Rice Farming. धान जलीय पौधा नहीं है, लेकिन किसान इस की खेती जलीय पौधों की तरह करते हैं. वे खेतों में पानी भरा रखते हैं. कई बार यह पानी फसल में बीमारी की वजह बनता है. वर्तमान हालात में कम पानी में धान की खेती के लिए किसानों को यह चाहिए कि वे 15-20 दिन की पौध की रोपाई ही कर दें. अगर पौध बड़ी हो गई तो उस की पत्तियों को 2-3 इंच काट दें, क्योंकि इन पत्तियों में पत्ती लपेटक कीट के अंडे होते हैं. पौधे की रोपाई करते ही फसल में बीमारी लग जाती है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि धान की फसल

6 पानी में आसानी से हो सकती है. पूसा संस्थान के विशेषज्ञ डा. सीवी सिंह बताते हैं कि अगर खेत में पानी लगाने का कोई साधन न हो और जमीन में दरारें पड़ जाएं तो निराई कराएं. इस से एक तो खरपतवार मारने के लिए छिड़की जाने वाली दवा का खर्चा बचेगा, दूसरा जो उर्वरक खेत में डाले हैं वे पौधे की जड़ों तक आसानी से पहुंचेंगे और पौधों का अच्छा विकास होगा.

सूखे मौसम में धान के खेतों में अगर पानी ज्यादा भरा जाएगा तो उस में बीमारी फैलने की संभावना ज्यादा रहेगी. इस बात की परवाह न करें कि जमीन सूख गई है. पौधे न सूखें इतनी नमी बनाए रखें. पहली निराई पौध की रोपाई के 25-30 दिन के बाद करें और निराई के बाद खेत में उर्वरक डाल कर हलका पानी लगाएं. कम पानी में धान की फसल लेने के लिए खेत में 2 बार निराई करानी पड़ सकती है, लेकिन इस के परिणाम भी अन्य तरीकों से की गई खेती की तरह ही होंगे.

एक किलोग्राम धान 25 सौ से 3 हजार लीटर पानी से तैयार होता है. मसलन, 7 सौ ग्राम चावल पाने के लिए हमें इतने पानी की खपत करनी ही होती है.

श्री विधि है बेहतर

इस विधि को मेडागास्कर भी कहा जाता है. इस के लिए धान की पौध को 8 से 12 दिन की अवधि में खेत में रोप दिया जाता है. लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखते हैं. इस तकनीक से धान की खेती में जहां जमीन, मेहनत, पूंजी और पानी कम लगता है.

नर्सरी डालने का समय

इस बार गेहूं के उत्पादन के सभी अनुमान फेल कर मौसम ने यह साबित कर दिया है कि खेती अब अनपढ़ों का काम नहीं रह गया है. इस के लिए बेहद जागरूक रहने की जरूरत है. नर्सरी डालने से पहले क्यारी में जिंक फैरस सल्फेट, एनपीके आखिरी जुताई में जमीन की जरूरत के अनुसार डालें. नर्सरी शाम के समय डालें. खेत में पानी खड़ा न रहने दें. गोबर की खाद पूरी तरह से सड़ी हुई डालें.

बासमती सैगमेंट की बारीक दाने वाली किस्मों का बीज 16 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए. पौध रोपाई के लिए पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 20 सेंटीमीटर रहनी चाहिए.

नर्सरी डालने के लिए 15 मई से 15 जून का समय सही रहता है. इस के 20 से 25 दिन बाद तैयार पौध को खेत में रोप देना चाहिए. नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा जुताई में 40, 50, एवं 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से रखना चाहिए.

नाइट्रोजन की 35 किलोग्राम मात्रा रोपाई के 5 दिन बाद खेत में डालनी चाहिए. अखिरी खुराक कल्ले निकलते समय डालें. बीज को नमक के पानी में डाल कर थोथे दानों को निकाल देना चाहिए. इस के बाद धान को साफ पानी से धो कर भिगोना चाहिए. नर्सरी में अजोला का इस्तेमाल करें.

एजेक्टोवैक्टर, पीएसवी, ट्राईकोडर्मा, सूडोमोनास का भी नर्सरी इस्तेमाल करना अच्छा रहता है. फफूंदी वाली बीमारी से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा की 3 ग्राम मात्रा प्रति एक किलोग्राम बीज के उपचार के लिए मिलाएं.

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