Aromatic Plants. देश की खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए जहां एक ओर अनाज उत्पादन में इजाफा जरूरी है, वहीं दूसरी ओर लाखों हेक्टेयर बेकार पड़ी ऊसर जमीन को सुधारने की भी जरूरत है. हमारे देश में तकरीबन 70 लाख हेक्टेयर जमीन में लवणता यानी नमक की समस्या है. इस में से 25 लाख हेक्टेयर जमीन उत्तर भारत में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में है.

इस तरह की मिट्टी में कुछ ऐसी फसलें उगाई जा सकती हैं, जो क्षारीयता झेल सकें और मिट्टी की भौतिक, जैविक व रासायनिक हालत को भी सुधारें, ताकि पैदावार में गिरावट न आए.

क्षारीय जमीन में कुछ ऐसे औषधीय व सुगंधीय पौधे उगाए जा सकते हैं, जो क्षारीयता को कम करने के साथसाथ पारंपरिक फसलों के मुकाबले ज्यादा उपज देते हैं.

औषधीय व सुगंधीय पौधे पूरी दुनिया में सब से ज्यादा कीमत रखते हैं, क्योंकि इन का इस्तेमाल दवा, मसाले व सौंदर्य प्रसाधन बनाने में खूब होता है. इसलिए विश्व बाजार में इन की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है.

सुगंधीय पौधे

पामारोजा : पामारोजा एक तेल वाली बारहमासी घास है, जिसे रोशा घास या रूसा घास भी कहते हैं. पामारोजा एक ऐसी फसल है, जो सभी जगह उगाई जा सकती है. यह क्षारीयता और लवण वाले पानी में खराब नहीं होती. इस की लगातार खेती से मिट्टी की क्षारीयता के साथसाथ भौतिक व रासायनिक हालत में भी सुधार होता है.

नीबू घास: यह तेल वाला बारहमासी पौधा है और हर मौसम में उगाया जा सकता है. इस में सिट्राल 80-90 फीसदी होता है और खुशबू नीबू की तरह होती है. सिट्राल का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधन, इत्र व साबुन बनाने के लिए किया जाता है. इसे भी पामारोजा की तरह सभी जगह उगाया जा सकता है. नीबू घास 9.5 पीएच तक की लवणीय मिट्टी और अनुपजाऊ पहाड़ी ढलानों व कृषि वानिकी के पेड़ों के बीच छाया में भी उगाया जा सकता है. इस की कुछ उन्नत प्रजातियां सुगंधी, प्रगति, प्रभात, कावेरी, ओडी-19 हैं.

गेंदा: गेंदे की 3 प्रजातियां टी मिनाटा, टी पेचुएल व टी इरेक्टा हैं. इन तीनों का भोजन, स्वाद व सौंदर्य प्रसाधन उद्योग में इस्तेमाल होता है. सही माने में तो गेंदे का पूरा पौधा ही काम का है. इस से तेल, इत्र वगैरह हासिल होता है.

टी मिनाटा का तेल गोलकृमि व मच्छर को कम करने में इस्तेमाल होता है और इस से खाने वाला रंग बनता है. टी पेचुएल के तेल में टेगटाने सिनलोल, लिमोनिन, लिनाईलएसीटेट और ओसमीन काफी मात्रा में पाया जाता है. इसे क्षारीय मिट्टी जिस की ईएसपी 40.0 हो, में भी बिना किसी परेशानी के उगाया जा सकता है.

वेटिवर घास : वेटिवर घास में मिट्टी सुधारने की कूवत होती है. क्षारीय जमीन को सुधारने के लिए इस की खेती की जाती है. इस की खेती करने से मिट्टी का पीएच, ईसी व ईएसपी में कमी आती है, साथ ही गांवों में रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं. यह मिट्टी कटाव रोकने में भी सहायक है.

औषधीय पौधे

कौंच: कौंच एकवर्षीय रोम वाली लता वाला पौधा है और तमाम बीमारियों में काम आता है. कौंच हिमालय की निचली घाटियों से ले कर पूरे भारत के ऊष्ण प्रदेशों के मैदानी इलाकों में कुदरती तौर से उगने वाला पौधा है. इस की ये प्रजातियां बेहद महत्त्वपूर्ण हैं:

मुकुना प्रुरिएंस : इस के बीज काले रंग के होते हैं.

मुकुना निबिया : इस के बीज मटमैले सफेद होते हैं.

मुकुना यूटिलिस : इस के बीज सफेद व चित्तीदार होते हैं.

इसबगोल: यह भी एक महत्त्वपूर्ण औषधीय पौधा है. इस का बीज व भूसा कोमल और रोचक होता है. इस के बीज में स्टार्च व वसीय अम्ल की अधिकता पाई जाती है. इस की खेती गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब (जहां पर सिंचाई के पानी की लवणता 87.0 डेसीसाइमन तक होती है) में आसानी से की जा सकती है. अच्छी उपज उस जमीन में भी ले सकते हैं, जिस की ईएसपी 45.0 हो. इसबगोल का पौधा सोडियम के अवरोध के प्रति सहनशील होता है और खराब मौसम में भी अच्छा उत्पादन देता है.

चंद्रशूर: चंद्रशूर एक क्रुसीफेरी कुल का पौधा है. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में इस की खेती कारोबारी स्तर पर की जा रही है. यह पौधा हलके ऊसरपन व अम्लीयता में भी उगाया जा सकता है.

आंवला: औषधीय पेड़ों में आंवले की खास जगह है. औषधीय गुणों, उच्च उत्पादन, पोषक तत्त्वों से भरपूर और विभिन्न हालात में आराम से उगाए जा सकने के कारण आयुर्वेदिक दवा जैसे त्रिफला, च्यवनप्राश, तेल और कई प्रकार के चूर्ण बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

बताए गए औषधीय व सुगंधीय पौधों को ऊसर जमीन में उगा कर हम जमीन का सही इस्तेमाल करने के साथसाथ अधिक आमदनी भी कमा सकते हैं.  Aromatic Plants

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