Animal Care. गरमियों में पेट में गैस बनने की शिकायत आम रहती है, लेकिन यही गैस कभीकभी इतनी खतरनाक हो जाती है कि पशु की मौत तक हो जाती है. इसलिए जानें इस बीमारी के बारे में.
अफरा यानी बदहजमी एक ऐसी बीमारी है, जो जुगाली करने वाले पशुओं गाय, भैंस, भेड़ व बकरी में होती है. पशुओं के पेट की बीमारियों में यह सब से खतरनाक बीमारी है. यह इतनी घातक होती है कि अगर समय पर इलाज न किया जाए तो चंद घंटों में ही पशु की मौत तक हो सकती है.
बीमारी की वजह
सूखे चारे के बाद अचानक पनीला, हरा व स्वादिष्ठ चारा मिलने पर पशु द्वारा खुराक से अधिक चारा खा लेने से अफरा होता है.
पशु का एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदलाव होने व चारे में अचानक बदलाव होने पर भी यह परेशानी हो जाती है.
पशुओं को बारिश से भीगा सड़ागला चारा देने या साथ में कभीकभी जहरीली घास के शामिल होने की वजह से भी अफरा हो जाता है.
अधिक मात्रा में अनाज, बारीक पिसा हुआ आटा व अधिक प्रोटीन वाले दाने जैसे मटर, चना या फलीदार चारा खिलाने से भी पेट में गैस बनती है.
अधिक समय से भिगोया दाना या खली से भी यह बीमारी होती है.
दलहनी चारा अधिक मात्रा में खिलाने, पशु के काफी समय तक एक ही करवट बैठे रहने और खेत या यातायात से जुड़े पशुओं को चारा खिलाने के तुरंत बाद काम लेने की वजह से उन्हें अफरा होने का खतरा रहता है.
पशु द्वारा पौलीथिन की थैलियां, लोहे की कोई नुकीली सुई या तार वगैरह को चारे या दाने के साथ खा लेने से गले में रुकावट की वजह से भी यह बीमारी होती है.
बीमारी के लक्षण
पीडि़त पशु चारा खाना और जुगाली करना बंद कर देता है. पशु के बांई तरफ का पेट गैस की वजह से फूल जाता है और पेट पर हाथ से थपथपाने पर ढोलक जैसी ढपढप की आवाज आती है.
पशु अपनी पीठ कमान की तरह कर के खड़ा होता है और अकसर अपने पेट के बाईं ओर देखता है.
दर्द की वजह से पशु बेचैन होता है जिस के कारण वह रंभाता या कराहता है.
पेट में गैस भरने से डायफ्राम के ऊपर दबाव पड़ने से पशु को सांस लेने में कठिनाई होती है, जिस से वह मुंह खोल कर सांस लेने की कोशिश करता है.
पशु का बारबार लेटना व खड़ा होना, पिछला पैर पटकना और पेट पर लात मारना जैसे लक्षणों से अफरा को पहचान सकते हैं.
उपचार
पेट फूला होने पर पशु को किसी भी तरह का चारा या दाना बिलकुल भी नहीं दें.
पशु के मुंह को खुला रखें. इस के लिए मुंह में नीम की पतली डंडी या कोई पतला डंडा लगा कर रस्सी से दोनों तरफ सिर के सहारे बांध देना चाहिए, जिस से पशु मुंह खोलता व बंद करता रहे और गैस मुंह से बाहर निकलती रहे.
पशु की जीभ पर नमक रगड़ते रहें. खाने वाला सोडा 40-50 ग्राम और नौसादर 30-40 ग्राम आधा किलो कुनकुने पानी के साथ पिलाएं.
सरसों या मीठा तेल लगभग एक पाव और तारपीन का तेल 60 मिलीलीटर मिला कर पशु को पिलाएं.
अरंडी का तेल एक पाव और गाय का दूध एक किलो मिला कर हलका कुनकुना कर पशु को पिलाएं.
10 ग्राम हींग आधे लीटर पानी या एक पाव खाने वाले किसी तेल के साथ पिलाना भी सही रहता है.
बाजार में अफरा के इलाज के लिए कई दवाएं उपलब्ध हैं, जैसे टिंपाल पाउडर, ब्लाटोसिल, टाइरिल वगैरह. इन में से कोई एक देने से पशु को फौरन आराम मिलता है.
इन सब के बावजूद पशु को आराम न मिले तो समय गंवाए बिना नजदीकी पशु डाक्टर से इलाज कराएं. अगर पेट ज्यादा फूल गया हो तो पशु के बाएं (कोख) पेट से किसी बड़ी सूई या ट्रोकार कैनुला द्वारा गैस निकलवानी चाहिए.
बीमारी से बचाव के उपाय
पशु को अचानक बहुत नरम, पनीला हरा चारा ज्यादा मात्रा में नहीं दें, वरना पशु लालचवश जरूरत से अधिक खा लेगा.
हरे चारे के साथ सूखा भूसा जरूर खिलाएं.
पशुओं को दिए जाने वाले आहार व चारे में किसी भी मौसम में अचानक बदलाव नहीं करें. चारेदाने का बदलाव धीरेधीरे करें.
पशु को दिया जाने वाला हरा चारा सड़ागला न हो. हरे चारे के साथ कोई जहरीली घास न हो, यह जरूर देख लें. पशु को सड़ागला दाना या खली कभी नहीं देनी चाहिए.
पशु को दिया जाने वाला आहार, दाना, खली खिलाने से एक घंटा पहले भिगोएं.
पशु को दिया जाने वाला चारा, दाना, पानी शुद्ध और साफसुथरा होना चाहिए.
खाने के तुरंत बाद पशु से किसी तरह का काम न लें, थोड़े आराम के बाद ही काम लेना सही होगा, वरना पशु को अफरा हो सकता है.





