. आरएल सोनी ने बताया कि पिछले 5 वर्ष से कृषि विज्ञान केंद्र, वल्लभनगर किसानों की सेवा में तत्पर एवं कार्यरत हैं. वर्तमान में कृषि विज्ञान केंद्र का नया प्रशासनिक भवन, किसानघर, मशरूम प्रदर्शन इकाई, बकरी एवं मुरगीपालन इकाई बन कर तैयार हैं, जहां किसान आ कर नवीन तकनीकी से प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं.

कुलपति अजीत कुमार कर्नाटक ने अध्यक्षीय भाषण में किसानों से कृषि में नवाचार अपना कर खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसानों को आव्हान किया. इन्होंने बकरीपालन, मुरगीपालन में नवाचार करने के लिए युवा किसानों को आगे आने के लिए प्रेरित किया.

उन्होंने सब्जी उत्पादन में ब्रोकली, लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च, बेबीकौर्न, पापकौर्न, चैरी, टमाटर, छप्पन कद्दू एवं जैकुनी जैसी नकदी फसलें अपना कर खेती को लाभकारी बनाने के लिए प्रेरित किया.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने खेती में नवाचार एवं प्रसंस्करण के माध्यम से किसानों को आमदनी दुगुनी करने के लिए सुझाव दिया.

Kisan Goshthi

डा. आरए कौशिक, निदेशक, प्रसार, शिक्षा ने किसानों को फलफूल, सब्जी में नवाचार कर खेती को लाभकारी बनाने पर जोर दिया, वहीं डा. पीके सिंह, अधिष्ठाता कृषि प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर ने किसानों को जल बचत एवं प्रबंधन कर कम पानी में अधिक पैदावार लेने के बारे में जानकारी दी एवं वर्षा जल को फार्म एवं खेत पर संरक्षित कर के भूजल स्तर में इजाफा करे.

छगनलाल जाट ने किसानों को बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र एवं कृषि विभाग से जुड़ कर सरकारी योजना का लाभ लें. कृषि विभाग से डा. कैलाश अहीर ने कृषि में समेकित कीट प्रबंधन पर विचार व्यक्त किए.

इस कार्यक्रम में लसाडिया, सलूंबर, वल्लभनगर उपखंड के 240 किसानों एवं कृषक महिलाओं ने भाग लिया. कार्यक्रम में जनजाति उपयोजना के बजट से सौ किसानों को अनाज भंडारण संरक्षण पात्र का अनुप्रयोग हेतु आदान वितरण किए गए और किसानों को भिंडी का संकर बीज भी दिया. कृषि संकाय एवं आरएनटी महाविद्यालय, कपासन के 40 विद्यार्थियों ने भाग लिया.

इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के फार्म मैनेजर मोहन लाल खटीक एवं कंप्यूटर प्रोग्रामर अभिलाषा पोखरना मौजूद रहे.

कड़ाके की ठंड में फसल में कीट व बीमारियां

बस्ती: कड़ाके के ठंड में मौसम परिवर्तन हो रहा है, ऐसी स्थिति में फसलों में कीट व बीमारियों के प्रकोप की संभावना बढ़ गई है. इस समय किसान अपने फसल की नियमित निगरानी करते रहें. उक्त जानकारी उपकृषि निदेशक (कृषि रक्षा) ने दी. उन्होंने बताया कि राई, सरसों में माहू कीट का प्रकोप अगर माली नुकसान स्तर (05 फीसदी प्रभावी पौधे) से अधिक हो, तो अजादिरैक्टिन 0.15 फीसदी ईसी की मात्रा 2.5 लिटर या डाईमेथोएट 30 फीसदी ईसी 01 लिटर अथवा औक्सीडिमेटान मिथाइल ओडिमेटान 25 फीसदी ईसी की मात्रा 01 लिटर को प्रति हेक्टेयर की दर से 500 से 600 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

उन्होंने आगे बताया कि आलू की फसल में अगेती, पछेती झुलसा, सरसों में आल्टरनेरिया झुलसा, मटर में पाउड्री मिल्ड्यू आदि फफूंदीजनित रोगों के नियंत्रण के लिए ट्राईकोडर्मा हारजेनियम 2 फीसदी डब्ल्यूपी 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 400 से 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें अथवा कौपर औक्सीक्लोराइड 50 फीसदी डब्ल्यूपी 3 किलोग्राम या मैंकोजेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी 2 किलोग्राम या जिनेब 75 फीसदी डब्ल्यूपी 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि किसान फसल की सुरक्षा के लिए औनलाइन व्यवस्था सहभागी फसल निगरानी एवं निदान प्रणाली (पीसीएसआरएस) के तहत मोबाइल नंबर 9452247111 व 9452257111 पर व्हाट्सएप अथवा संदेश के माध्यम से अपनी समस्या भेज कर तत्काल समाधान प्राप्त कर सकते हैं.

बागबानी क्षेत्र में काफी संभावनाएं

बेंगलुरू/नई दिल्ली : 7 जनवरी, 2024. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने बेंगलुरू में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान (आईआईएचआर) का दौरा किया और यहां के किसानों, विद्यार्थियों व वैज्ञानिकों के साथ संवाद किया. उन्होंने किसान सुविधा काउंटर का शुभारंभ किया. इस अवसर पर एमओयू भी किए गए.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि आईआईएचआर 54 बागबानी फसलों पर काम कर रहा है और उत्तरपूर्वी राज्यों सहित देशभर के किसानों के लाभ के लिए उष्णकटिबंधीय फलों, सब्जियों व फूलों की फसलों सहित बागबानी फसलों की 300 से अधिक किस्में विकसित की गई हैं और संस्थान ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी अच्छा काम किया है.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि कृषि अर्थव्यवस्था में बागबानी का योगदान 33 फीसदी है, जिसे और आगे बढ़ाया जा सकता है, जिस की काफी संभावनाएं हैं.

उन्होंने आगे कहा कि हम न केवल घरेलू बाजार में, बल्कि दुनिया के बाजारों में और बेहतर ढंग से अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं. बागबानी क्षेत्र देश के आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण घटक माना जा रहा है. यह क्षेत्र नए तरीके से अपनी आय बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है. भारत में बागबानी उत्पादन में काफी वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2022-23 में 350 मिलियन टन हो गया है.

Farming Newsउन्होंने बागबानी उत्पादों के भंडारण, फूड प्रोसैसिंग, विपणन के महत्व को समझाया व किसानों को सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पादन का लक्ष्य रखने का अनुरोध किया, ताकि उन के उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकें.

कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने कृषि वैज्ञानिकों को अधिक से अधिक किसानों को अपनी प्रयोगशालाओं में लाने और नवीनतम अनुसंधान तकनीकों को उन के साथ साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया. इस से किसानों को उत्पादकता, पैदावार व आय को टिकाऊ तरीके से बढ़ाने में मदद मिलेगी.

उन्होंने कहा कि दलहन उत्पादन बढ़ाने के प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर हाल ही में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पोर्टल का शुभारंभ किया है, जिस से किसान बहुत लाभान्वित होंगे. इसी तरह से विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से काम करने व प्रौद्योगिकी के समर्थन की आवश्यकता है. सभी खाद्यान्न में हमारी आत्मनिर्भरता होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि झारखंड से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रारंभ किए गए प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाभियान के माध्यम से आदिवासी समुदाय को मौलिक सुविधाएं उपलब्ध कराते हुए उन्हें सुविधाएं प्रदान करने का काम किया जा रहा है.

शुरुआत में आईआईएचआर के निदेशक प्रो. संजय कुमार सिंह ने केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा व अन्य अतिथियों का स्वागत किया और संस्थान की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला.

भेड़ बकरी पालन में जागरूक बन करें विकास

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में जगन्नाथ यूनिवर्सिटी चाकसू जयपुर के 70 एग्रीकल्चर स्नातक के स्टूडैंट्स का एक दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण कार्यक्रम अपनी फैकल्टी डा. जितेंद्र कुमार शर्मा, डा. रामावोतर शर्मा, इंजीनियर एंजेलो डेनिश के साथ आयोजित किया गया.

निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के अनुसार कृषि व पशुपालन में भविष्य में स्टूडैंट्स को ज्यादा से ज्यादा जागरूक कर ही इस में उद्यमिता का विकास किया जा सकता है, इसलिए स्टूडैंट्स ने भ्रमण के दौरान संस्थान के दुंबा भेड़, अविशान भेड़, बकरी एवं खरगोशपालन इकाई के विजिट के साथ टैक्नोलौजी पार्क, मैडिसिनल गार्डन, हौर्टिकल्चर, चारा एवं पशुओं के लिए आवश्यक चारा वृक्ष व अन्य पोषण प्रबंधन के बारे में जान कर वहां पर उपस्थित संस्थान के कर्मचारियों के साथ संस्थान मे चल रहे शोध कार्य को जाना.

एटिक सैंटर के तकनीकी कर्मचारी मोहन सिंह द्वारा स्टूडैंट्स को संस्थान का एक दिवसीय भ्रमण के तहत विभिन्न जगह जैसे वूल प्लांट, सैक्टर्स, प्रदर्शनी हाल, फिजिलौजी आदि का भी भ्रमण कराया गया

रबी की सब्जियों में जैविक (बिना रसायन) कीट प्रबंधन

रबी की सब्जियों में मुख्य रूप से गोभीवर्गीय में फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठगोभी, सोलेनेसीवर्गीय में  टमाटर, बैगन, मिर्च, आलू, पत्तावर्गीय में धनिया, मेथी, सोया, पालक, जड़वर्गीय में मूली, गाजर, शलजम, चुकंदर एवं मसाला में लहसुन, प्याज आदि की खेती की जाती है.

इन सब्जियों में हानिकारक कीटों का प्रकोप फसल की ठीक से देखभाल न करने से होती है. आज सब्जियों में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग सब्जी उत्पादक कर रहे हैं. किसीकिसी सब्जी की फसल पर 7-12 बार कीटनाशी का छिड़काव करते पाया गया है. सब्जी फसलों में कीटनाशक रसायनों का प्रयोग इन के कुल उपयोग का 13-14 फीसदी (तकरीबन 0.678 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर) है.

ऐसे में जरूरत से अधिक रसायनों का प्रयोग सेहत के लिए हानिकारक साबित हो रहा है. बिना कीटनाशकों के भी कृषि क्रियाएं ए्वं जैविक विधि से कीटों का प्रबंधन किया जा सकता है. इस के लिए कीटों के प्रकोप की पहचान, प्रबंधन की समुचित विधियों की जानकारी होना आवश्यक है.

गोभीवर्गीय सब्जियों में कीट एवं प्रबंधन:
माहू:
यह कीट गोभी के पत्तों पर हजारों की संख्या में चिपके रहते हैं. यह हलके पीले रंग के होते हैं. व्यस्क कीट पंखदार एवं पंखरहित दोनों प्रकार के पाए जाते हैं. यह हमेशा चूर्णी मोम से ढके रहते हैं, जो इन के हरे रंग को छिपाए रखती है.

इस कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही रस चूस कर पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. माहू अपने शरीर से श्राव करते हैं, जिस से फफूंद का संक्रमण होता है. इस वजह से गोभी खाने व बिकने योग्य नहीं रहती है. इस कीट का प्रवेश नवंबर से हो कर अप्रैल माह तक सक्रिय रहता है.

प्रबंधन:
– नीम की गिरी 40 ग्राम महीन कर के प्रति लिटर पानी में घोल कर चिपकने वाले पदार्थ के साथ मिला कर छिड़काव करें.
– लेडी बर्ड भृंग परभक्षी कीट के 30 भृंग प्रति वर्गमीटर के प्रयोग से इस कीट का नियंत्रण सफलतापूर्वक किया जा सकता है.
– पीला स्टिकी ट्रैप प्रति एकड़ में 10 लगाएं.

हीरक पृष्ठ:
इस कीट का रंग धूसर होता है. जब यह बैठता है, तो इस की पीठ पर 3 हीरे की तरह चमकीले चिन्ह दिखाई देते हैं, इसलिए इस को हीरक पृष्ठ कीट के नाम से जाना जाता है. सूंड़ी का रंग पीलापन लिए हुए होता है. इस कीट का प्रकोप सब से ज्यादा पत्तागोभी की फसल पर होता है. सूंड़ियां पत्तियों की निचली सतह को खाती हैं और छोटेछोटे छेद बना देते हैं. ज्यादा प्रकोप की दशा में पत्तियां बिलकुल खत्म हो जाती हैं.

प्रबंधन:

– जहां पर इस कीट के प्रकोप की संभावना ज्यादा होती है, वहां अगेती व पछेती रोपण से बचना चाहिए.

– हर 25 लाइन गोभी के दोनों तरफ 2 लाइनें सरसों की बोआई करनी चाहिए. इस में पहली लाइन गोभी की रोपाई के 15 दिन पहले और दूसरी लाइन रोपाई के 15 दिन बाद करें, जिस से इस का मादा कीट आकर्षित हो कर सरसों पर अंडा देते हैं और नीम गिरी का निचोड़ 40 ग्राम प्रति लिटर में घोल कर छिड़काव करने से कीट का प्रकोप कम हो जाता है.

– जैव कीटनाशी बीटी यानी बेसिलस थुरिजिसिंस 500 ग्राम प्रति 500 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करें. आवश्यकता होने पर 10 दिन के अंतराल पर पुनः छिड़काव करें.

तंबाकू की सूड़ी:

व्यस्क मादा कीट पत्तियों की निचली सतह पर झुंड में अंडे देती हंै, 4 से 5 दिनों के बाद अंडों से सूंड़ी निकलती है और पत्तियों को खाती है. सितंबर से नवंबर माह तक इस का प्रकोप अधिक होता है.

प्रबंधन:
– पत्तियों के निचले हिस्से को झुंड में दिए गए अंडों को पत्तियों सहित तोड़ कर नष्ट कर दें.
– फैरोमौन ट्रैप 30 प्रति हेक्टेयर की दर से 30-30 मीटर की दूरी पर लगाएं.
3- एसएनपीवी 250 एलई, गुड़ 1 किलोग्राम, टीपोल 800 ग्राम, 500 लिटर में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से सायंकाल छिड़काव करें.

बैगन के कीट व प्रबंधन:
Ravi Prakash Mauryaतना एवं फल बेधक कीट:
इस कीट की संूड़ियां कोमल तने में छेद कर डेड हार्ट के लक्षण पैदा कर इन्हें सुखा देती हैं. इस कीट का प्रकोप पुष्पावस्था से ले कर फलों में अधिक होता है. क्षतिग्रस्त फल खाने योग्य नहीं रहते हैं.

प्रबंधन:
– ज्रूरत से अधिक नाइट्रोजन व फास्फोरस न दें.
– बैगन के अवशेषों को नष्ट कर दें.
– सदैव कीटग्रसित तना एवं फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें.
– नीम गिरी का प्रयोग करें.
– फैरोमौन ट्रैप 100 प्रति 10 मीटर की दूरी पर प्रति हेक्टेयर में लगाएं.

हरा फुदका:
इस के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही बैगन की पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं, साथ ही साथ अपनी जहरीली लार उस में छोड़ते हैं, जिस से प्रभावित भाग पीला हो जाता है और पट्टी के किनारे से अंदर की ओर मुड़ने लगती हैं, जिस से पत्तियां कप की आकार की हो जाती हैं. धीरेधीरे पूरी पत्तियां ही पीले धब्बों से भर जाती हैं और सूख कर गिर जाती हैं.
प्रबंधन:
– नीम गिरी का छिड़काव करें.

टमाटर के कीट:
सफेद मक्खी: यह कीट टमाटर के साथसाथ बैगन, भिंडी, लोबिया, मिर्च, कद्दू आदि फसलों को नुकसान पहुंचाता है. यह कीट सफेद एवं छोटे आकार का होता है. शरीर मोम से ढका रहता है, इसलिए इसे ‘सफेद मक्खी’ के नाम से जाना जाता है. इस की मादा पत्तियों की सतह पर 125 से 150 तक अंडे देती है. इस के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही पौधों की पत्तियों से रस चूसते हैं और विषाणुजनित रोग फैलाते हैं, जिस से पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं. इस के बाद पौधों में फूल व फल नहीं लगते हैं.
प्रबंधन:
– पौधों को नायलौन जाली 40 मेश साइज के अंदर तैयार करना चाहिए, जिस से सफेद मक्खी उस के अंदर न जा सके.
– खेत के चारों तरफ मक्का, ज्वार और बाजरा लगाना चाहिए, जिस से सफेद मक्खी का प्रकोप फसल में न हो सके.
– नीम का तेल 2-3 मिलीलिटर के साथ स्टीकर आधा मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में मिला कर सायंकाल में छिड़काव करना चाहिए.

फल बेधक कीट:
यह कीट टमाटर, पत्तागोभी ,फूलगोभी, भिंडी, लोबिया, मटर एवं सेम को नुकसान पहुंचाता है. इस कीट का प्रकोप फसल की पुष्पन एवं फली अवस्था में दिखाई देता है. इस कीट से क्षतिग्रस्त फलों में सूंड़ियों का सिर फल के अंदर धंसा एवं बाकी भाग बाहर होता है. क्षतिग्रस्त फलों में सूक्ष्मजीवों के संक्रमण के कारण फल सड़ने लगता है, जो खाने योग्य नहीं रहता है. सूंड़ी कच्चे टमाटर के फल में छेद कर के खाती है. सूंड़ी हरे रंग की होती है. इस के शरीर पर 3 धारियां पाई जाती हैं.

प्रबंधन:
– गरमी में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए.
– टमाटर की 25 दिनों वाली पौध की रोपाई के 16 लाइन के बाद एक लाइन गेंदे की, जो 45 दिन वाली पौध हो लगाएं. दोनों में फूल करीबकरीब एक ही समय में आते हैं. गेंदे का फूल मादा व्यस्क कीट को अंडा देने के लिए ज्यादा आकर्षित करता है.
– गेंदे की पत्तियां पत्ती सुरंगक एवं प्राकृतिक शत्रुओं को भी आकर्षित करती हैं.
– फैरोमौन ट्रैप 15 प्रति हेक्टेयर की दर से पौध से 6 इंच की ऊंचाई पर लगा कर निगरानी करें.
– ट्राईकोग्रामा अंडा परजीवी 50,000 अंडा प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में छोड़ दें.
– फूल लगते समय एचएनपीवी 300 एलई 1 किलोग्राम गुड़़ 100 मिलीलिटर इंडोट्रान चिपकने वाला पदार्थ को 500 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से सायंकाल छिड़काव करें. जरूरत समझें, तो 10 दिन बाद पुनः छिड़काव करें.

मिर्च के कीट:
थ्रिप्स:
इस का प्रौढ़ कीट लगभग एक मिलीमीटर लंबा एवं हलके पीले भूरे रंग का होता है. इस का पंख कटाफटा होता है. इस कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही कोमल पत्तियों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं, जिस से पत्तियां सिकुड़ कर ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है.

प्रबंधन:
– पीला स्टीकी ट्रैप 30 प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में लगाएं.

पीली माइट:
यह अष्टपदी माइट है. इस के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही मिर्च की पत्ती की निचली सतह से रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं, जिस में पत्तियां नीचे की ओर मुड़ कर नाव का आकार बना लेती हंै. पौधे का विकास रुक जाता है और फलने व फूलने की क्षमता प्रायः समाप्त हो जाती है.

प्रबंधन:
डायकोफाल 18.5 ईसी 3 मिलीलिटर या सल्फर 80 डब्ल्यूपी 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

प्याज व लहसुन के कीट:
थ्रिप्स:
यह कीट प्याज एवं लहसुन की पत्तियों के बीच रह कर रस चूसते हैं, जिस के कारण पत्तियांे पर सफेद या सिल्वर धब्बे बन जाते हैं और पत्तियां सूखने लगती हैं. यह कीट गरम मौसम में ज्यादा सक्रिय रहता है.

प्रबंधन:
– जेट नाजिल से पानी की बौछार करने से थ्रिप्स तेजी से नहीं बढ़ते हैं.
– नीम बिनौला का छिड़काव करें.
– पीला स्टिकी ट्रैप 30 की संख्या में प्रति हेक्टेयर में प्रयोग करें.

सब्जियों में कीटों के जैविक प्रबंधन के लिए जैविक कीटनाशक बनाने की सरल विधि निम्नानुसार है:
नीम की गिरी के 4 फीसदी घोल बनाने का तरीका:
नीम की निंबौला को अच्छी प्रकार से सुखाने के बाद उस के छिलके को बाहर निकालें और गिरी को पुनः सुखा लें. सूखी हुई गिरी को पीसने में सुविधा होती है. 40 ग्राम गिरी को बारीक पीस कर 200 मिलीलिटर पानी में 24 घंटे भिगो दें. उस के बाद महीन कपडे़ से छान कर उस में 800 मिलीलिटर और पानी मिला कर सब्जियों की फसल पर छिड़काव करने से फल बेधक, पत्ती लपेटक, सेमीलुपर, रस चूसने वाले कीट एवं माइट से बचाव किया जा सकता है.

तंबाकू का अर्क बनाने की विधि: 1 किलोग्राम तंबाकू के पाउडर को 10 लिटर पानी में आधे घंटे तक उबालें. इस समय घोल का रंग लाल कौफी की तरह हो जाता है. इस उबले हुए घोल में अतिरिक्त 10 लिटर पानी डाल कर ठंडा होने के बाद महीन कपडे़ से अच्छी तरह छान लें. छने हुए अर्क में अतिरिक्त पानी 80-100 लिटर डाल कर इस में साबुन 200 ग्राम मिला कर छिड़काव करें. तंबाकू का यह घोल पौधे से रस चूसने वाले कीट जैसे सफेद मक्खी, फुदका, माहू इत्यादि के लिए प्रभावशाली होता है. इस अर्क का छिड़काव एक बार से ज्यादा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह मित्र कीटों को नुकसान पहुंचाता है.

गाय के गोबर व मूत्र का अर्क बनाने की विधि: 5 किलोग्राम गोबर, 5 लिटर गोमूत्र को 5 लिटर पानी में अच्छी प्रकार मिश्रण बना कर 25 लिटर क्षमता वाले ड्रम में भर कर 4 दिनों तक रख दें. 4 दिनों के बाद मिश्रण को छान कर 100 ग्राम चूना मिला दें और इस में 100 लिटर अतिरिक्त पानी मिला कर एक एकड़ में छिड़काव कर सकते हैं. यह अर्क टमाटर, बैगन के फल छेदक के अलावा तंबाकू की सूंड़ी इत्यादि प्रौढ़ कीटों को अंडा देने से रोकता है. इस के अलावा यह अर्क कुछ बीमारियों के विरुद्ध काम करता है. पौधे स्वस्थ्य व हरेभरे रहते हैं. सब्जियों की फसल की सदैव निगरानी एवं निरीक्षण करते रहें, खेतों में साफसफाई का ध्यान रखें और कृषि क्रियाएं समयसमय पर करते रहें, तो कीटों का प्रकोप कम होगा. जब आवश्यकता पड़े, तभी जैविक कीटनाशकों का छिड़काव करें. छिड़काव से पहले तैयार सब्जियों की तुड़ाई कर लेनी चाहिए. छिड़काव के 4-5 दिन बाद ही सब्जियों का उपयोग करना चाहिए.

कृषि आय कैसे बढे ?

आय बढ़ाने के लिए 3 स्तरों पर काम करना होगा. पहला, लागत कम करना. दूसरा, उत्पादन बढ़ाना और तीसरा, जो उत्पादन किया है, उस का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करना.

सभी किसान जानते हैं कि किसी भी फसल के उत्पादन के लिए बहुत सी चीजों की जरूरत होती है, जिन्हें हम इस तरह बांट सकते हैं, जैसे बाजार से खरीदी जाने वाली कई चीजें जैसे बीज, खाद व उर्वरक व पौध संरक्षण, स्वयं के संसाधन (ट्रैक्टर, मशीनरी, जैविक खाद, कृषि यंत्र आदि), लगने वाली इनसानी मेहनत और ऊर्जा (सिंचाई, खेत की तैयारी, फसल काल में निंदाईखुदाई, फसल में दवा का छिड़काव, फसल की कटाईगहाई) आदि.

कृषि उत्पादन में इन चीजों का इस्तेमाल किया जाना बेहद जरूरी है, परंतु सही समय पर, सही मात्रा में सही तरीके से इन चीजों का उपयोग कर के या इन का दुरुपयोग रोक कर फसल उत्पादन की लागत को कम किया जा सकता है. अनियंत्रित लागत किसान की फसल उत्पादन लागत को बढ़ाने के साथ ही मुनाफे को कम करती है. बहुत सी लागत को कुछ तरीके से कम किया जा सकता है.

1. बीज की लागत कम करने के लिए निम्न उपाय अपनाएं:
(अ) उन्नत किस्म का बीज प्रयोग करें.
(ब) स्वयं का बीज उत्पादन करें या समूह के माध्यम से बीज उत्पादन करें.
(स) बीज की सिफारिश की गई मात्रा का ही उपयोग करें. अधिक बीज दर से उत्पादन कम होता है.
(द) घर का बीज उपयोग करने पर बोआई से पहले अंकुरण परीक्षण अवश्य करें.

Seeds2. रासायनिक उर्वरकों की पूरी मात्रा कभी फसल को नहीं मिलती है. उर्वरक उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिए निम्न उपाय अपनाएं:
(अ) अपनी भूमि का मिट्टी परीक्षण करवाएं.
(ब) मिट्टी परीक्षण की सिफारिश के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करें.
(स) जैविक खाद एवं जीवाणु खाद का उपयोग अवश्य करें.
(द) खड़ी फसल में दिए जाने वाला यूरिया सल्फर या नीम लेपित हो या स्वयं नीम खली से लेपित यूरिया तैयार कर फसल को देवें.
(य) दूसरों को देख कर उर्वरकों का प्रयोग नहीं करें.
(र) संतुलित पोषण के लिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें.

3. सिंचाई की दक्षता बढ़ाने के लिए निम्न उपाय अपनाएं:
(अ) क्यारियां छोटी बनाएं.
(ब) स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करें और पानी बचाएं.
(स) कृषि फसलों में भी ड्रिप सिंचाई विधि का सफल प्रयोग कर पानी की बचत करने के साथ उत्पादन भी बढ़ाया जा रहा है.
(द) सब्जी फसलों एवं दूरी पर लगाई गई फसलों में मल्च का उपयोग भी प्रभावी है.

4. पौध संरक्षण रसायनों का संतुलित उपयोग इस प्रकार करें:
(अ) पूरी जानकारी के बिना किसी भी रसायन का उपयोग न करें.
(ब) पौध संरक्षण रसायनों के साथ चिपकाने एवं फैलाने वाले पदार्थों का उपयोग दवा को प्रभावी बनता है.
(स) अत्यधिक जहरीली (लाल एवं पीले त्रिकोण वाली) दवाओं का प्रयोग खाद्य फसलों में न करें.
(द) सभी फसलों में आईपीएम विधि से कीट नियंत्रण करें. फैरोमौन ट्रैप, लाइट ट्रैप, घर पर बने जैविक कीटनाशकों का प्रयोग कर लागत को कम कर सकते हैं.

कृषक समाज के सतत विकास राष्ट्रीय सम्मेलन

हिसार: चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग द्वारा राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी)-आईडीपी प्रोजैक्ट के तहत “कृषक समाज के सतत विकास एवं सामाजिकआर्थिक उत्थान” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन का पिछले दिनों समापन हुआ, जिस में बतौर मुख्यातिथि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज रहे.

मुख्यातिथि प्रो. बीआर कंबोज ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि परिवार समाज का सब से छोटा हिस्सा है, इसलिए उस के सतत विकास के लिए उन्हें नई जानकारियां, नवाचारों व प्रौद्योगिकियों के प्रति प्रोत्साहित करना अनिवार्य है. इसी प्रकार देश के उत्थान में कृषक समाज का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है, इसलिए देश को विकास की पटरी पर लगातार बनाए रखने के लिए इन का उत्थान बहुत जरूरी है, लेकिन नई तकनीकों कों किसानों व समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचाना एक चुनौती भरा काम है. इस प्रक्रिया में समाजशास्त्र से जुड़े विशेषज्ञ महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि यदि नई तकनीकों को ईजाद करने वाले विभाग और समाजशास्त्री एकसाथ मिल कर काम करेंगे, तो इस के बहुत ही सार्थक परिणाम प्राप्त होंगे.

मुख्यातिथि बीआर कंबोज ने आंकड़ा प्रबंधन व विश्लेषण को भी अहम बताते हुए कहा कि इस से हर जगह से मिल रही जानकारियों को दुरुस्त व त्रुटिरहित समाज तक पहुंचाया जा सकता है. इस के लिए सरकारी व गैरसरकारी शिक्षण शोध संस्थानों को एक मंच पर आ कर एकजुटता के साथ जानकारी साझा करनी चाहिए. वर्तमान समय में खेती पर जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम बढ़ रहे हैं. इन्हीं चुनौतियों से निबटने के लिए विभिन्न नवीनतम एवं उन्नत सस्य क्रियाएं मदद कर सकती हैं.

इस अवसर पर कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने सम्मेलन में प्रस्तुत की गई मौखिक व पोस्टर प्रस्तुतियों के विजेता रहे प्रतिभागियों को पुरस्कृत कर उन का उत्साहवर्धन किया.

समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डा. विनोद कुमारी, सम्मेलन की आयोजक सचिव डा. जतेश काठपालिया व डा. रश्मि त्यागी ने दोदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन की तमाम गतिविधियों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की.

स्नातकोत्तर शिक्षा अधिष्ठाता व एनएएचईपी-आईडीपी प्रोजैक्ट के नोडल अधिकारी डा. केडी शर्मा ने सभी का स्वागत किया, जबकि मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. नीरज कुमार ने धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया.

इस कार्यशाला में मंच का संचालन डा. रिजुल सिहाग ने किया. हकृवि में आयोजित दोदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन दौरान हुई पोस्टर व मौखिक प्रस्तुतियों के पोस्टर प्रस्तुतीकरण में प्रथम पुरस्कार अन्नू, निशा, मोनिका, एकता, प्रियंका भाटी, रमेश चंद्र, व विक्रांत हुड्डा ने प्राप्त किया, जबकि द्वितीय पुरस्कार काव्या सहराव, हेमंत कुमार व अन्नू ने प्राप्त किया, वहीं तृतीय पुरस्कार के विजेता प्रीति रानी व प्रियंका रहे, जबकि ज्योति सिहाग, युगुम ढींगड़ा, स्वाति, कीर्ति, प्रियंका ने सांत्वना पुरस्कार जीता.

इसी प्रकार विभिन्न विषयों में आयोजित मौखिक प्रस्तुतियों में मंजु कुमार राठौर, सुनिधि पिलानियां, कोथा सरामाती, आयुशी, रितू छिकारा, इंदु, सीफती, प्रीति, जोन, मोनिका शर्मा, प्रीति नैन, गायत्री पिला व सुभाष ने बेहतरीन प्रदर्शन कर उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया.

साल 2022-23 में रिकौर्ड खाद्यान्‍न उत्‍पादन

नई दिल्ली : 18 अक्तूबर 2023. कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय ने वर्ष 2022-23 के लिए मुख्‍य फसलों के उत्‍पादन के अंतिम अनुमान जारी कर दिए हैं. इस के अनुसार देश में कुल खाद्यान्‍न उत्‍पादन रिकौर्ड 3296.87 लाख टन अनुमानित है, जो 2021-22 के 3156.16 लाख टन खाद्यान्न उत्‍पादन की तुलना में 140.71 लाख टन अधिक है. इस के अलावा साल 2022-23 के दौरान खाद्यान्‍न उत्‍पादन गत 5 वर्षों (2017-18 से 2021-22) के औसत खाद्यान्‍न उत्‍पादन की तुलना में 308.69 लाख टन अधिक है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि हमारे किसान लगातार कड़ी मेहनत कर रहे हैं, वहीं कृषि वैज्ञानिक व संस्थान भी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कृषि मंत्रालय द्वारा योजनाओं व कार्यक्रमों का सुचारु रूप से क्रियान्वयन हो रहा है. इस तरह सब के प्रयासों से कृषि क्षेत्र में रिकौर्ड खाद्यान्‍न उत्‍पादन सहित बेहतर नतीजे परिलक्षित हो रहे हैं.
अंतिम अनुमान के अनुसार, 2022-23 के दौरान मुख्‍य फसलों का उत्‍पादन इस प्रकार है :

खाद्यान्‍न – 3296.87 लाख टन
चावल – 1357.55 लाख टन
गेहूं – 1105.54 लाख टन
पोषक/मोटे अनाज – 573.19 लाख टन
मक्‍का – 380.85 लाख टन
दलहन – 260.58 लाख टन
तूर- 33.12 लाख टन
चना – 122.67 लाख टन
तिलहन – 413.55 लाख टन
मूंगफली– 102.97 लाख टन
सोयाबीन– 149.85 लाख टन
रेपसीड एवं सरसों – 126.43 लाख टन
गन्‍ना – 4905.33 लाख टन
कपास – 336.60 लाख गांठें (प्रति 170 किलोग्राम)
पटसन एवं मेस्‍टा– 93.92 लाख गांठ (प्रति 180 किलोग्राम)

वर्ष 2022-23 के दौरान चावल का कुल उत्‍पादन रिकौर्ड 1357.55 लाख टन अनुमानित है. यह पिछले वर्ष के 1294.71 लाख टन चावल उत्पादन से 62.84 लाख टन एवं विगत 5 वर्षों के 1203.90 लाख टन औसत उत्‍पादन से 153.65 लाख टन अधिक है.

Food Grain
Food Grain

वर्ष 2022-23 के दौरान गेहूं का कुल उत्‍पादन रिकौर्ड 1105.54 लाख टन अनुमानित है. यह पिछले वर्ष के 1077.42 लाख टन गेहूं उत्पादन से 28.12 लाख टन एवं 1057.31 लाख टन औसत गेहूं उत्‍पादन की तुलना में 48.23 लाख टन अधिक है.

श्री अन्न (पोषक/मोटे अनाजों) का उत्‍पादन 573.19 लाख टन अनुमानित है, जो 2021-22 के दौरान प्राप्त 511.01 लाख टन उत्‍पादन की तुलना में 62.18 लाख टन अधिक है. इस के अलावा यह औसत उत्‍पादन से भी 92.79 लाख टन अधिक है. श्री अन्न का उत्पादन 173.20 लाख टन अनुमानित है.

साल 2022-23 के दौरान कुल दलहन उत्‍पादन 260.58 लाख टन अनुमानित है, जो विगत 5 वर्षों के 246.56 लाख टन औसत दलहन उत्‍पादन की तुलना में 14.02 लाख टन अधिक है.

साल 2022-23 के दौरान देश में तिलहन उत्‍पादन रिकौर्ड 413.55 लाख टन अनुमानित है, जो साल 2021-22 के दौरान उत्‍पादन की तुलना में 33.92 लाख टन अधिक है. इस के अलावा साल 2022-23 के दौरान तिलहनों का उत्पादन 340.22 लाख टन औसत तिलहन उत्‍पादन की तुलना में 73.33 लाख टन अधिक है.

साल 2022-23 के दौरान गन्‍ना उत्‍पादन 4905.33 लाख टन अनुमानित है. साल 2022-23 के दौरान गन्‍ने का उत्‍पादन पिछले वर्ष के 4394.25 लाख टन गन्ना उत्पादन से 511.08 लाख टन अधिक है.
कपास का उत्‍पादन 336.60 लाख गांठ (प्रति 170 किग्रा की गांठ) अनुमानित है, जो पिछले वर्ष के कपास उत्‍पादन की तुलना में 25.42 लाख गांठें अधिक है. पटसन एवं मेस्‍ता का उत्‍पादन 93.92लाख गांठ (प्रति 180 किग्रा की गांठ) अनुमानित है.

बीआईएस ने एग्री बाय-प्रोडक्‍ट के लिए जारी किया मानक, कृषि उत्पादों और पत्तियों से बनेंगे बरतन

नई दिल्ली : भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने और सस्‍टेनेबिलिटी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एग्री बाय-प्रोडक्‍ट से बने भोजन परोसने वाले खास बरतनों के लिए मानक आईएस 18267: 2023 को जारी किया है. यह मानक निर्माताओं और उपभोक्ताओं को व्यापक दिशानिर्देश प्रदान करता है, ताकि देशभर में गुणवत्ता आवश्यकताओं में एकरूपता सुनिश्चित हो सके.

इस मानक के लागू होने के व्यापक फायदे हैं, क्योंकि बायोडिग्रेडेबल एग्री बाय-प्रोडक्‍ट बरतनों के उपयोग से पर्यावरण सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और एक चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है. इन बरतनों में किसी नुकसानदेह पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया है, और इसलिए इन से उपभोक्ताओं का कल्याण सुनिश्चित होगा.

यह मानक किसानों के लिए आर्थिक अवसर सृजित करता है और सस्‍टेनेबल कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देते हुए ग्रामीण विकास में योगदान करता है.

दुनियाभर में डिस्पोजेबल टेबलवेयर का उपयोग बढ़ रहा है. इस से डिस्पोजेबल टेबलवेयर के वैश्विक बाजार का भी विस्‍तार हो रहा है. डिस्पोजेबल प्लेट का बाजार वर्ष 2020 में 4.26 अरब डालर था, जो बढ़ कर वर्ष 2028 तक 6.73 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान है.

इसी प्रकार वर्ष 2021 से 2028 के बीच इस में 5.94 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर (सीएजीआर) से विस्‍तार होगा.

भारत में कई लार्ज स्‍केल और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) स्तर के विनिर्माता बायोडिग्रेडेबल कटलरी के उत्पादन में सक्रिय योगदान कर रहे हैं. उन्हें इस मानक के लागू होने से काफी फायदा होगा. इन उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और इसलिए इन के उत्पादन से जुड़े विनिर्माताओं की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है.

इस मानक में बायोडिग्रेडेबल बरतनों के उत्पादन के लिए कच्चे माल, विनिर्माण तकनीक, प्रदर्शन और स्वच्छता आवश्यकताओं सहित विभिन्न पहलुओं को शामिल किया गया है. इस में प्लेट, कप, कटोरे आदि बरतन बनाने के लिए पसंदीदा सामग्री के तौर पर खास पत्तियों और आवरण जैसे कृषि बाय-प्रोडक्‍ट्स के उपयोग को निर्दिष्ट किया गया है.

यह मानक पौधों और पेड़ों के उपयुक्त हिस्सों का उपयोग करने का सुझाव देता है. साथ ही, यह हाट प्रैसिंग, कोल्‍ड प्रैसिंग, मोल्डिंग और सिलाई जैसी विनिर्माण तकनीक प्रदान करता है. यह चिकनी सतहों, बिना धारदार किनारों के उपयोग पर भी जोर देता है और रसायनों, रेजिन और चिपकने वाले पदार्थों के उपयोग को प्रतिबंधित करता है.

नमो चौपाल के जरीए कृषि वैज्ञानिक देंगे खेतीकिसानी की जानकारी

मध्य प्रदेश में किसानों की सहायता के लिए प्रदेश सरकार ने कृषि क्षेत्र में नवीनतम तकनीकों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कृषि मेले आयोजित करने का निर्णय लिया है. किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री कमल पटेल ने उज्जैन में आयोजित हुए एग्री एक्सपो (कृषि मेले) का शुभारंभ किया.

इस अवसर पर किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री कमल पटेल ने जानकारी दी कि हर ग्राम पंचायत मुख्यालय पर नमो चौपाल बनाई जाएगी. इस चौपाल पर किसान, ग्रामीण और कृषि वैज्ञानिक सभी मिल कर खेतीकिसानी पर आपस में चर्चा करेंगे. इस के साथ ही उन्होंने एग्री एक्सपो में स्थापित किए गए विभिन्न स्टालों का भी दौरा किया.

जानें नमो चौपाल क्या है?

यह एक प्रशासनिक और सामाजिक पहल है, जो ग्राम पंचायतों में अपनाई जाएगी. इस का मुख्य उद्देश्य किसानों, ग्रामीणों और कृषि वैज्ञानिकों को एकसाथ आ कर खेतीकिसानी से जुड़ी जानकारी साझा करना और चर्चा करना है.

इस मंच पर किसानों को नवीनतम खेती की तकनीकें, उन्नत खेती के तरीके, जैविक खेती, बीज और उर्वरकों आदि के बारे में जानकारी मिलेगी.

कहां होंगी नमो चौपाल?

नमो चौपालों को ग्राम पंचायत की जमीन पर बनाया जाएगा, जहां किसान कृषि से जुड़ी बातों की चर्चा करेंगे व अपनी समस्याओं का समाधान और विकास करने की योजना बनाएंगे, जिन का समाधान कृषि विशेषज्ञों द्वारा किया जाएगा.

इस तरह की चर्चा से ग्रामीण क्षेत्रों में खेतीकिसानी में सुधार को ले कर बेहतर माहौल बनेगा और खेती के काम भी आसान होंगे.

मिलेगी जैविक खेती की जानकारी

विश्वविद्यालयों में किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती के बारे में पढ़ाया जाएगा. कृषि मंत्री कमल पटेल ने बताया कि किसानों के लिए आधुनिक खेती, उन्नत खेती और जैविक खेती आदि पर चर्चा करने के लिए कृषि मेलों का भी आयोजन किया जा रहा है. किसानों के फायदे के लिए मंडियों को मजबूत बनाया गया है, जहां उन्हें अपनी उपज का बेहतर दाम मिलेगा.

उन्होंने कृषि से संबंधित योजनाओं के विस्तार के साथ किसानों को आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक योजनाओं का लाभ उठाएं.

पहले आमतौर पर कृषि विश्वविद्यालयों में प्राकृतिक खेती और जैविक खेती से संबंधित विषयों को पढ़ाने की प्रथा नहीं थी, लेकिन अब किसानों को इस तरह की भी जानकारी मिलेगी.