सिवनी: केंद्रीय इस्पात एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने पौलीटैक्निक मैदान में आयोजित हुए कृषि सह अन्न मेले को संबोधित कर कहा कि कृषि लागत में कमी और आम लोगों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से देश में प्राकृतिक खेती के माध्यम से मोटे अनाज के उत्पादन को बढावा देने का काम सरकार द्वारा किया जा रहा है. देश में अन्नदाताओं की आय को बढाने को ले कर विभिन्न प्रयास लगातार जारी हैं.
मोटे अनाज की खेती, महिलाएं बनेंगी लखपति
उन्होंने कहा कि पुराने समय से प्राकृतिक खेती की पद्धति अपनाई जाती रही है और मोटे अनाज स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक है.
उन्होंने कहा कि किसान की आय में वृद्धि के लिए सरकार मोटे अनाज ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, रागी, चीना सहित मोटे अनाज को प्रोत्साहित किया जा रहा है.
उन्होंने बताया कि इस काम में विशेष रूप से महिलाओं को जोड़ कर उन्हें लखपति बनाने के उद्देश्य से सरकार काम कर रही है.
सारस पोर्टल से ट्रेनिंग
उन्होंने बताया कि सारस पोर्टल के द्वारा अन्न के उत्पादन में लगे किसानों को पैकेजिंग, ब्रांडिंग आदि की ट्रेनिंग भी सरकार द्वारा दी जा रही है.
उन्नत तकनीकों की प्रदर्शनी
केंद्रीय राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने अन्न मेले में उपस्थित किसानों से मेले में उपस्थित कृषि वैज्ञानिकों को एवं उन्नत कृषि तकनीकी को प्रदर्शित करती प्रदर्शनी से जानकारी प्राप्त करने की अपील करते हुए कहा कि अन्न मेले में शामिल हुए सभी किसान कृषि वैज्ञानिकों से उन्नत कृषि तकनीकी एवं बीजों की जानकारी अनिवार्य रूप से प्राप्त करें और उन्नत कृषि उपकरणों की प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए आवश्यकतानुसार नवीन तकनीक को अपनाएं.
अधिक कृषि रसायन नुकसानदायक, प्राकृतिक खेती को दें बढ़ावा
कार्यक्रम को संबोधित कर सांसद डा. ढालसिंह बिसेन ने कहा कि अधिक उत्पादन के लालच में हम ने विदेशी बीजों को अपना कर अनेक बीमारियों को जन्म दिया है और अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करने से हमारी जमीन बंजर हो गई है और उत्पादित फसलों में भी पोषक तत्वों की कमी आई है.
उन्होंने आगे यह भी कहा कि आज हमें प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जिस से कम लागत में पोषक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी.
विधायक दिनेश राय ने किसानों से जैविक कृषि अपना कर उन्नत कृषि उपकरणों, बीजों एवं तकनीक को अपनाने की बात कही.
मृदा स्वास्थ्य कार्ड से फायदा
उन्होंने कहा कि प्रत्येक किसान अपनी कृषि भूमि का मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाए, ताकि कमी वाले पोषक तत्वों को ध्यान में रख कर खाद एवं बीज का उपयोग किया जा सके. इसी तरह आलोक दुबे ने अपने उद्बोधन में शासन द्वारा संचालित की जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी.
कलक्टर क्षितिज सिंघल द्वारा मेले में उपस्थित किसानों को अन्न मेले के उद्देश्यों के बारे में जानकारी देने के साथसाथ सभी से उन्नत कृषि तकनीकी एवं खाद्य प्रसंस्करण के बारे में जानकारी ले कर तकनीकों को अपनाने की अपील की गई.
कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष मालती डहेरिया, जनपद अध्यक्ष सिवनी किरण भलावी, जनपद अध्यक्ष लोचन सिंह मरावी के साथ ही अन्य जनप्रतिनिधियों एवं विभागीय अधिकारियों एवं बडी संख्या में किसानों की उपस्थिति रही.
आयोजित मेले में कृषि विभाग के साथसाथ उद्यानिकी, कृषि विज्ञान केंद्र, पशुपालन विभाग, मत्स्य, आजीविका मिशन, आयुष, जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र के साथसाथ अन्य विभागों द्वारा स्टाल के माध्यम से विभागीय योजनाओं की जानकारी दी गई.
मेले में विशेष रूप से अन्न फसलों के उत्पादों जैसे कोदो, कुटकी के बिसकुट, कुकीज एवं प्राकृतिक खेती के उत्पादों के साथ छिंदवाड़ा, मंडला के किसान उत्पादक संगठनों ने अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया. इस के साथसाथ सिवनी के प्रगतिशील किसानों द्वारा जीराशंकर चांवल एवं प्राकृतिक खेती के उत्पाद, नरसिंहपुर जिले के गुड़ एवं तुअर की दाल के साथसाथ अन्य जिलों के विभिन्न उत्पादकों द्वारा अपने उत्पाद का प्रदर्शन किया गया.
जयपुर: प्रमुख शासन सचिव, कृषि एवं उद्यानिकी वैभव गालरिया की अध्यक्षता में पंत कृषि भवन में प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) की बैठक राज्य के प्रमुख बैंकों के स्टेट हैड के साथ आयोजित की गई.
प्रमुख शासन सचिव द्वारा बैंक अधिकारियों को इस योजना के प्रति संवेदनशील रहते हुए योजना के लक्ष्य अर्जित करने के लिए निर्देशित किया गया. उन्होंने बताया कि योजना का उद्देश्य खाद्य से संबंधित योजना में अनुदान प्रदान कर इकाइयों को बढ़ावा देना है.
उल्लेखनीय है कि आटा मिल, दाल मिल, प्रोसैसिंग यूनिट, ग्रेडिंग क्लिनिंग यूनिट, अचार व पापड़ के उद्योग, दूध व खाद्य पदार्थों से संबंधित इकाइयों के लिए इस योजना में अनुदान दिया जा रहा है.
प्रमुख शासन सचिव ने योजना की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि बैंकों द्वारा छोटे व मंझले खाद्य प्रसंस्करण उद्यमियों को अधिक से अधिक किस प्रकार लाभान्वित करवाया जा सकता है. इस योजना में नई व पुरानी खाद्य इकाइयों को स्थापित करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार द्वारा 35 फीसदी या अधिकतम 10 लाख रुपए तक का अनुदान दिया जा रहा है. इस योजना के तहत विभिन्न बैंकों की ओर से खाद्य इकाई लगाने पर 90 फीसदी तक की ऋण सहायता दी जा रही है.
उन्होंने आगे यह भी कहा कि राज्य में योजना को जनजन तक पहुंचाने एवं आवेदकों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर 9829026990 काम कर रहा है. योजना में आवेदनों की संख्या बढ़ाने की दृष्टि से रोलिंग प्रक्रिया के द्वारा अधिक से अधिक डिस्टिक रिसोर्स पर्सन सूचीबद्ध किए जा रहे हैं. सामान्य प्रक्रिया के तहत डिस्टिक रिसोर्स पर्सन के लिए आवेदनपत्र पीएमएफएमई राजस्थान पोर्टल पर उपलब्ध है.
राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड के जनरल मैनेजर आशु चैधरी ने बताया कि इस योजना का संचालन विपणन बोर्ड द्वारा विगत 3 सालों से किया जा रहा है, जिस में भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा सम्मिलित रूप से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने के लिए अनुदान दिया जा रहा है.
इस के लिए राज्य में एक प्रबंध यूनिट का संचालन भी किया जा रहा है. यह यूनिट इकाई को मशीन, आवेदन, ब्रांडिंग व मार्केटिंग में भी सहयोग करती है. इस योजना में आवेदन पूरी तरह से निःशुल्क है और डिस्टिक रिसोर्स पर्सन को 20,000 रुपए की राशि का भुगतान भी राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड द्वारा किया जाता है.
उदयपुर: 27 फरवरी, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संघटक मात्स्यकी महाविद्यालय में 3 दिवसीय मूल्य संवर्धित उत्पाद पर प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ. कार्यक्रम में डाया, बांध उदयपुर सहकारी समिति के 60 महिला एवं पुरुष प्रशिक्षणार्थियों ने हिस्सा लिया.
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए डा. आरए कौशिक ने मूल्य संवर्धित उत्पादों से किसानों की आय को 3 से 4 गुना बढ़ाने एवं सामाजिक स्तर को सुधारने के साथसाथ सीताफल प्रसंस्करण से दूसरे समूहों की सफलता की कहानी से प्रशिक्षणाथियों को सीखने एवं मत्स्य सहउत्पादों को तैयार कर जीवनस्तर सुधारने का आह्वान किया.
उन्होंने अपने संबोधन में प्रशिक्षणार्थियों को बतलाया कि इस प्रशिक्षण से उन्हें एक नए व्यवसाय के रूप में पूरी जानकारी दी जाएगी, जिस से किसानों को अपनी आमदनी को बढ़ाने में सहायता मिलेगी.
विशिष्ट अतिथि के रूप में मात्स्यकी महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डा. बीके शर्मा ने प्रशिक्षणार्थियों को विभिन्न प्रकार के मत्स्य सहउत्पाद जैसे मछली का अचार, पकोड़े, कटलेट, नमकीन, फाफड़े आदि कैसे बनाएगे, इस बारे में किसानों को अवगत कराया.
साथ ही, इस से नए व्यवसाय को कैसे शुरू कर सकते हैं, के बारे मे भी जानकारी दी और उन से होने वाली आय एवं इन को तैयार कर बाजार में भेजने के लिए तैयार करने के साथसाथ अपनी आय को बढ़ाने एवं आर्थिक रूप से सामाजिक स्तर को सुधारने पर जोर दिया.
डा. बीके शर्मा ने यह जानकारी भी प्रशिक्षणार्थियों के साथ साझा की कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम आईसीएआर के केंद्रीय मात्स्यकी प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआईएफटी) द्वारा प्रायोजित किया गया.
इस प्रशिक्षण को आयोजित करने के लिए मात्स्यकी महाविद्यालय में सीआईएफटी के द्वारा एक छोटी प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की गई, जो यहां के आदिवासी बहुल क्षेत्र के किसानों के लिए बहुत ही उपयोगी एवं सार्थक सिद्ध होगी. डा. बीके शर्मा ने निदेशक, सीआईएफटी को इकाई स्थापित करने के लिए महाविद्यालय परिवार की तरफ से आभार व्यक्त किया.
डा. आशीष झा, प्रमुख वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान-सीआईएफटी ने प्रशिक्षणार्थियों को बताया कि हम मछली से अनेक प्रकार के उत्पाद एवं सहउत्पाद बना कर एक अच्छा व्यवसाय शुरू कर अपने जीवनस्तर को सुधार कर समाज के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं.
उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों को सीआईएफटी द्वारा इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए प्रशिक्षण एवं संसाधन उपलब्ध कराना एवं हर समय उन के लिए तैयार रहने का आश्वासन दिया.
डा. आशीष झा ने गुजरात राज्य द्वारा समुद्री उत्पाद को विदेशों में निर्यात कर करोड़ों रुपए की आय अर्जित करने का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि अगर गुजरात से इस तरह का निर्यात कर सकते हैं, तो राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में दूरदराज के किसान स्वयं सहायता समूह बना कर इस व्यवसाय को भी कर सकते हैं.
महाविद्यालय के सहआचार्य डा. एमएल ओझा ने इस प्रशिक्षण में भाग लेने वाले किसानों को राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी एवं प्रोजैक्ट के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की और साथ ही कैसे उस से लाभान्वित हो सकेंगे, इस के बारे में बताया.
भोजन अवकाश के उपरांत प्रशिक्षणार्थियों ने प्रायोगिक कार्य में बढ़चढ़ कर भाग लिया एवं विभिन्न प्रकार की मछलियों एवं उन की साफसफाई और उन से बनने वाले सहउत्पादों की रुचि ले कर अपने जानकारी को बढ़ाया.
नई दिल्ली: वर्ष 1987-88 में 0.6 बिलियन अमेरिकी डालर के सालाना निर्यात की मामूली शुरुआत से कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) के सक्रिय सहयोग द्वारा वित्तीय वर्ष 2022-23 में कृषि निर्यात (Agricultural Exports) में 26.7 बिलियन अमेरिकी डालर की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इस वृद्धि की यात्रा को 200 से अधिक देशों में निर्यात के विस्तार द्वारा रेखांकित किया गया है, यह 12 फीसदी की सराहनीय चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) को दर्शाता है.
वर्ष 2022-23 की अवधि में भारत का कृषि निर्यात 53.1 बिलियन अमरीकी डालर तक पहुंच गया. भारत के इस कृषि निर्यात में एपीईडीए का योगदान 51 फीसदी रहा. अप्रैलदिसंबर, 2023 की अवधि में एपीईडीए के निर्यात समूह में 23 प्रमुख वस्तुओं में से 18 ने सकारात्मक वृद्धि का प्रदर्शन किया.
विशेष रूप से 15 बड़ी प्रमुख वस्तुओं में से 13, जिन का निर्यात पिछले वर्ष 100 मिलियन अमेरिकी डालर से अधिक था, इन्होंने 12 फीसदी की औसत वृद्धि दर के साथ सकारात्मक वृद्धि की. वहीं ताजा फलों ने 29 फीसदी की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज करते हुए उत्कृष्टता प्राप्त की.
इस के अलावा इस अवधि में प्रसंस्कृत सब्जियों के निर्यात में 24 फीसदी की वृद्धि हुई. इस के बाद विविध प्रसंस्कृत वस्तुओं, बासमती चावल और ताजी सब्जियों के निर्यात में भी पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में पर्याप्त वृद्धि हुई. ताजा फलों के निर्यात में भारत ने उल्लेखनीय रूप से वृद्धि की. यह पिछले वर्ष के 102 गंतव्य देशों की तुलना में आज 111 देशों को अपनी सेवाएं दे रहा है.
एपीईडीए ने 13 फरवरी, 2024 को अपने 38वें स्थापना दिवस के अवसर पर कृषि निर्यात के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अद्वितीय वृद्धि और प्रगति का उत्सव मनाया. कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य के साथ वर्ष 1986 में स्थापित एपीईडीए भारत के कृषि निर्यात को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर कर आया है.
अप्रैलनवंबर 2023 के दौरान कई प्रमुख वस्तुओं में पिछले वर्ष की तुलना में पर्याप्त वृद्धि देखी गई, जैसे केले में 63 फीसदी, दालें (सूखे और छिलके वाले) में 110 फीसदी, ताजे अंडे में 160 फीसदी और केसर व दशहरी आम में क्रमशः 120 फीसदी और 140 फीसदी रहा.
अप्रैल से दिसंबर, 2023 की अवधि के दौरान बासमती चावल के निर्यात मूल्य में 19 फीसदी की वृद्धि देखी गई, जो पिछले वर्ष के 3.33 बिलियन अमेरिकी डालर की तुलना में 3.97 बिलियन अमेरिकी डालर तक पहुंच गया. साथ ही, निर्यात की मात्रा में 11 फीसदी की उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जो समान समयसीमा में 31.98 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर 35.43 लाख मीट्रिक टन हो गई.
बासमती चावल ने शीर्ष बाजारों तक अपनी पहुंच बना ली है. ईरान, इराक, सऊदी अरब, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात इन निर्यातों के लिए शीर्ष 5 गंतव्यों के रूप में उभर कर आए हैं.
निर्यात का यह दमदार प्रदर्शन बासमती चावल की स्थायी लोकप्रियता और वैश्विक मांग की पुष्टि करता है, जिस से भारत के निर्यात क्षेत्र में एक प्रमुख कृषि उत्पाद के रूप में इस की स्थिति और अधिक मजबूत हो गई है.
नई दिल्ली: स्टार्टअप फोरम फौर एस्पायरिंग लीडर्स एंड मेंटर्स (सुफलम) 2024 का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि खाद्य प्रसंस्करण के विभिन्न पहलुओं में नवाचार, सहयोग और उन्नत प्रौद्योगिकियां खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में स्टार्टअप को स्थापित खाद्य व्यवसायों में बदलने में प्रमुख प्रेरक की भूमिका निभाती हैं.
13 फरवरी और 14 फरवरी को नई दिल्ली में आयोजित इस दोदिवसीय कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री पशुपति कुमार पारस ने कृषि एवं किसान कल्याण एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री शोभा करंदलाजे, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय में सचिव अनीता प्रवीण, कुंडली स्थित एनआईएफटीईएम के निदेशक डा. हरिंदर ओबेराय और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय में अपर सचिव मिन्हाज आलम की गरिमामयी उपस्थिति में किया.
इस आयोजन में 250 से अधिक हितधारकों की भागीदारी देखी गई, जिस में स्टार्टअप, खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी, एमएसएमई व वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधि, उद्यम पूंजीपति और शिक्षाविद शामिल थे.
2 दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में 3 ज्ञान सत्र, 2 पिचिंग सत्र, 2 पैनल चर्चा, नैटवर्किंग सत्र और एक प्रदर्शनी शामिल थी. स्टार्टअप सिंहावलोकन एवं लाभों से जुड़े ज्ञान सत्र के दौरान प्रतिभागियों को स्टार्टअप इंडिया की भूमिका, स्टार्टअप इंडिया के तहत मैंटरशिप एवं नवाचारों से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों और इस पहल द्वारा देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम को बढ़ावा देने में मदद करने के बारे में बताया गया.
खाद्य विनियमों से जुड़े अन्य ज्ञान सत्र के दौरान प्रतिभागियों को एफएसएसएआई एवं ईआईसी नियमों के अनुसार, विभिन्न खाद्य उत्पादों के घरेलू उपयोग, आयात और निर्यात में विभिन्न नियमों, प्रमाणपत्रों और अनुपालनों के बारे में उचित जानकारी दी गई. ताजा और प्रोसैस्ड खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एपीडा के तहत विभिन्न योजनाओं के बारे में नई जानकारी स्टार्टअप के लिए व्यवसाय और वित्तीय मौडलिंग थी, जिस में व्यवहार्यता और स्थिरता दिखाने वाली व्यवसाय योजना की तैयारी और किसी भी व्यवसाय की वित्तीय योजना में मुक्त नकदी प्रवाह के महत्व एवं उचित नकदी प्रवाह प्रबंधन पर स्टार्टअप को विभिन्न सुझाव दिए गए.
खाद्य प्रणालियों को बदलने से जुड़ी पैनल चर्चा कच्चे माल के विविधीकरण, शैवाल एवं मिलेट्स जैसे जलवायु अनुकूल विकल्पों और उद्यमिता में रचनात्मकता पर केंद्रित थी. खाद्य सुरक्षा मानकों को पूरा करने एवं आपूर्ति श्रंखलाओं को अनुकूलित करने के लिए प्रोसैसिंग मशीनरी, कच्चे माल और नवीन कृषि तकनीकी उपायों की डिजाइनिंग पर प्रकाश डाला गया. कच्चे माल की सोर्सिंग में हस्तक्षेप, प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों और टिकाऊ पैकेजिंग में अवसरों की खोज और निरंतर नवाचारों के लिए सहयोग पर भी चर्चा की गई.
फूड प्रोसैसिंग से जुड़े उद्यमियों के लिए स्टार्टअप कौन्क्लेव पर सत्र के दौरान खाद्य नवाचार केंद्र के रूप में भारत की क्षमता, उद्योग, स्टार्टअप और संस्थानों के बीच तालमेल की जरूरत पर बल देते हुए चर्चा की गई. मुख्य चर्चाएं उपभोक्ता प्राथमिकताओं और अनुपालन मानकों के अनुरूप टिकाऊ पैकेजिंग के महत्व पर केंद्रित थीं. स्टार्टअप से गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की सोर्सिंग, किसानों के साथ सहयोग करने और प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों और किफायती पोषण आधारित उत्पादों में उद्यम करने में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया गया. यह सत्र निरंतर नवाचार के लिए सभी क्षेत्रों में विशेष रूप से क्रेडिट नवाचार और क्रौस उद्योग साझेदारी के माध्यम से सहयोग पर जोर देने के साथ संपन्न हुआ.
दोनों ही दिन निर्धारित 2 पिचिंग सत्रों में 12 चयनित स्टार्टअप ने खाद्य प्रौद्योगिकीविदों, एसबीआई और एचडीएफसी बैंक के शीर्ष बैंकिंग अधिकारियों, वीसी, एनआईएफटीएम के संकाय और उद्योग पेशेवरों के एक पैनल के सामने अपने विचार पेश किए. 6 स्टार्टअप को उत्पाद परिशोधन, बाजार लिंकेज के साथसाथ निवेशक जुड़ाव के बारे में सलाह एवं सहायता की पेशकश की गई.
पैनलिस्टों ने इस पहल का स्वागत किया और उभरते छोटे उद्यमों को मार्गदर्शन एवं मार्गदर्शन के लिए भविष्य में ऐसे प्रयासों के लिए समर्थन की पेशकश की. इस दोदिवसीय कार्यक्रम के दौरान 26 स्टार्टअप, 9 पीएमएफएमई लाभार्थियों और 3 सरकारी एजेंसियों सहित कुल 38 प्रदर्शकों ने अपने उत्पादों, योजनाओं और प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया. इस के अलावा स्टार्टअप और उद्योग के बीच अलगअलग नैटवर्किंग सत्र भी हुए, जहां स्टार्टअप को मदद और तकनीकी सहायता देने पर चर्चा हुई.
‘सुफलम 2024’ ने परिवर्तनकारी चर्चाओं के एक उत्प्रेरक के रूप में काम किया है और इन चर्चाओं ने नवाचार संचालित विकास की दिशा में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का मार्ग प्रशस्त किया है और स्टार्टअप, उद्योग और शिक्षाविदों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया है.
मिर्जापुर: पूर्वी उत्तर प्रदेश, जिसे पूर्वांचल भी कहा जाता है, से कृषि और प्रोसैस्ड फूड प्रोडक्ट्स की निर्यात क्षमता का लाभ उठाने के लिए एपीडा यानी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ने 14 फरवरी, 2024 को मिर्जापुर में ‘कृषि निर्यात: क्षमता निर्माण और क्रेताविक्रेता बैठक‘ का आयोजन किया.
इस कार्यक्रम में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल मुख्य अतिथि रहीं. राज्यसभा सांसद राम शकल की अगुआई में कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, निर्यातक संघों के प्रतिनिधि, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), हितधारकों और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई. इस कार्यक्रम को किसानों से बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली और 1500 से अधिक किसानों ने कार्यक्रम में भाग लिया.
अपने मुख्य भाषण में अनुप्रिया पटेल ने कृषि निर्यात बढ़ाने के महत्व पर जोर देते हुए न केवल देश की विदेशी मुद्रा में योगदान देने की उन की क्षमता पर प्रकाश डाला, बल्कि रोजगार के मामले में सब से बड़ा क्षेत्र होने के नाते किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि की भी चर्चा की.
उन्होंने भारत सरकार की विभिन्न योजनाओं का हवाला देते हुए किसानों की आय बढ़ाने में भारत सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई और वैश्विक बाजारों तक उन की पहुंच को सुविधाजनक बनाने के लिए वाणिज्य विभाग के संकल्प को रेखांकित किया.
उन्होंने बागबानी, मसालों और समुद्री उत्पादों जैसे विभिन्न कृषि क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास पर सरकार के फोकस को भी रेखांकित किया. उन्होंने ऐसी ही एक आगामी महत्वपूर्ण परियोजना, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में चुनार उपमंडल में बनने वाली ‘सरदार वल्लभभाई पटेल निर्यात सुविधा केंद्र‘ पर प्रकाश डाला, जो निकट अवधि में पूरा होने पर इस क्षेत्र से कृषि निर्यात को काफी बढ़ावा देगा, जिस से पूर्वांचल देश का एक कृषि निर्यात हब बन जाएगा.
एपीडा के अध्यक्ष अभिषेक देव ने बाजार संबंधों पर ध्यान केंद्रित कर के और निर्यात बुनियादी ढांचे को बढ़ा कर एफपीओ और किसानों के लिए निर्यात के अवसरों को बढ़ाने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता व्यक्त की.
उन्होंने आगे बताया कि एपीडा, जिस ने 13 फरवरी, 2024 को अपना 38वां स्थापना दिवस मनाया, कृषि निर्यात मूल्य श्रंखला में सभी हितधारकों, विशेषकर किसानों को उभरते बाजार के अवसरों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और जोखिम प्रदान कर के उन की आय बढ़ाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. उन्होंने दोहराया कि एपीडा सभी हितधारकों के लाभ के लिए निकट भविष्य में भी ऐसे आयोजन करना जारी रखेगा.
‘सरदार वल्लभभाई पटेल निर्यात सुविधा केंद्र‘ कृषि और इस से जुड़े क्षेत्र के निर्यात को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है. इस नए विकासशील बुनियादी ढांचे की कल्पना एफपीओ, किसानों, निर्यातकों और अन्य हितधारकों की जरूरतों को पूरा करने वाली एक व्यापक सिंगल विंडो सिस्टम के रूप में की गई है. मिर्जापुर जिले के चुनार उपमंडल में 5 एकड़ क्षेत्र में फैली इस परियोजना में सभी आवश्यक सुविधाओं के साथ एक आधुनिक पैकहाउस की भी सुविधा है. इस के अलावा परियोजना में एक प्रशिक्षण सुविधा भी है, जिस से क्षेत्र के सभी किसानों और एफपीओ और एफपीसी को लाभ होगा.
अंत में इस परियोजना में प्रमुख निर्यात उन्मुख सरकारी निकायों जैसे एमपीईडीए, मसाला बोर्ड, आईआईपी, ईआईसी के कार्यालय भी होंगे, जो क्षेत्र के कृषि निर्यात ईकोसिस्टम के लिए सेवाएं देंगे.
एपीडा के प्रयासों के साथ अब पूर्वांचल क्षेत्र के वाराणसी हवाईअड्डे पर कोल्डरूम, क्वारंटीन और कस्टम क्लीयरेंस सेवाओं और कृषि एयर कार्गो के लिए हवाईअड्डे की सक्रियता जैसी महत्वपूर्ण निर्यात सुविधाएं भी उपलब्ध हैं, जिन में से सभी में वर्ष 2019 से पहले कुछ न कुछ कमी थी.
वाराणसी हवाईअड्डे द्वारा दिसंबर, 2023 तक 702 मीट्रिक टन जल्दी खराब होने वाले माल की हैंडलिंग हुई, जो पिछले साल के 561 मीट्रिक टन के आंकड़े के मुकाबले काफी ज्यादा रही और वास्तव में यह क्षेत्र की कृषि निर्यात क्षमताओं में उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है. एपीडा ने पूरे भारत से अग्रणी खरीदारों को आमंत्रित करने, एफपीओ और किसानों को सीधे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने के लिए क्रेताविक्रेता बैठकें आयोजित करने में भी मदद की.
इस बात पर जोर दिया जा सकता है कि एपीडा की पहल ने उत्तर प्रदेश को वित्त वर्ष 2023-24 (23 अप्रैल से 23 नवंबर) में केवल गुजरात और महाराष्ट्र को पीछे छोड़ते हुए तीसरा सब से बड़ा निर्यातक राज्य बनने के लिए प्रेरित किया है.
एपीडा द्वारा गंगा क्षेत्र की क्षमता के सफल दोहन ने एफपीओ और निर्यातकों को क्षेत्र से कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सशक्त बनाया है. लगभग 50 एफपीओ को कृषि निर्यात के लिए निर्यातकों के रूप में बढ़ावा दिया गया है, जिन में से 20 से अधिक सक्रिय रूप से प्रत्यक्ष और डीम्ड निर्यात दोनों में लगे हुए हैं. हरी मिर्च, आम, टमाटर, भिंडी, आलू, सिंघाड़ा, क्रैनबेरी, केला, जिमीकंद, लौकी, परवल, अरवी, अदरक, ताजा गेंदा जैसे ताजे फल और सब्जियों और चावल सहित कृषि उत्पादों की एक बड़ी रेंज का निर्यात किया गया है, जो वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए क्षेत्र की क्षमता को रेखांकित करता है.
नई दिल्ली : 20 दिसंबर, 2023. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री और जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने पिछले दिनों नई दिल्ली में प्रेस वार्ता में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की जनहितकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि समग्र स्वास्थ्य सेवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी व कुशल नेतृत्व में सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शुमार है.
उन्होंने बताया कि देश में एम्स की संख्या बढ़ कर 23 हो गई है, जो कि मोदी सरकार के पूर्व सिर्फ 6 ही थी, वहीं आरोग्य मंदिर (स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों) की संख्या में भी काफी इजाफा हुआ है, जो अब करीब 1.63 लाख हो चुके हैं.
प्रेस वार्ता में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के साथ केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे और सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा व इंदुबाला गोस्वामी भी उपस्थित थीं.
अर्जुन मुंडा ने पीएम मोदी के ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज-किसी को पीछे न छोड़ने’ के दृष्टिकोण के साथ ही प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना से जनसामान्य को हो रहे स्वास्थ्य लाभों के बारे में बताया कि 23 सितंबर 2018 को रांची (झारखंड) से प्रारंभ यह लगभग 55 करोड़ लाभार्थियों को लक्षित करने वाला दुनिया का सब से बड़ा सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम है. आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में पात्र लोगों को प्रति वर्ष 5 लाख रुपए का बीमा कवर प्रदान करने का प्रावधान है.
केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन कार्यक्रम के शुभारंभ के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विशेष रूप से आदिवासी आबादी के बीच सिकल सेल रोग से उत्पन्न महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों का इस के माध्यम से निदान संभव होगा.
उन्होंने आगे कहा कि देश में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र ने पिछले 70 वर्षों की तुलना में पिछले साढ़े 9 वर्षों में अत्यधिक उपलब्धियां हासिल की हैं. हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन के तहत आयुष्मान भारत योजना, जिला स्तर पर आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं तैयार कर रही है, क्योंकि सरकार की मंशानुरूप नए भारत को फिट भारत बनाने के लिए एक स्वस्थ व्यक्ति, एक स्वस्थ परिवार और एक स्वस्थ समाज आवश्यक है. मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश में स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव की क्रांति देखी गई है, जिसका कारण सरकार की इच्छाशक्ति है. देश में पहली बार स्वास्थ्य को डेवलपमेंट के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है और आज देश में एक ऐसा माहौल बना है, जब हम “हेल्दी नेशन, वेल्दी नेशन” की बात को स्वीकार कर रहे हैं.
केंद्र के स्वास्थ्य बजट को देखें या फिर केंद्र द्वारा राज्यों को स्वास्थ्य सेवा के लिए दिए जा रहे बजट की आवंटित राशि को देखें, तो निश्चित ही काफी बदलाव दिखाई देगा. अब इतिहास का सब से बड़ा हेल्थ बजट आवंटित हो रहा है व साल दर साल यह बजट राशि अधिकाधिक बढ़ाई जा रही है.
मंत्री अर्जुन मुंडा ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गई विकसित भारत संकल्प यात्रा के माध्यम से भी स्वास्थ्य सेवाओं की योजनाओं से जनसामान्य को जोड़ कर लाभ पहुंचाया जा रहा है. प्रधानमंत्र मोदी की भारत को संपूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने की जो संकल्पना है, उसी दिशा में सरकार ने हेल्थ के सभी पहलुओं पर काम किया है. प्रत्येक जिले में एक मेडिकल कालेज के लक्ष्य के साथ पिछले 9 वर्षों में इन की संख्या 350 से बढ़ा कर 700 से ज्यादा की गई है. पिछले 9 वर्षों में एमबीबीएस सीटों की संख्या 52 हजार से बढ़ा कर 1 लाख, 8 हजार से अधिक की गई है. साथ ही, पीजी की सीटों की संख्या 32 हजार से बढ़ा कर 70 हजार से अधिक की गई है. देश में पिछले 9 वर्षों में 10 हजार से ज्यादा जन औषधि स्टोर खोले गए और अब इन की संख्या को 10,000 से बढ़ा कर 25,000 से अधिक किया जा रहा है.
मंत्री अर्जुन मुंडा ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन गरीबों तक दवाई पहुंचाई है, जो एक समय में दवाओं की पहुंच से बाहर थे. जन औषधि योजना के माध्यम से गरीबों को अभी तक 25,000 करोड़ से अधिक रुपए की बचत हो गई है. उन्होंने कहा कि पीएम के प्रयासों से देश में “स्वस्थ राष्ट्र, धनवान राष्ट्र” की व्यापक भावना बन चुकी है.
केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने आदिवासी क्षेत्रों में 360 डिगरी विकास लाने के लिए सरकार की एक विशाल पहल, प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान (पीएम जनमन) के बारे में भी जानकारी दी. पीएम जनमन मिशन का लक्ष्य विभिन्न मंत्रालयों/विभागों की योजनाओं के माध्यम से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के विकास का है.
उन्होंने बताया कि इस मिशन का वित्तीय परिव्यय लगभग 24,000 करोड़ रुपए और 9 प्रमुख मंत्रालयों से संबंधित 11 महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों पर केंद्रित है. जनजातीय स्वास्थ्य, पीएम जनमन के तहत प्रमुख फोकस क्षेत्रों में से एक है.
तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक बागबानी विज्ञान की एक उभरती हुई शाखा है, जो फल, सब्जी, फूल, मसाले की फसलें वगैरह बागबानी उत्पादन के बाद के प्रबंधन और प्रसंस्करण से संबंधित है.
तुड़ाईकटाई, छंटाई, ग्रेडिंग और कोल्ड स्टोरेज आदि ऐसे कारक हैं, जो न केवल आंतरिक व्यापार को प्रभावित करते हैं, बल्कि विदेशी व्यापार के निर्यात को भी प्रभावित करते हैं.
कटाई के बाद प्रबंधन की बहुत बड़ी गुंजाइश और जरूरत है, क्योंकि भारत चीन के बाद फलों और सब्जियों का दूसरा सब से बड़ा उत्पादक है.
फल और सब्जियां महत्त्वपूर्ण बागबानी फसलें भोजन और अनाज की तुलना में किसान की आमदनी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत साबित हो रही हैं.
हालांकि बागबानी के दृष्टिकोण से बागबानी फसलों का उत्पादन बहुत ज्यादा होता है, पर साथ ही भारत फल और सब्जियों की तुड़ाई के उपरांत समुचित प्रबंधन की व्यवस्था का न कर पाना उस के लिए बहुत क्षतिकारक हो जाता है.
उचित तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन की जानकारी की कमी के चलते कुल फसल नुकसान 25 फीसदी से ज्यादा हो जाता है.
बात करें दूसरे विकसित देशों के बारे में, तो वहां की तुलना में भारत में फल और सब्जियों का प्रसंस्करण का काम बहुत कम है. हालांकि फल और सब्जियों का यह विशाल उत्पादन व्यापार और निर्यात दोनों के बढ़ने का अवसर प्रदान करते हैं.
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के डाटाबेस के अनुसार, साल 2019-20 में भारत ने 5,638 करोड़ रुपए के 8.23 लाख मीट्रिक टन फलों का निर्यात किया है.
सब्जी की बात करें, तो यह मात्रा 31.92 लाख मीट्रिक टन रही. भारत से 5,679 करोड़ रुपए की सब्जियों का निर्यात हुआ है और इन के द्वारा हासिल विदेशी मुद्रा को उचित तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन की प्रक्रिया को अपना कर और भी बढ़ाया जा सकता है.
एपीडा का कहना है कि उस ने साल 2022 तक कृषि निर्यात को 40 बिलियन डौलर से बढ़ा कर 60 बिलियन डौलर तक ले जाने का टारगेट तय किया है, जो उचित तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन की प्रक्रिया को अपना कर ही मुमकिन हो सकता है.
भारत वैश्विक खाद्य उत्पादन के मामले में दूसरे नंबर पर है. देश में कुल उत्पादन के मुकाबले सिर्फ 10 फीसदी खानेपीने की प्रोसैसिंग हो पाती है. ऐसा इसलिए है कि देश में कोल्ड स्टोरेज की भारी कमी है.
सरकार की यह कोशिश देश को विदेशी मुद्रा जुटाने के साथ किसानों की आमदनी बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है.
इसी तरह प्रसंस्करण क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय खाद्य उद्योग का सब से बड़ा क्षेत्र है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भारत के कृषि निर्यात का 25 फीसदी हिस्सा है और हर साल तकरीबन 8 फीसदी की दर से बढ़ रहा है.
साल 2018-19 के अप्रैलनवंबर के दौरान प्रसंस्कृत खाद्य और दूसरे उत्पादों का कुल निर्यात तकरीबन 1,200 करोड़ रुपए था. सरकार खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को आगे बढ़ाने में मदद के लिए कोल्ड स्टोरेज चेन, आवागमन और मैगा फूड पार्कों की क्षमता बढ़ा रही है.
भारत ने साल 2022 तक कृषि निर्यात के मूल्य को बढ़ा कर 60 अरब डौलर करने का लक्ष्य रखा है, जो तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक नुकसान और वस्तुओं के अपव्यय को कम करने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के मुताबिक, गेहूं उत्पादन में भारत दुनिया का दूसरा सब से बड़ा उत्पादक बन गया है, लेकिन निर्यात के मामले में हम अभी 34वें नंबर पर हैं.
इसी तरह सब्जियों के उत्पादन में भारत दुनिया का तीसरा सब से बड़ा देश जरूर है, लेकिन निर्यात के मामले में 14वें नंबर पर हैं. बाजार की मांग और कीमत में उतारचढ़ाव के कारण बागबानी के साथसाथ अनाज की फसलों में भी निर्यात की भारी गुंजाइश दिखाई दे रही है.
तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन टैक्नोलौजी और प्रोसैसिंग सैक्टर का दायरा
कटाईतुड़ाई के बाद उपज का प्रबंधन करने के लिए तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक बहुत ही महत्त्वपूर्ण है.
आधुनिक जीवनशैली के हिसाब से आजकल उपभोक्ता के पास समय की कमी और सभी रेडीमेड बनी हुई चीजों का उपयोग करने का आदी हो गया है, जिस से और प्रोसैसिंग की हुई वस्तुओं की मांग बढ़ रही है और तैयार उत्पादों की मांग होने के कारण प्रसंस्करण क्षेत्र दिनप्रतिदिन बढ़ रहा है.
Food Processing
अब उपभोक्ता उच्च गुणवत्ता और सुरक्षित उत्पाद चाहता है, साथ ही कम खाना पकाने का समय, संसाधित रेडीमेड बनी हुई वस्तुओं जैसी सुविधाएं भी चाहता है. प्रसंस्करण उद्योग अब लगातार इस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं.
शोधकर्ता अब अधिक सुविधाजनक और सुरक्षित प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिस के परिणामस्वरूप बागबानी फसलों का बेहतर प्रबंधन हो रहा है. ताजा और प्रसंस्कृत उपज की जीवन क्षमता अब विभिन्न कोटिंग, वैक्सिंग और सुरक्षित भंडारण सुविधाओं को विकसित कर के बढ़ाया जा रहा है.
पोषण सुरक्षा एक बड़ी चुनौती
विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के संस्थान और विश्वविद्यालय इस पहलू पर काम कर रहे हैं. पोषण सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है. पोषण सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने के लिए तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
कटाई के बाद की तकनीक का क्षेत्र उन कुछ उद्योगों में से एक है, जो समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकारी और निजी संगठनों द्वारा समान रूप से जोर दिया जाता है.
अनुसंधान और विकास
बागबानी उत्पादन की तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में एक उभरता हुआ क्षेत्र है. बनावट के साथसाथ उच्च पोषण गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत उत्पादों का विकास, जीवन क्षमता और ताजा उपज की गुणवत्ता में वृद्धि, कम लागत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों का मानकीकरण, खाद्य कोटिंग्स, वैक्सिंग, नियंत्रित वातावरण या संशोधित वातावरण, भंडारण आदि अनुसंधान के लिए महत्त्वपूर्ण विषय हैं.
यह क्षेत्र विभिन्न स्तरों पर छात्रों और शिक्षाविदों को अनुसंधान के अवसर प्रदान करता है. कृषि, बागबानी और संबद्ध विषयों में स्नातक की डिगरी के बाद छात्र आईसीएआरआईएआरआई परीक्षा के माध्यम से तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक में स्नातकोत्तर के लिए आवेदन कर सकते हैं.
विभिन्न आईसीएआर विश्वविद्यालयों में मास्टर और डाक्टरैट कार्यक्रम अलगअलग तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक में उपलब्ध हैं. उस के बाद वे अनुसंधान वैज्ञानिकों के पद के लिए विभिन्न बागबानी विषयों में आवेदन कर सकते हैं, जो समयसमय पर कृषि वैज्ञानिक भरती बोर्ड (एएसआरबी) द्वारा संचालित किया जाता है.
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलुरु आदि अनुसंधान के लिए प्रत्यक्ष भरती द्वारा प्रौद्योगिकीविदों को पोस्ट करने का अवसर प्रदान करते हैं.
राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, मसाला बोर्ड, नारियल बोर्ड, कटक को भी तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक के विशेषज्ञों की आवश्यकता है.
शिक्षण और शिक्षाविदों में कैरियर
तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन तकनीक और बागबानी फसलों का प्रसंस्करण एक अलग विषय है, जिसे विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि और बागबानी में पढ़ाया जाता है.
विभिन्न आईसीएआर विश्वविद्यालय इस पृष्ठभूमि के छात्र से सहायक प्रोफैसरों के पद के लिए आवेदन आमंत्रित करते हैं. इस उम्मीदवार के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षण (नैट) में प्रमाणपत्र के साथ मास्टर डिगरी होनी चाहिए. लिखित परीक्षा या साक्षात्कार में प्रदर्शन के आधार पर उम्मीदवारों को सहायक प्रोफैसर के रूप में चुना जाता है.
कैरियर के रूप में निजी क्षेत्र
कई निजी संगठन, कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं. कोल्ड चेन प्रबंधन, फल पकने वाले कक्ष, ग्रेडिंग और निर्यात फर्म उन उम्मीदवारों की तलाश करते हैं, जिन के पास तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन और ताजा फल को संभालने का अनुभव है.
Bagbani
प्रसंस्कृत उत्पादों की उच्च बाजार मांग है. पेय, सास, कैचप, कैंडी, चटनी, अचार, मसाले, न्यूनतम संसाधित फल, कटा हुआ फल और सब्जियां, जमे हुए उत्पादों जैसे विभिन्न प्रसंस्कृत उत्पादों की अत्यधिक मांग है.
इस पहलुओं के कारण प्रसंस्करण क्षेत्र एक नौकरी उन्मुख क्षेत्र है. यह उन उम्मीदवारों को नौकरी का अवसर प्रदान करता है, जिन के पास तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन और प्रोसैसिंग पृष्ठभूमि है.
विभिन्न फार्मास्यूटिकल्स और न्यूट्रास्यूटिकल्स उद्योग ऐसे उम्मीदवारों के लिए रोजगार प्रदान करते हैं. विभिन्न एनजीओ भी घरेलू स्तर पर काम कर रहे हैं. वे विभिन्न पदों के खिलाफ डिप्लोमाधारक छात्रों की भरती भी करते हैं.
इसी तरह निजी फर्म, जो विदेशों में अपनी वस्तुओं का निर्यात करती हैं, उन्हें उन उम्मीदवारों की भी जरूरत होती है जिन के पास छंटाई, ग्रेडिंग और अन्य तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन प्रक्रिया का अनुभव होता है. फलों और सब्जियों की तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन से संबंधित विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के संस्थान. कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान हैं, जो फलसब्जियों के बाद के पहलुओं पर काम करते हैं. वे छात्रों को तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन स्ट्रीम में मास्टर और डाक्टरैट की डिगरी भी प्रदान करते हैं. कुछ संस्थान हैं :
* भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा कैंपस, नई दिल्ली.
कोदो, कुटकी, नाचनी या रागी और बाजरा आदि मिलेट के अंतर्गत आने वाले अनाज हैं. ये अनाज ग्लूटेन फ्री और फायबर से भरपूर होते हैं, जिस से इन्हें पचाने के लिए हमारे पाचनतंत्र को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती, इसीलिए इन्हें सुपर फ़ूड भी कहा जाता है. इन्हें अपनी रोज की डाइट में शामिल करना हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होता है.
आज हम आप को ऐसे ही मिलेट की 2 रैसिपी बनाना बता रहे हैं, जिन्हें आप आसानी से घर पर बना सकती हैं. तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है :
रागी मिक्स वेज परांठा
कितने लोगों के लिए : 4
बनने में लगने वाला समय: 30 मिनट मील टाइप: वेज
सामग्री (कवर के लिए)
रागी का आटा – 2 कप
नमक – स्वादानुसार
घी – 1/2 टीस्पून
पानी – 1 कप
एक नौनस्टिक पैन में तेल गरम कर के जीरा तड़का कर प्याज को सुनहरा होने तक भून लें. अब इस में हरी मिर्च, शिमला मिर्च, बींस और नमक डाल कर ढक कर 5 मिनट तक पकाएं. उस के बाद उबले हुए आलू और सभी मसाले डाल कर अच्छी तरह चलाएं. 2-3 मिनट भून कर हरा धनिया डाल कर गैस बंद कर दें.
अब आटा तैयार करने के लिए पानी को नमक, घी और अजवाइन के साथ एक भगौने में उबाल लें. जैसे ही पानी उबलने लगे तो गैस बंद कर दें और रागी का आटा डाल कर अच्छी तरह चलाएं. जब पानी में आटा अच्छी तरह मिक्स हो जाए, तो इसे एक प्लेट में निकाल कर हाथ से अच्छी तरह मिला कर एकदम गेहूं के आटे जैसा नरम कर लें.
अब चकले पर थोड़ा सा तेल या घी लगा कर 2 रोटी बेल लें. एक रोटी के किनारों पर उंगली से पानी लगाएं और ब्रश से पूरी रोटी पर टोमेटो सौस लगा कर 1 टेबलस्पून भरावन अच्छी तरह फैला दें. ऊपर से दूसरी रोटी रख कर उंगलियों की सहायता से चारों तरफ से दबा दें. तैयार परांठे को चिकनाई लगे तवे पर डाल कर घी लगा कर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक सेंक लें.
गरमागरम परांठे को चटनी या अचार के साथ सर्व करें.
कोदो मिलेट पिज्जा
कितने लोगों के लिए: 6 बनने में लगने वाला समय: 30 मिनट मील टाइप : वेज
कोदो मिलेट, चावल और दाल को बनाने से पहले ओवरनाइट भिगो दें. सुबह पानी निकाल कर हरी मिर्च, नमक और दही के साथ बारीक पीस लें. अब इस में ईनो फ्रूट साल्ट, जीरा, हींग और हल्दी पाउडर डाल कर अच्छी तरह चलाएं. तैयार मिश्रण से चिकनाई लगे तवे पर एक बड़ा चम्मच मिश्रण ले कर मोटामोटा फैलाएं. जब इस का रंग बदल जाए तो पलट दें और एक पूरा चीज क्यूब ग्रेट कर दें. ऊपर से तीनों शिमला मिर्च डाल कर ढक कर एकदम धीमी आंच पर चीज के मेल्ट होने तक पकाएं. ऊपर से ओरेगेनो, चिली फ्लेक्स और चाट मसाला बुरक कर सर्व करें.
उदयपुर : पाताल से आकाश तक ही नहीं, बल्कि इस से आगे अंतरिक्ष तक कृषि का साम्राज्य है. कृषि वैज्ञानिक दिनरात इस सच को मूर्त रूप देने में जुटे हैं. युवा और कृषि भारत के लिए चुनौती नहीं, बल्कि एक सुअवसर है. शून्य बजट प्राकृतिक कृषि, कार्बनिक कृषि और व्यापारिक कृषि कुछ ऐसे कृषि के चुनिंदा प्रकार हैं, जो युवाओं को खूब आकर्षित कर रहे हैं. युवा इस क्षेत्र में उद्यमशीलता और नवाचार के द्वारा आमूलचूल परिवर्तन ला रहे हैं.
यदि किसान पढ़ेलिखे हों, तो मौसम, मिट्टी, जलवायु, बीज, उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई संबंधी सटीक जानकारी रखते हुए भरपूर पैसा कमा सकते हैं यानी कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां रोजगार की कोई कमी नहीं है और नवागंतुक बच्चों को 10वीं-12वीं में ही कृषि विषय ले कर अपनी और अपने देश की तरक्की का रास्ता अपनाना चाहिए.
यह बात पिछले दिनों यहां शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, जम्मू के पूर्व कुलपति डा. जेपी शर्मा राजस्थान कृषि महाविद्यालय के नूतन सभागार में एकदिवसीय कृषि शिक्षा मेले में आए कृषि छात्रों को संबोधित कर रहे थे.
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के तत्वावधान में राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना के तहत आयोजित इस मेले में 20 स्कूलों के छात्रछात्राओं के अलावा उन के प्राचार्य व स्टाफ ने भी भाग लिया, ताकि उच्च माध्यमिक स्तर पर विषय चयन में विधार्थियों का बेहतर मार्गदर्शन कर उन्हें कृषि जैसे रोजगारपरक विषय से जोड़ा जा सके.
उन्होंने आगे कहा कि कृषि छात्र आईआईटी, आईआईएम, सिविल सर्विसेज, आईसीएआर, एसएयू, राज्य सरकार एवं बैंकों आदि में अपना भविष्य बना सकते हैं.
उन्होंने कहा कि कोरोना काल हो या आर्थिक मंदी का दौर भारत कृषि आधरित देश होने की वजह से कभी पिछड़ा नहीं, बल्कि इन संकटकालीन स्थितियोें में जहां तकनीकी आधरित देशों में जीडीपी माइनस में चली गई, वहीं भारत ने कृषि में 3.4 फीसदी वृद्धि की.
कृषि में नई क्रांति की जरूरत
उन्होंने कहा कि भारत की 50 फीसदी आबादी कृषि से ही जीविकोपार्जन करती है. कृषि को फिर से एक नई क्रांति की जरूरत है और देश के युवाओं द्वारा कृषि क्रांति का आधार भी तैयार हो चुका है. आज का पढ़ालिखा युवा फूड प्रोसैसिंग, वेल्यू एडिशन, टैक्नोलौजी और मार्केटिंग को भलीभांति जानता है. गांव में ही प्रोसैसिंग हो, पैकेजिंग हो और वहीं से सीधे बाजार तक सामान पहुंचे तो युवाओं को खेतीकिसानी से कोई परहेज नहीं होगा.
अनेक कृषि क्षेत्र हैं युवा किसानों के लिए
युवा किसान ऐसे हैं, जिन का अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लिंक स्थापित है और वे अच्छाखासा मुनाफा कमा रहे हैं. उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा, जो कि आईआईटी, आईआईएम आदि के छात्र भी कृषि आधरित उद्योगों की ओर बढ़ रहे हैं.
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि कृषि में पढ़ेलिखे युवाओं के आने से युवा आत्मनिर्भर बनेंगे, युवाओं के आत्मनिर्भर होने से देश आत्मनिर्भर होगा और अंततः राष्ट्र का कल्याण होगा.
उन्होंने आगे कहा कि फलफूलों की खेती, मशरूम की खेती, पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन, मिल्क प्रोडक्ट तैयार करना, ग्राफ्टेड फलों की पौध तैयार करना, खादबीज की दुकान लगाना, कुक्कटपालन, मधुमक्खीपालन, सजावटी पौधों की नर्सरी खोलना, खाद्य प्रसंस्करण और आंवला, तिलहन, दहलन की प्रोसैसिंग यूनिट लगा कर शिक्षित युवा अपना, परिवार का और देश का भविष्य संवार सकते हैं. यही नहीं, कई लोगों को रोजगार भी मुहैया कर सकते हैं.
कृषि विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका
कृषि क्षेत्र में अनुसंधान भी बहुत जरूरी है. युवाओं को कृषि से जोड़ने के लिए देशभर में वर्तमान में 73 कृषि विश्वविद्यालय प्रयासरत हैं, जहां कृषि की पढ़ाई गुणवत्तापूर्ण तरीके से हो रही है. भारत का इजरायल के साथ कृषि शोध को ले कर करार हुआ है.
डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि आज भारत की कुल जनसंख्या में 27.3 फीसदी युवा आबादी है यानी 37.14 करोड़ युवाओं के साथ भारत सब से अधिक युवाओं वाला देश है. यदि वैज्ञानिक पद्दति से कालेज स्तर पर प्रशिक्षण दिया जाए, कुटीर एवं घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिले तो पैसों की चाहत में युवा वर्ग भी कृषि क्षेत्र में पूरे जुनून से जुड़ेगा.
विशिष्ट अतिथि राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, उदयपुर की निदेशक कविता पाठक ने भी विधार्थियों को कृषि विषय रोजगारपरक बताते हुए अधिकाधिक विद्यार्थियों को कृषि विषय में अपना भविष्य संवारने का आह्वान किया.
उन्होंने स्कूली पाठ्यक्रम निर्धारण में भी कक्षा-7 व 8 से कृषि संबंधी पाठ का समावेश करने पर जोर दिया, ताकि छात्रछात्राओं को विषय चयन की प्रेरणा शुरू से ही मिल सके.
डा. पीके सिंह, समन्वयक एनएएचईपी ने बताया कि इस वर्ष विश्वविद्यालय के 71 छात्र एवं 11 प्राध्यापकों को प्रशिक्षण हेतु अमेरिका, आस्ट्रेलिया एवं थाईलैंड भेजा गया व दिसंबर, 2023 तक 50 और विद्यार्थियों को भेजा जाएगा.
कार्यक्रम के आरम्भ में डा. मीनू श्रीवास्तव, अधिष्ठाता ने सभी का स्वागत किया और मेले के महत्व को बताया