Grapes Farming-

अंगूर तोड़ने के बाद पकते नहीं हैं, इसलिए जब खाने लायक हो जाएं या बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए. फलों की तुड़ाई सुबह या शाम में करनी चाहिए. पैकिंग के पहले गुच्छों से टूटे व गलेसड़े दानों को निकाल दें.

अच्छे रखरखाव वाले बाग से 3 साल बाद फल मिलना शुरू हो जाते हैं, जो 2-3 दशक तक मिलते हैं. परलेट किस्म के 14-15 साल के बगीचे से 30-35 टन व पूसा सीडलेस से 15-20 टन प्रति हेक्टेयर फल लिए जा सकते हैं.

फसल सुरक्षा :

अंगूर की फसल को इन बीमारियों व कीटों से इस तरह महफूज रखें:

उत्तरी भारत में अंगूर की एंथ्रक्नोज व सफेद चूर्णी ही मुख्य बीमारियां हैं. एंथ्रक्नोज बहुत ही खतरनाक बीमारी है. इस का असर फल व पत्ती दोनों पर होता है.

पत्तों की शिराओं के बीच जगहजगह टेढ़ेमेढ़े गहरे भूरे दाग पड़ जाते हैं. इन के किनारे गहरे भूरे या लाल रंग के होते हैं, मध्य भाग धंसा हुआ हलके रंग का होता है और बाद में पत्ता गिर जाता है.

शुरू में फलों पर धब्बे हल्के रंग के होते हैं, बाद में बड़ा आकार ले कर बीच में गहरे हो जाते हैं. इस बीमारी की रोकथाम के लिए छंटाई के बाद बीमार भागों को खत्म कर दें.

कापर आक्सीक्लोराइड 0.2 फीसदी के घोल का छिड़काव करें. पत्ते निकलने पर 0.2 फीसदी बाविस्टिन का छिड़काव करें. बरसात में कार्बेंडाजिम 0.2 फीसदी का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें.

सफेद चूर्णी :

यह शुष्क मौसम में ज्यादा फैलती है. पत्तों, शाखाओं, एवं फलों पर सफेद चूर्णी दाग देखे जा सकते हैं. ये दाग धीरेधीरे पूरें पत्तों व फलों पर फैल जाते हैं, जिस के कारण फल गिर सकते हैं या देर से पकते हैं.

इस की रोकथाम के लिए 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक या 0.1 फीसदी कैरोथेन के 2 छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतर पर करें.

अंगूर को थ्रिप्स, चैफर बीटल कीट और कुछ पक्षी बहुत नुकसान पहुंचाते हैं.

थ्रिप्स :

थ्रिप्स कीट का हमला मार्च से अक्तूबर महीने तक रहता है. थ्रिप्स अंगूर की पत्तियों, टहनियों और फलों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाता है.

थ्रिप्स की रोकथाम के लिए 5 सौ मिलीलीटर मेलाथियान का 5 सौ लीटर पानी में घोल बना कर उस का छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा नीम के काढ़े को माइक्रो जाइम के साथ मिला कर पंप द्वारा खेत को तरबतर कर देना चाहिए.

चैफर बीटल :

अंगूर को सब से ज्यादा नुकसान चैफर बीटल से होता है. यह कीट रात में फसल पर हमला करता है और पूरी फसल को चौपट कर देता है.

इस की रोकथाम के लिए बारिश के मौसम के दौरान 10 बीएचसी पाउडर का छिड़काव हर 10 दिन के अंतर पर करें. ऐसा कर के चैपर बीटल पर काबू पाया जा सकता है.

पक्षी :

अंगूर पकने के समय तोते, कौवे वगैरह पक्षी गुच्छों को खा जाते हैं. अगर बेल घर के आंगन में लगी है, तो गुच्छों को हरे रंग के पौलीथिन या कपड़े की थैलियों से ढक देना चाहिए. बगीचों में उन्हें नायलोन के जाल से

ढक कर, ढोल या पटाखों के शोर से पक्षियों को उड़ा कर फसल को बचाना चाहिए.

उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्में इस तरह हैं

परलेट : यह उत्तर भारत में जल्दी पकने वाली किस्म है. इस की बेल ज्यादा फलदार और चमकीली होती है. गुच्छे मध्यम, बड़े तथा गठीले होते हैं. फल सफेदी लिए हरे तथा गोलाकार होते हैं.

ब्यूटी सीडलेस : यह बरसात से पहले मई के अंत तक पकने वाली किस्म है. गुच्छे मध्यम से बड़े, लंबे और गठीले होते हैं. फल मध्यम आकर के गोलाकार बिना बीज वाले व काले होते हैं.

पूसा सीडलेस : यह किस्म थांपसन सीडलेस से मेल खाती है. यह जून के तीसरे हफ्ते तक पकना शुरू होती है. गुच्छे मध्यम, लंबे, बेलनाकार खुशबू वाले और गठे हुए होते हैं. फल छोटे व अंडाकार होते हैं. फल पकने पर हरे पीले सुनहरे हो जाते हैं. यह किस्म किशमिश बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है.

पूसा नवरंग : यह संकर किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार की गई है. यह जल्दी पकने वाली और ज्यादा उपज देने वाली किस्म है. गुच्छे मध्यम आकर के होते हैं. फल बिना बीज वाले गोलाकार व काले रंग के होते हैं. इस किस्म में गुच्छे भी लाल रंग के होते हैं. यह किस्म रस व मदिरा बनाने के लिए बढि़या है.    Grapes Farming

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