Animal Fodder : पशुओं के लिए ज्वार खास चारा फसल (Animal Fodder) है. यह पोषक तत्त्वों से भरपूर है और खाने में पशुओं को स्वादिष्ठ भी लगती है. जिस समय चारे की कमी होती है तब इस का साइलेज बना कर पशुओं को खिलाया जाता है.
जमीन व खेत की तैयारी : ज्वार की खेती वैसे तो सभी तरह की जमीन में की जा सकती है, पर अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इस की खेती के लिए बढि़या मानी गई है. फसल की बढि़या पैदावार के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करना चाहिए.
बीजाई का समय
एक कटाई वाली किस्मों के लिए सिंचित इलाकों में : गरमी की फसल की बोआई का सही समय 20 मार्च से 10 अप्रैल तक होता है. खरीफ में फसल की बीजाई का सही समय 25 जून से 10 जुलाई होता है.
जिन इलाकों में सिंचाई के लिए पानी की कमी है और बारिश के भरोसे ही रहना पड़ता है वहां खरीफ की फसल पहली बरसात होते ही बो देनी चाहिए.
ज्यादा कटाई वाली किस्मों के लिए : ज्यादा कटाई वाली किस्मों की बोआई अप्रैल के पहले पखवारे में कर देनी चाहिए. यदि खेत खाली न हो तो बोआई मई के पहले हफ्ते तक भी की जा सकती है.
बीज की मात्रा और बीजाई का तरीका : ज्वार के लिए 20-24 किलोग्राम बीज व ज्वार की ही एक किस्म मीठी सूड़ान घास के लिए 12 से 14 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ के हिसाब से लें और 2.5 से 4 सैंटीमीटर गहराई और 25-30 सैंटीमीटर के फासले पर लाइनों में ड्रिल या पोरे की मदद से बीजाई करें. यदि बीज की छिड़काव विधि से बोआई करनी है तो बीज की मात्रा 15-20 फीसदी तक बढ़ाएं.
एक कटाई वाली ज्वार की किस्मों की लोबिया के साथ 2:1 के अनुपात में (2 कतार ज्वार और 1 कतार लोबिया) बोआई की जाए तो चारे की क्वालिटी बढ़ जाती है और पशुओं को यह चारा (Animal Fodder) ज्यादा स्वादिष्ठ लगता है.
उर्वरक प्रबंधन
सिंचित या ज्यादा बारिश वाले इलाकों में : 20 किलोग्राम नाइट्रोजन (44 किलोग्राम यूरिया) प्रति एकड़ बीजाई के समय और 10 किलोग्राम नाइट्रोजन (22 किलोग्राम यूरिया) एक महीने बाद डालें.
सूड़ान घास या ज्यादा कटाई वाली ज्वार में हर कटाई के बाद 10 किलोग्राम नाइट्रोजन (22 किलोग्राम यूरिया) प्रति एकड़ डालें.
कम बारिश या बारानी इलाकों के लिए : 20 किलोग्राम नाइट्रोजन (44 किलोग्राम यूरिया) प्रति एकड़ दें. सारी खाद बीजाई से पहले कतारों में डालें.
रेतीली व फास्फोरस की कमी वाली जमीनों में : 6 किलोग्राम शुद्ध फास्फोरस (40 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट) प्रति एकड़ के हिसाब से बोआई के समय डालें.
खरपतवार प्रबंधन : ज्वार में खरपतवारों की रोकथाम के लिए समय पर निरागईगुड़ाई करें और जरूरत पड़े तो सुरक्षित कीटनाशक का उचित मात्रा में इस्तेमाल करें जिस से खरपतवार नियंत्रण में रहेंगे और जमीन में नमी भी बनी रहेगी.
सिंचाई : मार्चअप्रैल में बोई गई फसल में पहली सिंचाई बोआई के 15-20 दिन बाद और आगे की सिंचाइयां 20-25 दिन के अंतराल पर करें. इस प्रकार तकरीबन 5 सिंचाइयों की जरूरत होती है.
बारिश के मौसम में बोई गई फसल में आमतौर पर सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. यदि बरसात देरी से हो तो जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें. ज्यादा कटाई वाली फसल में हर कटाई के बाद सिंचाई जरूर करें. इस से फुटाव जल्दी व ज्यादा होता है.
नुकसान पहुंचाने वाले कीट
गोभ छेदक मक्खी : यह कीट फसल को मार्च से मध्य मई और मध्य जुलाई से सितंबर तक हानि पहुंचाता है इसलिए फसल को मध्य मई से ले कर जून माह तक बो दें और बीज की 10 फीसदी मात्रा ज्यादा प्रयोग में लाएं. अधिक प्रकोप होने पर फसल में 400 ग्राम कार्बारिल (50 फीसदी) प्रति एकड़ को 200 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. अगर जरूरत हो तो दूसरा छिड़काव 10-12 दिन बाद करें. परंतु इस बात का ध्यान रखें कि छिड़काव के बाद इस का चारा पशुओं को 21 दिन तक न खिलाएं.
तना छेदक : इस कीट का हमला फसल उगने के 15 दिन बाद शुरू हो जाता है. छोटी फसल में पौधों की गोभ सूख जाती है. बड़े पौधों में इस की सूंडि़यां तने में छेद बना कर फसल की पैदावार व क्वालिटी को काफी कम कर देती हैं.
टिड्डा : ये कीट ज्वार की फसल को छोटी अवस्था से ले कर बड़ी होने तक पूरे समय नुकसान पहुंचाते हैं. नए और पुराने पत्तों को किनारों से खाते हैं जिस से भारी प्रकोप की अवस्था में केवल पत्तों की मध्य शिराएं और कभीकभी तो केवल पतला तना ही रह जाता है. फसल छोटी रह जाती है और बढ़वार रुकने के कारण कभीकभी दाने भी नहीं बनते हैं.
फसल पर इन कीड़ों की तादाद बहुत होती है जिस से इन के मलमूत्र की बहुतायत के कारण फफूंद आ जाती है और फसल चारे (Animal Fodder) के योग्य नहीं रहती. इस कीड़े की रोकथाम के लिए 500 मिलीलिटर मैलाथियान (50 ईसी) व 750 ग्राम कार्बारिल (50 फीसदी) का छिड़काव 250 लिटर पानी में प्रति एकड़ के हिसाब से करें.
बीमारियां
पत्तों के रोग : आमतौर पर एंथ्रेक्नोज पत्ती का झुलसा और लाल धब्बे के रोग वगैरह ज्वार को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. इन से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधक किस्मों का इस्तेमाल करें. जमीन में मौजूद रोग तत्त्वों की रोकथाम के लिए बीज को बिनोमिल या सेरेसन 2-3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें, फिर इसे (Animal Fodder) बोएं.





