Rice Farming : भारत में धान यानी चावल केवल एक फसल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भोजन और किसानों की आजीविका का आधार है. देश की लगभग 25 प्रतिशत खेती योग्य भूमि पर धान की खेती की जाती है. आज भारत दुनिया का सब से बड़ा धान उत्पादक और निर्यातक देश बन चुका है. वर्ष 2025 में भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व में पहला स्थान हासिल किया और अब दुनिया के लगभग 40 प्रतिशत चावल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी है. वर्तमान समय में भारत का चावल निर्यात 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक पहुंच चुका है.

धान की खेती जहां किसानों की आमदनी का बड़ा साधन है, वहीं यह देश की विदेशी मुद्रा बढ़ाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. भारत में लगभग 65 प्रतिशत लोग रोज अपने भोजन में चावल का उपयोग करते हैं, लेकिन धान की खेती से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. भूजल का लगातार गिरता स्तर, जलवायु परिवर्तन, पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण, मिट्टी की बिगड़ती सेहत और बढ़ती खेती लागत किसानों और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं. ऐसे में अब जरूरत है कि धान की खेती को अधिक टिकाऊ, कम लागत वाली और जल संरक्षण आधारित बनाया जाए.

एक नजर में भारत में धान की खेती

भारत में धान की खेती मुख्य रूप से खरीफ मौसम में की जाती है. सामान्यतः जूनजुलाई में रोपाई होती है और सितंबरअक्तूबर में कटाई की जाती है. हालांकि, दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में साल में 2 से 3 बार धान की फसल ली जाती है. पश्चिम बंगाल में आउस, अमन और बोरो नाम से 3 मौसमों में धान उगाया जाता है. वर्ष 2025-26 में धान उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख राज्य हैं.

धान की अच्छी फसल के लिए गरम और आर्द्र जलवायु आवश्यक होती है. इस की खेती के लिए 25 डिगरी सैल्सियस से अधिक तापमान उपयुक्त माना जाता है, जबकि आदर्श तापमान दिन में लगभग 30 डिगरी और रात में 20 डिगरी रहता है. थोड़े समय के लिए यह 40 डिगरी तापमान भी सहन कर सकती है. धान को अधिक नमी और 100 सैंटीमीटर से ज्यादा वर्षा की आवश्यकता होती है. अच्छी जलधारण क्षमता वाली और 5.5 से 6.5 पीएच वाली मिट्टी इस की खेती के लिए सब से उपयुक्त मानी जाती है.

इन विधियों से की जाती है धान की खेती

धान की खेती की सब से प्रचलित विधि है धान की नर्सरी तैयार कर रोपाई करना. यह देश में सब से ज्यादा अपनाई जाने वाली पारंपरिक विधि है. इस में पहले नर्सरी में बीज डाले जाते हैं और लगभग 25 से 35 दिन बाद पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है. यह तरीका अधिक श्रम और अधिक पानी मांगता है, लेकिन इस से अच्छी पैदावार मिलती है.

धान की खेती की दूसरी प्रचलित विधि है डीएसआर यानी डायरैक्ट सीडेड राइस विधि. इस विधि में अंकुरित बीजों को मशीन की सहायता से सीधे खेत में बो दिया जाता है. इस से मजदूरी और पानी दोनों की बचत होती है. यह तकनीक खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है जहां मजदूरों की कमी और भूजल संकट बढ़ रहा है. भारी और मध्यम मिट्टी वाले क्षेत्रों में यह तकनीक अधिक सफल मानी जाती है.

धान की खेती और चुनौतियां

धान की खेती में सब से बड़ी समस्या अत्यधिक पानी की खपत है. एक किलो धान तैयार करने में लगभग 3,000 से 4,000 लिटर पानी खर्च होता है. यह विश्व औसत से काफी अधिक है. पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में स्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है. जहां पहले 30 फुट पर पानी मिल जाता था, वहीं अब कई जगहों पर 80 से 200 फुट तक बोरिंग करनी पड़ रही है. लगातार भूजल दोहन के कारण जलभृत यानी एक्वीफायर तेजी से खाली हो रहे हैं. यह केवल आज की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बड़ा संकट है.

धान के खेतों में लगातार पानी भरा रहने से मिट्टी में औक्सीजन की कमी हो जाती है और मीथेन गैस बनती है. यह गैस जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों में से एक है. भारत में कृषि क्षेत्र से होने वाले कुल उत्सर्जन में धान की खेती का बड़ा योगदान है. इस के अलावा पराली जलाने की समस्या हर साल गंभीर वायु प्रदूषण पैदा करती है. इस से कार्बन मोनोऔक्साइड और सूक्ष्म कण वातावरण में फैलते हैं जो स्वास्थ्य के लिये बेहद हानिकारक हैं.

कुछ राज्यों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक पाई जाती है. ऐसे क्षेत्रों में जलभराव वाली धान खेती के कारण चावल के दानों में आर्सेनिक पहुंच जाता है. लंबे समय तक ऐसा चावल खाने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. बिहार के कई जिलों में हुए अध्ययनों में चावल, गेहूं और आलू में आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई है. इस के अलावा कीटनाशकों और रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग से किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है.

भूजल नीचे जाने के कारण किसानों को गहरे बोरवैल और महंगे पंप लगाने पड़ रहे हैं. छोटे किसानों के लिए यह बहुत बड़ी आर्थिक समस्या बनती जा रही है. पंजाब में धान की खेती के लिए बिजली और उर्वरक पर सरकार लगभग 39 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर तक खर्च करती है. लंबे समय तक एक ही फसल उगाने से मिट्टी में जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी होने लगती है, जिस के कारण उर्वरकों की जरूरत लगातार बढ़ती जाती है.

बढ़ता तापमान और अनियमित वर्षा धान की खेती के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाले वर्षों में धान की उत्पादकता में 6 से 10 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. उत्तर और पूर्वी भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों में इस का असर सब से ज्यादा दिखाई दे सकता है.

विश्व बैंक और कई अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि उत्तरपश्चिम भारत में धान की खेती ऊर्जा, पानी और जलवायु संकट का एक चक्र बना रही है. मुफ्त या सस्ती बिजली के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिस से ऊर्जा खर्च और कार्बन उत्सर्जन दोनों बढ़ रहे हैं.

भारत दुनिया का सब से बड़ा चावल निर्यातक देश है. ऐसे में यदि पानी की कमी या जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन घटता है तो इस का असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा और चावल की कीमतों पर पड़ेगा.

इन तरीकों से किया जा सकता है समाधान

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और विभिन्न राज्य योजनाओं के माध्यम से सरकार डीएसआर तकनीक, सूक्ष्म सिंचाई और फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है. पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों को कम पानी वाली खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा सूखा, लवणीयता और अधिक तापमान सहन करने वाली धान की किस्मों का विकास किया जा रहा है. एनआईसीआरए परियोजना के तहत जलवायु अनुकूल तकनीकों को किसानों तक पहुंचाया जा रहा है.

सरकार जल संकट वाले क्षेत्रों में धान की जगह मोटे अनाज, दलहन और तिलहन जैसी फसलों को बढ़ावा दे रही है, ताकि पानी की बचत हो सके और खेती अधिक टिकाऊ बने.

धान के खेतों में लगातार पानी भरे रखने के बजाय वैकल्पिक आर्द्रशुष्क पद्धति यानी ए डब्ल्यूडी तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिस से पानी और मीथेन उत्सर्जन दोनों कम होते हैं.

यह पहल हो सकता है प्रभावी

अब समय आ गया है कि केवल बिजली और उर्वरक पर सब्सिडी देने के बजाय पानी बचाने, मिट्टी सुधारने और फसल विविधीकरण अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहन दिया जाए. दलहन, तिलहन और श्रीअन्न जैसी फसलों के लिए मजबूत खरीद व्यवस्था और बेहतर एमएसपी जरूरी है, ताकि किसान धान पर पूरी तरह निर्भर न रहें.

इस के अलावा एसआरआई पद्धति, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना होगा. एआई आधारित मौसम सलाह और मिट्टी नमी सैंसर जैसी तकनीकें पानी की बचत में मदद कर सकती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि सही तकनीकों से बिना उत्पादन घटाए 30 से 40 प्रतिशत तक पानी बचाया जा सकता है.

संवेदनशील क्षेत्रों में नए बोरवैल पर नियंत्रण जरूरी है. साथ ही गांव स्तर पर जल बजट और सामुदायिक भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देना होगा. किसान उत्पादक संगठन और सहकारी समितियां मिल कर लागत कम कर सकती हैं.

धानगेहूं की लगातार खेती से बाहर निकलना होगा. दलहन, तिलहन, बागबानी और कृषि वानिकी जैसी प्रणालियां किसानों की आय बढ़ाने के साथसाथ मिट्टी और पर्यावरण दोनों के लिए भी बेहतर हैं.

सतत खेती तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को आसान ऋण और प्रशिक्षण मिलना चाहिए. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ अधिक किसानों तक पहुंचना जरूरी है. ग्रामीण क्षेत्रों में गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और कृषि प्रसंस्करण इकाइयों का विकास होने से किसानों को बेहतर दाम मिलेगा और फसल खराब होने की समस्या कम होगी.

धान की खेती भारत की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यदि पानी की बरबादी, मिट्टी की गिरती गुणवत्ता और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थिति गंभीर हो सकती है. अब जरूरत ऐसी खेती की है, जिस में उत्पादन भी अच्छा हो, पानी भी बचे, मिट्टी भी स्वस्थ रहे और किसान की आय भी बढ़े. नई तकनीक, वैज्ञानिक खेती, फसल विविधीकरण और सही सरकारी नीतियां मिल कर धान की खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बना सकती हैं.

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