Inspiring Personality-

जल ही जीवन है, जल की एकएक बूंद का सही इस्तेमाल करते हुए नागौर जैसे डार्कजोन जिले के  किसान ने छोटी सी जमीन में 10 सालों में 10 हजार से ज्यादा पेड़ पनपा दिए. कम पानी से ही खेतों को उपवन का रूप दे कर भरपूर डेढ़ गुना ज्यादा पैदावार लेने वाले इस किसान की हिम्मत की दाद देनी होगी. इस किसान का नाम हिम्मतराम भांभू है.

इसे भी कुदरत का करिश्मा ही कहिए कि हिम्मताराम ने पुश्तैनी जमीन गांव सुखवासी में नहीं, बल्कि सूखे हुए हरिमा गांव में कर्ज ले कर खरीदी 34 बीघा जमीन में हरियाली का छोटा पहाड़ उगा दिया. पेश है हिम्मताराम की सफलता की कहानी उन्हीं के शब्दों में:

हिम्मताराम की कहानी

वैसे तो मैं परंपरागत हूं, लेकिन खेती और वानिकी की प्रेरणा दादीमां से मिली. साल 1974-75 में दादी नैनीदेवी ने मेरे हाथ से गांव सुखवासी में पीपल का पेड़ लगवाया था.

जिंदगी की पटरी पर चलतेबढ़ते जब साल 1987-88 में उसी पौधे को विशाल पेड़ के रूप में देखा, तो दादी की प्रेरणा ने बड़ा रूप ले लिया. आज पूरे नागौर जिले में 5 लाख पेड़ लगा चुका हूं.

मूलरूप से एक किसान परिवार का होने के नाते खेती की जमीन पर वनविकास करना उस समय समाज में हंसीमजाक लगता था, लेकिन मैं ने जैसेतैसे कर के गांव हरिमा (जो वास्तव में पेड़विहीन सा था) में 34 बीघा जमीन खरीदी. साल 1999 में इस जमीन में पौधे रोपे. हां, तब इतनी सावधानी जरूर बरती कि रेतीली जमीन, खारे पानी और सूखे मौसम के हिसाब से यहां खेजड़ी, कुमठ, नीम, कैर, देशी बेर, गूंदा, रोहिड़ा, खजूरिया, देशी बबूल, झालकी, अड़वा जैसे लोकल पेड़ों को ही लगाया.

हिम्मत नहीं हारी

हालांकि कुछ लोग मुझे खेत में पौधों की कतारों पर काम करते देख कर हंसते भी थे. लेकिन मैं डटा रहा. मैं ने हिम्मत नहीं हारी. कतारों के बीच जुताई करने में काफी सावधानी रखनी पड़ती, समय भी ज्यादा खर्च होता. लेकिन शुरुआत में मैं ने थोड़ा सा घाटा सहन किया. आज मेरे खेतों में बारहों महीने कुछ न कुछ उपज मिलती रहती है.

खेजड़ी मरुधरा की जीवन रेखा

खेती धीरज, सहकारिता और समय से ही फायदा देती है. राजस्थान के मरुस्थलीय खेतों में तो स्थानीय पेड़ पनपा कर ही किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं. मेरी निजी राय में जितने ज्यादा खेजड़ी के पेड़ होंगे, उतना ही किसान ज्यादा खुशहाल होगा.

खेजड़ी तो हमारी मरुधरा की जीवन रेखा है. मैं ने तो अपने एकदूसरे खेत में 6 बीघा में 4 सौ पेड़ खेजड़ी और देशी बबूल के बिना किसी खर्चे के केवल बरसाती पानी से ही पनपाए हैं. पेड़ लगाने में खर्चा नगण्य है, बचाने के लिए थोड़ी लगन रखनी पड़ेगी. पेड़ आप की खेती में कई गुना ज्यादा बढ़ोतरी करेंगे. खेजड़ी तो फसल को हेज यानी स्नेह देती है, परहेज नहीं करती. इसलिए मेरे खेतों की जमीन सोना उगलती है.

कैसे पनपाएं खेजड़ी

पके हुए खोखों यानी खेजड़ी फली को बकरी को खिलाएं. मींगणी को महफूज रखें. पहली बरसात से पहले गहरा गड्ढा तैयार कर लें. हर गड्ढे में 3-4 मींगणी डालें. साथ ही कैर यानी ढालू के बीज भी डालें. केवल मईजून महीने में सिंचाई नाममात्र के पानी से करें, ताकि पहली बारिश में बच सकें. मवेशी से नहीं, ट्रैक्टर हल से बचाएं.

पेड़ तो प्राणदाता है

पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ में हमारे किसान भी पिसते जा रहे हैं. नीचे धरती की कोख से पानी खींचने की मशीनें तो खूब हैं, लेकिन ऊपर गगन से पानी बरसाने के लिए मशीनें कहां?हैं?

यह काम तो पेड़ ही करते हैं. जब किसान धान, तिलहन, दलहन और नकदी फसलों के लिए हजारों सालों से संचित जमीनी पानी को दुश्मन की तरह दोहन कर के भी पेड़ नहीं पनपा सकते तो हम स्वार्थी हो रहे?हैं. किसान को अन्नदाता कहते?हैं, लेकिन पेड़ तो प्राणदाता है. आज इनसान ही दूसरे के प्राण सुखा रहा है, तो वह किसान कहलाने का हकदार ही नहीं.

पेड़ों की छनती हुई धूप, बरसात की सीधी बौछार और मिट्टी कटाव से नाजुक फसलों का बचाव होता है. पेड़ों की मंजरी पर तितलियां, भौंरे और कीट बैठ कर फसल का परागण भी बढ़ाते हैं. पत्तियां खाद बनाती हैं. पेड़ों की जड़ें गहरी जाती?हैं, फसलों की जड़ें उथली, इस में किसी तरह की टकराहट का सवाल ही नहीं उठता.

भरपूर फसल

जहां एक ओर किसान पशुपक्षियों से फसल को बचाने के चक्कर में तारबंदी, कीटनाशी छिड़काव और निगरानी पर जोर देते?हैं, वहीं मैं ने पेड़ों पर जगहजगह मिट्टी के चौड़े बरतन लटकाए हैं. बरतन में पानी पी कर फल से चुग्गा चुगने वाले परिंदे जितना खाते हैं, उसी अनुपात में उपजाऊ खाद भी तो देते हैं. यही नहीं, हानिकारक कीड़ेमकोड़ों को भी ये पक्षी खा जाते हैं. इतने पक्षियों के बावजूद मेरे खेत में हमेशा भरपूर फसल हो ही जाती है.

आज के युग में खेती को कारोबार मानना तो वाजिब है, लेकिन किसान को ‘अन्नदाता स्वरूप’ बचाए रखना होगा. लोग नवाचार करने वालों पर हंसते हैं,जो कि बिलकुल गलत है.

पढ़लिख कर भी किसान बीड़ी, गुटखा, अफीम, शराब और सामाजिक कुरीतियों दहेज, आदि से उबर नहीं पाया है और दोष खस्ताहाल खेती को देता है.

हकीकत तो यह?है कि निरंतर अकालों के बावजूद मरुधरा ने अपनी कूवत बिलकुल नहीं खोई?है, उलटे किसानों ने मेहनत करने की कूवत, धीरज को छोड़ कर नशे को पकड़ लिया है. इस में खेती का भला क्या दोष?

मैं ने नशेडि़यों का नशा छुड़ाया है. अकाल, बाढ़, कर्ज से पीडि़त कुछ हिम्मतहारू लोग थोड़ी सी मुसीबत में जमीन बेच कर शहरों में धंधा पनपाने की सोचते हैं, उन के लिए मेरा यह संदेश है कि ‘शौकियाना जमीन को जो बेचेगा वह जिंदगी में कभी सफल नहीं होगा, वह कभी भी पेटभर नहीं खा सकता.

ज्यादा जानकारी के लिए हिम्मताराम भांभू के मोबाइल नंबर 09414241601 पर संपर्क कर सकते हैं.        Inspiring Personality

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...