Soil Erosion Control. पहाड़ी इलाकों में ढलान व कम गहरी मिट्टी का बारिश से कटाव होता है. ढलान में  रुकावट के लिए स्टेगर टेंच बना कर पेड़ों के पौध, झाडि़यां व घास लगाने से मिट्टी कटाव को रोकने के साथ ही पर्यावरण बचाया जा सकता है.

लवणीय व क्षारीय मिट्टी: शुष्क इलाकों में पानी की कमी के कारण इस मिट्टी का सुधार मुश्किल है. वाटर हार्वेटिंग, रिज व फरो विधि अपना कर लवण सहन करने वाले पेड़ जैसे कि इजरायली बबूल, लूसिनिया एकेसियाअनुरा, स्पोरोबोलस, इल्युसिन घास और झाडि़यां उगाई जा सकती हैं.

क्षारीय/लवणीय पानी से सिंचित मिट्टी: शुष्क व अर्धशुष्क इलाकों में सिंचाई का पानी क्षारीय या लवणीय होता है, जिस से सिंचाई करने पर मिट्टी क्षारीय या लवणीय हो जाती है.

रबी की फसल ऐसे पानी से लेने के लिए इस तरह इंतजाम करें:

क्षारीय पानी से सिंचित मिट्टी: क्षारीय पानी में सोडियम कार्बोनेट व बाई कार्बोनेट की अधिकता के कारण सिंचाई करने पर मिट्टी का पीएच मान 8.5 से 9.5, मिट्टी सख्त, पानी का रिसाव कम व पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है. बारिश से पहले मिट्टी की जिप्सम जरूरत का 50 फीसदी और सिंचाई के पानी में कार्बोनेट इस्तेमाल करने के लिए जिप्सम की मात्रा से उपचार करने पर रबी में गेहूं, सरसों की अच्छी फसल ले सकते हैं.

लवणीय पानी से सिंचित मिट्टी: लवणीय पानी से सिंचाई करते समय सही तकनीक अपनाने से मिट्टी में कम मात्रा में लवण इकट्ठा होता है. क्यारियां न बना कर धारीदार (रिज व फरो) विधि से सिंचाई करें. लवण सहन करने वाली फसल ही लें. सिंचित फसल लेने के बाद पहले खेत खाली छोड़ दें.

समन्वित पोषक प्रबंधन: समन्वित पोषक तत्त्व प्रबंधन का मतलब है कि रासायनिक उर्वरकों के साथ जैविक खाद का इस्तेमाल करना. अकेले रासायनिक उर्वरकों से फसल लेने से जैविक अंश में कमी के कारण मिट्टी की उर्वरा ताकत कम होती है. इसलिए कंपोस्ट, हरी खाद, कड़बी का उर्वरकों के साथ इस्तेमाल करने से अच्छी उपज मिलती है.

मिट्टी जांच: राजस्थान के सभी जिलों में मिट्टी व पानी जांच की सुविधा है. फसल लेने से पहले मिट्टी की जांच करा कर बताए सुझाव के अनुसार फसल के लिए उर्वरक, खाद, जिप्सम और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का इस्तेमाल करना चाहिए.  Soil Erosion Control

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