Animal Feed : अजोला पानी की सतह पर तैरने वाला जलीय फर्न है. यह छोटेछोटे समूह में सघन हरित गुच्छे की तरह तैरता व फैलता है. भारत में इस की प्रजाति अजोला पिन्नाटा और एनबियाना काफी सही पाई गई है. यह ज्यादा गरमी सहन करने वाली किस्म है.

अजोला पशुओं के लिए कम लागत का एक पौष्टिक आहार (Animal Feed)  है. शुष्क भार के आधार पर इस में 25-35 फीसदी प्रोटीन, 10-12 फीसदी खनिज पदार्थ और 7-10 अमीनो अम्ल पाए जाते हैं. यह जल्दी बढ़ने वाली किस्म है. बोआई के बाद इस का उत्पादन 8-10 दिनों के अंदर ही मिलना शुरू हो जाता है.

पशुओं को पूरक आहार के रूप में अजोला को खिलाने पर 15-20 फीसदी तक दूध ज्यादा बढ़ जाता है. देश के विभिन्न प्रदेशों व क्षेत्रों में चारे व पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा करने के लिए अजोला उत्पादन को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया जा रहा है. यह पानी के स्थिर स्रोतों में प्राकृतिक रूप से भी उगाया जा रहा है. पशुओं के लिए अजोला एक संतुलित आहार (Animal Feed) के रूप में प्रयोग किया जाता है.

अजोला खिलाने से न केवल पशु सेहतमंद और निरोग रहता है, बल्कि दूध की मात्रा भी बढ़ी हुई पाई गई है. इस के अलावा शारीरिक विकास में भी यह काफी सहायक साबित हुआ है.

छनाई : एक सैंटीमीटर वर्गाकार छिद्रयुक्त प्लास्टिक की छलनी से अजोला निकाला जाता है. निकालते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उस में मिट्टी व गोबर का घोल न आने पाए.

अजोला उत्पादन की विधि

* कृत्रिम रूप से अजोला के उत्पादन के लिए 15-20 सैंटीमीटर गहरे पानी के गड्ढे की जरूरत होती है.

* गड्ढे का आकार तकरीबन 4 मीटर लंबा, 1.5 मीटर चौड़ा और 20 सैंटीमीटर गहरा सही होता है.

* इस के बाद गड्ढे की सतह पर प्लास्टिक की पन्नी बिछा देते हैं. इस के आसपास लगे पेड़ों की जड़ें गड्ढे में न जाएं.

* प्लास्टिक की पन्नी के लगे होने से गड्ढे में रिसाव द्वारा बाहर का पानी नहीं पहुंचता और तापमान भी नियंत्रित रहता है.

* गड्ढे में प्लास्टिक की पन्नी इस तरह से बिछानी चाहिए, जिस से उस में परत न पड़े.

* तकरीबन 10-15 किलोग्राम छनी हुई मिट्टी समान रूप से पौलीथिन के ऊपर डाल देते हैं.

* इस के बाद 5 किलोग्राम गोबर, 20 ग्राम अजोफर्ट या एसएसपी का 10 लिटर पानी में घोल बनाते हैं और इस घोल को गड्ढे में डालते हैं जिस से कि पानी का स्तर 8 सैंटीमीटर हो जाए.

* तकरीबन 1-2 किलोग्राम ताजा रोगमुक्त अजोला के बीज गड्ढे में डालते हैं.

* 7-10 दिनों में अजोला पूरी तरह से बढ़वार कर गड्ढे में भर जाता है. इस तरह तकरीबन 4 वर्गमीटर से 2 किलोग्राम अजोला प्रतिदिन हासिल कर सकते हैं.

* प्रत्येक 7 दिनों के अंतराल पर गोबर 2 किलोग्राम, अजोफास 25 ग्राम, 20 ग्राम अजोफर्ट को 2 लिटर पानी में घोल कर गड्ढे में डालते रहना चाहिए, जिस से अजोला का उत्पादन अधिक और टिकाऊ बना रहता है.

* इस की उत्पादन लागत बहुत कम है.

कटाई : अजोला की कटाई करते समय निम्न सावधानी बरतनी चाहिए:

* अजोला 7-10 दिनों में तैयार हो जाता है. इसे प्लास्टिक की छलनी से निकालना चाहिए, जिस के सूराख एक सैंटीमीटर आकार के हों, ताकि पानी गड्ढे में ही रहे.

* आधी बालटी पानी में अजोला को अच्छी तरह से धो लेना चाहिए. उस के बाद ही इस का प्रयोग दुधारू पशुओं के लिए किया जाना चाहिए, ताकि गोबर की गंध खत्म हो जाए, फिर पशु इसे स्वाद से खाते हैं.

अजोला का लाभ

अजोला संपूर्ण पोषक तत्त्वों का खजाना है. अजोला को खिलाने से उन के दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होने के साथसाथ शरीर में भी बढ़वार होती है और पशु सेहतमंद रहते हैं.

* अजोला को गाय, भैंस, मुरगी, भेड़, बकरी बड़े चाव से खाते हैं और आसानी से पचाते हैं, जिस के फलस्वरूप दूध उत्पादन के मामले में 10-15 फीसदी तक का इजाफा देखा गया है.

* अजोला को कुछ माह तक लगातार नियमित रूप से खिलाने से बकरी, सूकर, मुरगी के वजन में बढ़ोतरी पाई गई है.

* अजोला की उत्पादन विधि इतनी आसान है कि घर की औरतें भी इस का उत्पादन कर सकती हैं.

* गायभैंस के अलावा छोटे जानवरों जैसे बकरी, मुरगी, बतख वगैरह के लिए इस का उपयोग कर कम समय में उन का औसत वजन बढ़ा कर अच्छी आमदनी ले सकते हैं.

सावधानियां : अजोला के इस्तेमाल में लाने से पहले निम्न एहतियात बरतने जरूरी हैं:

* पौधा पूरी तरह से पकने की स्थित में न आए, इस का ध्यान रखते हैं.

* गड्ढे में पानी का तापमान 30 डिगरी सैल्सियस से कम नहीं होना चाहिए. ज्यादा तापमान होने पर छप्पर या दूसरे साधनों से इसे नियंत्रित रखना चाहिए.

* जैव पदार्थ को प्रतिदिन या एक दिन के अंतराल पर निकाल लेना चाहिए, जिस से अजोला ज्यादा घना न हो.

अजोला से गड्ढे में पानी का पीएच मान प्रतिदिन देखते रहना चाहिए. पीएच मान 5.5 से 7.5 हो.

* बीज को कवकनाशी या कीटनाशी द्वारा शोधित करते रहना चाहिए.

* 3 माह के अंतराल पर अजोला की मिट्टी व पानी को बदल देना चाहिए. इस के बाद गड्ढे में पौलीथिन को निकाल कर साफ कर लेना चाहिए और उस में नई मिट्टी व वर्मी कंपोस्ट 10-15 किलोग्राम दोबारा शीट पर समान रूप से फैला कर फिर से गोबर का घोल डाल दें और साफ अजोला डालें, जिस से अजोला का उत्पादन समान रूप से मिलता रहे.

* बीचबीच में साफ पानी का स्तर कम होने पर अजोला के गड्ढे में पानी डाल कर इस का स्तर 5-6 इंच तक बनाए रखना चाहिए.

* अजोला गड्ढे से निकाली गई मिट्टी और पानी को फेंकने के बजाय अपने बाग और खेतों में डालें जिस से कि वह एक जैविक खाद के रूप में मिट्टी को मिलेगा और इस के पौष्टिक तत्त्व से जमीन को उपजाऊ बनाया जा सके.

* कीटनाशक का प्रयोग किए गए गड्ढे से निकाले गए जैव पदार्थ को पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग नहीं करना चाहिए.

* अजोला को पशु आहार (Animal Feed) में उपलब्धता के आधार पर देना चाहिए.

* इसे सिर्फ पूरक आहार के रूप में ही उपयोग करना चाहिए.

अजोला से उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन मिलता है इसलिए अजोला को सर्वोत्तम पादप, जादुई फर्न अथवा हरा सोना या फिर पशुओं के लिए च्यवनप्राश कहा गया है.

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