Samba Masuri Dhan : बीपीटी 5204 जिसे सांबा मसूरी के नाम से जाना जाता है, देश की सबसे लोकप्रिय धान किस्मों में से एक मानी जाती है. यह किस्म अपने पतले, चमकदार और स्वादिष्ट चावल के लिए किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के बीच काफी पसंद की जाती है.
खासतौर पर दक्षिण भारत के कई राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, लेकिन अब देश के अन्य हिस्सों में भी किसान इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं. सांबा मसूरी एक मध्यम अवधि वाली धान किस्म है, जिसकी फसल लगभग 130 से 140 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. यह किस्म लगभग 4.5 से 5 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने में सक्षम मानी जाती है.
सांबा मसूरी की खासियत
इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसके चावल की गुणवत्ता है. इसके दाने मध्यम पतले, सफेद और आकर्षक होते हैं. पकने के बाद चावल नरम, स्वादिष्ट और हल्की सुगंध वाला होता है, जिसके कारण बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है. सांबा मसूरी किस्म झुलसा रोग यानी बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के प्रति प्रतिरोधी मानी जाती है. हालांकि यह किस्म ब्लास्ट रोग के प्रति कुछ हद तक संवेदनशील होती है.
सांबा 1850: सांबा मसूरी का उन्नत संस्करण
सांबा 1850, सांबा मसूरी बीपीटी 5204 का उन्नत संस्करण है. इसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा विकसित किया गया है. यह किस्म दक्षिणी और पूर्वी भारत में व्यापक रूप से उगाई जाती है और ब्लास्ट रोग के प्रति प्रतिरोधी मानी जाती है. इसमें मध्यम पतले दाने होते हैं और यह कम समय में तैयार होने वाली किस्म है. इस किस्म में 3-4 सिंचाई की बचत हो जाती है.
सांबा 1850 की खेती कैसे करें
इस किस्म में प्रति एकड़ रोपाई के लिए लगभग 5 किलो बीज पर्याप्त माना जाता है. रोपाई के समय पौध से पौध की दूरी 20 सेंटीमीटर और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 10 सेंटीमीटर रखी जाती है. रोपाई के 40-45 दिन पहले हरी खाद का प्रयोग करने से भूमि की सेहत में सुधार होता है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर सिंचाई और रोग नियंत्रण के जरिए किसान इस किस्म से बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं.
भविष्य में धान की खेती को बदल सकती हैं उन्नत किस्में
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन किस्मों का सही तरीके से विस्तार किया जाए और किसानों तक समय पर गुणवत्तायुक्त बीज पहुंचाए जाएं, तो आने वाले वर्षों में धान की खेती अधिक लाभकारी और टिकाऊ बन सकती है.
कम पानी, रोगरोधी क्षमता, बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन वाली ये किस्में किसानों की लागत कम करने के साथ आय बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकती हैं.
यदि इन किस्मों का सही तरीके से विस्तार किया जाए और किसानों तक समय पर गुणवत्तायुक्त बीज पहुंचाए जाएं, तो आने वाले वर्षों में धान की खेती अधिक लाभकारी और टिकाऊ बन सकती है.





