भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के ग्राम जसरोपनगर गोयाना में ‘मेरा गांव-मेरा गौरव’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘संतुलित उर्वरक उपयोग'(Fertilizers in Agriculture)अभियान के तहत कृषक संगोष्ठी का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया. यह कार्यक्रम उक्त अभियान के अंतर्गत आयोजित गतिविधियों की श्रृंखला का प्रारंभिक चरण था. कार्यक्रम में 314 किसानों के साथ-साथ वैज्ञानिकों एवं कृषि अधिकारियों ने भाग लिया, जिससे किसानों की सक्रिय सहभागिता देखने को मिली.

700 गांवों तक पहुंचेंगे कृषि वैज्ञानिक

यह आयोजन एक राष्ट्रव्यापी पहल का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत भा.कृ.अ.प.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली, के साथ-साथ झारखंड एवं असम परिसरों तथा देशभर में स्थित 9 क्षेत्रीय स्टेशनों के 129 वैज्ञानिक दल लगभग 700 गांवों का दौरा करेंगे. इस पहल में लगभग 600 वैज्ञानिक शामिल हैं, जो किसानों के साथ प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन एवं सतत कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का कार्य करेंगे.

खाद उर्वरक से अधिक तकनीक जरूरी

मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में डॉ. सीएच. श्रीनिवास राव, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने के महत्त्व पर बल दिया. उन्होंने बताया कि उर्वरकों (Fertilizers in Agriculture)  के उपयोग से पूर्व मृदा परीक्षण अत्यंत आवश्यक है तथा किसानों को केवल यूरिया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश का संतुलित उपयोग करना चाहिए. उन्होंने हरित खाद, जैव उर्वरकों, वर्मी कंपोस्टिंग, मल्चिंग एवं संरक्षित खेती जैसी तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि फसल अवशेषों को प्रभावी रूप से जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है. जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि संतुलित पोषक तत्त्वों का उपयोग मृदा की उर्वरता बनाए रखने तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है. उन्होंने किसानों को किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के गठन हेतु भी प्रेरित किया, जिससे सामूहिक शक्ति एवं विपणन क्षमता में वृद्धि हो सके.

अनेक तकनीकों का प्रदर्शन

किसानों के लाभार्थ पूसा एसटीएफआर मीटर, पूसा जैव उर्वरक एवं पूसा डीकंपोजर पर व्याख्यान एवं प्रदर्शन आयोजित किए गए. इन सत्रों में मृदा स्वास्थ्य एवं एकीकृत पोषक तत्त्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण हेतु पूसा एसटीएफआर मीटर का उपयोग, जैव उर्वरक एवं कंपोस्टिंग तकनीक, फसल विविधीकरण तथा जैविक एवं प्राकृतिक खेती जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया. इसके अतिरिक्त दलहनी फसलों के लिए सतत तकनीकों पर विशेष सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर बल दिया गया.

कार्यक्रम के दौरान किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग (Fertilizers in Agriculture) , मृदा स्वास्थ्य एवं उन्नत कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करने के लिए जानकारीपरक साहित्य का वितरण भी किया गया. कार्यक्रम में सभी वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं किसानों के योगदान की सराहना की गई.

डॉ. आर. एन. पडारिया, संयुक्त निदेशक (प्रसार), डॉ. देबाशीष मंडल, अध्यक्ष, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विज्ञान संभाग, डॉ. लिवलीन शुक्ला, प्रधान वैज्ञानिक, माइक्रोबायोलॉजी, डॉ. बृजेश मिश्रा, प्रधान वैज्ञानिक, सूक्ष्मजीव विज्ञान, डॉ. राजीव कुमार, प्रधान वैज्ञानिक, कृषि शस्य विज्ञान, डॉ. दिनेश कुमार, प्रधान वैज्ञानिक, शस्य विज्ञान, डॉ. संदीप लाल, प्रधान वैज्ञानिक, बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संभा तथा डॉ. देबरूप दास, वैज्ञानिक, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विज्ञान संभाग भी इस अवसर पर उपस्थित रहे.

यह पहल किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाने तथा सतत एवं जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने हेतु निरंतर प्रयासों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है.

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