जलवायु परिवर्तन पर बैठक में भारत की भागीदारी

नई दिल्ली: 28 नवंबर, 2023. जलवायु परिवर्तन पर यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन औन क्लाडइमेट चेंज (सीओपी-28) की बैठक 30 नवंबर से 12 दिसंबर, 2023 तक दुबई में होगी. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस बैठक में भारतीय शिष्टमंडल की भागीदारी के लिए चल रही तैयारियों के साथ ही कृषि क्षेत्र में कार्बन क्रेडिट की क्षमता की समीक्षा की.

उन्होंने बताया कि मंत्रालय द्वारा बैठक में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जलवायु अनुकूल श्रीअन्न, प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जलवायु अनुकूल गांवों के वैश्विक महत्व समेत देश की उपलब्धियां साइड इवेंट्स में प्रदर्शित होंगी.

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आगे कहा कि कृषि को जलवायु परिवर्तन के मुताबिक किया जाना चाहिए, ताकि किसान समुदाय इस से फायदा ले सकें. उन्होंने जोर दे कर कहा कि भारत जैसा अत्यधिक आबादी वाला देश मीथेन की कटौती की आड़ में खाद्य सुरक्षा पर समझौता नहीं कर सकता है.

समीक्षा बैठक में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण सचिव मनोज अहूजा ने मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को सीओपी बैठक के महत्व, जलवायु परिवर्तन व भारतीय कृषि पर लिए गए निर्णयों के प्रभाव के बारे में जानकारी दी.

मंत्रालय के एनआरएम डिवीजन के संयुक्त सचिव फ्रैंकलिन एल. खोबुंग ने खाद्य सुरक्षा पहलुओं और भारतीय कृषि की स्थिरता के संबंध में जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर ऐतिहासिक निर्णयों और भारत के रुख पर विवरण प्रस्तुत किया.

बैठक में डेयर के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक ने भी अधिकारियों के साथ हिस्सा लिया.

संयुक्त सचिव (एनआरएम) ने कार्बन क्रेडिट के महत्व को भी प्रस्तुत किया, जो जलवायु अनुकूल टिकाऊ प्रथाओं को अपनाने के माध्यम से खेती में पैदा किया जा सकता है. राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन के अंतर्गत कृषि वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, राष्ट्रीय बांस मिशन, प्राकृतिक व जैविक खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली आदि जैसे अनेक उपायों का आयोजन किया गया है. मिट्टी में कार्बन को अनुक्रमित करने की क्षमता है, जिस से जीएचजी व ग्लोबल वार्मिंग में योगदान कम हो जाता है.

मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सुझाव दिया कि कार्बन क्रेडिट का लाभ कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय बीज निगम के बीज फार्मों और आईसीएआर संस्थानों में मौडल फार्मों की स्थापना के माध्यम से किसानों तक पहुंचना चाहिए.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि केवीके को किसान समुदाय के बीच जागरूकता पैदा करने में भी शामिल होना चाहिए, ताकि किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सके. कार्बन क्रेडिट, किसानों को सतत् कृषि का अभ्यास करने में प्रोत्साकहन के लिए एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है. ऐसे कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए कार्बन क्रेडिट की जानकारी वाले किसानों को साथ लिया जा सकता है.

गेहूं बीज : प्राकृतिक आपदा में भी लहलहाएगी फसल

बेमौसम बारिश, आंधी, तूफान, ओला जैसी प्राकृतिक आपदा आने पर सब से पहले इस का फसलों पर बुरा असर पड़ता है. हरीभरी लहलहानी खड़ी फसल तबाह हो जाती है और किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फिर जाता है. लेकिन अब गेहूं फसल लेने वाले किसानों के लिए गेहूं की एक खास विकसित प्रजाति मौजूद है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी ने विकसित किया है. गेहूं की यह नई प्रजाति कुदरत-9 है, जिस के बारे में उन का कहना है कि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में भी गेहूं की फसल लहलहाती दिखाई देगी. फसल पर न तो आंधीतूफान का असर होगा, न ही अधिक बारिश व पाले से कोई नुकसान. उलटे इतना सब झेलने के बाद भी प्रति एकड़ अधिकतम 28 से 32 क्विंटल तक का उत्पादन होगा. किसानों को यह अजूबा लग सकता है, मगर यह सच है.

उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव टडि़या, जिला वाराणसी के प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी द्वारा तैयार देशी बीज की इन्हीं विशेषताओं के कारण जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के वैज्ञानिकों ने गेहूं कुदरत-9 देशी बीज को दूसरे प्रचलित बीजों की अपेक्षा बेहतर बता कर अधिक उत्पादन के साथ मानव स्वास्थ्य के लिए सेहतमंद प्रजाति का प्रमाणीकरण भी दिया है. किसानों की तरक्की के रास्ते खोलने वाले किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी को पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया है.

पेटेंट प्रजाति कुदरत-9

प्रकाश सिंह रघुवंशी ने इस खास प्रजाति कुदरत-9 बीज का पेटेंट भी करा दिया है. शायद वे देश के पहले ऐसे किसान हैं, जिन के बीज का पेटेंट भारत सरकार ने किया है.

‘अपनी खेती अपनी खाद, अपना बीज अपना स्वाद’ का नारा देने वाले किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी महज कक्षा 8वीं जमात तक ही पढ़े हैं. देशभर के किसानों को वे बीते 15 सालों से जागरूक करने के अभियान में लगे हुए हैं. उन का मकसद है कि देश का हर किसान बीज के मामले में आत्मनिर्भर बने.

क्या हैं खासीयतें : गेहूं की नई विकसित प्रजाति कुदरत 9 को जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के प्राचार्य साइंटिस्ट आरएस शुक्ला द्वारा प्रमाणित अनुसंधान रिपोर्ट में गेहूं कुदरत-9 बीज से तैयार हुई फसल के 1,000 दानों का वजन महज 48 ग्राम रहा, जबकि दूसरे स्थान पर सब से प्रचलित बीज जीडब्ल्यू-366 (सी) प्रजाति में इतने ही दानों का वजन 46 ग्राम निकला है. कुदरत शृंखला के बीज कुदरत-5 व कुदरत-8 बीजों का परीक्षण का परिणाम भी दूसरी प्रजाति की अपेक्षा बेहतर है.

उत्पादन में सब से आगे : गेहूं की नई किस्म कुदरत-9 बीज का उपयोग करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 हजार, 777 किलोग्राम बताया गया है, वहीं दूसरे स्थान पर रहे जीडब्ल्यू-366 (सी) में प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 हजार, 722 किलोग्राम ही रहा है. साथ ही, गेहूं की बालियों की लंबाई प्रतिद्वंदी बीज 98 सैंटीमीटर के मुकाबले 100 सैंटीमीटर रही हैं. बालियों की तादाद भी 20 फीसदी अधिक मिली है.

किसान ही बने उत्पादक : बातचीत में किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी ने बताया कि ‘रघुवंशी एग्रीकल्चर रिसर्च और्गेनाइजेशन’ नाम से गठित संस्था के माध्यम से वे अरहर, धान व सभी प्रकार की दालों के बीज भी तैयार कर रहे हैं. धान के बीज की प्रजाति कुदरत-3 प्रति हेक्टेयर 80 क्विंटल का उत्पादन तक दे रही है.

इस के अलावा वे किसानों के लिए सौसौ ग्राम के बीज के पैकेट बना कर भी किसानों को फ्री में बांटते हैं, जिस से किसान उन बीजों को लगा कर अपना बीज खुद तैयार कर सकें.

अधिक जानकारी के लिए प्रकाश सिंह रघुवंशी के मोबाइन नंबर : 9793153755 पर किसान फोन कर सकते हैं.

चना की नई उन्नत किस्म से फायदा पाएं

दलहनी फसलों में चने की खेती अपना खास स्थान रखती है. भारत दुनिया का सब से ज्यादा चना पैदा करने वाला देश है. चने की तकरीबन 70-75 फीसदी पैदावार हमारे देश में होती है. उत्तर से मध्य व दक्षिण भारत के राज्यों में चना रबी फसल के रूप में उगाया जाता है. चना उत्पादन की नई उन्नत तकनीक व उन्नतशील किस्मों का इस्तेमाल कर किसान चने का उत्पादन और भी बढ़ा सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, अखिल भारतीय समन्वित चना अनुसंधान परियोजना ने हाल ही में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) में आयोजित अपने 24वें वार्षिक बैठक में जीनोमिक्स की मदद से विकसित चना की 2 बेहतर किस्मों ‘पूसा चिकपी-10216’ और ‘सुपर एनेगरी 1’ को जारी किया है, जो चने की दूसरी किस्मों से कहीं बेहतर है.

पूसा चिकपी 10216

* चना की यह एक खास किस्म है. इसे डाक्टर भारद्वाज चेल्लापिला, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के नेतृत्व में चिकपी ब्रीडिंग ऐंड मोलेकुलर ब्रीडिंग टीम द्वारा डाक्टर वार्ष्णेय के. राजीव, इक्रिसैट के नेतृत्व वाली जीनोमिक्स टीम के सहयोग से विकसित किया गया है.

* इस किस्म को आणविक मार्करों की मदद से ‘पूसा 372’ की आनुवांशिक पृष्ठभूमि में आनुवांशिक ‘क्यूटीएल हौटस्पौट’ के बाद विकसित किया गया है.

* ‘पूसा 372’ देश के मध्य क्षेत्र, उत्तरपूर्व मैदानी इलाकों और उत्तरपश्चिम मैदानी इलाकों में उगाई जाने वाली चना की एक खास किस्म है. इस का इस्तेमाल लंबे समय यानी देर से बोई जाने वाली स्थितियों के लिए राष्ट्रीय परीक्षणों में मापक (नियंत्रण किस्म) के रूप में किया जाता रहा है. इस किस्म का विकास साल 1993 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा तैयार किया गया था. हालांकि इस का उत्पादन कम हो गया था.

* इस को प्रतिस्थापित करने के लिए साल 2014 में चना के ‘आईसीसी 4958’ किस्म में ‘सूखा सहिष्णुता’ के लिए पहचाने गए जीनयुक्त ‘क्यूटीएल हौटस्पौट’ को आणविक प्रजनन विधि से ‘पूसा 372’ के आनुवांशिक पृष्ठभूमि में डाल कर विकसित किया गया है.

* नई किस्म की औसत पैदावार 1447 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. भारत के मध्य क्षेत्र में नमी कम होने की स्थिति में यह किस्म ‘पूसा 372’ से तकरीबन 11.9 फीसदी ज्यादा पैदावार देती है.

* इस किस्म के पकने की औसत अवधि 110 दिन है. दाने का रंग उत्कृष्ट होने के साथसाथ इस के 100 बीजों का वजन तकरीबन 22.2 ग्राम होता है.

* खास रोगों मसलन फुसैरियम विल्ट, सूखी जड़ सड़ांध और स्टंट के लिए यह किस्म मध्यम रूप से प्रतिरोधी है और इसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाकों में खेती के लिए चुना गया है.

डाक्टर भारद्वाज चेल्लापिला ने बताया है कि ‘पूसा चिकपी 10216’ भारत में चना की वाणिज्यिक खेती के लिए पहचानी जाने वाली खास सहिष्णुतायुक्त पहली आणविक प्रजनन किस्म बन गई है.

सुपर एनेगरी 1

* इस किस्म को कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, रायचूर (कर्नाटक) और इक्रिसैट के सहयोग से विकसित किया गया है.

* इस किस्म को चना के ‘डब्लूआर 315’ किस्म में फुसैरियम विल्ट रोग के लिए पहचाने गए प्रतिरोधी जीनों को आणविक प्रजनन विधि से कर्नाटक राज्य की प्रमुख चना किस्म एनेगरी 1 की आनुवांशिक पृष्ठभूमि में डाल कर विकसित किया गया है.

* इस किस्म की औसत पैदावार 1898 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है और यह एनेगरी किस्म से तकरीबन 7 फीसदी अधिक पैदावार देती है. साथ ही, दक्षिण भारत में उपज कम करने वाले कारक फुसैरियम विल्ट रोग के लिए बेहद प्रतिरोधी है.

* यह किस्म औसतन 95 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस के 100 बीजों का वजन तकरीबन 18 से 20 ग्राम तक होता है.

* इस किस्म को आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में खेती के लिए चुना गया है.

उपयुक्त जलवायु

चने की खेती तकरीबन 78 फीसदी असिंचित इलाकों और 22 फीसदी सिंचित इलाकों में की जाती है. सर्दी में फसल होने के कारण चना की खेती कम बारिश वाले इलाकों और कम ठंडक वाले इलाकों में की जाती है. फूल आने की दशा में यदि बरसात हो जाए तो फूल झड़ने के कारण फसल को बहुत नुकसान होता है.

चने के अंकुरण के लिए कुछ अधिक तापमान की जरूरत होती है, जबकि पौधों की सही बढ़वार के लिए आमतौर पर ठंडे मौसम की जरूरत होती है.

उपयुक्त जमीन

चने की खेती बलुई से ले कर दोमट और मटियार मिट्टी में की जा सकती है. इस के अलावा चने की खेती के लिए भारी दोमट और मडुआ, पड़आ, कछारी जमीन, जहां पानी जमा न होता हो, वह भी ठीक मानी जाती है.

काबुली चने की खेती के लिए मटियार दोमट और काली मिट्टी, जिस में पानी की सही मात्रा धारण करने की कूवत होती है, उस में सफलतापूर्वक खेती की जाती है. लेकिन जरूरी यह है कि पानी के भरने की समस्या न हो. जल निकासी का सही प्रबंध होना चाहिए.

खेत की तैयारी

चने की खेती के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो से करनी चाहिए. इस के बाद एक क्रास जुताई हैरो से कर के पाटा लगा कर जमीन समतल कर लें.

फसल को दीमक व कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए आखिरी जुताई के समय उस की रोकथाम का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए. जमीन की पैदावार कूवत बनाए रखने और फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए.

बोआई का उचित समय

उत्तर भारत के असिंचित इलाकों में चना की बोआई अक्तूबर माह के दूसरे पखवारे में करें और सिंचित इलाकों में नवंबर माह के पहले पखवारे में करनी चाहिए.

पछेती बोआई दिसंबर माह के पहले हफ्ते कर लेनी चाहिए. देश के मध्य भाग में अक्तूबर का पहला और दक्षिण राज्य में सितंबर के आखिरी हफ्ते से अक्तूबर का पहला सप्ताह चने की बोआई के लिए उचित है.

बीजोपचार : चने की खेती में कई तरह के कीट और रोगों से बचाव के लिए बीज को उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए. बीज को उपचारित करते समय ध्यान रखें कि सब से पहले उसे फफूंदीनाशी, फिर कीटनाशी और आखिर में राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें.

जड़ गलन व उकटा रोग की रोकथाम के लिए बीज को कार्बंडाजिम या मैंकोजेब या थाइरम की 1.5 से 2 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित करें.

दीमक और दूसरे जमीनी कीटों की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी या इंडोसल्फान 35 ईसी की 8 मिलीलिटर मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए.

बीजों को उपचारित कर के एक लिटर पानी में 250 ग्राम गुड़ को गरम कर के ठंडा होने पर उस में राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस घुलनशील जीवाणु को अच्छी तरह मिला कर उस में बीज उपचारित करना चाहिए. उपचारित बीज को छाया में सुखा कर शीघ्र बोआई कर देनी चाहिए.

उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के मुताबिक करें तो ज्यादा अच्छा होगा. वैसे, सामान्य तौर पर 20-25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि असिंचित अवस्था में 2 फीसदी यूरिया या डीएपी का फसल पर छिड़काव करने से अच्छी पैदावार मिलती है.

सिंचाई प्रबंधन : चने की खेती मुख्यत: असिंचित अवस्था में की जाती है, जहां पर सिंचाई के लिए सीमित पानी मुहैया हो, वहां फूल आने के पहले (बोआई के 50-60 दिन बाद) एक हलकी सिंचाई करें. सिंचित इलाकों में दूसरी सिंचाई फली बनते समय जरूर करें.

सिंचाई करते समय यह ध्यान दें कि खेत के किसी भी हिस्से में पानी जमा न होने दें, वरना फसल को नुकसान हो सकता है. फूल आने की स्थिति में सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण 

खरपतवार चने की खेती को 50 से 60 फीसदी तक नुकसान पहुंचाते हैं इसलिए खरपतवार नियंत्रण जरूरी है.

खरपतवार नियंत्रण के लिए पैंडीमिथेलिन 30 ईसी को 3 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लिटर पानी में घोल कर बोआई के 48 घंटे के अंदर छिड़काव यंत्र द्वारा छिड़काव करना चाहिए. फसल में कम से कम 2 बार निराईगुड़ाई करें. पहली गुड़ाई फसल बोने के 35-40 दिन बाद और दूसरी गुड़ाई 50-60 दिनों बाद कर देनी चाहिए.

कीट नियंत्रण : चने की खेती में मुख्य रूप से फली भेदक कीट का हमला ज्यादा होता है. देर से बोआई की जाने वाली फसलों में इस का प्रकोप अधिक होता है.

फली भेदक के नियंत्रण के लिए इंडोसकार्ब (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या स्पाइनोसैड (0.4 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या इमामेक्टीन बेंजोएट (0.4 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का छिड़काव करें. एनपीवी उपलब्ध होने पर इस का 250 लार्वा समतुल्य 400 से 500 लिटर पानी में घोल कर 2-3 बार छिड़काव कर सकते हैं. इसी तरह 5 फीसदी नीम की निबौली के सत का प्रयोग भी इस के नियंत्रण के लिए कारगर है.

रोग नियंत्रण : चने की खेती में मुख्य रूप से उकटा और शुष्क मूल विगलन रोग होता है. फसल को इन से बचाने के लिए बोआई से पहले बीज को फफूंदीनाशक जैसे 1.0 ग्राम बीटावेक्स और 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. जिन इलाकों में इन रोगों का अधिक प्रकोप हो, वहां पर उकटा और शुष्क मूल विगलन रोगरोधी किस्में बोएं.

इस के अलावा चने की फसल में कीट रोगों का भी प्रकोप होता है. इस का समयसमय पर खात्मा करना जरूरी है. चने की फसल में खासतौर से फली भेदक कीट का प्रकोप अधिक होता है जो शुरुआती दौर में पत्तियों को खाता है, बाद में फली बनने पर छेद बना कर उस में घुस जाता है और दानों को खोखला कर देता है.

इस के अलावा झुलसा रोग, उकटा रोग वगैरह फसल में आते हैं जिन की समय से रोकथाम जरूरी है और अपनी रोगग्रस्त फसल को कृषि विशेषज्ञ को दिखा कर कीट बीमारी पर काबू पाया जा सकता है.

पाले से बचाव : पाले से भी फसल को बहुत अधिक नुकसान होता है. पाला पड़ने की संभावना दिसंबर माह से जनवरी माह में अधिक होती है. पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के लिए फसल में गंधक के तेजाब की 0.1 फीसदी मात्रा यानी एक लिटर गंधक के तेजाब को 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. पाला पड़ने की संभावना होने पर खेत के चारों ओर धुआं करना भी लाभदायक रहता है.

फसल की कटाई और गहाई : चने की फसल की पत्तियां व फलियां पीली व भूरे रंग की हो जाएं और पत्तियां गिरने लगें और दाने सख्त हो जाएं तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए. काटी गई फसल जब अच्छी तरह सूख जाए, तो थ्रेशर द्वारा दाने को भूसे से अलग कर लेना चाहिए और पैदावार को सुखा कर भंडारित करना चाहिए.

Chanaविभिन्न राज्यों के लिए अन्य किस्में

मध्य प्रदेश : जेजी 74, जेजी 315, जेजी 322, पूसा 391, विश्वास (फुलेजी 5), विजय, विशाल, जेजी 16, जेजी 130, जेजीजी 1, जवाहर ग्राम काबुली 1, बीजीडी 128 (के), आईपीसीके 2002-29, आईपीसीके 2004-29 (के), पेकेवी काबुली 4 आदि खास हैं.

राजस्थान : हरियाणा चना 1, डीसीपी 92-3, पूसा 372, पूसा 329, पूसा 362, उदय, सम्राट, जीपीएफ 2, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), आरएसजी 888, आलोक (केजीडी 1168), बीजीडी 28 (के), जीएनजी 1581, आरएसजी 963, राजास, आरएसजी 931, जीएनजी 143, पीबीजी 1, जीएनजी 663 वगैरह किस्में प्रमुख हैं.

हरियाणा : डीसीपी 92-3, हरियाणा चना 1, हरियाणा काबुली चना 1, पूसा 372, पूसा 362, पीबीजी 1, उदय, करनाल चना 1, सम्राट, वरदान, जीपीएफ 2,  चमत्कार, आरएसजी 888, हरियाणा काबुली चना 2, बीजीएम 547, फुलेजी 9425-9, जीएनजी 1581 आदि प्रमुख हैं.

पंजाब : पूसा 256, पीबीजी 5, हरियाणा चना 1, डीसीपी 92-3, पूसा 372, पूसा 329, पूसा 362, सम्राट, वरदान, जीपीएफ 2, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), आरएसजी 888, बीजीएम 547, फुलेजी 9425-9, जीएनजी 15481, आलोक (केजीडी 1168), पीबीजी 3, आरएसजी 963, राजास और आरजी 931 वगैरह खास हैं.

उत्तर प्रदेश : डीसीपी 92-3, केडब्लूआर 108, पूसा 256, पूसा 372, वरदान, जेजी 315, आलोक (केजीडी 1168), विश्वास, पूसा 391, सम्राट, जीपीएफ 2, विजय, पूसा काबुली 1003, गुजरात ग्राम 4 आदि प्रमुख हैं.

बिहार : पूसा 372, पूसा 256, पूसा काबुली 1003, उदय, केडब्लूआर 108, गुजरात ग्राम 4 और आरएयू 52 वगैरह प्रमुख हैं.

छत्तीसगढ़ : जेजी 315, जेजी 16, विजय, वैभव, जवाहर ग्राम काबुली 1, बीजी 372, पूसा 391, बीजी 072 और आईसीसीवी 10 वगैरह खास हैं.

गुजरात : पूसा 372, पूसा 391, विश्वास, जेजी 16, विकास, विजय, विशाल, धारवाड़ प्रगति, गुजरात ग्राम 1, गुजरात ग्राम 2, जवाहर ग्राम काबुली 1, आईपीसीके 2009-29 और आईपीसीके 2004-29 वगैरह प्रमुख हैं.

महाराष्ट्र : पूसा 372, विजय, जेजी 16, विशाल, पूसा 391, विश्वास (फुलेजी 5) धारवाड़ प्रगति, विकास, फुलेजी 12, जवाहर ग्राम काबुली 1, विहार, केएके 2, बीजीडी 128, (के), आईपीसीके 2002-29, आईपीसीके 2004-29, फुलेजी-0517 (के) और पेकेवी काबुली 4 वगैरह खास हैं.

झारखंड : पूसा 372, पूसा 256, पूसा काबुली 1003, उदय, केडब्लूआर 108 और गुजरात ग्राम 4 वगैरह खास हैं.

उत्तराखंड : पंत जी 186, डीसीपी 92-3, सम्राट, केडब्लूआर 108, पूसा चमत्कार (बीजी 1053) बीजीएम 547 और फुलेजी 9425-9 वगैरह खास हैं.

हिमाचल प्रदेश : पीबीजी 1, डीसीपी 92-3, सम्राट, बीजीएम 549 और फुलेजी 9425-9 वगैरह खास हैं.

आंध्र प्रदेश : भारती (आईसीसीवी 10) जेजी 11, फुलेजी 95311 (के) और एमएनके 1 वगैरह प्रमुख हैं.

असम : जेजी 73, उदय (केपीजी 59), केडब्लूआर 108 और पूसा 372 वगैरह खास हैं.

जम्मू और कश्मीर : डीसीपी 92-3, सम्राट, पीबीजी 1, पूसा चमत्कार (बीजी 1053), बीजी एम 547 और फुलेजी 9425-9 वगैरह खास हैं.

कर्नाटक : जेजी 11, अन्नेगिरी 1, चाफा, भारती (आईसीसीवी 10), फुलेजी 9531, श्वेता (आईसीसीवी 2) एमएनके 1 वगैरह खास हैं.

मणिपुर : जेजी 74, पूसा 372, बीजी 253 वगैरह हैं.

मेघालय : जेजी 74, पूसा 372 और बीजी 256 वगैरह हैं.

ओडिशा : पूसा 391, जेजी 11, फुलेजी 95311, आईसीसीवी 10 वगैरह खास हैं.

तमिलनाडु : आईसीसीवी 10, पूसा 372 और बीजी 256 प्रमुख है.

पश्चिम बंगाल : जेजी 74, गुजरात ग्राम 4, केडब्लूआर  108, पूसा 256, महामाया 1 और महामाया 2 वगैरह खास हैं.

काबुली चना की नई किस्म एसआर 10

हाल ही में काबुली चना की नई किस्म एसआर 10 विकसित की गई है. इस किस्म से 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल सकेगी. इस किस्म के 100 दानों का वजन तकरीबन 50 ग्राम से अधिक होगा. इस की बोआई नवंबर के पहले हफ्ते में कर सकते हैं. यह फसल मार्च तक पक कर तैयार हो जाती है.

राजस्थान में विकसित चना किस्म एसआर 10 का कृषक पौध अधिकार प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा पंजीकृत किया गया है.

हरा चना की किस्म आरएसजी 991

किस्म आरएसजी 991 रोग प्रतिरोधी होने के साथ प्रसंस्करण के लिए भी बेहतर है. राजस्थान के झुंझुनूं, टोंक और राज्य के अन्य जिलों में इस किस्म को उगा कर किसान बाजार से अच्छी आमदनी ले रहे हैं.

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान मटर की तरह इस के हरे दानों को बेच सकते हैं. यह हरे चने की एक किस्म है. इस की कटाई के बाद हरे दानों का वैज्ञानिक विधि से भंडारण भी कर सकते हैं. भंडारित उपज से समय के मुताबिक हरे छोले तैयार कर बाजार में बेच सकते हैं. हरे छोले तैयार करने के लिए इन्हें रातभर पानी में भिगोना होता है और उस के बाद सुबह पानी निकाल कर इन को बाजार में बेचा जा सकता है.

हरे चने की यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों ही इलाकों के लिए सही मानी गई है, जो 135 से 140 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

उत्तरप्रदेश में हाईटैक नर्सरी बढ़ाएगी किसानों की आमदनी

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में किसानों को विभिन्न प्रजातियों के उच्च क्वालिटी के पौधे उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इजराइली तकनीक पर आधारित हाईटैक नर्सरी तैयार की जा रही है. यह काम मनरेगा अभिसरण के तहत उद्यान विभाग के सहयोग से कराया जा रहा है और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों की दीदियां भी इस में हाथ बंटा रही हैं. इस से स्वयं सहायता समूहों को काम मिल रहा है.

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बताया कि इस योजना के क्रियान्वयन से कृषि और औद्यानिक फसलों को नई ऊंचाई मिलेगी. विशेष तकनीक का प्रयोग कर के ये नर्सरी तैयार की जा रही हैं. सरकार की मंशा है कि प्रदेश का हर किसान समृद्ध बने और बदलते समय के साथ किसान हाईटैक भी बने.

उन्होंने आगे बताया कि सरकार पौधरोपण को बढ़ावा देने के साथ ही बागबानी से जुड़े किसानों को भी माली रूप से मजबूत बनाने का काम कर रही है. मनरेगा योजना से 150 हाईटैक नर्सरी बनाने के लक्ष्य के साथ तेजी से काम किया जा रहा है.

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के निर्देश व पहल पर ग्राम्य विकास विभाग ने इस को ले कर प्रस्ताव तैयार किया था, जिस को ले कर जमीनी स्तर पर युद्धस्तर पर काम हो रहा है. हाईटैक नर्सरी से किसानों की माली हालत भी मजबूत हो रही है.

प्रदेशभर में 150 हाईटैक नर्सरी बनाने का लक्ष्य रखा गया है. बुलंदशहर के दानापुर और जाहिदपुर में हाईटैक नर्सरी बन कर तैयार भी हो चुकी है. 32 जिलों की 40 साइटों पर ऐसी नर्सरी बनाने का काम किया जा रहा है.

कन्नौज के उमर्दा में स्थित सैंटर औफ एक्सीलेंस फौर वेजिटेबल की तर्ज पर प्रदेश के सभी जनपदों में 2-2 मिनी सैंटर स्थापित करने की कार्यवाही जारी है. किसानों को उन्नत किस्म के पौध के लिए भटकना नहीं पड़ेगा.

समूह के सदस्यों को रोजगार

नर्सरी की देखरेख करने के लिए स्वयं सहायता समूह को जिम्मेदारी दी गई है. समूह के सदस्य नर्सरी का काम देखते हैं, जो पौधों की सिंचाई, रोग, खादबीज आदि का जिम्मा संभालते हैं. इस के लिए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है.

किसानों की आय में बढ़ोतरी के लिए सरकार उच्च क्वालिटी व उन्नत किस्म के पौधों की नर्सरी को बढ़ावा देने के लिए तेजी से काम कर रही है. प्रत्येक जनपद में पौधशालाएं बनाने का काम किया जा रहा है. इन में किसानों को फूल और फल के साथ सर्पगंधा, अश्वगंधा, ब्राह्मी, कालमेघ, कौंच, सतावरी, तुलसी, एलोवेरा जैसे औषधीय पौधों को रोपने के लिए जागरूक किया जा रहा है. किसानों को कम लागत से अधिक फायदा दिलाने के लिए पौधरोपण की नई तकनीक से जोड़ा जा रहा है.

अब तक 7 करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बताया कि हाईटैक नर्सरी के निर्माण में अब तक 7 करोड़ से ज्यादा की धनराशि खर्च की जा चुकी है. बुलंदशहर में 2, बरेली, बागपत, मुजफ्फरनगर, मेरठ, महोबा, बहराइच, वाराणसी, बलरामपुर समेत 9 जनपदों में हाईटैक नर्सरी की स्थापना के लिए अब तक 7 करोड़ रुपए की धनराशि का भुगतान किया जा चुका है.

ग्राम्य विकास आयुक्त जीएस प्रियदर्शी ने बताया कि प्रदेश में 150 हाईटैक नर्सरी के निर्माण की कार्यवाही मनरेगा कन्वर्जेंस के अंतर्गत की जा रही है, जिस के सापेक्ष 125 हाईटैक नर्सरी की स्वीकृति जनपद स्तर पर की जा चुकी है.

जंगल की आग – पलाश

पलाश को हिंदी में ढाक, बंगाली में पलाश, मराठी में पलस, गुजराती में खाखरो, तेलुगु में मोंदुगा, तमिल में परस, कन्नड़ में मुलुगा, मलयालम में पलास औैर वैज्ञानिक भाषा में ब्यूटिया मोनोस्पर्मा कहते हैं. मार्च माह में पूरा पेड़ सिंदूरी यानी लाल रंग के फूलों से लद जाता है और मीलों दूर से यह अपनी मौजूदगी की सूचना देता है. इसी वजह से इसे फ्लेम औफ फौरेस्ट यानी जंगल की आग भी कहते हैं.

भारत में लाख के कीड़े के परपोषी पेड़ के रूप में पलाश का स्थान कुसुम के बाद है. पलाश पर पैदा लाख अच्छी किस्म की नहीं होती, पर मात्रा दूसरी किसी परपोषी जाति पर पैदा लाख से ज्यादा होती है.

पलाश के पेड़ से हासिल लाख के कीडे़ के भू्रण से बेर और दूसरे लाख पोषियों को निवेशित भी किया जाता है, पर कुसुम पर निवेशित नहीं किया जाता है. इसे जड़ चूषकों यानी रूट सकर्स द्वारा पुनर्जीवित यानी फिर से जिंदा किया जा सकता है. इस के विभिन्न भाग भिन्नभिन्न रूपों में उपयोगी हैं :

पत्तियां : पलाश की पत्तियां फरवरी माह में झड़ जाती हैं और नई पत्तियां फूल खिलने के बाद मार्चअप्रैल माह में निकलती हैं. इस की पत्ती में 20-30 सैंटीमीटर वृत्ताकार माप के 3 पत्रक पाए जाते हैं. पत्तियां शीतल, रुक्ष, ग्राही और कफरात शामक होने से प्राचीन काल से ही रेशभर में दोनापत्तल बनाने के काम आती हैं.

ऐसा माना जाता है कि इन में भोजन करने से भूख बढ़ती हैं और पाचन क्रिया ठीक रहती है. आंखों और दिमाग को भी इस से ऊर्जा मिलती है. इन का उपयोग करने के बाद आसानी से अलग कर नष्ट कर सकते हैं.

पूरी तरह से विकसित एक पेड़ से तकरीबन 2,500 से 4,000 तक पत्तियां हासिल होती हैं जो 350 से 400 पत्तलें बनाने के लिए पर्याप्त है. पत्तियों का उपयोग फोड़ाफुंसी, मुहांसे, गिलटी, हीमोराइड्स वगैरह के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है. इस की पत्तियों में मौजूद ग्लूकोसाइड के चलते ये पौष्टिक चारे के रूप में भी इस्तेमाल होती हैं.

बीज : पलाश की फली मई माह में पक कर तैयार हो जाती है. फली की नोक पर पाया जाने वाला बीज लालकथई रंग का, अंडाकार या गुरदाकार होता है. इस के बीजों में 8-10 फीसदी काइनो तेल, 18 फीसदी एल्युमिनाइड व कुछ फीसदी शर्करा पाई जाती है. बीज और तेल में कृमिनाशक गुणों के चलते इन का इस्तेमाल बुखार, मलेरिया, फीताकृमि व गोलकृमि के इलाज में किया जाता है. तेल व इस की खली में पाया जाने वाला लिपिडरहित पदार्थ कीटनाशक होता है. इसे तेल और खली से अलग कर कीटनाशक के रूप में उपयोगी बनाने के लिए अनुसंधान जारी है. पलाश के बीजों का इस्तेमाल तेल, साबुन उद्योग में भी किया जाता है, जबकि इस की खली प्रोटीन से भरपूर होती है.

फूल : इस के फूल बाहर से मखमली भूरे पीले व भीतर की ओर सिंदूरी लाल रंग के होते हैं और मार्च माह में पूरे वनों में अपनी मौजूदगी दिखाते हैं. इस वजह से ही इन्हें फ्लेम औफ फौरेस्ट कहते हैं. इस के फूलों में सुगंध न होने के चलते लुभावने रंग, पौष्टिक परागण और रस के कारण अनेक कीटों को लुभाते हैं.

Palashअर्क के रूप में पलाश के सूखे फूलों से पीला रंग हासिल होता है जिस में फिटकरी, चूना मिला कर गहरा सिंदूरी या नारंगी रंग हासिल करते हैं जो सिल्क, दूसरे कपड़े यानी फैब्रिक, लकड़ी या खाद्य पदार्थों को रंगने के काम आता है. इस रंग से रंगे हुए कपड़े पांडुरोगी को पहनाने से इस रोग की बढ़वार पर रोक लगती है और चर्म रोग व चेचक के प्रकोप से भी बचाव होता है. फूल सूजन, प्रदाह या जलन को कम करते हैं. होली पर आज भी पलाश के फूलों से रंग बनाया जाता है.

जड़ : पलाश की नई जड़ों से रेशा निकलता है, जो मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में रस्सियां वगैरह बनाने के काम आता है. इस की जड़ की छाल ब्लडप्रैशर के इलाज में फायदेमंद है.

लकड़ी : इस की लकड़ी आमतौर पर गांवदेहात में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होती है. इस की छाल से हासिल अर्क का इस्तेमाल नजला और खांसी के इलाज में किया जाता है.

गोंद : इस की छाल की दरारों और कृत्रिम चीरों से लाल रस निकलता है जो सूख कर लाल गोंद बन जाता है. इसे ढाक का गोंद या बंगाल कीनो कहते हैं. इस में कार्नटिक अम्ल और गौलिक अम्ल 50 फीसदी पिच्छल द्रव्य व 2 फीसदी क्षार पाए जाते हैं. इस गोंद को पुनिया गोंद या कमरकस कहते हैं. यह त्वचा की बीमारियों, मुंह से संबंधित बीमारी, अतिसार, पेचिस, पेट संबंधी बीमारी और दूसरी बीमारियों में बेहद उपयोगी है.

लाख : लाख एक रेजिन स्राव है, जो लेसिफर लेक्का नामक कीट द्वारा स्रावित किया जाता है. यह कीट पलाश के पेड़ परजीवी के रूप में रहता है. एक साल में 2 बार यह हासिल किया जा सकता है.

अप्रैलमई माह में लाख का उत्पादन कम होता है, लेकिन सुनहरे रंग के कारण इस की कीमत ज्यादा होती है, जबकि अगस्तसितंबर माह में हासिल होने वाला लाख गहरे रंग का होने के चलते अपेक्षाकृत कम कीमत में बिकता है.

लाख का उपयोग खोखले गहनों के अंदर भरने, लाख के गहने, खिलौने व ग्रामोफोन रिकौर्ड बनाने में किया जाता है.

इस तरह पलाश दोना, पत्तल कारोबार व लाख उत्पादन के चलते किसानों के लिए कृषि वानिकी के तहत उपयुक्त होता है और प्रयोगों द्वारा इस से खेती की पैदावार पर भी कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होने की पुष्टि हो चुकी है. यह लवणीय मिट्टी के सुधार के लिए भी काफी उपयोगी है.

हाइड्रोजैल : जल प्रबंधन और अधिक उपज

बढ़ती आबादी के साथसाथ कृषि, उद्योग और शहरी आबादी के बीच पानी की कमी होना अब चिता की बात है. इस समस्या से कैसे निबटा जाए, इस के लिए हर रोज नए प्रयोग भी हो रहे हैं.

जल प्रबंधन की अनेक तरकीबें जैसे ड्रिप व फव्वारा सिंचाई, छोटे पैमाने पर जल संचयन यानी पानी जमा करना मल्चिंग, शून्य या कम से कम जुताई जैसे तरीकों को अपनाया जा रहा है.

खेती में कम से कम पानी की जरूरत हो, इसी संदर्भ में विशेषज्ञों ने ऐसा पदार्थ ईजाद किया जिन्हें हाइड्रोजैल कहा जाता है. यह जल संरक्षण के लिए बेहद उपयोगी तकनीक है.

पूसा हाइड्रोजैल : कृषि की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि रसायन संभाग के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजैल तैयार किया है जिसे पूसा हाइड्रोजैल का नाम दिया गया है.

यह कृषि रसायन प्राकृतिक पौलीमर सैल्यूलोस पर आधारित है. यह अपने शुष्क वजन के मुकाबले 350-500 गुना अधिक पानी ग्रहण कर फूल जाता है और पौधे की जरूरत के मुताबिक धीरेधीरे जड़ क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ता है, जिस से पौधे की जड़ में नमी बनी रहती है. यह उत्पाद उच्च तापमान (40 से 50 डिगरी सैल्सियस) पर भी प्रभावी रहता है, इसलिए यह हमारे देश के गरम इलाकों के लिए भी बेहद लाभदायक है.

पूसा हाइड्रोजैल के लाभ : पौधों की जड़ों के आसपास की मिट्टी में नमी बनी रहती है. बारानी क्षेत्रों व सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए पानी की बचत होती है. मिट्टी में पूसा हाइड्रोजैल डालने से सभी तरह की फसलों, जिन में खाद्यान्न व बागबानी फसलें शामिल हैं, में कम सिंचाई करनी पड़ती है. इस प्रकार यह तकनीक सिंचाई, पैसा और समय की लागत को कम करती है.

गेहूं की फसल में इस के असर को जानने लिए पूसा संस्थान व देश के अन्य कई संस्थानों द्वारा परीक्षण किए गए. इन परीक्षणों के नतीजों में पाया गया कि सामान्य तौर पर गेहूं के लिए 5-6 सिंचाइयों की जरूरत रहती है, जबकि पूसा हाइड्रोजैल का इस्तेमाल कर के उपज में नुकसान के बिना आसानी से 2 सिंचाई बचाई जा सकती हैं. इसी तरह मूंगफली, आलू, सोयाबीन, फूलों, शाकीय व अन्य फसलों में भी इस के अच्छे नतीजे देखे गए हैं.

नर्सरी व पौध रोपाई के अच्छे नतीजे : नर्सरी लगाते समय व पौध रोपण के समय पूसा हाइड्रोजैल का प्रयोग अंकुरण व जड़ फुटाव को बढ़ावा देता है. संस्थान के संरक्षित कृषि व प्रौद्योगिकी केंद्र के पौलीहाउस व खेतों में किए गए परीक्षणों में देखा गया है कि गुलदाउदी में पूसा हाइड्रोजैल के इस्तेमाल से अच्छी गुणवत्ता की नर्सरी मात्र 18-20 दिन में तैयार हो जाती है जबकि आमतौर पर नर्सरी तैयार होने में 28-30 दिन का समय लगता है.

मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए पूसा हाइड्रोजैल न केवल बीज के फुटाव, फसल विकास में भी सहायक है, बल्कि  यह पौधे को स्थायी रूप से मुरझाने की स्थिति में लंबे समय तक बचाता है.

कैसे काम करता है पूसा हाइड्रोजैल : मिट्टी में डालने पर पूसा हाइड्रोजैल इसी का एक हिस्सा बन जाता है. इस हाइड्रोजैल के चीनी के दानों जैसे छोटेछोटे कण जड़ के आसपास में सिंचाई या बारिश के बाद अतिरिक्त पानी, जो कि पौधों को नहीं मिल पाता है, को पा कर फूल जाते हैं और पौधों के विकास के दौरान पानी की कमी से पैदा होली वाली स्थिति में जड़ें इन फूले हुए कणों से जरूरत के मुताबिक पानी व पोषक तत्त्व लेती हैं.

कहां और किस कीमत पर : अनेक परिस्थितियों में उगाई जाने वाली अधिकांश फसलों के लिए पूसा हाइड्रोजैल 2.5 से 5.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना सही माना गया है. बाजार में यह उत्पाद निम्नलिखित कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा है:

# कार्बोरंडम यूनिवर्सल प्रा. लि. बैंगलुरु, ब्रांड का नाम कावेरी, मोबाइल नंबर 9449081339.

# अर्थ इंटरनैशनल प्रा. लि., नई दिल्ली, ब्रांड का नाम वारिधर, जी 1, मोबाइल नंबर 9868259735.

इस के अलावा 2 और कंपनियां, हंटिन आर्गेनिक्स प्राइवेट लि., फरीदाबाद व नागार्जुन फर्टिलाइजर्स प्रा. लि., हैदराबाद भी इस उत्पाद को जल्दी ही बाजार में उपलब्ध कराएंगी.

पूसा हाइड्रोजैल की शुरुआती कीमत 1,200 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 1,400 रुपए प्रति किलोग्राम रखी गई है. कंपनियों से मिली जानकारी के आधार पर मांगानुसार कीमत के कम या ज्यादा होने की संभावनाएं हैं.

हाइड्रोजैल का इस्तेमाल : पूसा हाइड्रोजैल का इस्तेमाल तय किए गए तौरतरीकों के अनुसार ही करें. जरूरत के मुताबिक तय की जाने वाली प्रत्येक विधि में यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाइड्रोजैल के कण बीज या पौध के एकदम नीचे या आसपास ही डालें, जिस से पौधें को पूरी नमी मिले.

खास तरीका:

गेहूं, मक्का, दालों, तिलहन वगैरह जैसी फसलों के लिए:

* खेती की तैयारी, पूर्व बोआई व सिंचाई, उर्वरक आदि का प्रयोग सामान्य रूप

से करें.

* हाइड्रोजैल का प्रयोग बोआई के समय सब से ज्यादा लाभदायक है.

* खेत से 20-25 किलोग्राम सूखी मिट्टी लें व उसे एकसमान कर लें. इस में जरूरत के मुताबिक 2.5-5.0 किलोग्राम हाइड्रोजैल व बीज मिलाएं.

* यदि आप डीएपी का प्रयोग कर रहे हैं तो इसे भी खेत में डालने की अपेक्षा मिट्टी जैल के मिश्रण में मिलाना फायदेमंद रहता है.

* तैयार किए गए मिश्रण को सीड ड्रिल या हल द्वारा लाइनों में डालें, बाद में फसल की अवस्था व मिट्टी में नमी के आधार पर सिंचाई करें.

Hydrogelपौध तैयार करने के लिए

कुछ फसलों के लिए पौध भी तैयार करनी होती है जिस के लिए सही वातावरण व पोषण तत्त्वों की तय मात्रा बेहद जरूरी है. पूसा हाइड्रोजैल इस संदर्भ में बहुत उपयोगी है. बोआई से पहले मिट्टी की तैयारी के समय भी इस के इस्तेमाल की सिफारिश की जाती है.

ट्रे में पौध तैयार करने के लिए हाइड्रोजैल (2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है) को सूखे मिट्टी रहित माध्यम में अच्छी तरह मिलाएं. ट्रे को इस मिश्रण से भर लें और ट्रे में बीज बो दें और सामान्य रूप से प्रथम सिंचाई या फर्टीगेशन करें. बाद की सिंचाइयां बीज अंकुरण व समयसमय पर नमी की स्थिति को देखते हुए करनी चाहिए. खेत में पौध तैयार करने के लिए हाइड्रोजैल (2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) और बीज जरूरत के मुताबिक उतनी सूखी मिट्टी में मिलाएं जिसे आसानी से नर्सरी क्षेत्र में समान रूप से फैलाया जा सके.

पौध की खेत में रोपाई के समय

हाइड्रोजैल को सूखी मिट्टी में मिलाएं. तैयार मिश्रण को खेत में बनाई गई कुंड पंक्तियों में समान रूप से डालें. बाद में पौध रोपाई इस तरीके से करें कि डाला गया जैल जड़ के आसपास ही रहे.

डिबलिंग विधि द्वारा फसल (आलू, गन्ना) की रोपाई के समय जैल मिट्टी मिश्रण बीज कलम लगाने के लिए बनाए गए गड्ढों या कुंडों में समान रूप से बांट कर के डालें. बाद में बीज कलम रोप कर कुंड या गड्ढे को ढक दें.

सावधानियां

* पैकेट को अच्छी तरह से बंद कर के रखें, ताकि इस पर नमी का असर न हो.

* बोआई या पौध रोपण के समय हाइड्रोजैल मिट्टी मिश्रण को पूर्ण रूप से नमी रहित सूखी मिट्टी में तैयार करें.

* बीज व मिट्टी के साथ जैल का सभाग मिश्रण करना जरूरी है.

* जैल मृदा मिश्रण का खेत में समान रूप से प्रयोग सुनिश्चित करें.

* नमी रहित स्थान पर ही इस का भंडारण करें.

इसबगोल की जैविक खेती

इसबगोल एक महत्त्वपूर्ण नकदी व औषधीय फसल है. इसबगोल को स्थानीय भाषा में घोड़ा जीरा भी कहते हैं. विश्व की कुल पैदावार की 80 फीसदी इसबगोल की पैदावार भारत में होती है. इस की खेती मुख्य रूप से राजस्थान व गुजरात में की जाती है. इसबगोल को मुख्यतया दानों के लिए उगाया जाता है, पर इस का कीमती भाग इस के दानों पर पाई जाने वाली भूसी है, जिस की मात्रा बीज के भार की 27-30 फीसदी तक होती है.

इसबगोल के भूसी रहित बीजों का इस्तेमाल पशुओं व मुरगियों के लिए आहार बनाने में किया जाता है.

साथ ही, इसबगोल का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी और एलोपैथिक इलाजों में किया जाता है. इस के अलावा इस का इस्तेमाल रंगाईछपाई, आइसक्रीम, ब्रेड, चौकलेट, गोंद और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में भी होता है.

उन्नत किस्में

आरआई 89 : यह किस्म राजस्थान की पहली उन्नत किस्म है. इस के पौधों की ऊंचाई 30-40 सैंटीमीटर होती है. यह 110-115 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरआई 1 : सूखे और कम सूखे इलाकों के लिए मुनासिब इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 29-47 सैंटीमीटर होती है. यह 115-120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 12-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

जलवायु व जमीन

इसबगोल के लिए ठंडी व शुष्क जलवायु अच्छी मानी जाती है. बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 20-25 डिगरी सैल्सियस के बीच का तापमान अच्छा माना जाता है. इस के पकने की अवस्था पर साफ, सूखा व धूप वाला मौसम बहुत अच्छा रहता है. पकाव के समय बारिश होने पर इस के बीज सड़ने लगते हैं और बीजों का छिलका फूल जाता है. इस से इस की पैदावार व गुणवत्ता में कमी आ जाती है. इस की खेती के लिए दोमट, बलुई मिट्टी, जिस में पानी के निकलने की अच्छी व्यवस्था हो, अच्छी रहती है.

खेत की तैयारी

खरीफ फसल की कटाई के बाद खेत की 2-3 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बनाएं और फसल से ज्यादा पैदावार लेने के लिए 5-6 टन सड़ी गोबर की खाद या 3 टन सड़ी देशी खाद व फसल के अवशेष 3 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं. जैव उर्वरकों के रूप में 5 किलोग्राम पीएसबी व 5 किलोग्राम एजोटोबेक्टर प्रति हेक्टेयर की दर से 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर खेत में डालें.

बीज दर व बोआई

इसबगोल का बीज बहुत छोटा होता है. इसे क्यारियों में छिटक कर मिट्टी में मिलाना चाहिए. इस के फौरन बाद सिंचाई कर देनी चाहिए. इस प्रकार छिटक कर बोआई करने के लिए 4-5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

बीजोपचार : इसबगोल की जैविक खेती के तहत फसल को तुलासिया रोग से बचाने के लिए बीजों में नीम, धतूरा व आक की सूखी मिश्रित पत्तियों (1:1:1) से बना पाउडर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से मिलाएं.

Isabgolखरपतवारों की रोकथाम

इसबगोल में 2-3 निराइयों की जरूरत होती है. पहली निराई बोआई के तकरीबन 20 दिनों बाद व दूसरी निराई 40-45 दिनों बाद कर के फसल को खरपतवारों से बचाएं. इस से तुलासिया रोग का हमला भी कम होता है.

सिंचाई

इसबगोल में बोआई के समय, उस के 8 दिनों, 30 दिनों व 65 दिनों बाद सिंचाई करने से अच्छी उपज हासिल होती है.

इसबगोल की फसल में क्यारी विधि के बजाय फव्वारा विधि द्वारा 6 सिंचाइयां (बोआई के समय और 8, 20, 40, 55 व 70 दिनों बाद) करने से अच्छी उपज मिलती है.

कीट व रोग

रोगग्रस्त फसल के अवशेषों को खेत से बाहर कर के नष्ट कर देना चाहिए. गरमी में गहरी जुताई कर के खेत खाली छोड़ें. फसल चक्र अपनाएं यानी बारबार एक ही खेत में इसबगोल की खेती न करें. स्वस्थ, प्रमाणित व रोगरोधी किस्मों का चयन करें.

खेत में इस्तेमाल की जाने वाली गोबर की खाद अच्छी तरह से सड़ी हुई होनी चाहिए. खेत में ट्राइकोडर्मा कल्चर 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अंतिम जुताई के समय मिलाएं. इसबगोल की जैविक खेती में नीम, धतूरा, आक की सूखी पत्तियों के पाउडर को 1:1:1 के अनुपात में मिला कर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें.

फसल को रोगों व मोयले से बचाने के लिए 12 पीले चिपचिपे पाश यानी फैरोमौन ट्रैप प्रति हेक्टेयर लगाएं. दीमक से बचाव के लिए जमीन में बेवेरिया बेसियाना या मोटाराइजियम (मित्र फफूंद) 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिलाएं. पर्णीय छिड़काव के रूप में नीम की पत्तियों का अर्क, धतूरा (10 फीसदी) व गौमूत्र (10 फीसदी) का इस्तेमाल मृदरोमिल आसिता और मोयले की रोकथाम के लिए करें. जरूरत के मुताबिक दोबारा छिड़काव करें.

कटाई, मड़ाई व ओसाई

इसबगोल में 25 से 125 तक कल्ले निकलते हैं. पौधों में 60 दिनों बाद बालियां निकलना शुरू होती हैं. तकरीबन 115-130 दिनों में फसल पक कर तैयार हो जाती है.

फसल पकने पर सुनहरी पीली बालियां गुलाबीभूरी हो जाती हैं और बालियों को दबाने पर दाने बाहर आ जाते हैं.

Isabgolफसल के पूरी तरह पकने के 1-2 दिन पहले ही फसल को काट लेना चाहिए. कटाई सुबह के समय करें, जिस से बीजों के बिखरने का डर न रहे. कटी हुई फसल को 2-3 दिन खलिहान में सुखा कर जीरे की तरह झड़का लें व निकले हुए बीजों की सफाई कर के व सुखा कर बोरियों में भर कर सूखी व ठंडी जगह पर भंडारण करें.

उपज व उपयोगी भाग

इसबगोल की औसत उपज 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इस की भूसी की मात्रा बीज के भार की 30 फीसदी होती है, जो सब से कीमती व उपयोगी भाग है. बाकी 65 फीसदी गोली, 3 फीसदी खली और 2 फीसदी खारी होती है. भूसी के अलावा सभी भाग जानवरों को खिलाने के काम आते हैं.

बड़े काम की खेती की मशीनें

पशु ताकत का इस्तेमाल खेती के कामों में दिनोंदिन कम हो रहा है, जिस के चलते इंजन, ट्रैक्टर, पावर टिलर व मोटरों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन ऐसा कहना ठीक होगा कि देश में सभी पावर साधनों का इस्तेमाल होता रहेगा.

खेती की मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक लंबी योजना तैयार कर के उसे लागू करना होगा. मौजूदा संसाधनों व सामाजिक और माली हालात को ध्यान में रखते हुए छोटे किसानों को सही फार्म मशीनरी के चुनाव पर ज्यादा बल देना होगा. देश के ज्यादातर किसान छोटे किसानों की कैटीगरी में आते हैं, जो ज्यादा पावर वाले व कीमती ट्रैक्टरों को नहीं खरीद सकते.

अगर बीज की बोआई और रोपाई वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो पैदावार में औसतन 15 फीसदी की बढ़वार होती है. अगर खरपतवार की रोकथाम, कटाईमड़ाई, सिंचाई और धान या गेहूं व दलहनी फसलों की मड़ाई में वैज्ञानिक तकरीकों को अपनाया जाए तो पैदावार में काफी बढ़ोतरी हो सकती है.

मशीनीकरण व पावर के इस्तेमाल से पैदावार का सीधा संबंध है. भारतीय खेती में पशु पावर और खेतिहर मजदूर शामिल हैं. फिर भी छोटे व मध्यम दर्जे के किसानों के लिए यह पावर पूरी नहीं है. अगर प्रति हेक्टेयर मुहैया पावर को देखा जाए तो विकसित देशों के मुकाबले अभी भी हम काफी पिछड़े हुए हैं.

आधुनिक फार्म मशीनरी के इस्तेमाल से ज्यादातर खेतों से साल में कम से कम 2 फसलें लेना मुमकिन हो गया है. इस के साथसाथ बढि़या मशीनों, बीज व खाद को सही गहराई और दूरी पर डाल कर किसान पैदावार बढ़ाने में काबिल हो सकते हैं. प्रसार व ट्रेनिंग की कमी से किसानों में खेती की मशीनों के प्रति जानकारी की कमी, समय पर बैंकों से लोन हासिल न होना और अच्छी फार्म मशीनरी का समय पर मुहैया न होना वगैरह कुछ ऐसी वजहें हैं, जिन से फार्म मशीनरी का फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है.

खेती में मशीनों की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए ज्यादातर मशीनरी बनाने वाले किसानों को अच्छे ट्रैक्टर व फार्म मशीनरी मुहैया कराने में मददगार हो रहे हैं. किसानों के लिए आधुनिक फार्म मशीनरी मुहैया कराने व मशीनों की मरम्मत व देखभाल की सुविधा देने के लिए पूरे देश में ग्रामीण कारीगर हैं. इन ग्रामीण कारीगरों को मरम्मत की आधुनिकतम सुविधा मुहैया कराने की जरूरत है.

खेती की पैदावार बढि़या मशीनों से कई गुना बढ़ाई जा सकती है जो ताकत का जरीया, अच्छे काम, काम करने वाले की थकान में कमी को ध्यान में रख कर मुमकिन हो सकता है. बहुत सी सरकारी व प्राइवेट कंपनियां और विश्वविद्यालय लगातार फार्म मशीनरी में सुधार का काम कर रहे हैं जो कि इनसानी थकान को कम व भविष्य में खेती के काम को पूरी तरह मशीनी तरीके से करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

बढि़या मशीनों द्वारा कम समय, पैसा, मेहनत और ऊर्जा का इस्तेमाल कर असरदार तरीके से कम थकान व बिना किसी नुकसान के खेती के काम को अंजाम दिया जा सकता है.

Machineहालांकि किसान बढि़या बीज, खाद, फसल हिफाजत के तरीके, सिंचाई व ताकत का इस्तेमाल कर के पैदावार को बढ़ा रहे हैं, लेकिन अभी भी खेती की मशीनों का इस्तेमाल जानकारी की कमी में कम ही कर रहे हैं. नई व बढि़या मशीनों का इस्तेमाल कर के फसलों की पैदावार को काफी तक बढ़ाया जा सकता है.

हमारे देश में खेत छोटेछोटे हैं. खेतों का आकार छोेटा होने की वजह से किसान बड़ीबड़ी व ज्यादा कीमती मशीनें खरीदने और उन का इस्तेमाल करने में नाकाम हैं.

फार्म मशीनरी का इस्तेमाल खेत और दूसरी बातों पर निर्भर करता है. बीज, खाद व कैमिकल बहुत ही खर्चीले तरीके हैं, जिन का इस्तेमाल कर के पैदावार ज्यादा की जाती है.

इस बात को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी हो गया है कि सुधरे व विकसित फार्म मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए जो कि बीजों की बोआई की दर पर जरूरत के मुताबिक कंट्रोल व खेत में बोआई समय से करें.

इनसान व पशु पावर स्रोत पर निर्भरता को कम करने के लिए यह जरूरी है कि खेती के कामों को पूरा करने के लिए आधुनिक फार्म मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए.

साल 2000-01 में पशु पावर 16.38 फीसदी तक कम हुई व मशीनी पावर में 83.62 की बढ़ोतरी साल 1971-72 के मुकाबले में हुई है. प्रति हेक्टेयर खेती के मजदूरों की संख्या में 0.82-1.44 फीसदी की बढ़वार हुई है, लेकिन फिर भी प्रति हेक्टेयर खेती के मजदूरों की प्रति घंटे पिछले सालों में कई फसलों के लिए कमी पाई गई है.

यह अनुमानित किया गया है कि कुल ऊर्जा का 66-80 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकोें में घरों की देखभाल और 16-25 फीसदी खेती उत्पादन में इस्तेमाल होता है.

बिजली विभाग ने कुल बिजली का तकरीबन 85 फीसदी गांवों को मुहैया किया है. खेती में मशीनीकरण का हिस्सा तकरीबन 9-10 फीसदी तक है. खेती हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जो कि कुल पैदावार का तकरीबन 25 फीसदी है.

पिछले 10 दशकों में फार्म मशीनरी का इस्तेमाल बहुत ही ज्यादा हुआ है. आज के समय में तकरीबन 126 लाख से अधिक ट्रैक्टर, लगभग 9650 कंबाइन, 38.8 लाख से अधिक थ्रेशर व 168 लाख से अधिक सिंचाई के पंप हैं. फार्म मशीनरी कई खेती के कामों जैसे जुताई, बोआई, फसल हिफाजत व गहाई, जोकि तकरीबन 41 फीसदी, 30 फीसदी, 35 फीसदी तक हर किसी के लिए है.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह बहुत जरूरी है कि बढि़या फार्म मशीनरी को गंवई इलाके में खेती के कामों के लिए इस्तेमाल किया जाए, जिस से उत्पादकता को ज्यादा व फसलों की पैदावार में लगने वाले माली बजट को कम किया जाए.

सरकार द्वारा छोटे और मध्यम कैटीगरी के फार्म मशीनरी बनाने वाले को काफी सुविधाएं दी जा रही हैं. कईर् निर्माता किसानों के लिए ट्रेनिंग का भी प्रावधान रखते हैं, जिस से किसानों को फार्म मशीनरी के इस्तेमाल, देखभाल और मरम्मत की जानकारी हो सके.

सांप हमारे मित्र भी हैं

राजस्थान के जोधपुर जिले के वाइल्ड लाइफर शरद पुरोहित सांपों के व्यवहार के बारे में बताते हैं, ‘‘ मुझे बचपन से ही सांपों ने अपनी ओर आकर्षित किया. मैं ने हमेशा ही इन्हें असहाय पाया. सांपों के कहीं भी दिखाई दे जाने पर इन्हें मार दिए जाने की परंपरा ने मुझे भीतर तक झंझोर दियाहै. उन की इसी अनदेखी के चलते न जाने कब मेरा स्वाभाविक स्नेह इन्हें जिंदगी देने की वजह बन गया.’’

दुनियाभर में सांपों की 3,400 प्रजातियां हैं. इन में से तकरीबन 2,000 तो भारत में ही पाई जाती हैं. चूंकि मेरे काम का क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान है, इसलिए मैं ने यहीं पाई जाने वाली प्रजातियों पर ज्यादा काम किया है. तकरीबन 25 ऐसी प्रजातियां हैं, जो राजस्थान में मिल जाती हैं. इन में से कुछ ही सांप जहरीले और घातक होते हैं.

आम लोगों की जिंदगी और किसानों के लिए सांपों का होना क्यों जरूरी है? जैव संतुलन में चूहे इनसानी जिंदगी में सब से बड़े घाटे का सौदा हैं. वे हमारे सब से बड़े दुश्मन हैं. ये चूहे हर साल खाद्यान्न का एक बड़ा हिस्सा चट कर जाते हैं. सांप इन चूहों के सब से बड़े दुश्मन हैं, इसलिए सांपों का सरंक्षण किया जाना बेहद जरूरी है.

सांपों की प्रजातियों में 3 सांप ऐसे भी हैं, जो हमारे लिए घातक हैं, वह भी मुठभेड़ हो जाने पर या छू लेने भर से, वरना खुद से हमला करना इन की फितरत नहीं.

मेरा अनुभव कहता है कि हमारी असावधानी से ही हमारी जानें जाती हैं. कोबरा, करैत, वाइपर ये कुछ ऐसे सांप हैं, जिन से हमारी जान जोखिम में पड़ सकती है.

कोबरा

यह सांप हमारे घरों के आसपास रहना ज्यादा पसंद करता है. यह बहुत ही समझदार  होता है. पहले तो यह हमें सचेत करता है. एकदम हमला नहीं करता. हमारे द्वारा दूरी बनाए रहने तक हम से दूर जाने की कोशिश करता है.

करैत

यह सांप बहुत ही घातक है. अकसर रात को निकलने वाला यह सांप ठंडक से बचने के लिए इनसानी इलाकों के नजदीक चला आता है और नींद में सोए हुए बेकुसूर लोग इस का शिकार बनते हैं. इस के दंश यानी काटने के निशान बहुत सूक्ष्म होते हैं. इस वजह से इस की पहचान बड़ी मुश्किल से हो पाती है.

लोगों में एक गलतफहमी है कि एक पीवणा सांप भी होता है, उस का जिम्मेदार भी यही होता है, लेकिन यह भी बिना छेड़े, हम से दूर भागना पसंद करता है.

वाइपर

इस सांप को शुष्क इलाकों का राजा कहते हैं. यह घातक और विषैला सांप है. यह सांप छोटीछोटी झाड़ियों और मिट्टी में रहना ज्यादा पसंद करता है. करीब जाने पर यह फुंफकारता है. इस की फुंफकार बहुत डरावनी होती है. आम आदमी इसे सुनते ही दूर हट जाता है.

इस की खराबी या अवगुण यह है कि यह बिना छेड़े ही हम पर हमला कर सकता है. इस से दूर रहना ही बचाव है. आम भाषा में इसे ‘भांडी’ यानी ‘पूंछ कटी’ भी कहते हैं.

वाइपर चूहों का बड़ा शिकारी है. जैसलमेर और बाड़मेर जैसे सीमांत इलाकों में इस के डसने की सब से ज्यादा खबरें मिलती हैं.

शहरी इलाकों में है इन का राज

शहरी इलाकों या पुराने शहरी इलाकों में ‘सैंड बोआ’, ‘ग्लोसी बेलिड’, ‘अर्थ बोआ’, ‘वर्मस्नेक’, ‘कोबरा’ जैसे सांप सब से ज्यादा पाए जाते हैं, जो बरसात के दिनों में ज्यादा सक्रिय दिखते हैं.

गांवों और कसबों में बसे खेतों की बात करें, तो ‘सिंड अवल हैडेड’, ‘रैड स्पाटेड’, ‘ब्लैक हैडेड रौयल स्नेक’, ‘एफ्रो एशियन सैंड स्नेक’, ‘कैट स्नेक’, ‘रैट स्नेक’, ‘वुल्फ स्नेक’ जैसे सांप अधिक मिलते हैं.

तो बचाव किस तरह हो

सर्प व्यवहार विशेषज्ञ शरद पुरोहित बताते हैं कि हम क्या करें, जब ये हमारे सामने हों. ऐसे सवाल अकसर ही पूछे जाते हैं. मेरा जवाब होता है, बस अपनी नजरें उन पर जमाए रहें. अगर ये खुली जगह पर हैं तो खुद ही चले जाएंगे और यदि घर में निकल आए हैं तो आप का फर्ज बनता है, कि बिना कोई हलचल किए, बहादुरी दिखाने की कोशिश किए बगैर किसी माहिर सांप विशेषज्ञ की मदद ले कर इन का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए.

इन को भूल कर भी बिना पहचान किए छूने की कोशिश से बचें. लाठी, चिमटा, टोंग वगैरह से प्रहार इन के लिए घातक साबित हो सकता है, ये जितने ताकतवर दिखाई पड़ते हैं, उस से ज्यादा कमजोर इन की हड्डियां और सिर होते हैं. रैस्क्यू के बाद ये जी नहीं पाते, यथासंभव प्रबंधन होना चाहिए, हैंडलिंग बिलकुल भी न करें.

कुछ इलाकों में इन्हें देखते ही मार देने का रिवाज है. मेरा मानना है, चूंकि यह किसानों के परम मित्र हैं, इन्हें सम्मान दिया जाना जरूरी है. ये हमारे जीने की वजह हैं, हमारी जिंदगी में इन की उपयोगिता भी बराबर की है.

सांप को पलकें नहीं दीं, इन्हें सुनाई नहीं देता, इन के हाथपैर, सींग नहीं होते, महज मुंह और रेंगने के लिए पूरा शरीर धरती से चिपकाए रहते हैं. इन की फुंफकार या सर्र की आवाज ही एक हथियार है जो संकट में इन की हिफाजत करती है. अगर यह खुद को फंसा हुआ पाएंगे तो ही आक्रामक होंगे, मुठभेड़ करेंगे. ऐसे सांप जो घातक नहीं हैं, उन्हें खेतों, गोदामों वगैरह में घूमने दें. ये आप को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएंगे.

तकरीबन 3,000 से भी ज्यादा सांपों की जिंदगी बचा चुके शरद पुरोहित कहते हैं, ‘‘अकसर देखता हूं कि मेरे पहुंचने से पहले ही इन से कोई छेड़खानी हुई हो तो यह सांप आक्रामक नजर आते हैं. इस के उलट अगर माहौल शांत रहा हो तो ऐसा लगता है मानो सांप बहुत कहने में लगता है और खुद ही रैस्क्यू का हिस्सा बन हमारा सहयोगी हो जाता है.

‘‘मुझे ये सांप बेहद शरीफ, सुंदर और आकर्षक लगने के साथसाथ असहाय लगते हैं. रेस्क्यू करने के शुरुआती दिनों में पहलेपहल मेरा परिवार बहुत घबराता था, पर अब वे सहयोगी हैं. हर साल वन विभाग द्वारा इस तरह की कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है.

‘‘मैं जिज्ञासुओं को इन सांपों की पहचान, रैस्क्यू और बाइट प्रबंधन के तरीकों पर ट्रेनिंग देता हूं.  शहर के कई नौजवानों को मैं ने अपने साथ वालंटियर की तरह तैयार कर रखा है. मैं इस काम को वैज्ञानिक तरीके से करने की बारीकियां इन नौजवानों को सिखला रहा हूं.

‘‘कालेज, स्कूल समेत कई विभागों को मैं ने अपनी इस जागरूकता मुहिम में शामिल किया है, पत्रपत्रिकाओं के जरीए भी मेरा प्रयास जारी है.

‘‘खुशी की बात है कि अब मुझे जैसे कुछ जागरूक नौजवानों की बात का असर रंग दिखा रहा है, खासकर जोधपुर में अब कोई इन सांपों को मारता नहीं है.

हर साल जुलाई से अक्तूबर माह तक हम नौजवानों की टीम ‘यूथ अरण्य’ दिनरात मुफ्त सेवा देती रहती है. पर, अफसोस इस बात का है कि प्रशासन इस विषय को कभी आपदा प्रबंधन का हिस्सा नहीं मानता, जबकि यह एक जरूरी काम है कि इनसान और जानवर दोनों बचे रहें, सुरक्षित रहें.

‘‘हमारी जैसी कोशिशें शायद पूरे देश में जारी हैं. सुझाव  है कि सरकारी अस्पतालों में भी इस तरह की एक कार्यशाला रखी जाए और इन की पहचान संबंधी समझ को आम लोगों में गहरे उतारा जाए, को समझाया  जाए. आपातकाल में इन के संबंधित चित्र डिसप्ले हों, ताकि इन के डसने से पीडि़तों को तुरंत इलाज मिल सके.’’

 

मधुमक्खीपालन से किसानों को फायदा

मधुमक्खीपालन से किसानों को दोहरा फायदा होगा. एक तो मधुमक्खीपालन से तैयार होने वाले शहद और मोम की बिक्री से अतिरिक्त आमदनी होगी और दूसरी फसल का उत्पादन भी बेहतर होगा.

मधुमक्खीपालन से शहद, मोम, रौयल जैली में दूसरे कई उत्पाद किसान हासिल कर सकते हैं जो उन की आमदनी बढ़ाने के लिए मददगार साबित होते हैं.

वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाक्टर आनंद सिंह का कहना है कि पारंपरिक फसलों में प्राकृतिक मार के चलते कई बार फसल खराब होने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है.

ऐसे में मधुमक्खीपालन के जरीए किसान अपनी पैदावार और आमदनी को बढ़ा सकते हैं. किसान एपीकल्चर यानी मधुमक्खीपालन की ट्रेनिंग ले कर और इसे अपना कर दोहरा फायदा ले सकते हैं.

Honeyदुनिया में मधुमक्खियों के तकरीबन 20,000 प्रकार हैं. इन में से केवल 3 प्रकार की मधुमक्खी ही शहद बना पाती हैं. आमतौर पर मधुमक्खी का जो छत्ता होता है, उस में एक रानी मक्खी होती है. इस रानी मक्खी के अलावा छत्ते में कई हजार श्रमिक मक्खी और कुछ नर मधुमक्खी भी होती हैं. मधुमक्खी श्रमिक मधुमक्खियों की मोम ग्रंथि से निकलने वाले मोम से अपना घर बनाती हैं, जिसे आम भाषा में शहद का छत्ता कहा जाता है.

मधुमक्खीपालन में रखें खास ध्यान

विशेषज्ञों के मुताबिक, मधुमक्खियां अपने कोष्ठक का इस्तेमाल अंडे सेने और भोजन इकट्ठा करने के लिए करती हैं, इसलिए किसानों को मधुमक्खीपालन के समय कुछ बातों का ध्यान रखने की जरूरत है.

दरअसल, मधुमक्खी छत्ते के ऊपरी भाग का इस्तेमाल शहद जमा करने के लिए करती हैं. ऐसे में किसानों को यह चाहिए कि छत्ते के अंदर परागण इकट्ठा करने, श्रमिक मधुमक्खी, डंक मारने वाली मधुमक्खियों के अंडे सेने के कोष्ठक बने होने चाहिए. कुछ मधुमक्खियां खुले में अकेले छत्ते बनाती हैं, जबकि कुछ अन्य मधुमक्खियां अंधेरी जगहों पर कई छत्ते बनाती हैं. मधुमक्खीपालन में उपकरणों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. ऐसे में किसानों को एपीकल्चर के विशेषज्ञ या फिर ऐसे किसान से टे्रनिंग ले कर मधुमक्खीपालन को अपनाना चाहिए जो इस की अच्छी जानकारी रखता हो.