खेती में नएनए संसाधनों के चलते लागत बढ़ रही है. खतरनाक केमिकल हमारी मिट्टी, हवा और पानी को खराब कर रहे हैं. छोटे व सीमांत किसानों के लिए बढ़ती महंगाई के चलते खेती करना नुकसानदायक साबित हो रहा है. इन हालात में पशुधन (Livestock) खासकर गायभैंसों का रोल बहुत ज्यादा बढ़ गया है.

गाय के गोबर से हम जैविक खाद वर्मी कंपोस्ट, वर्मी वाश, सीपीपी, मटका खाद, नाडेप वगैरह बना कर मिट्टी के उपजाऊपन और उस की सेहत को ठीक कर सकते हैं. गाय के पेशाब से कीटनाशक वगैरह बना कर केमिकलों की जगह इस्तेमाल में ला कर लागत कम कर सकते हैं.

आज जैविक उत्पादों की मांग लगातार

बढ़ रही है. हर आदमी जैविक अनाज व सागसब्जी हासिल करना चाहता है. ऐसे में जैविक अनाज के उत्पादन के लिए पशु पालन किसान के लिए जरूरी हो गया है.

यह जानना जरूरी

– हमारे यहां ज्यादातर पशुओं के वंश का पता नहीं है. बड़ी तादाद में ऐसी गायें व भैंसें हैं, जिन का प्रति ब्यांत औसत दूध उत्पादन 3 सौ से 1 हजार लीटर है.

– अभी देश में सूखे चारे, हरे चारे व दाने की क्रमश: 36 फीसदी, 60 फीसदी व 44 फीसदी कमी होने के चलते दूध उत्पादन पर असर पड़ा है.

– पशुओं के प्रजनन काल में लंबा अंतर है.

– पशुओं की देखरेख में कमी है और किसान पशुओं की बीमारी के बारे में ज्यादा जागरूक नहीं हैं.

– देश में गायों की संख्या भैंसों की तुलना में काफी ज्यादा है. इन की दूध उत्पादन क्षमता बहुत कम है.

– गाय की अच्छी नस्लें साहीवाल, लाल सिंधी और गीर हैं. इन का औसत दूध उत्पादन प्रति ब्यांत 18 सौ से 22 सौ लीटर है.

– दूध उत्पादन के साथ खेती के काम के लिए हरियाणा और धारपारकर अच्छी नस्लें हैं, जिन का औसत दूध उत्पादन प्रति ब्यांत 15 सौ से 18 सौ लीटर है.

– भैंसों में दूध देने वाली मुर्रा, भदावरी, नीली रवि और सुरही प्रमुख नस्लें हैं, जिन का औसत दूध उत्पादन एक ब्यांत में 18 सौ से 22 सौ लीटर है.

– दूध के साथ खेती के लिए हरियाणा व धारपारकर नस्लें हैं. इन का औसत दूध उत्पादन 15 सौ से 25 सौ लीटर तक है.

– गायों में दूध उत्पादन को बढ़ाने के लिए संकर प्रजनन पर बल दिया गया है.

– कुछ स्थानों पर देशी और विदेशी नस्ल की गायों के प्रजनन से संकर नस्ल की गायों करन फ्रीज, करन स्वीस और फ्रिजवाल से दूध उत्पादन का काम हो रहा है.

पशुओं का चयन :

पशु के चुनाव का मकसद पशुधन का सुधार करना है. चुनाव द्वारा उन की रचना को बदल कर अच्छे गुणों को पशुओं में बदला जा सकता है, जिस से आगे की नस्ल सुधर जाती है. पशुओं का चयन कई तरह से किया जाता है:

बाहरी आकार में मादा पशु देखने में सौम्य और सुंदर होना चाहिए. उस का शरीर आनुपातिक और चलने का तौरतरीका शानदार होना चाहिए. डेरी उपयुक्तता में मादा पशु को सामने, ऊपर और बगल से देखने में उस का शरीर त्रिकोण के आकार का होना चाहिए. शारीरिक क्षमता में नथुने चौड़े, खाल ढीली व नरम और शरीर चुस्त और हलकाफुलका होना चाहिए. इसी तरह उत्पादन प्रणाली में थन भलीभांति विकसित और पिछला भाग भरा होना चाहिए. चारों चूचक मध्यम श्रेणी और बराबर फासले पर होने चाहिए. दूध की नसें काफी उभरी हुई व शाखादार होनी चाहिए.

वंशावली चयन :

वंशावली देखते समय 2 पीढि़यों के संबंधियों का रिकौर्ड देखना चाहिए. पहले मातापिता से संतति में आए गुण यानी पिता से 50 फीसदी व माता से 50 फीसदी व दूसरी पीढ़ी यानी दादादादी से यानी दादा से 25 फीसदी, दादी से 25 फीसदी गुण बच्चों में आते हैं. इसी आधार पर अगली पीढ़ी के पशुओं के दूध उत्पादन की क्षमता को आसानी से जांच सकते हैं. सरकारी डेरी फार्मों से पशु खरीदते समय पशुओं के पीढ़ी दर पीढ़ी रिकौर्ड रखे जाते हैं.

खुराक का रखें ध्यान

* अधिक दूध उत्पादन के लिए पशुओं के आहार में अधिक से अधिक हरे चारे को शामिल करना चाहिए. दुधारू पशुओं को स्वस्थ रखने व उन से अधिक दूध उत्पादन के लिए पौष्टिक हरे चारों का पूरे साल इंतजाम होना चाहिए.

* खरीफ के मौसम में ज्वार, मक्का के साथ लोबिया और ग्वार बराबर मात्रा में पशुओं को भरपेट खिलाया जा सकता है. अक्तूबरनवंबर में बरसीम और लूर्सन व दिसंबर से अप्रैल तक और गरमियों में जई और बरसीम को हरे चारे के तौर पर खिलाया जा सकता है.

* मोटे चारे ज्वार, बाजरा व मक्का की कुट्टी काट कर खिलाएं. इस के अलावा प्रति किलोग्राम भूसा 4-5 किलोग्राम हरा चारा मिला कर खिलाना चाहिए.

* दाने व खली को दरी बना कर देना चाहिए. गाय को प्रति 3 लीटर व भैंस को प्रति ढाई लीटर दूध उत्पादन पर एक किलोग्राम दाने का मिश्रण देना चाहिए. गर्भ धारण में एक डेढ़ किलोग्राम दाना अगल से देना चाहिए.

* पर्याप्त मात्रा में खनिज लवण व विटामिन भी आहार में शामिल होने चाहिए.

* पर्याप्त मात्रा में साफ पानी हर समय दुधारू पशुओं को देना चाहिए.

* दूध उत्पादन के लिए राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड द्वारा तैयार यूरिया शीरा खनिज मिश्रण का इस्तेमाल किया जा सकता है.

पशु खरीदते समय रखें इन बातों का ध्यान

खेती और पशु पालन का चोलीदामन जैसा साथ है. दोनों का वजूद एकदूसरे के बगैर अधूरा है. आइए गौर करें इस बात की अहमियत पर.

*           खुले बाजार या मेले से पशु न खरीदें. वहां धोखाधड़ी की संभावना ज्यादा रहती है.

*             4-5 से अधिक किसान एक टोली में न जाएं नहीं तो अच्छे पशुओं के चयन में परेशानी होगी.

*             पशु पालकों से ही दुधारू पशु खरीदने चाहिए. अगर पशु दूध दे रहा हो तो कम से कम 3 से 5 बार खुद दूध निकाल कर देखें.

*             जिस योजना के तहत पशु खरीदे जा रहे हैं, उस के पशु डाक्टर को साथ ले जाएं. स्थानीय पशु डाक्टर पर निर्भर न रहें.

*              क्रय किए गए पशुओं को अपने साथ ट्रक पर ले आएं. छोटे बछड़ों का खास ध्यान रखें. तेज ट्रक में उन को चोट लगने का खतरा होता है.

*             मेले या बाजार से लाते समय पशुओं के खानेपीने व आराम का ध्यान रखें. जरा सी लापरवाही बरतने पर उन के दूध उत्पादन पर खराब असर पड़ता है.

*             पशुओं को घर लाने पर उन्हें वैसा ही भोजन व माहौल देने की कोशिश करें, जैसा पहले मिलता रहा हो.

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