भारत में सब से पहले कीवीफल (Kiwi Fruit) बंगलुरु के लालबाग गार्डन में एक सजावटी पेड़ के रूप में लगाया गया. बाद में भारतीय अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र फागली में इसे लगाया गया. पहली बार इस का फल साल 1979 में देखा गया. इस के बाद कई अन्य प्रजातियां न्यूजीलैंड से आयात कर के लगाई गईं. आज यह कम और मध्यम ऊंचाई वाले हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नीलगिरी की पहाडि़यों वगैरह में खूब हो रहा है.
कीवी की दुनिया में 50 प्रजातियां हैं. 2 प्रजातियां एक्टीनिडिया चाइनेंसिस और एक्टीनिडिया डेलिसियोसा जिन को कीवीफल (Kiwi Fruit) कहते हैं, भारत में भी पाई जाती हैं. भारत में उगाई जाने वाली सभी किस्में एक्टीनिडिया डेलीसियोसा समूह के वंशज से जुड़ी हुई हैं.
कीवी को सही नमी वाली हर तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन गहरी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 5-6 के बीच हो और फालतू पानी के निकलने का इंतजाम हो, इस की खेती के लिए ज्यादा ठीक होती है.
खेत की तैयारी व रोपण
कीवी को टीबार या निफिन तरीके से लगाया जाता है. 5-6 मीटर पौधों से और 4 मीटर लाइन से लाइन की दूरी पर दिसंबरजनवरी में पहले से तैयार किए गए गड्ढों में कीवी के पौधों को लगा दिया जाता है. पौधों को लगाने के बाद चारों ओर से मिट्टी को दबा कर सिंचाई कर देनी चाहिए. पाले से बचाने के लिए पौधों को खरपतवार या पुआल से ढक देना चाहिए और सिंचाई का खास ध्यान रखना चाहिए.
पौध तैयार करना:
कीवी की पौध कलम लगा कर, लेयरिंग और ग्राफ्टिंग द्वारा तैयार की जाती है.
कलम लगा कर:
कलमों को पौलीहाउस में तैयार किया जाता है. लकड़ी के बने बक्सों में बालू, सड़ी खाद, मिट्टी, लकड़ी का बुरादा और कोयले के चूरे का मिश्रण भर कर तैयार कर लेना चाहिए.
दिसंबरजनवरी के महीने में कटाईछंटाई के दौरान निकली टहनी को जमीन में दबा देते हैं और फरवरीमार्च महीने के समय जब तापमान थोड़ा बढ़ जाता है, टहनियों को जमीन से निकाल कर 15-20 सेंटीमीटर की कलमें, जिन में कम से कम 3 कलियां हों, के निचले सिरों को नैफ्थलीन एसिटिक एसिड के घोल में कुछ पल डुबो कर लकड़ी के बक्सों में लगा देते हैं.
इन बक्सों को 15-20 मिनट के अंतर पर रखें. इस तरीके से तैयार की गई कलमों से तकरीबन 90 फीसदी तक कलमें आराम से हासिल की जा सकती हैं. अगले साल दिसंबरजनवरी महीने में इन कलमों को पौलीहाउस से निकाल कर रोपाई के लिए लगाया जा सकता है.
ग्राफ्टिंग द्वारा:
दिसंबर में कीवी फलों से बीज को निकाल कर स्ट्रेटीफिकेशन के लिए फ्रिज या फिर किसी ठंडी जगह जमीन में दबा दिया जाता है और डेढ़ से 2 महीने बाद बीज निकाल कर पहले से तैयार की गई क्यारियों में 15-20 सेंटीमीटर की लाइन से लाइन की दूरी पर फरवरी के दूसरे हफ्ते में बोआई कर सड़ी हुई गोबर की खाद से ढक कर पुआल की पलवार बिछा देना चाहिए. बोआई के 15-20 दिन बाद बीजों में जमाव होना शुरू हो जाता है. पौधों को नर्सरी से निकाल कर दिसंबर में 15-20 सेंटीमीटर लाइन से लाइन व पौधे से पौधे की दूरी पर दूसरी जगह लगा दिया जाता है. इन मूलवृतों पर उन्नत किस्मों की सांकुर डाल कर फरवरीमार्च में जिह्वा कलम तकनीक द्वारा ग्राफ्टिंग कर दी जाती है. दिसंबरजनवरी में इन पौधों को निकाल कर गड्ढों में लगा दिया जाता है.
खाद:
15-20 किलो गोबर की खाद, आधा किलो नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश का मिश्रण, जिस में 15 फीसदी नाइट्रोजन हो, को 5 साल तक देते हैं. 5 साल बाद 25-30 किलो गोबर खाद और 800-900 ग्राम नाइट्रोजन, 500-600 ग्राम फास्फोरस व 800-900 ग्राम पोटाश प्रति पौधा देना चाहिए. नाइट्रोजन का एक हिस्सा कलियों के फूलने से पहले व दूसरे हिस्से को फल बनने के समय दें. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा को गोबर की खाद के साथ दिसंबरजनवरी में दिया जाना चाहिए. खाद देते समय बाग में सही नमी हो.
परागण:
कीवी की बेल एक लिंगी होने के चलते अच्छी पैदावार के लिए नर व मादा किस्मों को सही अनुपात में लगाना बहुत जरूरी है. इस के लिए 6-7 मादा बेल के साथ एक नर बेल जरूर लगानी चाहिए. इस में परागण मधुमक्खियों से होता है. इसलिए बाग में मधुमक्खियों के बक्सों को रखना ज्यादा सही रहता है.
सधाई और कटाईछंटाई:
कीवी के पौधों से अच्छी पैदावार लेने के लिए सधाई की जरूरत होती है. इस की सधाई परगोला, टीबार, निफिन व बावर तरीके से की जाती है. टीबार तरीके से सधाई काफी सुविधाजनक व सस्ती पड़ती है.
पौधों को लगाने के बाद जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर ऊपर से काट देना चाहिए. तने पर निकलने वाली टहनियों को काटते रहना चाहिए. इस के बाद ऊपर की कली को तोड़ देना चाहिए. बगल से निकलने वाली 2 मध्य समानांतर सेहतमंद शाखाओं को विपरीत दिशा में तार के साथ बढ़ाना चाहिए. अच्छी क्वालिटी वाले फल हासिल करने के लिए टीबार तकनीक को पौलीहाउस में अपनाना चाहिए.
फल नई शाखाओं पर ही आते हैं, जो एक साल पुरानी शाखाओं से निकली हुई होती हैं. एक शाखा सिर्फ 3-4 सालों तक ही फल देती है. इस के बाद उस को काट कर दूसरी शाखाओं को चुनना चाहिए. कटाईछंटाई दिसंबरजनवरी महीने में, जब पौधों से पत्तियां गिर जाएं, तब करनी चाहिए. जनवरी के बाद कटाईछंटाई करने पर बेलों से रस निकलने लगता है, जिस से बेलों के सूखने व मरने की संभावना रहती है. कीवी की अच्छी देखभाल से 20-25 टन प्रति हेक्टेयर फल हासिल हो जाते हैं.
कटाई के बाद:
इस के पौधे 4-5 साल में फल देना शुरू कर देते हैं और इस की तुड़ाई अक्तूबर से दिसबंर में किस्म और मौसम के अनुसार की जा सकती है.
तुड़ाई के बाद फलों को 20 डिगरी तापमान पर रखने से फल 10-12 दिन में पकने शुरू हो जाते हैं. पौलीथीन की थैलियों में रखने से फल सिकुड़ते नहीं हैं और जल्दी तैयार हो जाते हैं. आम हालात में फलों को 40-60 दिन तक कमरे में रखा जा सकता है. कोल्ड स्टोरेज में इस को जीरो डिगरी सेंटीग्रेड तापमान पर 6 महीने तक स्टोर किया जा सकता है.





