Grape Farming-
अंगूर ने उत्तर भारत में भी एक महत्त्वपूर्ण फल के रूप में अपना स्थान बना लिया है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंगूर के उत्पादन, उत्पादकता व क्षेत्रफल में बहुत तेजी से इजाफा हो रहा है.
अंगूर एक स्वादिष्ठ फल है. अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है, लेकिन इस से किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है. यहां हम अंगूर की खेती के बारे में चर्चा कर रहे हैं.
मिट्टी व आबोहवा
अंगूर की जड़ की काफी मजबूत होती है. यह कंकरीली, रेतीली से चिकनी व उथली से ले कर गहरी मिट्टियों में भी आसानी से पनपता है, लेकिन रेतीली, दोमट और पानी निकासी वाली मिट्टी इस के लिए अच्छी पाई गई है. इस की खेती के लिए लंबी गरमी अच्छी रहती है.
अंगूर के पकते समय बारिश या बादल का होना हानिकारक है. इस से दाने फट जाते हैं और फलों की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए उत्तर भारत में जल्दी पकने वाली किस्मों को ही लगाना चाहिए.
पौध तैयार करना :
अंगूर की पौध कटिंग कलम द्वारा तैयार होती है. जनवरी में काटछांट से निकली टहनियों से कलमें ली जाती हैं. कलम हमेशा स्वस्थ व पकी टहनियों से लेनी चाहिए. 4-6 गांठों वाली 25 से 45 सेंटीमीटर लंबी कलमें ली जाती हैं.
कलम का नीचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए और ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए. इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गई क्यारियों में लगा देते हैं. एक साल पुरानी जड़ वाली कलमों को जनवरी महीने में नर्सरी से निकाल कर खेत में रोपित कर देते हैं.
बेलों की रोपाई :
रोपाई से पहले मिट्टी की जांच जरूर करवा लें और खेत को तैयार कर लें. बेलों के बीच की दूरी किस्म और साधने की तकनीक पर निर्भर करती है.
इन बातों को ध्यान में रख कर 90×90 सेंटीमीटर आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन में आधा भाग मिट्टी, आधा भाग गोबर की सड़ी हुई खाद, 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, एक किलोग्राम सुपर फास्फेट व 5 सौ ग्राम पोटेशियम सल्फेट को अच्छी तरह मिला कर भर दें. जनवरी महीने में इन गड्ढों में एक साल पुरानी जड़ वाली कलमों को लगा दें. बेल लगाने के तुरंत बाद पानी दें.
सधाई व छंटाई :
अच्छी फसल लेने के लिए बेलों को साधने व काटछांट की सिफारिश की जाती है. बेल को उचित आकर देने के लिए इस के अनचाहे भाग के काटने को साधना कहते हैं और बेल में फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से फैलने के लिए किसी भी हिस्से की छंटनी को छंटाई कहते हैं.
अंगूर की बेल साधने के लिए पंडाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन व हैड तकनीकें अपनाई जाती हैं, लेकिन पंडाल तकनीक ही ज्यादा चलन में है.
पंडाल द्वारा बेलों को साधने के लिए ढाई मीटर ऊंचाई पर सीमेंट के खंभों के सहारे लगे तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है. जाल तक पहुंचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है. तारों के जाल पर पहुंचने पर ताने को काट दिया जाता है.
बेलों की सही समय पर काटछांट जरूरी है. जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तब छंटाई की जा सकती है, लेकिन कोंपले फूटने से पहले यह काम पूरा हो जाना चाहिए. काटछांट जनवरी महीने में की जाती है.
छंटाई में बेल के जिस भाग में फल लगे हों, उस के बढ़े हुए भाग को कुछ हद तक काट देते हैं. किस्म के अनुसार कुछ स्पर को केवल एक या 2 आंख छोड़ कर शेष को काट देना चाहिए. इन्हें रिनिवल स्पर कहते हैं. आमतौर पर जिन शाखाओं पर फल लग चुके हों उन्हें ही रिनिवल स्पर के रूप में रखते हैं.
ब्यूटी सीडलेस की 3-3 आंखें छोड़ कर छंटाई करें. परलेट की 3-4, पूसा उर्वशी व पूसा नवरंग की 3-5 और पूसा सीडलेस की 8-10 आंखें छोड़ कर छंटाई करनी चाहिए.
सिंचाई
नवंबर से दिसंबर महीने तक सिंचाई की जरूरत नहीं होती, क्योंकि बेल सुसुप्त अवस्था में होती है, लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई जरूर करें. फूल आने और पूरा फल बनने (मार्च से मई) तक पानी की जरूरत होती है. इस दौरान तापमान व मौसम को ध्यान में रखते हुए 8-10 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए.
फल पकने शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए. फलों की तुड़ाई के बाद भी एक सिंचाई जरूर कर देनी चाहिए.
खाद एवं उर्वरक
अंगूर की बेल मिट्टी से काफी मात्रा में पोषक तत्त्वों को लेती है. इसलिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए मिट्टी में खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्त्वों की पूर्ति जरूर करें.
पंडाल तकनीक से साधी गई व 3×3 मीटर की दूरी पर लगाई गई अंगूर की 5 साल की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट व 50-60 किलोग्राम गोबर की खाद की जरूरत होती है. छंटाई के तुरंत बाद जनवरी के आखिरी हफ्ते में नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्र व फास्फोरस की सारी मात्रा डाल देनी चाहिए. बाकी मात्रा फल लगने के बाद डालें. Grape Farming





