Camel Farming. प्रसव के 7-8 दिन पहले से ही गाभिन ऊंटनी को चरने के लिए चारागाह नहीं भेजना चाहिए. हरा चारा देना चाहिए. विटामिन ए का इंजेक्शन जरूर देना चाहिए, ताकि मां व बच्चे को रतौंधी बीमारी नहीं हो. प्रसव के पहले ऊंटनी अकेले में रहना चाहती है. उस की पूंछ की जड़ के दोनों ओर 2 कटाव झलकते हैं. योनिद्वार के चारों तरफ सूजन दिखाई देती है. वह बारबार उठतीबैठती है.

कब पिलाएं नवजात को दुध

स्तनग्रंथि और थन सूज जाते हैं. इस से पता चल जाता है कि जल्द ही 1-2 घंटे के भीतर ऊंटनी बच्चा पैदा करेगी. आमतौर पर नवजात बच्चा एक घंटे के भीतर खुद ही अपनी मां का दूध पीने लग जाता है. बच्चा अगर थनों से पूरा दूध नहीं पी सके तो बचा हुआ दूध दुह कर निकाल देना चाहिए.

क्या हैं फायदें?

इस से थनैला बीमारी का डर नहीं रहता. बच्चा 3 महीने तक केवल ऊंटनी के दूध पर ही निर्भर रहता है. बच्चे के जन्म के 3 दिन तक लगातार विटामिन ए और क्लोरम फेरिकाल के टीके लगा कर दस्त व रतौंधी से बचाया जा सकता है. बच्चे को सर्रा बीमारी से बचाने के लिए 3 महीने बाद टीका लगवाएं.

ऊंट की उम्र

जन्म के समय नवजात ऊंट के मुंह में कोई भी दांत नहीं होता है. दूसरे हफ्ते के आखिर तक मध्य दूधिया दांत और महीनेभर में निचले जबड़े के सभी दांत निकल आते हैं. 3 साल के ऊंट के दूधिया दांत घिसने लगते हैं. 4 साल की उम्र में दूधिया दांत घिस कर सिर्फ छोटे टुकड़ों के रूप में रह जाते हैं. सारे दांत एक दूसरे से अलग दिखाई देने लगते हैं.

साढ़े 4 साल की मादा बच्चा पैदा करने लायक हो जाती है. इस उम्र में निचले जबड़े में स्थाई मध्य दांत निकल आते हैं. 5 साल की उम्र तक आतेआते दूधिया दांत गिर जाते हैं. 6 साल के ऊंट के निचले जबड़े में 4 स्थाई दांत होते हैं.

6 साल का नर ऊंट प्रजनन कर सकता है, साढ़े 6 साल की उम्र में पीछे के दांत निकलने लगते हैं और 7 साल की उम्र में सभी दांत पूरे विकसित हो जाते हैं. 8 साल की आयु में चोरदंत या कुकुरदंत निकलने शुरू हो जाते हैं और 9 साल की उम्र में पूरे विकसित हो जाते हैं. इस उम्र में ऊंट के ऊपरी जबड़े में 16 व निचले जबड़े में 18 कुल मिला कर 34 दांत होते हैं.

9 साल के बाद दांतों की घिसावट के अनुसार उम्र का पता लगाया जाता है. 11 साल के बाद दांतों के आधार पर उम्र का सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है. ऊंट का जीवनकाल 40 साल का होता है, लेकिन 20 साल के बाद इस की उपयोगिता कम होने लगती है.

ऊंटनी के दूध से बन रहीं आइसक्रीम और दवाएं

ऊंटनी के दूध से भारतीय मिठाई व कुल्फी, चाय, कौफी, लस्सी, सुगंधित दूध, क्रीम वगैरह तैयार कर विदेशों में निर्यात किए जा रहे हैं. गुलाबजामुन और पनीर बनाने की तकनीक किसानों को भी बताई जा रही है.

मानव स्वास्थ्य के हित में ऊंटनी के दूध के अलावा ऊंट के खून से भी दवाएं बनाने की ओर खोजबीन चल रही है. ऊंट के खून से सांप के जहर के इलाज के लिए एंटीइनेक वीनम तैयार किया गया है. शुगर की दवा बनाने के लिए रिसर्च जारी है. वैज्ञानिकों ने ऊंट के खून से थायराइड और टीबी के इलाज के लिए एंटीबाडीज तैयार कर ली है. भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान, मुंबई के साथ मिल कर बीकानेर के केंद्र ने प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, टीबी व थायराइड को दूर करने की एक बड़ी परियोजना हाथ में ली है.

केंद्र ने कृषि इंजीनियरिंग के सहयोग से ऊंटचालित प्रोसेसिंग यंत्र और बिजली उत्पादन यूनिट तैयार की हैं, जिन में ऊंटों को काम पर लगा कर बिजली उत्पादन, चारा काटने व अनाज की पिसाई का काम किया जाता है. ये काम पर्यावरण अनुकूल होने के साथसाथ इन से डीजल, बिजली की भी बचत हो सकती है.    Camel Farming

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