अरहर का बीज (Arhar Seeds) तैयार करने के लिए प्रजनक या आधारीय प्रथम बीज और प्रमाणित बीज के लिए आधारीय बीज किसी कृषि विश्वविद्यालय या सरकारी संस्था या भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर से लेना चाहिए.
टाइप-21, मानक, यूपीएएस-120, आईसीपीएल-151 और पारस अरहर की अगेती वैरायटी हैं.
देर से बोआई के लिए पारस (250-275 दिन), टाइप-7, टाइप-17, बहार, अमर, नरेंद्र अरहर-1, आजाद, पूसा-9, पीडीए-11 का इस्तेमाल करें.
मिट्टी :
अरहर की फसल के लिए सामान्य पीएच मान वाली बलुई दोमट मिट्टी जिस में पानी निकास का सही इंजताम हो, अच्छी रहती है. बीज के लिए उस खेत का चुनाव करें, जिस में पिछले साल अरहर न उगाई गई हो.
दूरी :
अरहर में 5 से 30 फीसदी पर परागण होता है. इसलिए आधार बीज के लिए 200 मीटर और प्रमाणित बीज के लिए 100 मीटर की दूरी रखनी चाहिए.
खेत की तैयारी:
खेत की एक बार मिट्टी पलट हल से जुताई और 2 बार टिलर से जुताई कर पाटा लगा कर तैयार करना चाहिए. फसल को उकठा बीमारी से बचाने के लिए ट्राईकोडर्मा नामक फफूंदनाशी को गोबर की खाद में मिला कर आखिरी जुताई से पहले खेत में इस्तेमाल करें.
बीज की मात्रा :
बीज फसल के लिए 15-20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज चाहिए होता है. उपचार के लिए 2 ग्राम थीरम और 1 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम बीज या 4 ग्राम ट्राईकोडर्मा एक किलोग्राम बीज की दर से इस्तेमाल करें. बोने से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर से भी उपचारित करना चाहिए. 10 किलोग्राम बीज के लिए 1 पैकेट काफी होता है. कल्चर से उपचारित करने के बाद बीज को छाया में सुखाएं और तुरंत बोआई कर दें.
बोआई :
अरहर की देर से पकने वाली किस्मों की बोआई मध्य जुलाई तक और जल्दी पकने वाली प्रजातियों की बोआई जून के आखिरी हफ्ते तक जरूर कर देनी चाहिए. बोआई लाइनों में 60-75 सेंटीमीटर दूरी व पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेंटीमीटर रख कर करें. बोआई बेड प्लांटर से उठी हुई मेंड़ों पर करना सही होता है.
उर्वरक व सिंचाई :
अरहर को 20-30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश व 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. सिंगल सुपर फास्फेट 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या डीएपी 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और सल्फर बोआई के समय लाइनों में देना चाहिए.
खरीफ में बारिश की कमी में जरूरत पड़ने पर हलकी सिंचाई करें. खेत में कम नमी होने पर एक सिंचाई फूल आने से पहले और एक सिंचाई फलियां बनते समय करनी चाहिए.
खरपतवार रोकथाम :
रासायनिक विधि से खरपतवार रोकथाम के लिए पेंडामिथेलीन (30 ईसी) 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर को 700 लीटर पानी में घोल कर आखिरी जुताई के पहले खेत में छिड़काव कर के मिट्टी में मिला दें. बरसात में खरपतवारों की बढ़वार काफी हो जाती है, इसलिए बोआई के 25-30 दिन बाद और 40-50 दिन बाद निराईगुड़ाई करने से भी खरपतवार कम किए जा सकते हैं.
फसल सुरक्षा :
अरहर की बीज फसल को कीट व बीमारियों से इस तरह बचाएं:
फली बेधक कीट:
इस की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास (36 ईसी) का एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बना कर फूल आने पर छिड़काव करें और 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें.
पत्ती लपेटक कीट:
इस कीट द्वारा अधिक नुकसान नहीं होता है. ज्यादा कीट होने की दशा में मोनोक्रोटोफास (35 ईसी) का 900 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें
अरहर की फली मक्खी :
इस की रोकथाम के लिए फूल आने के बाद मोनोक्रोटोफास या डाइमिथोएट का 1.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें.
उकठा:
इस बीमारी से पौधों में पानी व खाद का संचार रुक जाता है. पत्तियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं और पौधा भी सूख जाता है. इस की रोकथाम के लिए लंबी अवधि का फसल चक्र अपनाएं. बीज उपचार जरूर करें.
बंझा रोग :
इस का कोई असरदार रासायनिक उपचार नहीं है. बंझा रोग अवरोधी जैसे नरेंद्र, अरहर-1, पूसा-9 वगैरह की बोआई से यह काफी हद तक कंट्रोल होता है.
फालतू पौधों को निकालना :
अरहर की फसल से 2 बार (फूल आते समय व फली पकते समय) अलग तरह के पौधों को फूलों के रंग, आकार, पत्तियों व फलियों के लक्षण के आधार पर पहचान कर निकाल दें और बीमार पौधों को भी निकाल कर मिट्टी में दबा दें या जला दें.
कटाई व गहाई :
फलियों के पकने पर पौधों को दराती या गंडासे से काट कर 8-10 दिन खेत में ही सूखने के लिए छोड़ दें. इस के बाद डंडों से पीट कर जमीन पर पटक कर दाने निकाल लेने चाहिए. बीज को 4-5 दिन धूप में सुखा कर साफ बोरों में भर कर रखें.





