Soil Health . आधुनिक तकनीकों को अपनाने से हमारी जमीन की पैदावार कूवत में इजाफा हुआ है, लेकिन मौजूदा संसाधनों के हद से ज्यादा इस्तेमाल का असर मिट्टी के सूक्ष्म जीवों, मिट्टी की भौतिक व रासायनिक बनावट, उपजाऊपन और खानेपीने की चीजों पर भी पड़ा है. केमिकलों के इस्तेमाल से फसल उत्पादन का खर्च बढ़ जाता है, जिस से किसानों का मुनाफा कम हो जाता है.

लगातार टिकाऊ पैदावार लेने और आबोहवा को महफूज बनाए रखने के लिए खेती की दूसरी तकनीक जैसे कार्बनिक खेती या जैविक खेती एक अच्छा जरीया है. कार्बनिक खेती या जैविक खेती का आधार जैविक खादें, फसल कचरा, हरी खाद, कंपोस्ट और जैव उर्वरक हैं. इन के इस्तेमाल से खेती के उत्पादन में लागत कम लगती है व मिट्टी की भौतिक, रासायनिक व जैविक क्वालिटी में सुधार होता है.

जैव उर्वरक या जीवाणु खाद की जैविक खेती में अहम जगह है. मिट्टी में करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु रहते हैं, जो मिट्टी से पौधों के लिए पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ाते हैं. ये जीवाणु नाइट्रोजन, फास्फोरस व गंधक पैदा करते हैं, जो पौधों की बढ़वार में मददगार होते हैं. जीवाणु खाद ऐसे ही जीवाणुओं का उत्पाद है जो पौधों के लिए नाइट्रोजन और फास्फोरस की मौजूदगी बढ़ाता है.

जैव उर्वरक या जीवाणु खाद मिट्टी में पाए जाने वाले काम के जीवाणुओं का कल्चर है, जिसे उचित माध्यम या वाहक के साथ मिला कर खाद की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इस से जमीन की उपजाऊ ताकत कुदरती तरीके से बढ़ती है. जैव उर्वरकों का इस्तेमाल बीज उपचार के लिए किया जाता है, जिस से अंकुरण के समय ये जीवाणु पौधों की जड़ों में या इस के आसपास की मिट्टी में पनाह लेते हैं.

जैव उर्वरकों और उपचारित बीजों को गरम जगह और धूप से बचा कर रखना चाहिए. जैव उर्वरकों से पैदावार में 10-15 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है. राइजोबियम, एजोटोवैक्टर, एजोस्पाइरिलम, एसीटोबैक्टर, फास्फोटिका और नील हरित शैवाल प्रमुख जैव उर्वरक हैं.

राइजोबियम

राइजोबियम जीवाणु दलहनी फसलों में इस्तेमाल होने वाला जैव उर्वरक है. अलगअलग फसल के लिए अलगअलग तरह का राइजोबियम उर्वरक इस्तेमाल होता है. राइजोबियम जीवाणु और दलहनी फसलें दोनों ही एकदूसरे की मदद से काम करते हैं.

मूंग, उड़द, अरहर, चना, मटर, मसूर, नारंगी व गहत के लिए राइजोबियम लैग्यूमिनोसोरम का इस्तेमाल होता है. सोयाबीन के लिए राइजोबियम जैपोनिकम और रिजका, बरसीम के लिए राइजोबियम ट्राइपोली और सभी तरह की बीन्स या दालों के लिए काऊपी मिसलैनी का इस्तेमाल होता है.

200 ग्राम राइजोबियम कल्चर से 10 किलोग्राम बीज उपचारित कर सकते हैं. बीज उपचारित करने के लिए 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर 300-400 लीटर पानी में डाल कर अच्छी तरह से घोल लें.

बीजों को किसी साफ जगह पर इकट्ठा कर जैव उर्वरक के घोल को बीजों पर धीरेधीरे डालें और हाथ से तब तक उलटतेपलटते रहें जब तक सभी बीजों पर जैव उर्वरक की समान परत न बन जाए. अब उपचारित बीजों को किसी छायादार जगह पर फैला कर 10 मिनट तक सुखा लें और कूंड़ों में बो कर मिट्टी से ढक दें.

एजोटोबैक्टर व एजोस्पाइरिलम

ये जीवाणु दलहनी फसलों को छोड़ कर अन्य फसलों जैसे अनाज, सब्जियां, फल, फूल, कपास, गन्ना वगैरह में इस्तेमाल किए जाते हैं.

इन से फसल की उपज में 10-15 फीसदी तक का इजाफा होता है. इन का इस्तेमाल बीज, पौध और मिट्टी उपचार के लिए किया जा सकता है.

बीज उपचार के लिए 200 ग्राम जैव उर्वरक 10 किलोग्राम बीज के लिए इस्तेमाल करें. गेहूं, मक्का, मंडुवा, झंगोरा, रामदाना, कुट्टू, जौ, सूरजमुखी, सरसों, तोरिया, तिल, भिंडी वगैरह फसलें इन जैव उर्वरकों के लिए अच्छी हैं.

धान, मिर्च, टमाटर, गोभी, बैगन, प्याज, शिमला मिर्च  वगैरह की पौध उपचार के लिए 4-5 लीटर पानी में एक किलोग्राम जैव उर्वरक का घोल किसी चौड़े मुंह वाले बरतन में बनाएं. इस घोल में पौधे की जड़ों व गन्ने के 3-4 आंख वाले टुकड़ों को 5 मिनट तक डुबो कर पौध उपचार करें. उपचारित पौधों की तुरंत खेत में रोपाई कर दें.

मिट्टी उपचार के लिए 3 किलोग्राम जैव उर्वरक को 40-50 किलोग्राम कंपोस्ट खाद या भुरभुरी मिट्टी में मिला कर आखिरी जुताई के समय या फसल की पहली सिंचाई से पहले एक एकड़ खेत में छिड़क कर मिट्टी में मिला दें.

नील हरित शैवाल

नील हरित शैवाल यानी काई को साइनोबैक्टीरिया भी कहते हैं.  धान में नील हरित शैवाल 10-12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रोपाई के एक हफ्ते बाद इस्तेमाल करें.

इस काई की पौध को पहले अलग से क्यारी में खड़े पानी में उगा कर बढ़ाना पड़ता है फिर धान की रोपाई के बाद खेत के खड़े पानी में डाल दें. इस को डालते समय खेत में 3-4 सेंटीमीटर पानी जरूर भरा रहना चाहिए. अगर धान में किसी खरपतवारनाशी का इस्तेमाल किया है, तो इस जैव उर्वरक को खरपतवारनाशी डालने के 3-4 दिन बाद इस्तेमाल करें.

फास्फोरस जैव उर्वरक

इसे फास्फेट विलयकारी जैव उर्वरक भी कहते हैं. इसे सभी फसलों के बीज उपचार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

इन सभी जैव उर्वरकों को इस्तेमाल करते समय जैव उर्वरक के पैकेट को धूप और गरमी से दूर किसी ठंडी जगह पर रखें. जैव उर्वरक को पैकेट पर लिखी तारीख तक ही इस्तेमाल करें. उस के बाद उस का असर कम हो जाता है. जैव उर्वरक का पूरा फायदा लेने के लिए जीवाणुओं का उसी इलाके से लेना अच्छा रहता है. Soil Health

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...