23,731 करोड़ रुपए की गोबर-धन योजना (GOBARdhan Scheme) लागू, गोबर और फसल के कचरे से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाने वालों को सरकार देगी तय कीमत.

बेकार समझे जाने वाले गोबर और खेती के कचरे से अब अधिक कमाई की जा सकेगी. केंद्र सरकार ने 23,731 करोड़ रुपए की ‘गोबर-धन’ योजना लागू कर दी है. इस योजना के तहत गोबर, फसल अवशेष और दूसरे जैविक कचरे से कंप्रेस्ड बायोगैस यानी CBG बनाने को बढ़ावा दिया जाएगा.

खरीद की गारंटी और मिलेगी सरकारी मदद:
सबसे खास बात यह है कि कंप्रेस्ड बायोगैस बनाने वाले प्लांटों को बाजार मिलने की चिंता कम होगी. सरकार की योजना के तहत बिक्री योग्य CBG की 100 प्रतिशत तक खरीद की गारंटी सरकार द्वारा दी जाएगी और कम से कम 10 साल तक तय कीमत पर CBG खरीदने की व्यवस्था होगी. इसके अलावा प्लांट लगाने वालों को आर्थिक सहायता भी मिलेगी.

अब कीमती होगा गोबर और कचरा:
GOBAR-DHAN का पूरा नाम ‘गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन’ है. इसमें पशुओं के गोबर के साथ धान की पराली, फसल अवशेष, पशुओं के चारे का बचा हुआ कचरा और अन्य जैविक कचरे का इस्तेमाल किया जा सकेगा.

इससे किसानों के लिए गोबर और फसल अवशेष केवल कचरा नहीं रहेंगे, बल्कि कमाई का साधन बन सकते हैं. गांवों में CBG प्लांट लगने से गोबर और कृषि कचरे की मांग भी बढ़ सकती है.

मिलेगी तय कीमत:
सरकार ने CBG का सरकारी मूल्य 2,110 रुपए प्रति MMBTU तय किया है. 95 प्रतिशत मीथेन की मात्रा के आधार पर यह करीब 98 रुपए प्रति किलो के बराबर है. इसमें टैक्स और कंप्रेशन शुल्क शामिल नहीं हैं.
यह कीमत कम से कम 31 मार्च 2036 तक लागू रहेगी.
हालांकि, उत्पादन लागत, महंगाई और दूसरी परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य में कीमत में बदलाव किया जा सकता है.

CNG और PNG में बढ़ेगा इस्तेमाल:
CBG को प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर ग्राहकों तक पहुंचाया जाएगा. ऐसा होने से देश में CBG की मांग बढ़ने की उम्मीद है.

किसानों के लिए क्या फायदा?
किसानों , पशुपालकों के लिए इस योजना का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि गांवों में गोबर और फसल अवशेष की उपयोगिता बढ़ेगी. किसान अपने स्तर पर या समूह बनाकर CBG और जैविक खाद से जुड़े कारोबार से जुड़ सकते हैं. इससे पशुपालन और खेती से मिलने वाली आमदनी के अलावा कमाई का एक और रास्ता बन सकता है.

10 सालों के लिए बनाई योजना:
योजना 2026-27 से 2035-36 तक लागू रहेगी. ऐसे में आने वाले वर्षों में गांवों में गोबर, फसल अवशेष और जैविक कचरे पर आधारित छोटे-बड़े कारोबार के अवसर बढ़ सकते हैं.

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