Farming Techniques. पश्चिम राजस्थान के ज्यादातर इलाकों में सिंचाई की कमी के कारण बारिश आधारित खरीफ में बाजरा, ग्वार, मूंग, मोठ व तिल की फसल ही ली जाती है. बारिश कम और अनियमित होने के कारण उपज कम होती है. बारिश के पानी के मिट्टी की नमी के रूप में रहने व पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई तकनीकें ईजाद की गई हैं.

हवा के कटाव के लिए शेल्टर बेल्ट: हवा की दिशा में रुकावट के लिए खेत की मेंड़ पर पेड़ों की 3 कतारें लगाई जाती हैं. पहली कतार में इजरायली बबूल, नीम, सरस, केशिया सियामा, दूसरी व तीसरी कतार में कम ऊंचाई के पेड़ व झाडि़यां जैसे कुमठिया, फोग, बेर लगा कर शेल्टर बेल्ट तैयार की जाती है.

उर्वरता के लिए वानिकी: खेत में पेड़ लगा कर मिट्टी का अच्छा प्रबंधन किया जा सकता है. शुष्क इलाकों में पेड़ फसल के लिए सहयोगी होते हैं. बारिश का पानी खेजड़ी के पेड़ों के कारण मिट्टी में जा कर नमी के रूप में महफूज होता है. पेड़ की पत्तियों के गलने व मिट्टी में जैविक अंश व सूक्ष्म जीव बढ़ने से फसल को पोषक तत्त्व मिलते हैं.

खेतीबागबानी: इस तकनीक में 10 मीटर के अंतर पर बेर के गोला व सेव किस्म के पौधे लाइन में 5-5 मीटर के अंतर पर लगाए जाते हैं. पौधों की लाइन के बीच में ग्वार, मूंग, मोठ की फसल अच्छी उपज देती है. सीमित व लवणीय पानी वाले इलाकों में बेर के स्थान पर अनार व आंवला के पौधे लगाए जा सकते हैं.

फसल चक्र: बाजरा राजस्थान की मुख्य फसल है. बारिश के बाद ही बाजरे की फसल को नाइट्रोजन उर्वरक दिए जाते हैं. उर्वरक नहीं दिए जाने पर हर साल बाजरा लेने पर इस की उपज में कमी होती है. फसल चक्र के रूप में पहले साल दलहनी फसल लेने के बाद बाजरे की फसल को नाइट्रोजन व फास्फोरस अच्छी मात्रा में मिलते हैं.

टिब्बा स्थिरीकरण

हालांकि ज्यादातर टिब्बे स्थिर हैं, परंतु झाडि़यों के कटने व चराई के कारण सतही रेतीली मिट्टी बिखर जाती है और गरमियों में तेज हवा में उड़ कर खेतों में, सड़कों व आसपास फैल जाती है. टिब्बा स्थिरीकरण इस तरह किया जाता है:

* टिब्बों के पास 5 मीटर के अंतर पर इजरायली बबूल, कुमठिया व फोग के पौधे लगाएं. पौध के आसपास सेवन, धामन घास, तुंबा की बिजाई करें और पौध की सिंचाई करें.

* हवा से उड़ने वाली रेत से बचाने के लिए पौधों के पास सूखी टहनियों से माइक्रो विंड ब्रेक लगाते हैं.

* टिब्बों की तारबंदी कर उन्हें पशुओं से बचाएं.

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