Energy Revolution from Poultry : ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ पर्यावरण और अतिरिक्त आय—पोल्ट्री क्षेत्र अब इन तीनों मोर्चों पर नई भूमिका निभाने की तैयारी में है. देश में पोल्ट्री फार्मों से निकलने वाले अपशिष्ट को अब कचरा नहीं, बल्कि ऊर्जा संसाधन के रूप में देखा जा रहा है. इसी दिशा में पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया (PFI) ने पोल्ट्री फार्मों में बायोगैस प्लांट स्थापना के लिए सरकार से 60 प्रतिशत सब्सिडी की मांग की है.

यदि यह पहल व्यापक स्तर पर लागू होती है, तो इससे न केवल पोल्ट्री कचरा प्रबंधन की समस्या कम होगी, बल्कि गैस और बिजली उत्पादन के जरिए ऊर्जा क्षेत्र को भी समर्थन मिल सकता है.

पोल्ट्री अपशिष्ट से बनेगी ऊर्जा

अब तक बायोगैस को मुख्य रूप से गोबर आधारित तकनीक माना जाता रहा है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से मुर्गियों की बीट (पोल्ट्री मैन्योर) और हैचरी अपशिष्ट से भी बायोगैस उत्पादन संभव है. पोल्ट्री मैन्योर में कार्बनिक पदार्थ, नाइट्रोजन और जैविक अवशेष प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो एनारोबिक डाइजेशन (Anaerobic Digestion) प्रक्रिया के लिए उपयुक्त माने जाते हैं.

कैसे बनती है पोल्ट्री बायोगैस?

प्रक्रिया मुख्य रूप से चार चरणों में होती है—

1. अपशिष्ट संग्रहण

पोल्ट्री फार्मों से निकलने वाली बीट, बिछावन सामग्री, हैचरी अवशेष और जैविक कचरा एकत्र किया जाता है.

2. डाइजेस्टर में अपघटन

इस सामग्री को पानी के साथ मिलाकर बायोगैस डाइजेस्टर में डाला जाता है, जहां ऑक्सीजन रहित वातावरण में सूक्ष्मजीव इसे विघटित करते हैं.

3. गैस उत्पादन

इस प्रक्रिया से मुख्यतः मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड बनती है. मीथेन युक्त गैस खाना पकाने, हीटिंग और बिजली उत्पादन में उपयोगी होती है.

4. स्लरी का उपयोग

गैस बनने के बाद बची स्लरी जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग की जा सकती है.

हैचरी अपशिष्ट भी बनेगा संसाधन

विशेषज्ञ बताते हैं कि अंडे के खोल, भ्रूण अवशेष, चूजों के जैविक अपशिष्ट और पोल्ट्री प्रोसेसिंग वेस्ट भी बायोगैस फीडस्टॉक के रूप में इस्तेमाल हो सकते हैं. इससे हैचरी कचरे के निस्तारण की समस्या भी कम हो सकती है.

60 फीसदी सब्सिडी की मांग क्यों?

पोल्ट्री फेडरेशन का तर्क है कि मौजूदा सब्सिडी बड़े निवेश की तुलना में पर्याप्त नहीं है. मध्यम और बड़े पोल्ट्री फार्मों में बायोगैस प्लांट की लागत काफी अधिक आती है, जिससे किसानों और उद्यमियों की रुचि सीमित रहती है. यदि 60 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है, तो अधिक पोल्ट्री फार्म इस मॉडल को अपनाने के लिए आगे आ सकते हैं.

ऊर्जा संकट में कितनी मदद?

हाल के वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों विशेषकर पश्चिम एशिया में अस्थिरता ने गैस आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बढ़ाया है. ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या पोल्ट्री आधारित बायोगैस इस कमी की भरपाई कर सकती है?

विशेषज्ञों के अनुसार यह राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक गैस का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकती, लेकिन विकेंद्रीकृत ऊर्जा (decentralized energy) के रूप में ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है. यदि बड़े पैमाने पर पोल्ट्री क्लस्टरों में बायोगैस इकाइयां लगती हैं, तो स्थानीय स्तर पर ईंधन, बिजली और उर्वरक तीनों उपलब्ध हो सकते हैं. अर्थात, यह गैस संकट का पूर्ण समाधान नहीं, लेकिन मजबूत पूरक विकल्प अवश्य बन सकता है.

तीन बड़े फायदे

1. कचरे से ऊर्जा और बिजली

पोल्ट्री अपशिष्ट से बायोगैस और बिजली उत्पादन संभव होगा, जिससे ऊर्जा लागत घट सकती है.

2. स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण

पोल्ट्री कचरे से दुर्गंध, रोगजनक और प्रदूषण की समस्या कम हो सकती है.

3. जैविक खाद से मिट्टी को लाभ

बची हुई स्लरी खेतों के लिए मूल्यवान जैविक खाद बन सकती है.

पोल्ट्री किसानों को क्या लाभ होगा?

• ऊर्जा लागत में कमी
• अतिरिक्त आय का स्रोत
• कचरा प्रबंधन समाधान
• उर्वरक लागत में बचत
• मक्का या अन्य चारा फसलों के लिए जैविक पोषण

बायोगैस के व्यापक लाभ

कृषि के लिए

कृषि के क्षेत्र में बायोगैस के लाभ की बात करें तो इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता सुधरती है. रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है

पर्यावरण के लिए

• ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने में मदद
• अपशिष्ट प्रबंधन बेहतर

ऊर्जा के लिए

• स्थानीय गैस और बिजली उत्पादन
• आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने में सहयोग

पोल्ट्री सेक्टर की नई भूमिका

अब पोल्ट्री सिर्फ अंडे और चिकन उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहता. यह ऊर्जा, पर्यावरण और जैविक कृषि से जुड़कर बहुआयामी मॉडल की ओर बढ़ रहा है. यदि सब्सिडी बढ़ती है और नीति समर्थन मिलता है, तो पोल्ट्री आधारित बायोगैस मॉडल ग्रामीण भारत में ‘कचरे से कमाई’ और ‘ऊर्जा से आत्मनिर्भरता’ का नया उदाहरण बन सकता है.

मुर्गियों की बीट से निकलने वाली यह ऊर्जा आने वाले समय में कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के बीच नई साझेदारी की नींव रख सकती है.

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