Litchi Farming. जायकेदार और रसदार लीची की खेती के लिए खास आबोहवा और मिट्टी की जरूरत होती है, इसलिए हर जगह इस की खेती नहीं हो सकती है. उत्तरी बिहार, देहरादून की घाटी, उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों और झारखंड के कुछ हिस्सों में इस की खेती होती है. इस के अलावा पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब के कुछ इलाकों में भी लीची की खेती की जा रही है.

लीची के जैम और स्क्वैश की इंटरनैशनल मार्केट में मांग बढ़ने से पठारी इलाकों में इस की खेती की कोशिश शुरू हो गई है. झारखंड के रांची, पूर्वी सिंहभूम और उत्तराखंड में लीची की पैदावार तेजी से बढ़ रही है.

लीची के लिए सामान्य पीएच मान वाली गहरी बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है. जहां मिट्टी की पानी सोखने की कूवत ज्यादा होती है, वहां इस की बेहतर पैदावार होती है. अब हलकी अम्लीय और लेटराइट मिट्टी में भी इस की खेती होने लगी है और इस के अच्छे नतीजे भी सामने आने लगे हैं.

लीची की खास किस्में

लीची की 3 प्रमुख किस्में हैं शाही, चायना और स्वर्ण रूपा लीची की सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली किस्म है. इस के फल गोल और लाल रंग के होते हैं और गूदे की मात्रा भी ज्यादा होती है.

इस किस्म के 15 से 20 साल के पेड़ 80 से 100 किलोग्राम लीची के फल देते हैं. चायना किस्म की लीची  देर से पकती है. इस के पेड़ बौने होते हैं और फल लाल व ज्यादा गूदे वाले होते हैं. इस का पूरी तरह से तैयार पेड़ 60 से 80 किलोग्राम लीची देता है. पठारी इलाकों में एक पेड़ 40 से 50 किलोग्राम लीची देता है.

कितने समय में मिलती पैदावार

कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि लीची के पेड़ को पूरी तरह से तैयार होने में 15-16 साल लग जाते हैं. शुरुआती दिनों में लीची के पौधों के बीच खाली पड़ी जमीन में दलहनी फसलें और सब्जियां लगा कर किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं. इस से मिट्टी की उर्वरा शक्ति का भी विकास हो जाता है.

लीची के साथ करें अन्य फलों की खेती

नई खोजों से पता चला है कि लीची के बगीचों में पूरक पौधों के रूप में अमरूद, शरीफा और पपीता भी लगाए जा सकते हैं. इन पौधों को लीची के 2 पौधों के बीच में 5×5 मीटर की दूरी पर लगा सकते हैं. एक हेक्टेयर खेत में लीची के 100 और 300 पूरक पौधे लगाए जा सकते हैं.

रखें ध्यान

पठारी इलाकों में मंजरी आने से 3 महीने पहले पौधों में सिंचाई करें.

मंजरी आने के 30 दिन पहले पौधों पर जिंक सल्फेट (2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर) डालें और उस के 15 दिन के बाद दूसरा छिड़काव करने से मंजरी और फूल अच्छे आते हैं.

लीची के बगीचे में मधुमक्खी के छत्ते रखने से लीची का शहद भी हासिल किया जा सकता है.

फल लगने के एक हफ्ते बाद प्लैनोफिक्स या एनएए का छिड़काव करने से फलों को झड़ने से बचाया जा सकता है.

फल लगने के 15 दिन बाद 15-15 दिनों के अंतर पर बोरिक एसिड (4 ग्राम प्रति लीटर) या बोरेक्स (5 ग्राम प्रति लीटर) का छिड़काव करने से फल कम झड़ते हैं और फल की मिठास भी बढ़ती है. Litchi Farming

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