तोरिया की बोआई का सही समय मध्य सितंबर

इस बार देश के कई इलाकों में बरसात सामान्य से कम हुई है, जिस के कारण या अन्य किसी कारण से किसान खरीफ में कोई खास फसल नहीं ले पाए या कई किसान जो बरसाती सीजन के अनुसार फसल लगाते हैं, उन्हें भी धोखा ही मिला. ऐसे में वे किसान खाली पडे़ खेतों में तोरिया/लाही की फसल ले सकते हैं.

तोरिया खरीफ एवं रबी के मध्य में बोई जाने वाली तिलहनी फसल है, जिस में मुनाफे की संभावना हमेशा रहती है.

खेत की तैयारी

इस के लिए खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 जुताई देशी हल, कल्टीवेटर/हैरो से कर के पाटा दे कर मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए.

प्रमुख प्रजातियां

तोरिया की प्रमुख प्रजातियां टी.-9,भवानी, पीटी -303, पीटी -30 एवं तपेश्वरी है, जो 75 से 90 दिन में पक कर तैयार हो जाती है, जिन की उपज क्षमता 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ है.

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

तोरिया का बीज डेढ़ किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करना चाहिए. बीजजनित रोगों से सुरक्षा के लिए उपचारित एवं प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए. इस के लिए 2.5 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज को उपचारित कर के ही बोएं.

बोआई का समय

अच्छी फसल लेने के लिए तोरिया की बोआई सितंबर माह के पहले पखवारे में ही की जानी चाहिए.

भवानी प्रजाति की बोआई सितंबर माह के दूसरे पखवारे में ही करें.

खाद एवं उर्वरक

मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए. यदि मिट्टी परीक्षण न हो सके, तो 16 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग प्रति एकड़ में करें. 44 किलोग्राम यूरिया, 125 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 30 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें.

बोआई के 25 से 30 दिन के बीच पहली सिंचाई के बाद टौप ड्रेसिंग के रूप में 44 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ में देना चाहिए.

बोआई की विधि

तोरिया की बोआई 30 सैंटीमीटर की दूरी पर 3 से 4 सैंटीमीटर की गहराई पर कतारों में करनी चाहिए और पाटा लगा कर बीज को ढक देना चाहिए. घने पौधों को बोआई के 15 दिन के भीतर निकाल कर पौधों की आपसी दूरी 10-15 सैंटीमीटर कर देना चाहिए और खरपतवार नष्ट करने के लिए एक निराईगुड़ाई भी साथ में कर देनी चाहिए.

ऐसे करें सिंचाई

फूल निकलने से पूर्व की अवस्था पर पानी की कमी के प्रति तोरिया (लाही) विशेष संवेदनशील है. अतः अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए इस अवस्था पर सिंचाई करना आवश्यक है. वर्षा होने से हानि से बचने के लिए उचित जल निकास की व्यवस्था करें.

Farmingकीट एवं रोग प्रबंधन

नाशीजीवों की सही पहचान कर उचित प्रबंधन करना चाहिए.

यों करें कटाईमड़ाई

जब फलियां 75 फीसदी तक सुनहरे रंग की हो जाएं, तो फसल को काट कर सुखा लेना चाहिए. तत्पश्चात मड़ाई कर बीजों को सुखा कर भंडारित करें.

सरसों की प्रोसैसिंग कर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है. आजकल सरसों का तेल भी ऊंचे दामों पर मिलता है. सरसों पिलाई के बाद उस की खली पशुओं के आहार में काम आती है. कुछ लोग तो सरसों खरीद कर उस का तेल, खली आदि बेच कर अच्छाखासा मुनाफा भी कमाते हैं. यही उन के रोजगार का जरीया भी बनता है.

पाकचोई की उन्नत खेती

बढ़ रही जानलेवा बीमारियों से बचाव के लिए लोग अपने खानपान और सेहत को ले कर संजीदा हुए हैं. अब लोग अपने भोजन में ऐसी सब्जियों और अनाजों को शामिल कर रहे हैं, जो उन्हें बीमारियों से बचाने में मदद तो करे ही, साथ ही शारीरिक डीलडौल को भी चुस्तदुरुस्त रखे.

इस मामले में डाक्टरों और खानपान से जुड़े मामलों के जानकारों का यह मानना है कि अगर भोजन में अनाज के साथ हरी पत्तेदार सब्जियों और फलफूल को शामिल कर लिया जाए, तो शरीर को भरपूर मात्रा में पोषण तो मिलता ही है, साथ ही यह हमें कई तरह की बीमारियों से बचाता भी है.

खानपान से जुड़े माहिरों का यह भी मानना है कि अगर हरी पत्तेदार सब्जियों को बिना तेलमसाले के उबाल कर या कच्चा ही खाया जाए, तो यह और भी कारगर होता है. यही वजह है कि बाजार में ऐसी हरी सब्जियों और पत्तेदार साग की मांग दिनोंदिन बढ़ रही है.

बाजार में हरी पत्तेदार सब्जियों की बढ़ती मांग को देखते हुए अगर किसान इन की खेती करें, तो किसानों की अच्छीखासी आमदनी हो सकती है.

अगर उबाल कर या कच्ची खाई जाने वाली पत्तेदार सब्जियों की बात करें, तो ‘चीनी पाकचोई’ नाम की पत्तेदार सब्जी इन्हीं में से एक है. इसे ‘बोक चौय’ के नाम से भी जाना जाता है. बड़ेबड़े मौल और शौपिंग सैंटर में यह हमें आसानी से बिकती हुई दिख जाती है. जहां इसे काफी ऊंचे दाम पर बेचा जाता है. इस के पौधों के पत्ते आकर्षक हलके हरे रंग और 500-650 ग्राम के औसत वजन के साथ मांसल और मुलायम होते हैं.यह सर्दियों के मौसम की फसल है. इसे हम कच्चा या हलके भाप में उबाल कर सोया सास या हलके नमक के साथ खा सकते हैं.

‘चीनी पाकचोई’ पत्तागोभी कुल की सब्जी है. पाकचोई को हम गमलों में भी आसानी से उगा सकते हैं. अगर आप पास गृहवाटिका या छत पर बागवानी का काम करते है तो वहां आसानी से पाकचोई को उगाया जा सकता है.

Farmingपोषक तत्वों से है भरपूर

पाकचोई को चीन और जापान में काफी पसंद किया जाता है, क्योंकि यह कई तरह के पोषक तत्वों की प्रचुरता वाली सब्जी मानी जाती है. इस का उपयोग सूप, हलचल फ्राइज और भी अन्य पकवानों के लिए किया जाता है. इस सब्जी का सेवन करने से इम्युनिटी मजबूत होती है.

पाकचोई ओमेगा-3 एस, एंटीऔक्सीडेंट, खनिज, जस्ता, प्रतिरक्षा को बढ़ाने आदि गुणों को समेटे हुए है. इस में कम मात्रा में कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट भी पाया जाता है. इस के सेवन से शरीर को प्रचुर मात्रा में इन पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है.

उन्नत किस्में

चूंकि पाकचोई एक विदेशी किस्म है, फिर भी इसे भारत में आसानी से उगाया जा सकता है. इस की कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं, जिन्हें घरबैठे औनलाइन ईकौमर्स वैबसाइटों से खरीदा जा सकता है.

पाकचोई की उन्नत किस्मों में प्राइमा, रिची, हिप्रो, अलेंका, निगल, हंस, फोर सीजंस, यूना, सौंदर्य पूर्वी चीन क्रंच, चीन एक्सप्रेस, मैरी, अर्ली जेन शिवालय है.

मिट्टी और जलवायु

पाकचोई ठंडे के सीजन की फसल है. इस के लिए 13 से 21 डिगरी के बीच का तापमान उपयुक्त माना जाता है. इस की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से युक्त दोमट मिट्टी मुफीद होती है. इस की खेती को भरपूर पानी की जरूरत होती है.

नर्सरी तैयार करना

पाकचोई की खेती के लिए पहले नर्सरी तैयार करनी पड़ती है. बीज बोआई 15 सितंबर से 15 नवंबर तक नर्सरी में की जानी चाहिए. इस के लिए पहले मिट्टी को खूब भुरभुरी बना कर उस में गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद मिला कर 3 मीटर लंबा और 2 मीटर चौड़ा बेड बना लेते हैं. एक हेक्टेयर में बोआई के लिए इस के आधा किलोग्राम से ले कर एक किलोग्राम बीज काफी होता है.

अगर इस के बीजों की खेत सीधी बोआई यानी डायरेक्ट सोइंग करनी हो, तो उस के लिए इस के बाद 3 से 4 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है.

रोपाई

अगर पाकचोई की रोपाई नर्सरी डाल कर की जा रही है, तो नर्सरी में जब पौधे 25-30 दिन के हो जाएं, तो इस के पौधों को पहले से तैयार खेत में रोपाई कर देना चाहिए.

पौधों की रोपाई के पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार खेत में रोपाई करें. रोपते समय यह जरूर ध्यान दें कि पंक्ति से पंक्ति और पौधों से पौधों की दूरी 30-45 सैंटीमीटर रखी जानी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

पाकचोई के खेत में रोपाई या सीधी बोआई के पहले प्रति हेक्टेयर की दर से 40-50 टन गोबर की सड़ी खाद को मिट्टी में डाल कर अच्छी तरह मिला दें. इस के अलावा 125 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 275 किलोग्राम यूरिया के साथ 62.5 किलोग्राम फास्फोरस यानी 387.5 किलोग्राम सिंगल सुपरफास्फेट और 62.5 किलोग्राम और पोटाश की 100 किलोग्राम मात्रा को 3 हिस्सों में बांट लें, जिस में से एक भाग पौधों की रोपाई या बीज की सीधी बोआई के पहले जुताई के दौरान मिट्टी में मिला देना चाहिए, जबकि बाकी बची खाद और उर्वरक के 2 हिस्से को फसल बोआई के बाद क्रमशः 20वें और 35वें दिन समान अनुपात में खड़ी फसल में प्रयोग करें.

सिंचाई

पाकचोई ज्यादातर ठंड के मौसम में उगाई जाती है. इसलिए इस फसल को कम सिंचाई की जरूरत होती है. फिर भी मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए पौध की रोपाई के 5वें दिन और फिर 10-12 दिनों के अंतराल में हलकी सिंचाई करते रहें.

निराई, गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण

पाकचोई के पौध रोपाई या सीधी बोआई के बाद फसल को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए एक या दो निराई या गुड़ाई करनी जरूरी है.

कीट व बीमारी

आमतौर पर पाकचोई की पौध में किसी गंभीर कीट व बीमारी का प्रकोप नहीं होता है. हालांकि एफिड्स और फ्लाई बीटल कभीकभी नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसी दशा में कीटों को नियंत्रित करने के लिए पौधों के विकास के दौरान 10 दिनों के अंतराल पर एक या दो बार नीम बीज सत को 5 फीसदी की दर से प्रयोग करें.

कटाई और उत्पादन

पाकचोई की तैयार फसल को पौधों की मिट्टी के स्तर से थोड़ा ऊपर से कटाई की जाती है. यह आमतौर पर रोपाई के 40 से 50 दिन बाद होती है. पाकचोई सर्दियों के मौसम की फसल है, जो 500-550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की औसत उपज देती है.

खस की खेती : कम लागत में बनाए मालामाल

आजकल सौंदर्य प्रसाधनों से ले कर चिकित्सा व खानपान की वस्तुओं में सुगंधित पदार्थों का प्रयोग बढ़ने लगा है. परफ्यूम, अगरबत्ती, मिठाइयां, गुटखा, सेविंग क्रीम, मसाज क्रीम व ऐरोमा चिकित्सा में सुगंधित बनाने के लिए प्रयोग किया जाने वाला पदार्थ खस, पामारोजा, लेमनग्रास, सेट्रेनिला, मेंथा, गुलाब, केवड़ा इत्यादि से निकलने वाला तेल होता है, जिस की मांग को देखते हुए इस की खेती के क्षेत्रफल में हाल के सालों में बडी तेजी से इजाफा हुआ. इन सुगंधित फसलों की खेती कम लागत, कम श्रम व पशुओं से सुरक्षा की दृष्टि से महफूज मानी जाती है. साथ ही, इस का मार्केट में वाजिब मूल्य भी आसानी से मिल जाता है. इस वजह से सुगंधित फसलों की खेती फायदे का सौदा साबित हो रही है. इन्हीं सुगंधित फसलों में खस का तेल एक ऐसा कृषि उत्पाद है, जिस का बाजार मूल्य किसानों को अधिक लाभ देने के साथ ही लागत में कमी वाला भी है. इसलिए हमारे किसान खस की खेती को अपना कर अत्यधिक लाभ कमा सकते हैं.

खस की खेती में किसानों को जोखिम भी कम है.

खस की खेती के लिए किसी भी तरह की मिट्टी अनुकूल होती है. यहां तक कि इस को बंजर मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है. इस की खेती के लिए सब से पहले उन्नत किस्म की अधिक तेल देने वाली किस्म की नर्सरी की आवश्यकता पड़ती है. इस के पहले से ही एक वर्ष पुरानी पौधों को तैयार कर के रखना चाहिए.

नर्सरी तैयार करने के लिए सीमैप द्वारा विकसित खस यानी वेटिवर की उन्नत किस्मों जैसे केएस-1, केएस -2, धारिणी, केशरी, गुलाबी, सिम-वृद्धि, सीमैप खस-15, सीमैप खस-22, सीमैप खुसनालिका और सीमैप समृद्धि प्रजाति का चयन किया जाना ज्यादा अच्छा होता है. इन प्रजातियों को सीमैप लखनऊ से खरीदा जा सकता है.

एक एकड़ खेत के लिए खस के तकरीबन 20,000 पौधों की आवश्यकता पडती है, जिन को नर्सरी के लिए रोपित कर अगले वर्ष अधिक क्षेत्रफल में खेती के लिए उपयोग में लाया जा सकता है.

खस को रोपित करने के पहले खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान देना जरूरी है. इस के लिये सर्वप्रथम किसी भी प्रकार की मिट्टी, जिस में पौध रोपण करना हो, रोटावेटर या हैरो से एक जुताई कर के पाटा लगा दें. इस के बाद कल्टीवेटर से 2 जुताई कर के पाटा लगा कर मिट्टी में प्रति एकड 500 किलोग्राम जिप्सम मिलाना जरूरी है. इस के अलावा पौधों को रोपित करने के पहले फसल को दीमक से बचाने के लिए रिजेंट क्लोरोपायरीफास को 60 किलोग्राम डीएपी के साथ प्रति एकड़ खाद में मिला कर मिट्टी में मिला दे. इस से खस की जड़ों को दीमक से नुकसान पहुंचने का खतरा नहीं होता है.

खेत की तैयारी के बाद खस के पौधो को नर्सरी से एकएक पौधा अलग कर पौधे से पौधे की दूरी 1 फुट व लाइन से लाइन की दूरी डेढ़ फुट पर रखते हुए रोपित कर दें.

खस के पौधों को खेत में रोपित करने का सब से अच्छा समय फरवरी के प्रथम सप्ताह से मार्च के अंतिम सप्ताह का होता है.

खस के पौधों को खेत में रोपित करने के 2 दिन के भीतर खेत की हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. फसल रोपण के 15 दिन बाद पुनः खेत की सिंचाई कर दें. गरमियों में हर 15 दिन पर खस के फसल की सिंचाई करते रहना जरूरी है. वर्षा ऋतु में खस की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है. सितंबर माह से पुनः एक माह के अंतराल पर सिंचाई करें. इस दौरान रोपाई के समय 6 किलोग्राम डीएपी, 24 किलोग्राम पोटाश व 30 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ की दर से खेत में बो दिया जाता है. इस के बाद पुनः 4 माह बाद इसी अनुपात में खाद की बोआई करना जरूरी होता है. खस की खेती में किसी तरह की बीमारी व कीट नहीं लगता है और न ही इसे पशुओं से नुकसान पहुंचने का डर होता है.

फसल की कटाई एवं खुदाई

खस की फसल हर तरह की जमीनों में बड़ी आसानी से उगाई जाती है. यहां तक कि यह जलभराव वाले स्थानों में भी अच्छी उपज देती है. खस की जडों से सब से अधिक तेल लेने का समय जनवरीफरवरी माह का होता है, क्योंकि ठंडियों में खस की जड़ों में तेल अधिक पड़ता है.

खस की खुदाई के पहले जड़ से एक फुट ऊंचाई पर छोड़ कर उसबीके ऊपर के हिस्सों की कटाई कर दें. खस की फसल के ऊपरी हिस्सों के कटाई के बाद तुरंत ही इस की जड़ों की खुदाई करना जरूरी है, क्योंकि कटाई के बाद तुरंत खुदाई न करने से जड़ों में तेल का फीसदी घट जाता है.

जड़ों की खुदाई में अत्यधिक मेहनत की आवश्यकता होती है, इसलिए इसे जेसीबी से खुदाई करना ज्यादा अच्छा होता है. आमतौर पर एक घंटे में एक एकड़ खेत से खस की खुदाई बड़ी आसानी से हो जाती है.

खुदाई के दौरान खस की जड़ों से खेत से निकालने के लिए 20 मजदूरों की जरूरत पड़ती है, जो जड़ों को साफ कर ट्राली में लादने का काम करते हैं.

प्रोसैसिंग

खस की जड़ों से तेल निकालने के लिए सब से पहले खेत से जड़ों को लाने के बाद पहले से तैयार किए 3 फुट गहरे, 15 फुट लंबे व 8 फुट चौड़े गड्ढे में पानी भर कर उस में डाल कर 24 घंटे के लिए भीगने के लिए छोड देते हैं. इस से खस की जड़ों में स्थित तेल फूल जाता है और यह आसवन टंकी में कम समय में निकलता है. पानी में जड़ों को डालने से उस में लगी मिट्टी भी अलग हो जाती है.

 

FARMING

प्रोसैसिंग प्लांट

खस की जड़ों से तेल निकालने के लिए प्रोसैसिंग प्लांट की आवश्यकता होती है, जिस की लागत अमूमन 1.5 लाख रुपए आती है. प्रोसैसिंग प्लांट तैयार करने के लिए सब से पहले आसवन टंकी की आवश्यकता पड़ती है, जो सीमैप लखनऊ या स्थानीय कृषि यंत्र तैयार करने वालों व बेचने वालों के यहां से खरीदा जा सकती है. इस आसवन टंकी को टंकी की पेदी के अनुसार वर्गाकार या आयताकार भट्टी तैयार कर के रखा जाता है. इस के बाद एक पानी का गड्ढा तैयार कर के टंकी से पाइप निकाल कर गड्ढे में क्वायल लगा कर जोड़ा जाता है, जो तेल को ठंडा करने का काम करती है. इस के अलावा क्वायल से एक सेपोटर लगा कर गड्ढे से बाहर निकाला जाता है, जहां खस का तेल व पानी अलगअलग हो कर विशेष डिजाइन के डब्बे में इकट्ठा होता है.

इस प्रोसैसिंग यूनिट में पानी में भिगोई गई जड़ों को बाहर निकाल कर आसवन टंकी में डालते हैं. इस टंकी से एक बार में 5 क्विंटल (1बीघा) जड़ों से तेल निकाला जा सकता है. इन जड़ों को टंकी में डालने के बाद टंकी के ऊपर के ढक्कन को कस कर बंद कर दिया जाता है. इस के बाद टंकी की भट्ठी को नीचे से गरम करते हैं. लगभग 30 घंटों के बाद इस 5 क्विंटल जड़ों से तेल निकल कर सेपरेटर में इकट्ठा हो जाता है, जो लगभग 4 से 5 लिटर होता है.

इस प्रकार एक एकड़ की फसल को जड़ों से एक आसवन टंकी से तेल निकालने पर लगभग 90 घंटों का समय लगता है और एक एकड़ की फसल से 12 से 15 लिटर तेल प्राप्त होता है.

मार्केटिंग

खस के तेलों की सुगंध लंबे समय तक बनी रहने व अपने औषधीय गुण की वजह से बाजार में मांग अत्यधिक बनी हुई है. खस का तेल चामारोजा, लेमनग्रास, सेट्रेनेला, गेंधा की अपेक्षा काफी महंगा बिकता है. इस का वर्तमान बाजार रेट 12,000 रुपए से 15,000 रुपए प्रति लिटर है, जबकि इस की मांग इतनी अधिक है कि कन्नौज इत्र कारोबारियों के अलावा लखनऊ व दिल्ली के खारी बावली मार्केट के कारोबारी खुद किसानों से संपर्क कर तेल की खरीदारी करते हैं. इसलिए इस की मांग को देखते हुए किसानों को इस की खेती की तरफ जरूर ध्यान देना चाहिए.

लाभ

खस की खेती में लाभ की अपेक्षा लागत और श्रम बहुत कम है. एक एकड़ खेत के लिए इस की खेती से ले कर प्रोसैसिंग तक मात्र 45,000 रुपए की लागत आती है, जिस में सिंचाई में 10,000 रुपया, खाद में 1,000 रुपया, जबकि तेल को बेच कर एक लाख, 80 हजार रूपया प्राप्त होता है. अगर लागत को निकाल दिया जाए, तो एक लाख, 35 हजार रुपए की शुद्ध आमदनी होती है.

खस की खेती लागत और श्रम की दृष्टि से तो फायदेमंद है ही, इसे किसी प्रकार बाढ़, कीट, बीमारी या पशुओं से नुकसान पहुंचने का डर भी नहीं होता है. इसलिए खस की खेती को अपना कर हमारे किसान अपने जीवन को भी सुगंधित बना सकते हैं.