समुद्री शैवाल की खेती

कच्छ: केंद्रीय मत्स्यपालन, मछुआरा समाज, मत्स्यपालन स्टार्टअप पूरे भारत में समुद्री शैवाल की खेती को अपनाने और समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए पशुपालन और डेयरी मंत्री, परषोत्तम रूपाला ने राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता की.

कच्छ सीट से मत्स्य विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी, मत्स्य विभाग की संयुक्त सचिव नीतू कुमारी प्रसाद, मत्स्य विभाग के संयुक्त सचिव सागर मेहरा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपमहानिदेशक डा. जेक. जेना, सीमा सुरक्षा बल के महानिरीक्षक अभिषेक पाठक, राष्ट्रीय मत्स्य विकास परिषद के सीई डा. एलएन मूर्ति, गुजरात सरकार के निदेशक (एफवाई) नितिन सांगवान और अन्य गणमान्य व्यक्ति इस अवसर पर मौजूद थे.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री (एफएएचडी) परषोत्तम रूपाला ने प्रतिभागियों, मछुआरों और मछुआरा महिलाओं को संबोधित किया और समुद्री शैवाल की खेती के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने व्यापक उत्पाद अवसरों को ध्यान में रखते हुए मछुआरों और मछुआरा महिलाओं को समुद्री शैवाल की खेती अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया.

मंत्री परषोत्तम रूपाला ने यह भी कहा कि यह समुद्री शैवाल की खेती पर पहला राष्ट्रीय सम्मेलन है, जो समुद्री शैवाल उत्पादों के रोजगार सृजन का एक विकल्प है, क्योंकि यह समुद्री उत्पादन में विविधता लाता है और मछली किसानों की आय बढ़ाने के अवसरों को बढ़ाता है.

Seaweedउन्होंने यह भी कहा कि यह पारंपरिक मछली पकड़ने पर निर्भरता कम करता है और तटीय समुदायों की आजीविका में विविधता लाता है.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने यह भी बताया कि कोरी क्रीक का पायलट प्रोजैक्ट समुद्री शैवाल की खेती के लिए गेमचैंजर हो सकता है. इसलिए हम यहां समुद्री शैवाल की खेती स्थल पर एकत्र हुए हैं. समुद्री शैवाल की खेती को सफल बनाने के लिए उन्होंने सभी हितधारकों से अपने सुझाव और इनपुट के साथ आगे आने का आह्वान किया.

मत्स्य विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने समुद्री शैवाल की खेती की चुनौतियों और अवसरों पर प्रकाश डाला. उन्होंने समुद्री शैवाल मूल्य श्रंखला में चुनौतियों का आकलन करने और समाधान खोजने की आवश्यकता पर जोर दिया.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि सरकार का लक्ष्य समुद्री शैवाल उत्पादन में नवाचार करना, नीतिगत ढांचे, विनियमों पर विचारविमर्श करना, नैटवर्किंग के अवसरों को सुविधाजनक बनाना और रिश्तों को बढ़ावा देना है.

उन्होंने यह भी बताया कि समुद्री शैवाल मूल्य श्रंखला की इंडटूइंड मैपिंग और मूल्य श्रंखला में बाधाओं को संबोधित करना समय की मांग है और हमारा विभाग इस के लिए प्रतिबद्ध है.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ मत्स्यपालन स्टार्टअप जैसे कि क्लाइमैक्रू (गुजरात) और पुकाई एक्वाग्री (आंध्र प्रदेश), अनुसंधान संस्थानों अर्थात आईसीएआर- सैंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएमएफआरआई), सीएसआईआर – सेंट्रल साल्ट मरीन कैमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई) और आईसीएआर-केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआईएफटी) और एनएफडीबी (भारत सरकार) द्वारा स्थापित प्रदर्शनी के विभिन्न स्टालों का दौरा किया. स्टालों में समुद्री शैवाल के मूल्यवर्धित उत्पादों और खेती की प्रक्रियाओं और प्रयुक्त सामग्री का प्रदर्शन किया गया.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने प्रदर्शनी में भाग लेने वाले उद्यमियों और वैज्ञानिकों से बातचीत की.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला को सीमा सुरक्षा बल की हाई स्पीड नौका से कोरी क्रीक परियोजना स्थल पर गए और समुद्री खरपतवार की खेती के विभिन्न तरीकों को देखा. समुद्री शैवाल विकास पर राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान गुजरात के कच्छ जिले के कोरी क्रीक में सीएमएफआरआई, सीएसएमसीआरआई और एनएफडीबी पायलट परियोजनाओं की ओर से मोनोलिन, ट्यूबनैट और राफ्ट भी प्रदर्शित की गईं.

Seaweedमंत्री परषोत्तम रूपाला ने अत्याधुनिक समुद्री शैवाल खेती देखी, राफ्ट कल्चर और ट्यूबनैट पायलट आईसीएआर-सीएमएफआरआई, सीएसएमसीआरआई और टीएससी-पर्पल टर्टल के साथ समुद्र से पैदा होने वाले भोज्य पदार्थों को अपनाने के बेहतर तरीके प्रदान कर रहे हैं. गणमान्य लोगों ने अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्यमियों के प्रतिनिधियों के साथ बात की और प्रगति, चुनौतियों और आगे की योजनाओं को ले कर भी बात की.

आईसीएआर-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) कोच्चि के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. दिवु, सीएसआईआर-केंद्रीय नमक समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई), भावनगर के वरिष्ठ प्रोफैसर डा. मंगल सिंह राठौड़ और वैज्ञानिकों एवं सीवीड कंपनी, लक्षद्वीप से उद्यमी हरि एस. थिवाकर की ओर से औनफील्ड अनुभव अन्य विवरण प्रस्तुत किए गए.

नीतू प्रसाद ने केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला और अन्य गणमान्य व्यक्तियों को उन के प्रयासों, उन के मार्गदर्शन और समर्थन के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने समुद्री शैवाल क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों और प्रगति पर प्रकाश डाला.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने लाभार्थियों को पीएमएमएसवाई की विभिन्न परियोजनाओं के स्वीकृति आदेश भी वितरित किए. इन में नई फिन फिश हैचरी, नया तालाब आदि शामिल थे. इस के अलावा घेड फिश एंड फाम्र्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को मोनोलाइन के साथ समुद्री शैवाल कल्चर की मोनोलाइन प्रति ट्यूबनैट मेथड इनपुट सहित स्थापना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई.

इस मौके पर प्रतिभागी भी शामिल हुए. इन में मत्स्य किसान, मछुआरे, मत्स्यपालन सहकारी समितियां और राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों के मत्स्य प्रबंधन में शामिल सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक और विभिन्न मत्स्यपालन विश्वविद्यालयों और कालेजों आदि के शोधकर्ता शामिल रहे. सम्मेलन में 300 लाभार्थियों ने भाग लिया. इस दौरान सभी प्रतिभागियों को सर्वोत्तम तरीकों आदि के बारे में जानने और समुद्री शैवाल विशेषज्ञों के साथ विचारों का आदानप्रदान करने का अवसर मिला.

सम्मेलन के दौरान पूरे समुदाय के लाभ के लिए मत्स्यपालन क्षेत्र में समुद्री शैवाल की खेती की पहुंच को मजबूत करने और विस्तार देने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया.

सम्मेलन के दौरान भिन्नभिन्न हितधारकों के साथ जागरूकता बढ़ा कर मत्स्यपालन समुदाय में अनुभवों और सफलता के विवरण के प्रस्तुत किए गए. इस ने समुद्री शैवाल की खेती को अपनाने के लिए उद्यमियों, प्रसंस्करणकर्ताओं, किसानों के बीच सहयोग और साझेदारी की समझ बढ़ाने और इसे बढ़ावा देने का एक बेहतर अवसर प्रदान किया.

सावधानीपूर्वक किए गए बहुआयामी कार्यक्रमों के माध्यम से देश का मत्स्यपालन क्षेत्र प्रगति के पथ पर है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) मत्स्यपालन विभाग (डीओएफ) की महती योजना है और इस में समुद्री शैवाल की खेती सहित विभिन्न मत्स्यपालन गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता के प्रावधान शामिल हैं. समुद्री शैवाल को विश्व स्तर पर पोषक तत्वों के एक महत्वपूर्ण स्रोत और कार्बन अलग करने वाले घटक के रूप में देखा जाता है, इसलिए इस का विकास और उपयोग पर्यावरण के नुकसान को कम करने, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने और आबादी की खातिर पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है. भारत में समुद्री शैवाल का आर्थिक महत्व, खेती, भोजन, फार्मास्यूटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन, जलीय कृषि और जैव ईंधन उत्पादन की क्षमता में इस के योगदान से निर्मित हुआ है. यह रोजगार उत्पन्न करता है, ब्लू इकोनोमी का समर्थन करता है और निर्यात के अवसर प्रदान करता है.

समुद्री शैवाल के क्षेत्र का विकास, पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी लाभों के साथ मत्स्यपालन विभाग की प्रमुख योजना, पीएमएमएसवाई के लिए प्रमुख क्षेत्रों में से एक है. इस क्षेत्र को विकसित करने की पहल की गई है.

बीते 8 वर्षों में 51 फीसदी बढ़ा दूध उत्पादन

गांधीनगर: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गुजरात के गांधीनगर में नेशनल कोआपरेटिव डेयरी फेडरेशन औफ इंडिया (NCDFI) लिमिटेड के मुख्यालय का शिलान्यास किया एवं ईमार्केट अवार्ड 2023 समारोह को संबोधित किया.

इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष शंकर चौधरी, इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी, एनडीडीबी के अध्यक्ष डा. मीनेश शाह और एनसीडीएफआई के अध्यक्ष डा. मंगल राय समेत अनेक लोग मौजूद थे.

अपने संबोधन में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि हमारे देश में डेयरी और खासकर कोआपरेटिव डेयरी सैक्टर ने बहुआयामी लक्ष्यों को हासिल किया है. अगर दूध का व्यापार कोआपरेटिव सैक्टर नहीं करता है, तो दूध उत्पादन, एक बिचौलिए और दूध का उपयोग करने वाले तक सीमित रहता है.

लेकिन अगर कोऑपरेटिव सेक्टर कोऑपरेटिव तरीके से दूध का व्यापार करता है तो इसमें कई आयाम एक साथ जुड़ जाते हैं, क्योंकि इसमें उद्देश्य मुनाफे का नहीं है और इसका बहुआयामी फायदा समाज, कृषि, गांव, दूध उत्पादक और आखिरकार देश को होता है.

उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले 50 साल में इस सफलता की गाथा की अनुभूति की है.

Amit Shahसहकारिता मंत्री ने कहा कि आज विश्व के दुग्ध उत्पादन में भारत 24% हिस्से के साथ पहले स्थान पर पहुंच चुका है और प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में भारत में पिछले 8 वर्षों में दूध उत्पादन में लगभग 51% वृद्धि हुई है जो विश्व में सबसे तेजी के साथ हुई बढ़ोत्तरी है. यह सिर्फ इसलिए संभव हुआ है क्योंकि इनमें ज्यादातर उत्पादन कोऑपरेटिव डेयरी के माध्यम से हुआ है.

उन्होंने कहा कि अगर कोऑपरेटिव डेयरी चलानी है तो उसे पोषित करने वाली अनेक संस्थाएं बनानी पड़ेगी और एनसीडीएफआई यह काम करेगी.

उन्होने कहा कि NCDFI एक प्रकार से सभी डेयरी को गाइडेंस देने का काम कर रही है. शाह ने कहा कि जिस वासी गांव से श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई, वहीं आणंद जिले में लगभग 7000 वर्ग मीटर क्षेत्र में एनसीडीएफआई का मुख्यालय बनने जा रहा है. यह करीब 32 करोड़ रुपए के खर्च से बनेगा और सौर ऊर्जा संयंत्र से संचालित होगा. उन्होंने कहा कि नया मुख्यालय भवन 100 प्रतिशत ग्रीन बिल्डिंग होगा.

कोऑपरेटिव सेक्टर के जरिए पोषण आंदोलन

गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि जब कोऑपरेटिव सेक्टर डेयरी का बिजनेस करता है तब सबसे पहला फायदा दूध उत्पादकों को होता है, क्योंकि उनका शोषण नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अगर कोई अकेला दूध का उत्पादन करता है तो उसके पास दूध के स्टोरेज की क्षमता नहीं होती और वह मार्केट को एक्सप्लोर नहीं कर सकता. लेकिन अगर कोऑपरेटिव सेक्टर दूध का बिजनेस करता है तो गांव और जिला स्तर पर दूध संघ बनते हैं और उनके पास कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग, मार्केट की डिमांड के मुताबिक दूध को उस उत्पाद में कन्वर्ट करने की क्षमता होती है. इससे मुनाफे को कोऑपरेटिव आधार पर दूध उत्पादन करने वाली बहनों के पास पहुंचाने की व्यवस्था भी होती है और इस तरह दूध उत्पादन करने वाली बहनों का शोषण समाप्त हो जाता है. उन्होंने कहा कि अकेला दूध का उत्पादन करने वाला व्यक्ति अपने पशुओं के स्वास्थ्य की चिंता नहीं कर सकता है, लेकिन अगर कोऑपरेटिव तरीके से दूध उत्पादन किया जाए तो जिला दूध उत्पादक संघ पशु की नस्ल सुधार, स्वास्थ्य सुधार और पशुओं के अच्छे आहार की भी व्यवस्था करता है.

अन्य लाभ यह है कि अगर कोऑपरेटिव सेक्टर के जरिए दूध का बिजनेस होता है तो यह पोषण आंदोलन से स्वत: जुड़ जाता है.

अमित शाह ने कहा कि वह बनासकांठा की डेयरी सहित कई ऐसी डेरियों के बारे में जानते हैं जो कुपोषित बच्चों को पोषण युक्त दूध देकर उनके स्वास्थ्य की चिंता करती हैं. अहमदाबाद डेयरी जैसी कई डेयरियां गर्भवती महिलाओं को लड्डू देकर उनके और उनके बच्चे के पोषण की चिंता करती हैं और पूरा कोऑपरेटिव सेक्टर कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में जुड़ गया है.

सहकारिता मंत्री ने कहा कि डेयरी और डेयरी टेक्नोलॉजी के बारे में एक जमाने में भारत के लिए कल्पना करना भी मुश्किल था, लेकिन हमने ऐसे प्रयास किए कि पूरे भारत में सिमेट्रिक दूध उत्पादन शुरू हुआ. कई क्षेत्र ऐसे हैं जो कोऑपरेटिव डेयरी से नहीं जुड़े थे, वहां भी एनडीडीबी के माध्यम से गुजरात की सक्षम डेयरियां उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में अपने काम का विस्तार कर रही हैं और कोऑपरेटिव तरीके से अपने काम को बढ़ा रही हैं.

उन्होंने कहा कि अगर देश के हर गांव में सिमेट्रिक तरीके से दूध उत्पादन करना है और हर घर को आत्मनिर्भर बनाना है तो यह काम केवल कोऑपरेटिव डेयरी के जरिए ही संभव है.

डेयरियों ने दूध उत्पादन देश का नाम किया रोशन

Milkअमित शाह ने कहा कि भारत की डेयरियों ने दूध उत्पादन में विश्व में देश का नाम रोशन किया है. उन्होंने कहा कि 1946 में जब गुजरात में एक डेयरी ने शोषण शुरू किया तो इसके खिलाफ सरदार वल्लभभाई पटेल ने त्रिभुवन भाई को प्रेरित किया और 1946 में 15 गांवों में छोटी-छोटी डेयरी की शुरुआत हुई. उन्होंने कहा कि 1946 में शोषण के खिलाफ हुई एक छोटी सी शुरुआत विराट आंदोलन में परिवर्तित हुई और इसी से देश में श्वेत क्रांति का विचार आया और एनडीबीबी का उद्भव हुआ.

देश भर में अनेक कोऑपरेटिव डेरियाँ बनी

उन्होंने कहा कि आज देश भर में विकसित होकर अनेक कोऑपरेटिव डेरियाँ बनी है. अमूल प्रतिदिन लगभग 40 मिलियन लीटर दूध की प्रोसेसिंग करता है और 36 लाख बहनें दूध का भंडारण करती हैं और हर सप्ताह उन्हें उत्पादित दूध की कीमत मिल जाती है. श्री शाह ने कहा कि 2021-22 में अमूल फेडरेशन का टर्नओवर 72000 करोड़ रुपए का है.

प्रसवकाल में डेरी पशुओं की देखभाल

* पशुशाला में पशुओं के प्रसव के लिए अलग से प्रसवघर का इंतजाम करना चाहिए, जो कि साफसुथरा और हवादार होना चाहिए. फर्श को फिनाइल से धो कर सुखा लें. इस के बाद तुड़ी या पराली बिछा दें. फर्श ऊंचानीचा और फिसलने वाला यानी चिकना नहीं होना चाहिए. इस जगह में रोशनी का सही इंतजाम होना चाहिए.

* ब्याने से लगभग 10 दिन पहले पशु को प्रसवघर में बांधना शुरू कर दें. प्रसव के समय पशु के पास अधिक व्यक्तियों को खड़ा न होने दें और पशु के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न करें.

* ब्याने के समय यदि पशु खड़ा है तो ध्यान रखें कि बच्चा जमीन पर जोर से न गिरे. जब बच्चा योनि द्वार से बाहर आने लगे तो हाथों द्वारा बाहर निकालने में मादा की मदद करें.

* प्रसव के दौरान मादा को तकलीफ होने लगे या बच्चे का कुछ भाग बाहर आ जाए और पूरा बच्चा बाहर न आए तो उसी समय पशु चिकित्सक की मदद लें. कोशिश करें कि प्रसव के समय पशु विशेषज्ञ आप की पहुंच में हो जिस से पशु को कोई समस्या होने पर उस की तुरंत मदद ली जा सके.

* प्रसव क्रिया शुरू होते ही पशु बेचैन हो जाता है और योनि द्वार से तरल पदार्थ निकलना इस का मुख्य लक्षण है.

* इस समय पानी की थैली बाहर निकलती है जिसे अपनेआप ही फटने दें और छेड़छाड़ न करें. प्रसव के समय बच्चा पहले सामने के पैरों पर सिर टिकी अवस्था में बाहर आता है.

* प्रसव के बाद योनि द्वार पूंछ और पीछे के हिस्से को कुनकुने पानी में तैयार पोटैशियम परमैगनेट के घोल से साफ कर दें. पशु के पास गंदगी को तुरंत हटा दें.

* यदि प्रसव 4 घंटे में न हो तो पशु चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए.

* अकसर जेर 5-6 घंटे में बाहर निकल जाता है. यदि जेर 13-14 घंटे तक न निकले तो पशु चिकित्सक को दिखाएं.

पशुपालन : सरकारी योजनाओं का लें फायदा

हमारे यहां कई गंवई इलाकों में पशुपालन खेती के साथसाथ किया जाने वाला काम है. कुछ लोग अपनी घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही पशुपालन करते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने पशुपालन को बतौर डेरी कारोबार के रूप में अपनाया हुआ है.

यही डेरी कारोबार उन की आमदनी का एकमात्र जरीया है. लेकिन किसी भी काम को करने के लिए उस के बारे में सटीक जानकारी हो तो कारोबार मुनाफे का सौदा बनता है. कई दफा जानकारी की कमी में कारोबार करने वालों को नुकसान उठाना पड़ता है, इसलिए पशुपालन में पशुओं का रखरखाव, उन के खानपान में चारा, पानी वगैरह देने के अलावा घरेलू उपचार की सही जानकारी होनी चाहिए.

नया डेरी फार्म लगाने के लिए पहले या दूसरे ब्यांत के पशु जो कि ज्यादा से ज्यादा 20 या 25 दिन की ब्याई हुई ही खरीदनी चाहिए, क्योंकि ऐसे पशु अधिक समय तक दूध देते हैं.

इस के अलावा पशुओं की हर अवस्था जैसे गर्भकाल, प्रसवकाल और दूध काल वगैरह में समुचित देखभाल और प्रबंधन से ही किसी भी डेरी फार्म या डेरी उद्योग को कामयाब बनाया जा सकता है.

गांवों में पशुओं की देखभाल व खानपान, प्रबंधन का काम ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं. इसलिए यह जरूरी भी है कि समयसमय पर महिलाओं को पशुओं की देखभाल और प्रबंधन के बारे में तकनीकी जानकारी प्रशिक्षण के माध्यम से देनी चाहिए ताकि पशु से ज्यादा से ज्यादा दूध ले सकें.

केंद्र सरकार द्वारा भी किसानों और पशुपालकों के लिए अनेक हितकारी योजनाएं समयसमय पर आती रहती हैं, उन की जानकारी ले कर भी फायदा उठाना चाहिए. इस तरह की जानकारी अखबारों, पत्रपत्रिकाओं, रेडियो, टीवी और कृषि विभागों द्वारा दी जाती है.

इस के अलावा कृषि मेलों में भी भरपूर जानकारी मिलती है. अपने नजदीक लगने वाले ऐसे आयोजनों में भी युवा महिला व किसानों को जाना चाहिए, जहां पर खेतीकिसानी व पशुपालन के अनेक विशेषज्ञ होते हैं जो आप को नईनई जानकारी देते हैं. खेती से जुड़ी सरकारी कंपनियां, प्राइवेट कंपनियां, बैंक वगैरह के अधिकारी मौजूद होते हैं. उन से भी आम लोगों को तमाम तरह की नई जानकारी मिलती है.

डेरी सब्सिडी स्कीम (नाबार्ड) की उद्यमिता विकास योजना (डीईडीएस) : केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना का खास मकसद देश में दूध के कारोबार को बढ़ावा देना है. पशुपालन योजना के तहत आधुनिक डेरी या डेरी फार्म खोल कर आम किसान अपनी आमदनी में इजाफा कर सकते हैं.

इस योजना का फायदा किसान और पशुपालक दोनों ही ले सकते हैं. जो लोग डेरी कारोबार से जुड़े हैं, वह इस काम को और आगे बढ़ा सकते हैं और अनेक लोगों को रोजगार भी दे सकते हैं.

गंवई इलाकों के बेरोजगार नौजवान भी इस काराबार को शुरू कर सकते हैं. अगर आप को पशुपालन का तजरबा है तो अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना के तहत डेरी कारोबार से फायदा उठाने के लिए गायपालन और भैंसपालन के लिए लोन दिया जाता है. इस में सरकार द्वारा 25 से 33 फीसदी तक सब्सिडी दी जाती है.

अगर आप 10 दुधारू पशुओं से डेरी की शुरुआत करना चाहते हैं और इस पर होने वाला खर्चा तकरीबन 7 लाख रुपए आता है तो केंद्र के कृषि मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही डीईडीएस योजना में आप को तकरीबन 1.75 लाख रुपए की सब्सिडी मिलेगी.

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा यह सब्सिडी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास  बैंक यानी नाबार्ड के माध्यम से मुहैया कराई जाती है.

किस को कितनी सब्सिडी मिलेगी : डीईडीएस योजना के तहत आप को डेरी लगाने के लिए आमतौर पर 25 फीसदी की सब्सिडी मिलेगी. अगर आप अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से हैं, तो इस योजना के तहत आप को 33 फीसदी सब्सिडी दी जाएगी.

आप अगर राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड से डेरी खोलने के लिए लोन लेते हैं तो आप को कुछ नियमों का पालन करना होगा और अहम कागजात की जरूरत पड़ेगी. इस की जानकारी इस तरह से है:

* अगर आप के पास 2 से ज्यादा पशु हैं तो आप इस लोन के लिए आवेदन कर सकते हैं. अगर आप पहले से ही पशुपालन करते रहे हैं तो आप को लोन मिलने में भी आसानी होगी और लोन के लिए आवेदन करने के लिए आवेदनकर्ता की उम्र 18 साल से ज्यादा और 65 साल से कम होनी चाहिए.

* अगर आप 2 से ले कर 10 पशु के साथ डेरी शुरू करना चाहते हैं तो प्रति 5 पशु के लिए 0.25 एकड़ जमीन चारे के लिए मुहैया होनी चाहिए. अगर आप के पास जमीन है तो अच्छी बात है. अगर जमीन नहीं है तो आप किसी अन्य व्यक्ति की जमीन किराए पर ले कर यह काम शुरू कर सकते हैं. इस की जानकारी आप को बैंक को देनी होगी.

* आप जहां डेरी खोलना चाहते हैं, वहां का मूल निवास प्रमाणपत्र होना चाहिए.

क्याक्या कागजात जरूरी

* आवेदन फार्म (यह फार्म आप को औनलाइन इंटरनैट या फिर बैंक में मिल जाएगा).

* पहचान के लिए आधारकार्ड या वोटर आईडी कार्ड होना चाहिए.

* जिस बैंक में आप का अकाउंट है, उस बैंक की पासबुक होनी चाहिए.

* आप जहां डेरी खोलना चाहते हैं, वहां का मूल निवास प्रमाणपत्र होना चाहिए.

* आवेदन करने वाले व्यक्ति का पासपोर्ट साइज का फोटो भी चाहिए.

जरूरी कागजातों के अलावा आप को एक आवेदनपत्र देना होगा, जिस में यह लिखा होना चाहिए कि आप लोन क्यों ले रहे हैं? आप यह लोन कितने सालों में चुका देंगे? आप के पास कितने पशु हैं और फिलहाल इन से आप की कितनी आमदनी हो रही है? वगैरह.

इस तरह की जानकारी बैंक आप से मांगेगा, इसलिए ऐसे में आप को इन सवालों के जवाब की पहले से तैयारी कर लेनी चाहिए ताकि बाद में आप को किसी तरह की परेशानी न आए.

डेरी खोलने के लिए लोन का एप्लीकेशन फार्म लेते समय आप किसी भी बैंक कर्मचारी से सही जानकारी ले सकते हैं. बैंक कर्मचारी आप को बता देंगे, जैसे इस में कौनकौन से कागजात लगेंगे. आप को कितने दिन में यह लोन मिल सकता है वगैरह.

कैसे करें आवेदन : डेरी खोलने के लिए लोन कैसे मिलेगा तो इस के लिए आप को अपने बैंक जाना है. वहां आप को एप्लीकेशन फार्म के साथ जरूरी कागजात नत्थी करने हैं.

इन सभी कागजातों के साथ आप को बैंक में इन्हें जमा करना है. यहां बैंक कर्मचारी आप के लोन का आवेदन फार्म नाबार्ड यानी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक में भेज देंगे.

आप चाहें तो अपने नजदीकी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) जा कर लोन के लिए खुद भी फार्म जमा कर सकते हैं. इस के बाद आप के दस्तावेज सत्यापन यानी वैरीफिकेशन के लिए राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक जाएंगे.

डौक्यूमैंट वेरीफाई होने के बाद आप को पूछताछ के लिए बैंक बुलाया जाएगा. आप द्वारा दिए गए जवाब से संतुष्ट होने पर ही आप को लोन मिल सकेगा, अन्यथा बैंक कर्मचारी आप के लोन को रिजैक्ट कर सकता है. ऐसे में यह जरूरी है, आप को उस के सवालों का सही जवाब देना होगा. उसे भरोसा दिलाना होगा कि आप को वाकई लोन की जरूरत है.

डेरी फार्म कारोबार में होने वाला अनुमानित खर्च : अगर आप दूध देने वाले 10 पशुओं की डेरी खोलते हैं तो इस प्रोजैक्ट में तकरीबन 7 लाख रुपए की लागत आएगी.

डेरी उद्यमिता विकास योजना यानी डीईडीएस के तहत आप को इस में 1.75 लाख रुपए की सब्सिडी मिल जाएगी. तकरीबन सभी बैंक लोन देते समय अपने लोन की सुरक्षा के लिए आवेदनकर्ता से कुछ न कुछ गिरवी जरूर रखवाते हैं. इसे सिक्योरिटी डिपोजिट कहा जाता है. इस के लिए आप से जमीन के कागजात या घर के ऐसे कागजात मांगे जाते हैं, जिन की कीमत आप के लोन से ज्यादा हो और जब आप का लोन चुकता हो जाता है तो वह कागजात आप को वापस मिल जाते हैं.

अन्य योजनाओं में भी सब्सिडी

Pashupalanदूध उत्पादन के लिए उपकरण पर सब्सिडी : डेरी उद्यमिता विकास योजना (डीईडीएस) के तहत दूध से बनने वाली अनेक चीजें (मिल्क प्रोडक्ट) बनाने की यूनिट शुरू करने के लिए भी सब्सिडी दी जाती है. इस योजना के तहत आप दूध उत्पाद की प्रोसैसिंग के लिए उपकरण खरीद सकते हैं. खरीदे गए उपकरण पर आप को 25 फीसदी तक की कैपिटल सब्सिडी मिल सकती है.

अगर आप अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में आते हैं तो आप को इस के लिए 33 फीसदी सब्सिडी मिल सकती है.

मिल्क कोल्ड स्टोरेज पर भी है सब्सिडी: इस योजना के तहत दूध और दूध से बने उत्पाद के संरक्षण के लिए कोल्ड स्टोरेज यूनिट शुरू कर सकते हैं. इस पर भी 33 फीसदी  सब्सिडी मिलेगी.

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की तरफ से डेरी उद्यमिता विकास योजना के तहत पशु खरीदने, बछड़ापालन, वर्मी कंपोस्ट, डेरी लगाने, दूध शीतलन व अन्य कामों के लिए लघु एवं सीमांत किसानों समेत समूहों को प्राथमिकता दी जाती है.

डीईडीएस के बारे में अधिक जानकारी के लिए नाबार्ड की वैबसाइट पर जाए या अपने नजदीकी पशुपालन विभाग से संपर्क करें.

पशुओं में थनैला रोग और उस की रोकथाम

दुधारू पशुओं में अकसर थनैला रोग हो जाता है. इस वजह से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. समय पर उचित उपाय अपना कर इस रोग से छुटकारा पाया जा सकता है. पशु डाक्टर की देखरेख में ही उपचार करेंगे, तो आप का पशु भी सेहतमंद रहेगा.

वैसे, थनैला रोग का मतलब दूध देने वाले पशु के अयन यानी थन की सूजन और दूध की मात्रा के रासायनिक संघटन में अंतर आना होता है. अयन में सूजन, अयन का गरम होना और अयन का रंग हलका लाल होना इस रोग की खास पहचान है.

थनैला रोग विश्व के सभी भागों में पाया जाता है. इस से दुग्ध उत्पादन कम होता है और  दुग्ध उद्योग को भारी माली नुकसान उठाना पड़ता है. थनैला रोग जीवाणुओं, विषाणुओं और प्रोटोजोआ आदि के संक्रमण से होता है. संक्रमण के दौरान कई कारक खुद ही दूध में आ जाते हैं.

अगर इस का दूध इनसान इस्तेमाल करे, तो उसे भी कई रोग हो सकते हैं. इस वजह से यह रोग और भी खतरनाक हो जाता है. बीमार पशु के दूध को अगर उस का बच्चा सेवन करता है, तो वह भी बीमार हो सकता है.

आमतौर पर यह रोग छुआछूत और दूसरी कई वजहों से होता है, पर कई जीवाणुओं व विषाणुओं से होने पर दूसरे पशुओं में भी फैल सकता है. कई बार थन पर छाले पड़ जाते हैं, उस समय दूध निकालने पर थन पर घाव हो जाता है और हालत ज्यादा बिगड़ जाती है.

उपचार व रोकथाम

* बीमार पशु के अयन और थन की सफाई रखनी चाहिए.

* बीमारी की जांच शुरुआती समय में ही करवा लेनी चाहिए.

* थन या अयन के ऊपर किसी भी तरह के गरम तेल, घी या पानी की मालिश नहीं करनी चाहिए.

* दूध निकालने से पहले और बाद में किसी एंटीसैप्टिक लोशन से थन व अयन की धुलाई करनी चाहिए.

* डेरी में यदि ज्यादा पशु हैं, तो समयसमय पर थनैला रोग के परीक्षण का काम स्थानीय पशु डाक्टर की सलाह से जरूर करें.

* ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को थनैला रोग का टीका भी लगवाना चाहिए.

* दूध निकालते समय थन पर दूध की मालिश नहीं करनी चाहिए. उस की जगह घी या तेल वगैरह का इस्तेमाल करना चाहिए.

* पशु में रोग होने पर तत्काल निकट के पशु डाक्टर से संपर्क कर उचित सलाह व दवा लें.

दूध देने वाले पशु से संबंधित सावधानियां

* दूध देने वाला पशु पूरी तरह से सेहतमंद होना चाहिए. टीबी, थनैला वगैरह रोग नहीं होने चाहिए. पशु की जांच समयसमय पर पशु डाक्टर से कराते रहना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले पशु के शरीर की अच्छी तरह सफाई कर देनी चाहिए. दुहाई से पहले पशु के शरीर पर चिपका  गोबर, धूल, कीचड़, घास आदि साफ कर लेनी चाहिए, खासतौर से पशु के शरीर के पिछले हिस्से, पेट, अयन, पूंछ व पेट के निचले हिस्से की खासतौर पर सफाई करनी चाहिए.

* दूध दुहने से पहले अयन की सफाई पर खास ध्यान देना चाहिए. अयन व थनों को किसी जीवाणुनाशक घोल से धोया जाए और घोल के भीगे हुए कपड़े से पोंछ लिया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा.

* अगर किसी थन में कोई रोग हो, तो दूध निकाल कर फेंक देना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले हर थन की 2-4 दूध की धार जमीन पर गिरा देनी चाहिए या अलग बरतन में निकाल लेना चाहिए.

दूध देने वाले पशु के बंधने की जगह से संबंधित सावधानियां

* पशु बांधने व खड़े होने की जगह खुली होनी चाहिए.

* फर्श अगर मुमकिन हो तो पक्का होना चाहिए. अगर नहीं है, तो कच्चा फर्श भी समतल होना चाहिए. फर्श में गड्ढे वगैरह न हों. मूत्र व पानी निकालने का उचित इंतजाम होना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले पशु के चारों ओर सफाई कर देनी चाहिए. अगर बिछावन है, तो दुहाई से पहले उसे हटा देना चाहिए.

* दूध निकालने वाली जगह की दीवारें, छत आदि साफ होनी चाहिए. उन की चूने की पुताई करवा लेनी चाहिए और फर्श की फिनाइल से धुलाई 2 घंटे पहले कर लेनी चाहिए.

दूध के बरतन से संबंधित सावधानियां

* दूध दुहने का बरतन साफ होना चाहिए. उस की सफाई पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए. दूध के बरतन को पहले ठंडे पानी से, फिर सोडा या अन्य जीवाणुनाशक रसायन से मिले गरम पानी से, फिर सादा खौलते हुए पानी से धो कर धूप में या चूल्हे के ऊपर उलटा रख कर सुखा लेना चाहिए.

* साफ किए हुए बरतन पर मच्छरमक्खियों को नहीं बैठने देना चाहिए. यह भी ध्यान रहे कि बरतन को कुत्ता, बिल्ली वगैरह चाट न सकें.

* दूध दुहने वाले बरतन का मुंह चौड़ा व सीधा आसमान में खुलने वाला नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस से मिट्टी, धूल, गोबर आदि के कण व घासफूस के तिनके, बाल आदि सीधे दुहाई के समय बरतन में गिर जाएंगे. इसलिए बरतन संकरे मुंह वाला हो और टेढ़ा होना चाहिए.

* बरतन पर जोड़ व कोने कम होने चाहिए.

साफ तरीकों से करें दूध का उत्पादन

दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने, गंदे व असुरक्षित दूध को पीने से होने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने व ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दूध का उत्पादन साफ तरीकों से करना बहुत जरूरी है.

दूध में भोजन के सभी जरूरी तत्त्व जैसे प्रोटीन, शक्कर, वसा, खनिजलवण, विटामिन वगैरह उचित मात्रा में पाए जाते हैं, जो लोगों की सेहत और बढ़ोतरी के लिए बहुत जरूरी होते हैं, इसीलिए दूध को एक संपूर्ण आहार कहा गया है.

लेकिन दूध में जीवाणुओं की बढ़ोतरी होते ही दूध जल्दी खराब होने लगता है. इसे ज्यादा समय तक साधारण दशा में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है. कुछ दूसरे हानिकारक जीवाणु दूध के जरीए दूध पीने वालों में कई तरह की बीमारियां पैदा कर देते हैं, इसलिए दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित रखने, गंदे व असुरक्षित दूध को पीने से होने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने व ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दूध का उत्पादन साफ तरीकों से करना बहुत जरूरी है.

अगर भारत जैसे देश की बात करें तो यहां की दूध की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है. दूध की क्वालिटी पर असर डालने वाले जीवाणुओं की तादाद की बात करें तो प्रति मिलीलिटर कच्चे दूध में इन की तकरीबन 2 लाख से 10 लाख के बीच तादाद होती है, जबकि विदेशों में अच्छे से प्रबंधन करने के चलते इन की तादाद प्रति मिलीलिटर 30,000 से ज्यादा नहीं होती.

अगर हम पैकेटबंद दूध की बात करें तो इस में भी तादाद प्रति मिलीलिटर 30,000 से ज्यादा नहीं होती. इन हालात को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारे देश में पशुपालक दूध की क्वालिटी पर इतना ध्यान नहीं देते.

दूध में 2 तरह की गंदगियां पाई जाती हैं

* आंख से दिखाई देने वाली गंदगियां, जैसे गोबर के कण, घासफूस के तिनके, बाल, धूल के कण, मच्छरमक्खियां वगैरह. इन्हें साफ कपड़े या छलनी से छान कर अलग किया जा सकता है.

* आंख से न दिखाई देने वाली गंदगियां. इस के तहत सूक्ष्म आकार वाले जीवाणु आते हैं, जो केवल सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा ही देखे जा सकते है. इन्हें नष्ट करने के लिए दूध को गरम करना पड़ता है. दूध को लंबे समय तक रखना हो तो इसे ठंडा कर के रखना चाहिए.

इन गंदगियों के 2 स्रोत हैं

* जानवरों के अयन से : थनों के अंदर से पाए जाने वाले जीवाणु.

* बाहरी वातावरण से.

* जानवर के बाहरी शरीर से.

* जानवर के बंधने वाली जगह से.

* दूध के बरतनों से.

* दूध दुहने वाले ग्वाले से.

* दूसरे साधनों जैसे मच्छरमक्खियों, गोबर व धूल के कणों, बालों वगैरह से.

हमारे देश में जो दूध उत्पादन हो रहा है, वह ज्यादातर गांवों में या शहर की निजी डेरियों में ही उत्पादित किया जा रहा है, जहां सफाई पर ध्यान न देने के चलते दूध में जीवाणुओं की तादाद बहुत ज्यादा होती है और दिखाई देने वाली गंदगियां जो नहीं होनी चाहिए, भी मौजूद रहती हैं. इस के मुख्य कारण ये हैं :

* पशुओं को दुहने से पहले ठीक से सफाई न करना.

* पशुओं को दुहने वाले के हाथ व कपड़े साफ न होना.

* गांवों व शहरों में गंदी जगहों पर दूध निकालना.

* गंदे बरतनों में दूध निकालना व रखना.

* गाय के बच्चे को थन से दूध का पिलाना.

* दूध दुहने वाले का बीमार होना.

* दूध बेचने ले जाते समय पत्तियों, भूसे व कागज वगैरह से ढकना.

* देश की जलवायु का गरम होना.

* गंदे पदार्थों से दूध का अपमिश्रण करना.

साफ दूध का उत्पादन सेहत व ज्यादा मुनाफे के लिए जरूरी है, इसलिए ऐसे दूध का उत्पादन करते समय इन बातों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है :

दूध देने वाले पशु से संबंधित सावधानियां

* दूध देने वाला पशु पूरी तरह सेहतमंद होना चाहिए. उसे टीबी, थनैला वगैरह बीमारियां नहीं होनी चाहिए. पशुओं की जांच समयसमय पर पशु चिकित्सक से कराते रहना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले पशु के शरीर की अच्छी तरह सफाई कर लेना चाहिए. दुहने से पहले पशु के शरीर पर चिपके हुए गोबर, धूल, कीचड़, घास वगैरह साफ कर लेना चाहिए. खासतौर से पशु के शरीर के पीछे वाले हिस्से, पेट, अयन, पूंछ व पेट के निचले हिस्से की सफाई करनी चाहिए.

* दुहने से पहले अयन की सफाई पर खास ध्यान देना चाहिए व थनों को किसी जीवाणु नाशक के घोल के भीगे हुए कपड़े से पोंछ लेना चाहिए.

* अगर किसी थन में कोई बीमारी हो तो उस से दूध नहीं निकालना चाहिए.

* दुहने से पहले दूर थन की 2-4 दूध की धारें जमीन पर गिरा देनी चाहिए या अलग बरतन में इकट्ठा करनी चाहिए.

दूध देने वाले पशु के बांधने की जगह

* पशु बांधने का व खड़े होने की जगह पूरी होनी चाहिए.

* फर्श पक्का हो. अगर पक्का फर्श नहीं हो तो कच्चा फर्श समतल हो. उस में गड्ढे वगैरह न हों, जिस से पेशाब व पानी बह जाए.

* दूध दुहने से पहले पशु के चारों ओर सफाई कर देनी चाहिए, गोबर, पेशाब हटा देना चाहिए. यदि बिछावन बिछाया गया हो तो दुहने से पहले उसे हटा देना चाहिए.

* दूध निकालने वाली जगह की दीवारें, छत वगैरह साफ होनी चाहिए. उन की समयसमय पर चूने से पुताई करवाते रहना चाहिए और फर्श की फिनाइल से धुलाई 2 घंटे पहले कर लेनी चाहिए.

दूध के बरतन से संबंधित सावधानियां

* दूध दुहने का बरतन साफ होना चाहिए. उस की सफाई पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए. दूध के बरतन को पहले ठंडे पानी से, फिर सोडा या दूसरे जीवाणु नाशक रसायन से मिले गरम पानी से, फिर सादे खौलते हुए पानी से धो कर धूप में सुखा लेना चाहिए.

* साफ किए हुए बरतन पर मच्छरमक्खियों को नहीं बैठने देना चाहिए और  कुत्ता बिल्ली उसे जूठा न कर सकें.

* दूध दुहने के बरतन का मुंह चौड़ा व सीधा और ऊपर की तरफ खुलने वाला नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस से मिट्टी, धूल, गोबर वगैरह के कण व घासफूस के तिनके, बाल वगैरह सीधे दुहाई के समय बरतन में गिर जाएंगे इसलिए बरतन संकरे मुंह वाला हो और मुंह थोड़ा टेढ़ा होना चाहिए.

दूध दुहने वाले शख्स से संबंधित सावधानियां

* दूध दुहने वाला आदमी या औरत सेहतमंद होना चाहिए. उसे किसी तरह की कोई बीमारी न हो.

* उस के हाथों के नाखून कटे होने चाहिए और दुहाई से पहले हाथों को अच्छी तरह से साबुन से धो लेना चाहिए.

* ग्वाले या दूध दुहने वाले आदमी के कपड़े साफ होने चाहिए और सिर कपड़े से ढका हो.

* दूध निकालते समय सिर खुजलाना व बात करना, तंबाकू खा कर थूकना, छींकना, खांसना वगैरह गंदी आदतें नहीं होनी चाहिए.

दूसरी सावधानियां

* पशुओं को चारा, दाना, दुहाई के समय नहीं देना चाहिए, बल्कि पहले या बाद में दें.

* दूध में मच्छर मक्खियों का प्रवेश रोकना चाहिए.

* ठंडा करने से यानी 4-7 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर रखने से दूध में पाए जाने वाले जीवाणुओं की बढ़ोतरी रुक जाती है.

* दूध को कभी भी बिना गरम हुए इस्तेमाल में नहीं लाना चाहिए.

इन बातों पर अगर किसान भाई ध्यान दे तो स्वच्छ दूध का उत्पादन कर ज्यादा मुनाफा कमा सकतें हैं.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के पशु वैज्ञानिक से संपर्क करें.

इस मशीन से गाय और भैंस दोनों का दूध निकाला जा सकता है

गाय और भैंस के थनों की बनावट में थोड़ा फर्क होता है, इसलिए गाय का दूध दुहने वाली मशीन में थोड़ा सा बदलाव कर के इस मशीन से ही भैंस का दूध भी निकाला जा सकता है. भैंस का दूध निकालने के लिए मशीन का प्रैशर बढ़ाना होता है. डेरी डद्योग के लिए पशुपालक किसानों को सरकार अनुदान भी दे रही है. यह अनुदान पिछले दिनों तक केवल अनुसूचित जाति के लोगों को ही मिलता था, जो 33.33 फीसदी था. लेकिन अब सभी वर्ग के लोग इस अनुदान का लाभ ले सकते हैं.

मशीन से दूध निकालने की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई और आज यह तकनीक दुनियाभर के लोगों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है. आजकल डेरी उद्योग से जुड़े अनेक लोग पशुओं से दूध उत्पादन मशीन के द्वारा ले रहे हैं.

पशुओं का दूध दुहने वाली मशीन को हम मिल्किंग मशीन के नाम से भी जानते हैं. इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है. इस से पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है. इस से दूध की गुणवत्ता बनी रहती है और उस के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. यह मशीन थनों की मालिश भी करती और दूध निकालती है. इस मशीन से पशु को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो.

मिल्किंग मशीन से दूध निकालने से लागत के साथसाथ समय की भी बचत होती है और दूध में किसी तरह की गंदगी नहीं आती. इस से तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से बचाव होता है. पशुपालक के दूध निकालते समय उन के खांसने व छींकने से भी दूध का बचाव होता है. दूध मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है.

पशुपालन व डेयरी फार्मिंग है किन ऊंचाइयों पर और क्या हैं सरकारी योजनाएं

नई दिल्ली : पशुपालन, मत्स्यपालन और डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला ने पशुपालन और डेयरी से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं, जिस में उन्होंने बताया कि किसानों के दरवाजे पर ही कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान की जा रही हैं, जिस के तहत 5.71करोड़ पशुओं को शामिल किया गया है, 7.10करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं और इस कार्यक्रम के अंतर्गत 3.74 करोड़ किसानों को लाभ हुआ है. वहीं देश में आईवीएफ प्रौद्योगिकी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिस के तहत के तहत अब तक 19248 भ्रूण पैदा किए गए और 8661 भ्रूण स्थानांतरित किए गए. साथ ही, 1343 बछड़ों का जन्म हुआ.

सैक्स सौर्टेड सीमेन या लिंग वर्गीकृत वीर्य तैयार करने का आंकड़ा

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि देश में 90 फीसदी तक सटीकता के साथ केवल मादा बछिया के जन्‍म के लिए सैक्स सौर्टेड सीमेन या लिंग वर्गीकृत वीर्य तैयार करना शुरू किया गया है. कार्यक्रम के अंतर्गत सुनिश्चित गर्भावस्था पर किसानों के लिए 750 रुपए या सौर्टेड सीमेन की लागत का 50 फीसदी सब्सिडी उपलब्ध है.

डीएनए आधारित जीनोमिक चयन

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने स्वदेशी नस्लों के विशिष्ट जानवरों के चयन के लिए इंडसचिप विकसित किया है और रेफरल आबादी तैयार करने के लिए चिप का उपयोग कर के 25,000 जानवरों का जीनोटाइप किया है. दुनिया में पहली बार भैंसों के जीनोमिक चयन के लिए बफचिप विकसित किया गया है और अब तक रेफरल आबादी बनाने के लिए 8,000 भैंसों का जीनोटाइप किया गया है.

पशु की पहचान और पता लगाने की क्षमता

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि 53.5 करोड़ जानवरों (मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर) की पहचान और पंजीकरण 12 अंकों के यूआईडी नंबर के साथ पौलीयुरेथेन टैग का उपयोग कर के की जा रही है.

नस्‍ल का चयन

उन्होंने बताया कि गिर, शैवाल देशी नस्ल के मवेशियों और मुर्रा, मेहसाणा देशी नस्ल की भैंसों के लिए संतान परीक्षण कार्यक्रम लागू किया गया है.

राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एनडीडीबी के साथ एक डिजिटल मिशन, “राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन” यानी एनडीएलएम शुरू किया है. इस से पशुओं की उर्वरता में सुधार करने, पशुओं और मनुष्यों दोनों को प्रभावित करने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण पशुधन व घरेलू और निर्यात बाजार दोनों के लिए पशुधन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.

नस्ल वृद्धि फार्म

उन्होंने नस्ल वृद्धि फार्म योजना पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस योजना के तहत नस्ल वृद्धि फार्म की स्थापना के लिए निजी उद्यमियों को पूंजीगत लागत (भूमि लागत को छोड़ कर) पर 50 फीसदी (प्रति फार्म 2 करोड़ रुपए तक) की सब्सिडी प्रदान की जाती है. अब तक डीएएचडी ने 76 आवेदन स्वीकृत किए हैं और एनडीडीबी को सब्सिडी के रूप में 14.22 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

डेयरी विकास के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि किसानों को उपभोक्ता से जोड़ने वाले शीत श्रृंखला बुनियादी ढांचे सहित गुणवत्तापूर्ण दूध के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना और उसे मजबूत करना. वर्ष 2014-15 से 2022-23 (20.06.2023) तक 28 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में 3015.35 करोड़ रुपए (केंद्रीय हिस्सेदारी 2297.25 करोड़ रुपए) की कुल लागत के साथ 185 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. योजना के तहत 20 जून, 2023 तक मंजूर नई परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए कुल 1769.29 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं. मंजूर परियोजनाओं के अंतर्गत 1314.42 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग किया गया है.

डेयरी के कामों में लगी डेयरी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों का सहयोग करना

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि गंभीर प्रतिकूल बाजार स्थितियों या प्राकृतिक आपदाओं के कारण संकट से निबटने के लिए डेयरी के कामों में लगी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों को आसान कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान कर के सहायता करना है. वर्ष 2020-21 से 30 अप्रैल, 2023 तक एनडीडीबी ने देशभर में 60 दुग्ध संघों के लिए 2 फीसदी प्रति वर्ष की दर से 37,008.89 करोड़ रुपए की कार्यशील पूंजी ऋण राशि के विरुद्ध 513.62 करोड़ रुपए की रियायती ब्याज सहायता राशि की मंजूरी दे दी और 373.30 करोड़ रुपए (नियमित रियायती ब्याज दर के रूप में 201.45 करोड़ रुपए और अतिरिक्त ब्याज अनुदान राशि के रूप में 171.85करोड़ रुपए) जारी किए हैं.

डेयरी, प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचा विकास निधि (डीआईडीएफ)

दूध प्रसंस्करण, शीतलन और मूल्यवर्धित उत्पाद सुविधाओं आदि घटकों के लिए दूध प्रसंस्करण, शीतलन और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे का निर्माण/आधुनिकीकरण करना. डीआईडीएफ के तहत 31 मई, 2023 तक 6776.86 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय के साथ 37 परियोजनाएं स्वीकृत की गईं और 4575.73 करोड़ रुपए के ऋण के मुकाबले 2353.20 करोड़ रुपए का ऋण वितरित किया गया है. रियायती ब्‍याज दर के रूप में नाबार्ड को 88.11 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

राष्ट्रीय पशुधन मिशन

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि इस योजना में मुख्‍य रूप से रोजगार सृजन, उद्यमिता विकास, प्रति पशु उर्वरता में वृद्धि और इस प्रकार मांस, बकरी के दूध, अंडे और ऊन के उत्पादन में वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है. राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत पहली बार केंद्र सरकार व्यक्तियों, एसएचजी, जेएलजी, एफपीओ, सेक्शन 8 कंपनियों, एफसीओ को हैचरी और ब्रूडर मदर इकाइयों के साथ पोल्ट्री फार्म स्थापित करने, भेड़ और बकरी की नस्‍लों की वृद्धि, फार्म, सूअरपालन फार्म और चारा एवं चारा इकाइयों के लिए सीधे 50 फीसदी सब्सिडी प्रदान कर रही है.

अब तक डीएएचडी ने 661 आवेदन स्वीकृत किए हैं और 236 लाभार्थियों को सब्सिडी के रूप में 50.96करोड़ रुपए जारी किए हैं.

पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास निधि

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि व्यक्तिगत उद्यमियों, निजी कंपनियों, एमएसएमई, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और सेक्‍शन 8 कंपनियों द्वारा डेयरी प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे, मांस प्रसंस्करण और पशु चारा संयंत्र मवेशी/भैंस/भेड़/बकरी/सूअर के लिए नस्ल सुधार टैक्‍ नोलौजी और नस्ल वृद्धि फार्म स्थापित करने और तकनीकी रूप से सहायताप्राप्त पोल्ट्री फार्म के लिए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अब तक बैंकों द्वारा 309 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिन की कुल परियोजना लागत 7867.65 करोड़ रुपए है और कुल परियोजना लागत में से 5137.09 करोड़ रुपए सावधि ऋण है. रियायती ब्याज सहायता के रूप में 58.55 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम

उन्होंने बताया कि टीकाकरण द्वारा आर्थिक और जूनोटिक महत्व के पशु रोगों की रोकथाम, नियंत्रण और रोकथाम के लिए अब तक इयर टैग किए गए पशुओं की कुल संख्या 25.04 करोड़ है. एफएमडी के दूसरे दौर में अब तक 24.18करोड़ पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है.

उन्होंने यह भी बताया कि एफएमडी टीकाकरण का तीसरा दौर चल रहा है और अब तक 4.66 करोड़ जानवरों को टीका लगाया जा चुका है. अब तक 2.9 करोड़ जानवरों को ब्रुसेला का टीका लगाया जा चुका है. 16 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 1960 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) को हरी झंडी दिखाई गई है. 10 राज्‍यों में 1181 एमवीयू कार्यरत हैं.

नया भूसा कितना फायदेमद

किसान अकसर यह शिकायत करते मिल जाते हैं कि जब से उन्होंने नया भूसा खिलाना शुरू किया है, तब से कुछ पशुओं को दस्त लग गए हैं. नए भूसे में ऐसा क्या है, जिस के कारण पशु को दस्त लग जाते हैं? कुछ लोग कहते हैं कि नया भूसा गरमी करता है. गरमीसर्दी कुछ नहीं करता, आज आप को सम झाते हैं कि नए भूसे से पशुओं को दस्त क्यों लग जाते हैं.

खाद्यान्न फसलों को कीड़ेमकोड़ों से बचाने के लिए कई तरह के हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड फसलों पर छिड़के जाते हैं. ये हरबीसाइड खरपतवार तो खत्म कर देते हैं और इंसैक्टिसाइड व पैस्टिसाइड फसलों को तो कीड़ों से बचा लेते हैं, मगर इन की रेजिड्यू भूसे के ऊपर लगी रह जाती है. यही भूसा जब पशु को खिलाया जाता है तो ये हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड

और पैस्टिसाइड पशु के पाचन तंत्र में पहुंच कर उसे डिस्टर्ब कर देते हैं और पशु को दस्त लग जाते हैं.

इन हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड की मात्रा इतनी भी नहीं होती कि पशु मर ही जाए, मगर इतनी तो होती है कि उस का पाचन तंत्र खराब हो जाता है और उसे दस्त लग जाते हैं.

खेत में जो भी कैमिकल छिड़के जाते हैं, वे पौधे के अंदर या तो सीधे ही चले जाते हैं या फिर जब पौधा मिट्टी से अपना पोषण शामिल करता है तो उस समय ये सब कैमिकल पौधे के अंदर चले जाते हैं. वैसे तो इन का एक समय होता है जिस के बाद ये अपने आप ही डिऐक्टिवेट हो जाते हैं, मगर इन कैमिकल के डिऐक्टिवेट होने से पहले ही अगर वह भूसा पशुओं ने खाया तो ये सब कैमिकल उन के अंदर चले जाते हैं.

हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड लिपोफिलिक होते हैं, जिस का मतलब है कि ये कैमिकल फैट के साथ घुलमिल जाते हैं. कभीकभी तो पशु के अंदर इन कैमिकलों की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि वे लिपोफिलिक होने के चलते पशु के दूध में पाए जाने वाले फैट के साथ जुड़ कर दूध तक में स्रावित होने लगते हैं और अगर पशु मांस के लिए पाला गया है तो ये कैमिकल मांस में जमा होने लगते हैं और जब इन पशुओं का दूध या मांस कोई उपभोग करता है तो ये कैमिकल उस को भी प्रभावित करते हैं.

एक किलोग्राम गेहूं भूसे में 1.1 मिलीग्राम से 1.2 मिलीग्राम तक एंडोसल्फान पाया गया है. ज्वार की कड़बी में 0.46 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम एंडोसल्फान पाया गया है. एंडोसल्फान दूध में तो स्रावित नहीं होता है, मगर यह पशु को जरूर प्रभावित करता है.

उत्तराखंड के कुमायूं की पहाडि़यों और तराई के क्षेत्रों से इकट्ठे किए गए दूध के नमूनों में क्लोरोपायरिफौस मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट से ज्यादा पाया गया.

हैदराबाद के आसपास के क्षेत्रों से इकट्ठे किए गए दूध के नमूनों में डाइमेथोएट पाया गया.

कैसे नुकसान पहुंचाते हैं

हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड के कारण बड़े पशुओं का गोबर पतला हो सकता है. छोटे पशुओं को दस्त लग सकते हैं. दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन घट सकता है और उन की प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है.

पशुओं के हीट में न आने की समस्या आ सकती है. गर्भवती मादाओं में गर्भपात हो सकता है. पशुओं का लिवर और किडनी तक खराब हो सकते हैं. इन कैमिकल के कारण पशु की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है, और तो और कैंसर तक हो सकता है.

बचने के उपाय

* कैमिकल की जगह बायोपैस्टिसाइड ही उपयोग में लाए जाएं.

* अगर इन कैमिकल का उपयोग करना मजबूरी हो तो इन का छिड़काव करने के तुरंत बाद फसल को पशुओं को खाने के लिए न दिया जाए.

* नए भूसे को तुरंत ही पशुओं को खिलाना शुरू नहीं करना है, बल्कि कम से कम 2 महीने बाद ही उसे पशुओं को खाने के लिए देना है, ताकि उस के ऊपर अगर कोई कैमिकल लगा भी है, तो वह डिऐक्टिवेट हो जाए.

* अगर ताजा भूसा खिलाना मजबूरी हो तो उसे रातभर पानी में भिगोने के बाद ही पशुओं को खाने को दें. जिस पानी में भूसा भिगोया जाएगा उस में से कुछ पानी तो भूसा सोख ही लेगा और बाकी बचे पानी को फेंक दें.

सरकार द्वारा बैन किए गए इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना है

जो इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड बैन कर दिए गए हैं, उन के नाम हैं :

    • एलाक्लोर
    • एल्डीकार्ब
    • एल्ड्रिन
    • बेंजीन हैक्साक्लोराइड (बीएचसी)
    • कैल्शियम साइनाइड
    • कैप्टाफोल
    • कार्बारिल
    • कार्बोड्यूरान
    • क्लोर्डेन
    • क्लोरोबेंजाइलेट
    • साइब्रोमोक्लोरोप्रोपेन
    • कौपर एसीटोआसैनाइट
    • डाईएल्ड्रिन
    • डाईक्लोरोवास
    • ऐंड्रीन
    • इथाइलीन डाईब्रोमाइड (ईडीबी)
    • इथाइल मर्करी क्लोराइड (ईएमसी)
    • इथाइल पैराथियोन
    • फेनारिमोल
    • फेंथियोन
    • हैप्टाक्लोर
    • लाईन्यूरौन
    • मिथोक्सिइथाइल मरकरी क्लोराइड (एमईएमसी)
    • मिथाइल पैराथियोन
    • मैलिक हैडराजाइड (एमएच)
    •  मेनाडोन
    • मेथामोल
    • निकोटीन सल्फेट
    • नाइट्रोफेन
    • फोरेट
    • फौस्डिमिडोन
    • सोडियम साइनाइड
    • टौक्साफेन
    • ट्राईक्लोरो एसिटिक एसिड

विश्व दुग्ध दिवस : एक जरूरी दिन

1   जून को पूरी दुनिया में ‘विश्व दुग्ध दिवस’ का आयोजन किया जाता है. ‘विश्व दुग्ध दिवस’ मनाने की शुरुआत एफएओ द्वारा साल 2001 में की गई थी, ताकि दूध को वैश्विक खाद्य का दर्जा दिलाया जा सके.

नवजात के लिए दूध को सर्वोत्तम आहार माना गया है, क्योंकि दूध में वे सब पोषक तत्त्व मौजूद हैं, जो किसी भी नवजात के पोषण के लिए जरूरी होते हैं.

नवजात ही नहीं, बल्कि सभी आयु वर्ग के लोगों को दूध का उपयोग करते रहना चाहिए, क्योंकि दूध के अंदर 33 प्रकार के पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, जो मानव शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं.

वर्तमान में हमारे देश में दूध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 394 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से भी ज्यादा है. भारत का दुग्ध उत्पादन में दुनिया में पहला नंबर है और 20वीं पशु गणना के मुताबिक हमारे देश में साल 2018-19 में दूध का कुल उत्पादन 18.775 करोड़ टन रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 6.5 फीसदी ज्यादा है.

विदेशी व संकर नस्ल की गायों का औसत उत्पादन 7.95 किलोग्राम प्रतिदिन और देशी व अवर्गीकृत गायों का औसत उत्पादन 3.01 किलोग्राम प्रतिदिन रहा, जो पिछले साल की अपेक्षा क्रमश: 8.7 फीसदी और 5.7 फीसदी ज्यादा है.

दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित) और गुजरात टौप 5 में हैं और भारत के कुल दूध उत्पादन का 53.1 फीसदी ये 5 राज्य ही पैदा करते हैं.

दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान, मेरठ के वैज्ञानिक लगातार नई खोज कर रहे हैं और प्रसार गतिविधियों द्वारा उन को किसानों तक पहुंचा रहे हैं. इसी सिलसिले में सीआईआरसी गौधनवाणी नाम के 10 ह्वाट्सएप ग्रुप बनाए हुए हैं.

इन ग्रुप में पशुपालन से संबंधित नवीनतम जानकारियां रोजाना भेजी जाती हैं. इन ग्रुप का सदस्य बनने के लिए सदस्य बनना चाहने वाले का नाम, ह्वाट्सएप नंबर और पता इस मोबाइल नंबर 9933221103 पर ह्वाट्सएप करना होता है.

‘विश्व दुग्ध दिवस’ पर किसान और पशुपालक भी बधाई के पात्र हैं, क्योंकि उन्हीं की कोशिशों से भारत दुनियाभर में दूध उत्पादन में नंबर एक पर है.

अभी भी हमारे देश की प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता दुनिया के आंकड़े से कम है, इसलिए हमें इस साल भी पशु की उत्पादकता और दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए कोशिश करते रहना है और इस काम में केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक आप के साथ हैं. आप अपनी पशुपालन से संबंधित समस्याओं के निवारण के लिए हमारे वैज्ञानिकों से कभी भी सलाह ले सकते हैं.

सालभर हरे चारे के लिए उत्तम है गिनी घास की खेती

पशुपालकों के लिए हरे चारे की उपलब्धता का संकट पशुपालन की कठिनाइयों के लिहाज से एक प्रमुख समस्या मानी जाती है, जबकि पशुओं के समुचित विकास और अधिक दुग्ध के लिए प्रचुर मात्रा वाले पोषक तत्व से युक्त हरा चारा खिलाना बेहद जरूरी होता है.

पशुपालकों के लिए साल के कुछ महीने ऐसे होते हैं, जिस में वह आसानी से हरे चारे की उपलब्धता कर लेता है. लेकिन गरमियों के महीनों में अधिक पानी व सिंचाई के अभाव में पशुओं के लिए आवश्यक मात्रा में हरा चारा उगा पाना कठिनाई भरा होता है. इन परिस्थियों में पशुपालकों को हरे चारे के संकट से उबारने में बहुवर्षीय चारे की प्रजातियां बेहद फायदेमंद साबित होती हैं.

बहुवर्षीय हरे चारे में से एक गिनी घास की खेती इस लिहाज से फायदेमंद साबित होती है. हरे चारे के इस बहुवर्षीय फसल में पानी और सिंचाई की आवश्यकता दूसरे चारे की फसलों की अपेक्षा कम होती है. इस की फसल कम नमी की अवस्था में भी बड़ी तेजी से वृद्धि करती है.

गिनी घास में उपलब्ध पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा और उस का स्वाद दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाने में कारगर साबित होता है. गिनी घास की खेती आसान तरीकों से की जा सकती है. इस के लिए दोमट या बलुई दोमट उपयुक्त होती है, जिस में जलनिकासी की उचित व्यवस्था होना जरूरी है.

गिनी घास की फसल के लिए अम्लीय व क्षारीय मिट्टी उपयुक्त नहीं होती है. गिनी घास की फसल को छायादार स्थानों, मेंड़ों, नहरों के किनारे पर भी आसानी से उगाया जा सकता है.

गिनी घास की फसल लेने के लिए इस की बोआई सीधे बीज द्वारा, तने की कटिंग द्वारा या जड़ों की रोपाई कर की जा सकती है.

पोषक तत्वों की उपलब्धता

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, गिनी घास में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्वों की उपलब्धता पाई जाती है. इस में रेशा 28.36 फीसदी, प्रोटीन 6.10 फीसदी, फास्फोरस 0.29 फीसदी, कैल्शियम 0.29 फीसदी, मैग्नीशियम 0.38 फीसदी व पत्तों की पाचन क्षमता 55.58 फीसदी की मात्रा उपलब्ध होती है, जो पशुओं के विकास व दुधारू पशओं में दूध बढ़ाने में सहायक होती है.

नर्सरी तैयार करना

गिनी घास की रोपाई जड़ों से करना ज्यादा उपयुक्त होता है, क्योंकि इस से पौधे से पौधे की दूरी व लाइन से लाइन की दूरी का निर्धारण आसानी से किया जा सकता है. जड़ों से रोपाई के लिए सब से पहले इस की नर्सरी तैयार करें. एक हेक्टेयर खेत में जड़ों की रोपाई के लिए 3.4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता नर्सरी डालने के लिए होती है.

नर्सरी डालने का सब से उपयुक्त समय अप्रैलमई माह का होता है. इस के लिए 6 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़ी 10-20 क्यारियां बनानी पड़ती हैं. इन क्यारियों में बीज डालने के पहले गोबर की कंपोस्ट खाद मिलाना नर्सरी उठने में सहायक होता है. नर्सरी में बीज डालने के उपरांत नर्सरी की फव्वारे से सिंचाई करते रहें.

बोआई का उचित समय

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह बताते हैं कि गिनी घास चारे की ऐसी फसल है, जिसे वर्षभर में कभी भी बोया या रोपा जा सकता है. फिर भी सर्दी के मौसम में गिनी घास की रोपाई करने से बचना चाहिए. गिनी घास की रोपाई का सब से उपयुक्त समय वर्षा ऋतु का होता है.
गिनी घास की बोआई या रोपाई के पहले खेत की एक जुताई रोटावेटर या हैरो से करने के पश्चात दूसरी जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए.

अगर फसल की बोआई बीज से की जा रही है, तो बीज को एक से डेढ़ सैंटीमीटर गहराई में डालें. तने की कटिंग की रोपाई की दशा में कटिंग कम से कम 3 माह पुराना होना जरूरी है.

कटिंग के समय यह ध्यान दें कि जमीन के भीतर आधे से अधिक गाड़ देना चाहिए. खेत में रोपी गई इस कटिंग में जो गांठ जमीन के अंदर होती है, उसी से जड़ें निकलती हैं, जबकि ऊपरी गांठ से तना निकलता है.

गिनी घास की रोपाई करते समय पौध से पौध की दूरी 50 सैंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 100 सैंटीमीटर रखना न भूलें.

अगर इसे अन्य फसलों के साथ रोपा जा रहा है, तो यह दूरी और बढ़ा देनी चाहिए. यह दूरी 100 से 250 सैंटीमीटर तक हो जाती है. दूसरी फसलों के साथ लेने की अवस्था में इसे बोई गई फसल के 2 लाइनों के बीच में बोया जाता है. एक हेक्टेयर खेत के लिए गिनी घास की 40,000 से 50,000 जड़ों की जरूरत पड़ती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियां

गिनी घास की प्रजातियां, जो ज्यादा प्रचलित हैं, उन में कोयंबदूर- 1, कोयंबदूर- 2, डीजीजी-1, बुंदेल गिनी-1, बुंदेल गिनी-2, बुंदेल गिनी- 4, मकौनी, गटन, पीजीजी-1, पीजीजी-9 पीजीजी-14, पीजीजी-19, पीजीजी-101 व हेमिल प्रमुख हैं.

खाद एवं उर्वरक

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, हरे चारे की फसल के लिए गोबर की सड़ी खाद, कंपोस्ट खाद या केंचुआ खाद ज्यादा फायदेमंद होती है. अधिक चारा उत्पादन के लिए बोआई के पहले ही 200 से 250 क्विंटल तक गोबर की सड़ी खाद का उपयोग एक हेक्टेयर खेत के लिए करें.

जब जड़ों की रोपाई खेत में की जा रही हो, तब 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश की मात्रा का उपयोग प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों की जड़ों को देना चाहिए. इस के उपरांत प्रति हेक्टेयर की दर से हर कटाई के बाद 40 किलोग्राम नाइट्रोजन व 10 किलोग्राम फास्फोरस की मात्रा फसल को देनी चाहिए.

सिंचाई

गिनी घास की जड़ों की रोपाई खेत में करने के तुरंत बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद बारिश न होने की अवस्था में 10-15 दिन के अंतराल पर नियमित सिंचाई करते रहें. फसल में उग आए अनावश्यक खरपतवार को समयसमय पर निकालते रहना जरूरी है.

कटाई व उत्पादन

गिनी घास की पहली कटाई फसल रोपे जाने के 2 से 3 तीन माह बाद से शुरू किया जाता है. इस के बाद की नियमित कटाई 30-45 दिन के अंतराल पर की जा सकती है या फसल की लंबाई लगभग 5 फुट के करीब हो जाए तो भी फसल को जमीन से 15 सैंटीमीटर के ऊपर से काटा जा सकता है. सर्दियों की पहली कटाई जमीन से सटा कर करनी चाहिए. इस से फसल में खराब तने अपनेआप हट जाते हैं.

गिनी घास की फसल उत्तर व मध्य भारत के लिहाज से वर्षभर में 5-7 बार व दक्षिण भारत में पूरे वर्ष ली जा सकती है तो 7-8 बार तक हो सकती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियों की फसल लेने की दशा में औसत उत्पादन 200 से 250 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टेयर प्रति कटाई प्राप्त होता है. इस प्रकार वर्ष का औसत उत्पादन 1,200 से 1,300 क्विंटल तक प्राप्त हो सकता है.

गिनी घास की खेती के बारे में अधिक जानकारी व बीज के लिए भारतीय घास और चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई) (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), ग्वालियर रोड, झांसी – 284003 (उत्तर प्रदेश) से संपर्क किया जा सकता है.