Digital Farming

“अब खेत की मेड़ से लेकर सरकारी योजना तक, सब कुछ डिजिटल नक्शे पर लाने की तैयारी है.”

केंद्र सरकार ने कृषि के डिजिटलीकरण को तेज करने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए राज्यों के लिए 13,000 करोड़ रुपये तक ब्याज-मुक्त कर्ज उपलब्ध कराने की घोषणा की है. इस पहल का केंद्र है एग्रीस्टैक, जिसे सरकार खेती के लिए डिजिटल सार्वजनिक ढांचा (Digital Farming) बता रही है.

लेकिन किसानों के लिए बड़ा सवाल यही है—इससे उन्हें वास्तविक फायदा क्या होगा?
और दूसरा प्रश्न यह है कि, क्या यह सुविधा बनेगा या नई जटिलता?

आखिर एग्रीस्टैक है क्या?

सीधी भाषा में कहें तो एग्रीस्टैक खेती से जुड़ी जानकारियों का डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम है.

जैसे हर व्यक्ति के पास आधार नंबर है, वैसे ही किसान के लिए Farmer ID तैयार करने की योजना है.

इसमें संभावित रूप से दर्ज हो सकती हैं—
• किसान की पहचान
• उसकी जमीन का रिकॉर्ड
• कौन-सी फसल बोई गई
• बीज, खाद, सिंचाई या बीमा का उपयोग
• न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिक्री का रिकॉर्ड
• सरकारी योजनाओं का लाभ
यानी खेती और किसान से जुड़ी कई सूचनाओं को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ना.

सरकार की योजना में क्या है?

केंद्र सरकार ने इस डिजिटल ढांचे को सिर्फ अवधारणा तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसके लिए बड़ा वित्तीय प्रावधान भी जोड़ा है. 13,000 करोड़ रुपये तक का ब्याज-मुक्त कैपेक्स कर्ज राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उपलब्ध कराया जाएगा, जो 2026-27 के लिए घोषित 2 लाख करोड़ रुपये के कुल सुधार-आधारित कैपेक्स कर्ज पैकेज का हिस्सा है. यह फंडिंग स्वतः नहीं मिलेगी, बल्कि राज्यों को तय सुधार लागू करने और उनकी प्रगति के सत्यापन के बाद ही जारी होगी. यानी पहली बार कृषि डिजिटलीकरण (Digital Farming) को प्रदर्शन सम्बंधित मॉडल से जोड़ा जा रहा है.

कहाँ खर्च होगी राशि

इस राशि में से 10,000 करोड़ रुपये सीधे एग्रीस्टैक. के प्राथमिक उपयोगों पर खर्च करने की योजना है. इनमें 5,000 करोड़ रुपये उर्वरक वितरण के डिजिटलीकरण (Digital Farming), 4,000 करोड़ रुपये न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीद प्रणाली को मजबूत करने, जबकि 500-500 करोड़ रुपये उत्पादन आकलन और फसल बीमा (PMFBY) एकीकरण पर प्रस्तावित हैं.

किसान आई.डी. के जरिए पंजीकरण, डिजिटल फसल सर्वे से फसल सत्यापन और बीमा दावों के निपटान को तेज करने की बात कही जा रही है. इसके अलावा 1,000 करोड़ रुपये किसान रजिस्ट्री और डिजिटल फसल सर्वे विस्तार, 1,000 करोड़ रुपये जियो-रेफरेंस्ड गांव नक्शों, और 1,000 करोड़ रुपये सैटेलाइट आधारित भूमि मानचित्रण के लिए प्रस्तावित हैं, ताकि जमीन की सटीक पहचान और डेटा-आधारित कृषि प्रशासन विकसित हो सके.

योजना में पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों पर विशेष फोकस रखा गया है, जबकि राज्यों को किसान आई.डी. प्रगति के आधार पर चार श्रेणियों में बांटकर प्रोत्साहन देने का प्रावधान भी है. पूरी प्रक्रिया माइलस्टोन आधारित मॉनिटरिंग पर चलेगी और दिसंबर 2026 तक प्रगति रिपोर्ट के आधार पर आगे फंड जारी करने की सिफारिश होगी. सरकार इसे सिर्फ तकनीकी परियोजना नहीं, बल्कि कृषि शासन को डेटा आधारित बनाने की दिशा में बड़ा सुधार मान रही है.

सरकार क्या करना चाहती है?

योजना के तहत तीन बड़े क्षेत्रों पर जोर है—

1. खाद वितरण को डिजिटल बनाना
उर्वरक वितरण में पारदर्शिता लाने और सही लाभार्थी तक पहुंच सुनिश्चित करने की कोशिश है.

2. MSP खरीद व्यवस्था में सुधार
डिजिटल रिकॉर्ड से खरीद, पंजीकरण और भुगतान प्रक्रिया तेज करने की बात कही जा रही है.

3. फसल बीमा और क्रॉप सर्वे का एकीकरण
डिजिटल फसल सर्वे और किसान आई.डी. के जरिए बीमा दावों के सत्यापन को आसान बनाने का दावा है.

किसानों को क्या लाभ हो सकता है?

यदि यह व्यवस्था जमीन पर ठीक से लागू हुई, तो कई संभावित फायदे दिखते हैं—

योजनाओं का लाभ सीधे किसान तक

सब्सिडी, बीमा, सहायता और अन्य योजनाओं में बिचौलियों की भूमिका घट सकती है. फसल बीमा दावे आसान हो सकते हैं, यदि डिजिटल क्रॉप सर्वे सही हुआ तो नुकसान का आकलन तेज हो सकता है. MSP भुगतान में पारदर्शिता, खरीद और भुगतान में रिकॉर्ड आधारित व्यवस्था विवाद कम कर सकती है.

डेटा आधारित नीति निर्माण

किस क्षेत्र में कौन-सी फसल, किस समस्या के साथ उग रही है—इसका बेहतर आकलन हो सकेगा.

लेकिन किसानों की चिंताएं भी कम नहीं

यहीं से सवाल शुरू होते हैं., क्या छोटे और सीमांत किसान डिजिटल प्रक्रिया संभाल पाएंगे?
ग्रामीण इलाकों में अभी भी डिजिटल साक्षरता बड़ी चुनौती है. जमीन रिकॉर्ड त्रुटियां परेशानी बन सकती हैं, यदि रिकॉर्ड गलत हुआ, तो किसान योजना से बाहर भी हो सकता है.

डेटा नियंत्रण और गोपनीयता- किसानों के बीच यह चिंता भी है कि उनकी खेती संबंधी जानकारी का उपयोग कैसे होगा.

तकनीक बनाम जमीनी हकीकत

सिस्टम अच्छा हो सकता है, पर खराब इंटरनेट, पोर्टल दिक्कतें और स्थानीय प्रशासनिक समस्याएं असर डाल सकती हैं.

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि एग्रीस्टैक का विचार बुरा नहीं, पर इसकी सफलता तीन बातों पर निर्भर करेगी-रिकॉर्ड की शुद्धता, किसान-अनुकूल क्रियान्वयन और तकनीक के साथ मानव सहायता तंत्र यानी सिर्फ ऐप और पोर्टल काफी नहीं होंगे, गांव स्तर पर सहायता ढांचा भी चाहिए.

क्या यह किसानों की आय बढ़ाएगा?

सीधे-सीधे आय नहीं बढ़ाता, लेकिन यदि इनपुट सही मिले, बीमा समय पर मिले, न्यूनतम समर्थन मूल्य भुगतान पारदर्शी हो, योजनाओं का लाभ सही किसान तक पहुंचे, तो अप्रत्यक्ष रूप से आय पर असर पड़ सकता है.

पूर्वोत्तर, पहाड़ी क्षेत्रों पर विशेष फोकस

योजना में जियो-रेफरेंस्ड गांव नक्शे, सैटेलाइट आधारित भूमि मानचित्रण और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में डिजिटल सर्वे पर भी खर्च प्रस्तावित है. यह संकेत है कि सरकार इसे राष्ट्रीय कृषि डेटा ढांचे के रूप में देख रही है.

किसानों के लिए अवसर या सावधानी?

एग्रीस्टैक को कुछ लोग खेती का डिजिटल भविष्य मान रहे हैं, तो कुछ इसे निगरानी आधारित व्यवस्था भी मानते हैं. सच शायद बीच में है. यदि किसान की सुविधा केंद्र में रही, तो यह बदलावकारी हो सकता है. अगर कागज से पोर्टल तक सिर्फ बोझ शिफ्ट हुआ, तो नई दिक्कतें भी पैदा हो सकती हैं. एग्रीस्टैक को समझना जरूरी है, क्योंकि यह सिर्फ तकनीकी परियोजना नहीं, खेती के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव है.

किसानों के लिए संदेश साफ है-डिजिटल खेती का यह दौर अवसर भी है, लेकिन जागरूकता के बिना लाभ सीमित रह सकता है. खेती अब सिर्फ खेत में नहीं, डेटा में भी दर्ज होने जा रही है. सवाल यही है—इस बदलाव का मालिक किसान होगा या सिर्फ उपभोक्ता?

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