Soil .पौधे अपनी बढ़वार व विकास के लिए पोषक तत्त्व मिट्टी से ही लेते हैं. पोषक तत्त्व मुहैया करने की कूवत ही मिट्टी की उर्वरता है. मिट्टी के गठन, पीएच मान, जैविक अंश पर उर्वरता निर्भर करती है. रेतीले गठन, कम जैविक अंश, अधिक क्षारीय/अम्लीय मिट्टी की उर्वरता कम और दोमट मटियार, अधिक जैविक अंश, सामान्य पीएच मान वाली मिट्टियों की उर्वरता ज्यादा होती है. फिर फसल में उर्वरक, खाद, फसल चक्र, सिंचाई वगैरह का उर्वरता पर सीधा असर पड़ता है. इसलिए हर खेत की उर्वरता अलग होती है. सही उर्वरता मिट्टी की जांच से ही मालूम होती है. जैविक अंश को नाइट्रोजन का सूचक माना जाता है.

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों में लोहा, मैंगनीज, जिंक व कापर की पौधों को कम मात्रा में जरूरत होती है. ये फसल की जरूरत के मुताबिक मिट्टी में होते हैं. पोषक तत्त्वों की क्रिटिकल लिमिट यानी तय पैमाने से ज्यादा या कम लोहा (4.5 एमएल/ किग्रा), मैंगनीज (5.0 एमएल/ किग्रा), जिंक (1.0 एमएल/ किग्रा) व कापर (0.2 एमएल/ किग्रा) से कम होने पर पौधों की बढ़वार व फसल की उपज पर खराब असर पड़ता है.

स्वस्थ मिट्टी

बढ़ती आबादी के भोजन व अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए पिछले कुछ सालों में सघन खेती के लिए ट्रैक्टर वगैरह मशीनों का तेजी से इस्तेमाल बढ़ा है. ढलान पर खेती का चलन बढ़ने से रेतीली मिट्टी का हवा से कटाव व महीन गठन वाली मिट्टी का पानी से कटाव तेजी से हो रहा है. सिंचित व नहरी इलाकों में उर्वरकों का इस्तेमाल अधिक होने से मिट्टी में हवापानी के असंतुलन से सूक्ष्म जीवों की संख्या में तेजी से कमी आई है.

बढ़ता शहरीकरण और औद्योगिकीकरण उपजाऊ मिट्टी को लील ही नहीं रहा, वरन जमीन में खतरनाक केमिकल छोड़ने से मिट्टी व पानी खराब भी हो रहे हैं.

 

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