Choorma Diwas. 13 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय चूरमा दिवस केवल एक पारंपरिक व्यंजन का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय कृषि, संस्कृति और पोषण का भी जश्न है. इसकी शुरुआत कब और कहां से हुई, आइए जानते हैं इस बारे में कुछ रोचक बातें.
कब हुई इस की शुरुआत
इस खास दिन की शुरुआत साल 2024 में हरियाणा के झज्जर से एक जन-अभियान के रूप में हुई. इस पहल का उद्देश्य चूरमा जैसे देसी व्यंजन को वैश्विक पहचान दिलाना, नई पीढ़ी को भारतीय खाद्य विरासत से जोड़ना और स्थानीय कृषि उत्पादों को बढ़ावा देना है.
खाओ चूरमा, बनो सूरमा : खेतों से थाली तक पहुंचती मिठास
इस दिवस का संदेश भी बढ़ा दिलचस्प है ‘खाओ चूरमा, बनो सूरमा’. यह स्लोगन किसान की लगन, मेहनत और सेहत के मीठे स्वाद का स्वादिष्ट उदाहरण है. इसे बनाने में गेहूं, बाजरा या ज्वार का आटा, देसी घी और मिठास के लिए गुड़ या बूरा का उपयोग होता है यानी चूरमा की मिठास सीधे खेतों से हमारी थाली तक पहुंचती है.
मिलेट्स को बढ़ावा देता दिवस
आज जब देश श्री अन्न (मिलेट्स) को बढ़ावा दे रहा है, तब अनेक मोटे अनाज जैसे बाजरे और ज्वार का चूरमा किसानों के लिए आय बढ़ाने का नया जरिया बन सकता है. आने वाले दिनों में लोग सेहत के लेकर जागरूक होंगे और फिर होटल, रेस्टोरेंट और फूड इंडस्ट्री में पारंपरिक व्यंजनों को अपनाएं जाने पर तो मोटे अनाजों की मांग बढ़ेगी जिससे किसानों को भी इसका सीधा लाभ मिलेगा.
ऐसे भी बनता है चूरमा
चूरमा बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं या बाजरे या अन्य मिलेट्स के आटे की मोटी बाटियां या रोटियां बनाई जाती हैं. इन्हें धीमी आंच पर अच्छी तरह सेंका जाता है। जिससे यह कड़क हो जाएं. इसके बाद इन्हें ठंडी होने पर हाथ से तोड़कर दरदरा या मोटा पीस लिया जाता है. फिर इसमें देसी घी और गुड़ या बूरा मिलाकर अच्छी तरह मिला लिया जाता है. अधिक स्वादिष्ट और सेहतमंद बनाने के लिए इलायची, बादाम, काजू, पिस्ता और किशमिश आदि भी मिलाई जा सकती हैं.
किसानों का मनपसंद और समय की जरूरत चूरमा
पहले के समय में किसान खेत पर काम करने से पहले या फसल कटाई, गहाई के दौरान चूरमा खाना पसंद करते थे, क्योंकि यह लंबे समय तक ऊर्जा देता था. बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज फाइबर, आयरन और कैल्शियम से भरपूर होते हैं. गुड़ कई खनिजों का अच्छा स्रोत माना जाता है, जबकि देसी घी शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है. यही कारण है कि आज भी विशेषज्ञ पारंपरिक खाद्य पदार्थों को आधुनिक फास्ट फूड की तुलना में बेहतर विकल्प मानते हैं.
कुछ रोचक बातें
-राजस्थान में दाल-बाटी-चूरमा की थाली दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखती है.
-राजस्थान और हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के कई हिस्सों में भी इसकी अलग-अलग किस्में बनाई जाती हैं.
-सर्दियों में बाजरे का चूरमा विशेष रूप से पसंद किया जाता है.
-कई ग्रामीण इलाकों में नई फसल आने की खुशी में भी चूरमा बनाया जाता है.
-फूड प्रोसेसिंग के तहत अब कई स्टार्टअप और महिला स्वयं सहायता समूह पैक्ड चूरमा तैयार कर देश-विदेश तक पहुंचा रहे हैं.
चूरमा दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हमारी थाली में परोसा गया पारंपरिक भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत, भारतीय संस्कृति और बेहतर पोषण की कहानी भी है. यदि हम स्थानीय अनाजों और देसी व्यंजनों को अपनाते हैं, तो इससे किसानों की आय बढ़ेगी, श्री अन्न को बढ़ावा मिलेगा और चूरमा केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय खेती, पारिवारिक परंपरा और स्वस्थ जीवनशैली का ऐसा स्वाद है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है. Choorma Diwas





