Cow Dung Manure. आज का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब किसान 10-15 ट्रॉली गोबर खेत में डालता है, तब भी फसल पीली क्यों पड़ जाती है? खेत में खरपतवार का जंगल क्यों उग आता है? और दीमक फसल की जड़ों को क्यों चट कर जाती है? यदि आप भी अपने खेतों में देशी गोबर की खाद डाल रहे है तो एक बार यह जरूर पढ़ें.
अधूरी जानकारी, बड़ा नुकसान
हम बचपन से सुनते आए हैं कि ‘गोबर डालो, मिट्टी सोना उगलेगी’ जबकि सच्चाई यह है कि खेती में आधी-अधूरी जानकारी सबसे बड़ा नुकसान करती है. बहुत से किसान आज भी ताजा और कच्चा गोबर सीधे खेत में डाल देते हैं, जबकि विज्ञान साफ कहता है कि कच्चा गोबर खाद नहीं बल्कि अधपचा जैविक पदार्थ होता है. जो खेती में फायदा करने के बजाय नुकसान कर सकता है. आइए, जानते हैं कैसे :
-इसमें कार्बन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है और नाइट्रोजन कम. जब इसे खेत में डाला जाता है तो मिट्टी के सूक्ष्म जीव इसे सड़ाने के लिए मिट्टी की उपलब्ध नाइट्रोजन को खींच लेते हैं.
-परिणाम यह होता है कि पौधे को नाइट्रोजन नहीं मिलती और फसल पीली पड़ने लगती है. इसे वैज्ञानिक भाषा में नाइट्रोजन इमोबिलाइजेशन कहा जाता है.
-यही नहीं, कच्चे गोबर में जंगली घास के हजारों बीज जिंदा रहते हैं. पशुओं का पाचन तंत्र इन बीजों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाता.
-जब किसान ताजा गोबर खेत में डालता है तो असल में वह खरपतवार की बोआई कर देता है. बाद में खेत में मजदूरी और खरपतवार नियंत्रण का खर्च कई गुना बढ़ जाता है.
-एक और बड़ा खतरा दीमक और सफेद लट का है. अधपचे गोबर में मौजूद सेलुलोज दीमक का पसंदीदा भोजन होता है.
-पहले दीमक गोबर खाती है और बाद में फसल की जड़ों पर हमला कर देती है. गेहूं, गन्ना, मिर्च और सब्जियों में यह समस्या तेजी से बढ़ती है.
-बहुत से किसान सोचते हैं कि अगर गोबर को 5-6 महीने खेत के कोने में ढेर लगाकर छोड़ दिया जाए तो वह अच्छी खाद बन जाती है.
-खुले आसमान के नीचे धूप और बारिश में पड़ा गोबर अपनी असली ताकत खो देता है. तेज धूप से उपयोगी बैक्टीरिया मर जाते हैं और नाइट्रोजन अमोनिया गैस बनकर उड़ जाती है.
-बारिश आने पर पोटाश और दूसरे पोषक तत्व पानी के साथ नीचे बह जाते हैं. आखिर में किसान खेत में ऐसी सामग्री डालता है जिसमें पोषण बहुत कम बचता है.
क्या है सही तरीका
-सही तरीका यह है कि गोबर की वैज्ञानिक कंपोस्टिंग की जाए. खाद बनाने के लिए जमीन के ऊपर परतदार ढेर तैयार करना चाहिए.
-सबसे नीचे सूखा भूसा या फसल अवशेष रखें, उसके ऊपर ताजा गोबर और फिर थोड़ी पुरानी खाद या जीवित मिट्टी डालें.
-इसी तरह कई परतें बनाकर ढेर तैयार करें। इससे अंदर लाभकारी सूक्ष्म जीव तेजी से काम करते हैं.
-खाद बनाते समय नमी सबसे महत्वपूर्ण चीज है. बहुत ज्यादा पानी भर देने से ऑक्सीजन खत्म हो जाती है और खाद सड़ने लगती है.
-सही नमी की पहचान ‘लड्डू टेस्ट’ से की जा सकती है. मुट्ठी में दबाने पर सामग्री का लड्डू बन जाए लेकिन पानी न टपके, तो नमी सही मानी जाती है.
-जब खाद सही तरीके से बनती है तो उसके अंदर तापमान 60 से 70 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.
-इस तापमान पर खरपतवार के बीज और दीमक के अंडे नष्ट हो जाते हैं. यही वजह है कि वैज्ञानिक तरीके से बनी खाद खेत में घास और दीमक की समस्या कम करती है.
-हर 15-20 दिन में खाद की पलटाई जरूरी होती है. इससे ऑक्सीजन मिलती रहती है और कंपोस्टिंग प्रक्रिया तेज चलती है.
-लगभग 60 से 70 दिन बाद तैयार खाद भुरभुरी, गहरे रंग की और मिट्टी जैसी खुशबू वाली बन जाती है. इसे ही असली ह्यूमस या ब्लैक गोल्ड कहा जाता है.
-यहां भी एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. साधारण गोबर खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा सीमित होती है, इसलिए समझदार किसान इसे बायोफर्टिलाइजर के साथ सुपरचार्ज करते हैं.
-तैयार खाद में पीएसबी (फास्फेट सॉल्युबलाइजिंग बैक्टीरिया), एजोटोबैक्टर और ट्राइकोडर्मा मिलाया जाए तो यह खाद कई गुना ताकतवर बन जाती है.
-पीएसबी मिट्टी में बंद पड़े फास्फोरस को घुलनशील बनाता है. एजोटोबैक्टर वातावरण की नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है.
-ट्राइकोडर्मा मिट्टी की हानिकारक फफूंद को नियंत्रित करता है और जड़ों की सुरक्षा करता है.
किसान करें यह काम, खाद बनेगी बेमिसाल
1 टन तैयार ठंडी खाद में लगभग 1 लीटर पीएसबी, 1 लीटर एजोटोबैक्टर और 1 लीटर ट्राइकोडर्मा मिलाया जा सकता है.
इसे सक्रिय करने के लिए 50 लीटर पानी में 2 किलो गुड़ और 1 किलो बेसन घोलकर खाद पर छिड़कें और 10-15 दिन ढककर रखें. इस दौरान सूक्ष्म जीव तेजी से बढ़ते हैं और खाद अत्यंत प्रभावी बन जाती है.
खेत में उपयोग की बात करें तो एक बीघा में लगभग 3-4 टन सुपरचार्ज खाद अंतिम जुताई के समय पर्याप्त रहती है और यह कई 10 ट्रॉली कच्चे गोबर से ज्यादा असर देती है. इससे रासायनिक उर्वरकों और फफूंदनाशकों पर खर्च कम किया जा सकता है.
किसान यह भी जानें
-अगर फसल खड़ी है और पौधे पीले पड़ रहे हैं, तो जीवामृत एक तेज विकल्प हो सकता है.
-गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन से बना जीवामृत मात्र 7 दिन में तैयार हो जाता है और ड्रिप या सिंचाई के साथ देने पर फसल तेजी से प्रतिक्रिया देती है
-आज खेती केवल खाद डालने का काम नहीं रही. यह मिट्टी के विज्ञान, सूक्ष्म जीवों और पोषण प्रबंधन को समझने का समय है.
जो किसान गोबर का सही विज्ञान समझ लेता है, वह खेती की लागत कम करके मिट्टी की ताकत बढ़ा सकता है. जरूरत है समझदारी से काम करने की.





