Baby Corn : एक ओर जहां मक्के का इस्तेमाल खाने के रूप में, उद्योगों में कच्ची सामग्री के लिए, पशुओं के चारे व दाने के रूप में किया जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर फसल विविधीकरण व कम समय में आजकल ज्यादा आमदनी लेने के लिए, बेबीकौर्न (शिशु मक्का) की खेती का व्यवसायीकरण हो रहा है, पर बेबीकौर्न के इस्तेमाल, आर्थिक महत्त्व और उत्पादन विधियों की पर्याप्त जानकारी की कमी के चलते किसान इस की खेती करने में थोड़ी हिचक महसूस करते हैं.
सही जलवायु मिलने पर एक साल में बेबीकौर्न की 2 से 4 फसलें ली जा सकती हैं. इस की खेती से नकदीकरण व व्यवसायीकरण को बढ़ावा मिलता है, साथ ही इस के उत्पादन, विपणन, प्रसंस्करण और निर्यात की प्रक्रिया से रोजगार के अवसर मिलते हैं.
भारत इस का बड़ा उत्पादक व निर्यातक देश बन सकता है. बेबीकौर्न को उगाने की विधि वैसे तो मक्के से मिलतीजुलती है, पर प्रति इकाई पौध संख्या, खाद प्रबंध, तोड़ाई का समय व तरीका और प्रजातियां मक्के से अलग हैं.
किस्मों का चुनाव
बेबीकौर्न के लिए मक्के की कोई भी जल्दी पकने वाली एकल क्रास संकर प्रजाति सही रहती है. इस के अलावा प्रजाति कद में छोटी व एक से ज्यादा भुट्टे देने वाली होनी चाहिए. वे किस्में जो खरीफ में 45-50 दिनों में बसंत में 75-80 दिनों और उत्तरी भारत के ठंड के मौसम में 112-130 दिनों में सिल्क बना लें, बेबीकौर्न के लिए उगाना ठीक रहता है.
बेबीकौर्न की अधिक पैदावार के लिए वीएल 42, वीएल 76, एमईएस 114, पूसा संकर 1, पूसा संकर 2, वीएल बेबीकौर्न 1 वगैरह खास किस्में हैं. एचएम 4 व प्रकाश संकर किस्में उच्च क्वालिटी व अच्छी उपज के लिए लोकप्रिय हैं.
बोआई
दक्षिण भारत में बेबीकौर्न की बोआई पूरे साल की जा सकती है, जबकि उत्तरी भारत में इसे फरवरी से नवंबर माह के बीच बोया जा सकता है.
सिंचाई व अन्य उत्पादक कारकों की सही मौजूदगी होने पर बेबीकौर्न की एक साल में 2 या 4 फसलें ली जा सकती हैं.
यदि बीज उपचारित न हों तो उन्हें सही कवकनाशी व कीटनाशी जैसे बाविस्टीन व कैप्टान (1:1 के अनुपात में 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से) और फिप्रोनिल (4 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से) से उपचारित करना चाहिए.
बेबीकौर्न की बोआई समतल खेत में मेंड़ बना कर की जा सकती है. बारिश के मौसम में पानी भरने से बचने के लिए बोआई मेंड़ों पर ही करनी चाहिए.
सर्दियों में बोआई नालियों में करने से सिंचाई के लिए पानी नहीं देना होता और पोषक तत्त्वों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जा सकता है.
यदि समतल भूमि में बोआई की गई है तो बोआई के करीब 3 हफ्ते बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिस से तेज हवा व आंधी में पौधे गिर न सकें.
खाद व उर्वरक प्रबंधन
बेबीकौर्न की अधिक उपज लेने के लिए खेत में गोबर की अच्छी तरह सड़ीगली खाद डालनी चाहिए. गोबर की खाद को लगभग 8-10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से लगभग 12-15 दिनों पहले खेत की तैयारी के समय डाल देना ठीक रहता है. इस के अलावा मिट्टी जांच के आधार पर 150-180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटैशियम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए. मिट्टी में जिंक की पूर्ति के लिए 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट डालना न भूलें.
नाइट्रोजन की आधी मात्रा और पोटैशियम, फास्फोरस व जिंक सल्फेट की पूरीपूरी मात्राएं बोआई से पहले अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें.
नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा को 2 भागों में बांट कर पहली बोआई से 20-22 दिन बाद एक भाग डालें वहीं दूसरा भाग नर मंजरी निकलने से पहले खड़ी फसल में डालें.
नाइट्रोजन की यह मात्रा देने के बाद इसे मिट्टी में मिला दें और साथ ही साथ पौधों को सहारा देने के लिए मिट्टी भी चढ़ाएं. इस प्रकार पौधे नाइट्रोजन का पूरा व सही इस्तेमाल कर सकते हैं.
खरपतवार नियंत्रण
बेबीकौर्न की फसल में खरपतवार नियंत्रण का ध्यान शुरू से ही रखें. बारिश के मौसम में खरपतवारों का प्रकोप अधिक रहता है. लिहाजा, इस मौसम में खरपतवार नियंत्रण का खास खयाल रखना चाहिए.
खरपतवारों के निकलने से पहले एट्राजीन का 1.0-1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. यह चौड़े पत्तीदार खरपतवारों और अधिकतर घासों को रोकने का एक प्रभावी तरीका है.
दवा का छिड़काव इस तरह से करें कि छिड़कने के बाद खेत में कोई भी यहां तक कि दवा छिड़कने वाला भी न चले यानी एट्राजीन प्रयोग करने की रात खेत ज्यों का त्यों बना रहे.
सिंचाई प्रबंधन
बेबीकौर्न की फसल अगर बरसात के मौसम में लगाई है तो बारिश न होने की स्थिति में 2-3 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है. वसंत व शरद ऋतु में लगाई गई बेबीकौर्न की फसल को मौसम के अनुसार ज्यादा सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है.
नर मंजरी निकालना
बेबीकौर्न की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए नर मंजरी निकालना एक जरूरी काम है. पौधों में नर मंजरी दिखते ही तुरंत उसे हाथ से खींच कर निकाल देना चाहिए और उन को पशुओं को खिलाने के काम में लाना चाहिए.
नर मंजरी निकालते समय ध्यान रखें कि पौधों की पत्तियों को कोई नुकसान न पहुंचे, क्योंकि ये हरी पत्तियां ही पौधों का भोजन बनाने का काम करती हैं.
फसल प्रबंधन
वसंत व सर्दियों में उगाई गई फसलों में न के बराबर ही बीमारियां लगती हैं. बारिश के मौसम में लीफ ब्लाइट नामक बीमारी का प्रकोप दिखाई दे तो डाइथेन एम 45 नामक दवा की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.
किसी भी मौसम में बेबीकौर्न उगाने पर पाए जाने वाले कीड़ों में तनाभेदक (काइलोपारटिलस), गुलाबी तनाभेदक (सीसेमिया इफरेस) और सोरधम मक्खी (एथेरिगोना स्पेसिज) खास कीट हैं. बीज जमने के 10 और 20 दिन के बाद कार्बारिल या इंडोसल्फान का छिड़काव तनाभेदक की रोकथाम के लिए जरूरी है.
भुट्टों की तोड़ाई
बेबीकौर्न के भुट्टों की तोड़ाई में विशेष सावधानी बरनी चाहिए. भुट्टों की तोड़ाई बाल निकलने (सिल्क इमरजैंस) के बाद 1-2 दिन के अंदर कर लेनी चाहिए.
पौधे के निचले हिस्से में आए भुट्टे तोड़ाई के लिए पहले तैयार होते हैं. इन भुट्टों की तोड़ाई 2-3 सैंटीमीटर रेशमी कोपलें आने पर करनी चाहिए. खरीफ में तोड़ाई प्रतिदिन और रबी में 1 दिन छोड़ कर करें. तोड़ाई सुबह या शाम के वक्त करें व भुट्टे तोड़ते समय ऊपर की पत्तियां न हटाएं. पत्तियां हटाने से भुट्टे जल्दी खराब होते हैं.
एकल संकर मक्के में 3-4 तोड़ाई करना जरूरी होता है. तोड़ाई करते समय पौधों के ऊपर के छत्रक भी अवश्य निकाल दें, इस से नए भुट्टे आने की संभावना बढ़ जाती है. खरीफ और मौसम में तोड़ाई 10-12 दिनों में और सर्दियों में 20 दिनों के बीच होनी चाहिए.





