Soil of Madhya Pradesh. मध्य प्रदेश की धरती पर सभी तरह की फसलें, सब्जियां और फलों की पैदावार की जा सकती है. यह अलग बात है कि मिट्टी से जिंदगी चलाने वाले किसान को भी पता नहीं रहता कि उस के इलाके की मिट्टी किस किस्म की है और उस में और क्या पैदा किया जा सकता है.
मध्य प्रदेश सोयाबीन प्रदेश के नाम से भी पहचाना जाने लगा है. देश में सोयाबीन की सब से ज्यादा पैदावार यहीं होती है. इस से पहले और आज भी यहां का गेहूं नाम से बिकता है. सूबे की मिट्टी इन फसलों की खेती के लिए माफिक बैठती है.
मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड, मुरैना, डबरा और श्योपुर में पाई जाने वाली कछारी मिट्टी में गन्ना, गेहूं और चना कामयाबी से उगाए जा सकते हैं.
कछारी मिट्टी का रंग हलका पीलापन लिए भूरा व पीला होता है. इस का पीएच मान 7.8 तक होता है. सूबे के कुल क्षेत्रफल की 5 फीसदी मिट्टी कछारी है.
सब्जियों की बढ़वार भी इस मिट्टी में जल्दी और अच्छी होती है. इस मिट्टी में चूना और पोटाश ज्यादा पाए जाते हैं, जबकि नाइट्रोजन और फास्फोरस कम पाए जाते हैं.
छत्तीसगढ़ से लगे जिलों और महाकौशल के कुछ हिस्से में पाई जाती है. लालपीली मिट्टी का पीएच मान 5 से 6 तक होता है. जाहिर है इस में सभी फसलें नहीं उगाई जा सकतीं, खासतौर से नकदी फसलें जो किसान को मालामाल करती हैं. बालाघाट, रायगढ़, सरगुजा, रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर सहित राजनांदगांव जिलों में यह मिट्टी पाई जाती है. इस में धान की खेती ज्यादा होती है, वजह लालपीली मिट्टी में पानी का ठहराव जल्दी और ज्यादा होता है.
इस किस्म की मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, चूना और पोटाश ठीकठाक मात्रा में पाए जाते हैं, पर इतने नहीं कि फसल के दौरान इन को खाद व उर्वरक न देना पड़े. मोटे अनाज वाली फसलें इस में ज्यादा होती हैं.
सूबे की 37 फीसदी मिट्टी मीडियम काली है, जो हर लिहाज से अच्छी मानी जाती है. जबलपुर, नरसिंहपुर, कटनी, विदिशा, सीहोर, रायसेन, भोपाल, इंदौर, उज्जैन, धार व देवास में यह मिट्टी मिलती है. इस का पीएच मान 6.8 से 7.8 तक होता है. इस में सभी तरह की फसलें उगाई जा सकती हैं.
महाकौशल से मालवा इलाके तक इस मिट्टी का रंग कहीं गहरा भूरा और कहीं गहरा हरा रहता है. इस में गेहूं, सोयाबीन, मटर, धान, गन्ना, ज्वार, मक्का, कपास, मसूर, तिल और चना जैसी सभी फसलें पैदा की जा सकती हैं.
मीडियम काली मिट्टी में दूसरी मिट्टियों के मुकाबले पोटाश ज्यादा होता है, लेकिन नाइट्रोजन और फास्फोरस कम पाए जाते हैं. लिहाजा इस को खाद की जरूरत ज्यादा पड़ती है. इस मिट्टी में दाल वाली फसलें उगाए जाने से नाइट्रोजन की कमी पूरी होती रहती है.
मीडियम काली मिट्टी की क्वालिटी बनाए रखने के लिए जरूरी है कि किसान गरमी में जुताई पर ज्यादा ध्यान दें और नाइट्रोजन, फास्फोरस वाले उर्वरक जरूर छिड़कें.
सूबे के बुंदेलखंड और बघेलखंड इलाकों के सतना, रीवा, टीकमगढ़, पन्ना और छतरपुर के अलावा दतिया जिले में लालकाली मिट्टी पाई जाती है. यह सूबे के क्षेत्रफल का कुल 8.2 फीसदी है. इस मिट्टी में गेहूं, चना, धान, सोयाबीन आराम से लगाए जा सकते हैं और मोटे अनाज वाली फसलों मक्का, ज्वार और जौ के लिए भी यह बेहतर रहती है.
पोटाश की तादाद लालकाली मिट्टी में भी ठीकठाक रहती है, लेकिन नाइट्रोजन, फास्फोरस और चूना कम पाया जाता है. किस्म के मुताबिक इस का रंग लाल और काला मिलाजुला साफसाफ दिखता है.
सूबे के छिंदवाड़ा, सिवनी और बैतूल जिलों की मिट्टी उथली काली है, जिस का पीएच मान 7 से 8 के बीच है. इस मिट्टी का रंग भूराकाला होता है, जिस में नाइट्रोजन की तादाद कम रहती है, पर फास्फोरस और पोटाश ठीकठाक मात्रा में पाए जाते हैं. इस मिट्टी में धान, गेहूं और मोटे अनाज वाली फसलों की खेती होती है. नीबू प्रजाति के फल इन में ज्यादा होते हैं. संतरे की खेती सूबे के इन्हीं जिलों में होती है.
सब से ज्यादा उपजाऊ गहरी काली मिट्टी खंडवा, बड़वानी, खरगौन के अलावा होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिलों के कुछ हिस्सों में पाई जाती है. यहां गेहूं और चने के अलावा धान, गन्ना, कपास जैसी नकदी फसलें उगाई जाती हैं. इस मिट्टी का पीएच मान 7.75 होता है. पपीते की खेती के लिए यह मिट्टी बहुत अच्छी होती है. इस मिट्टी में नाइट्रोजन और फास्फोरस की तादाद कम होती है. इसलिए उर्वरक छिड़कते रहना चाहिए.
सूबे में सब से हलकी मिट्टी शहडोल, मंडला और झाबुआ जिलों में पाई जाती है, जिसे पथरीली या अधकचरी मिट्टी कहा जाता है. इस मिट्टी में सभी पोषक तत्त्व कम होते हैं, इसलिए नकद फसलें इस में पैदा ही नहीं होतीं. इस में मोटे अनाज वाली फसलें कामयाबी से उगाई जा सकती हैं. धान भी आसानी से पैदा हो जाता है. 6.7 पीएच मान वाली यह मिट्टी सूबे के कुल क्षेत्रफल का 8 फीसदी है, जिस का रंग लाल और काला होता है.
मिट्टियों की इन किस्मों का उस इलाके के रहनसहन और संपन्नता से खास संबंध है. पथरीली मिट्टी वाले इलाके में गरीबी ज्यादा है, क्योंकि वहां पैसा देने वाली फसलें पैदा नहीं होती हैं. यही हाल लाल और पीली मिट्टी वाले इलाके का भी है. यानी जहां मिट्टी अच्छी है, वहां का किसान खुशहाल है. Soil of Madhya Pradesh





