आज भले ही फास्ट फूड और आधुनिक मिठाइयों का चलन बढ़ गया हो, लेकिन बिहार के बाढ़ इलाके की लाई आज भी अपने अनोखे स्वाद और खुशबू के कारण लोगों के दिलों पर राज करती है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश और देश के कई हिस्सों में अभी भी बहुत से लोग इस पारंपरिक मिठाई बाढ़ की लाई से अनजान हैं, लेकिन जो एक बार इसका स्वाद चख लेता है, वह इसे दोबारा जरूर खोजता है.
पटना का गुलजारबाग: लाई की सबसे बड़ी मंडी
पटना के गुलजारबाग क्षेत्र को बाढ़ की लाई का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र माना जाता है.
- यहां नेपाल और उत्तर बिहार से खोबिया मंगाई जाती है
- खोबिया को भूनकर कारीगर लाई तैयार करते हैं
- बाढ़ क्षेत्र में करीब 10 हजार परिवार लाई बनाने और बेचने के व्यवसाय से जुड़े हैं
यह परंपरागत हुनर आज कई परिवारों की आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है.
स्वाद के दीवाने: देश से विदेश तक
लड्डू जैसी दिखने वाली यह लाई न सिर्फ बिहार में, बल्कि विदेशों में भी पसंद की जाती है.
- खोबिया आसानी से पचने वाला खाद्य पदार्थ है
- पहले इसे मरीजों के हल्के भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था
- करीब 50 साल पहले लाई ने एक स्वादिष्ट मिठाई का रूप ले लिया
आज इसका स्वाद पहले से ज्यादा समृद्ध और लोकप्रिय हो चुका है.
पर्यटकों को रोक लेती है लाई की खुशबू
जब देश-विदेश के पर्यटक बिहार आते हैं और बाढ़ क्षेत्र से गुजरते हैं, तो सड़क किनारे सजी लाई की दुकानें उन्हें रुकने पर मजबूर कर देती हैं. बाढ़ में प्रवेश करते ही हवा में लाई की भीनी-भीनी खुशबू माहौल को खास बना देती है.
कैसे बनती है बाढ़ की लाई
पिछले 15 वर्षों से लाई का व्यवसाय कर रहे रमेश साव बताते हैं कि बाढ़ के चोंदी मोहल्ले में बड़े पैमाने पर लाई बनाई जाती है, जहां यह एक लघु उद्योग का रूप ले चुकी है. यहां से रोजाना लगभग 50 क्विंटल लाई बाजार में भेजी जाती है.
लाई बनाने की पारंपरिक विधि
- मावे को कड़ाही में बादामी रंग होने तक भूना जाता है
- इससे खुशबू बढ़ती है और लाई 8–10 दिन तक ताजा रहती है
- इलायची को कूटकर पाउडर बनाया जाता है
- चीनी की सख्त चाशनी में भूना मावा, इलायची, गुलाबजल और खोबिया मिलाई जाती है
- ठंडा होने पर हाथों से लड्डू का आकार दिया जाता है
पैकिंग और कीमत
- लाई को ताड़ के पत्तों से बने डिब्बों में पैक किया जाता है
- इससे स्वाद और खुशबू लंबे समय तक बनी रहती है
- कीमत: ₹150 से ₹1000 प्रति किलो (गुणवत्ता के अनुसार)
विदेशों तक पहुंची बाढ़ की लाई
लाई कारोबारी भूषण कुमार बताते हैं कि अमेरिका, यूरोप और अरब देशों में बाढ़ की लाई के शौकीन बड़ी संख्या में हैं. पर्यटक इसे अपने साथ ले जाते हैं. विदेशों से ऑनलाइन और कोरियर के जरिए ऑर्डर आते हैं. तय पते पर लाई सुरक्षित भेजी जाती है
बाढ़ की लाई सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान है. यह परंपरा, स्वाद और रोजगार—तीनों को एक साथ जोड़ती है और आज भी देश-विदेश में अपनी खास जगह बनाए हुए है.





