Seed Treatment –

अंगरेजी में एक कहावत है कि ‘वैल बिगेन इज हाफ डन’ यानी किसी काम की अगर शुरुआत अच्छी हो तो समझें कि आधा काम निबट गया. यही बात खेती में भी लागू होती है. खेती की शुरुआत बीज से होती है. बीज अच्छी क्वालिटी का है और उसे सही ढंग से उपचारित किया गया है तो किसान की आधी टेंशन यहीं खत्म हो जाती है, क्योंकि अच्छे और उपचारित बीज से पैदावार तो अच्छी होगी ही साथ में कीट व बीमारी का खतरा भी काफी हद तक खत्म हो जाता है. कुछ किसान खुद ही अपना बीज तैयार करते हैं

बीज के लिए सब से अच्छे खेत की फसल को पहले से ही बचा कर रख लिया जाता है. इस खेत की फसल की अलग से कटाईगहाई कर बारीक दाने अलग कर रख दिए जाते हैं.

कंपनियों से खरीदा गया बीज बहुत महंगा होता है. छोटे किसान मुश्किल से खरीद पाते हैं. इस महंगे या कठिनाई से मिले बीज को खेत में बोने के पहले उस की सुरक्षा के इंतजाम करना भी खेतीकिसानी का एक अहम काम है. खेत में बोए जाने पर बीज को अंकुरित होने और उस के बाद पौधे बनने तक जमीन में मौजूद अनेक तरह के रोगाणुओं का सामना करना होता है.

मिट्टी में जाने पर सब से पहले बीज आसपास के मिट्टी के कणों से नमी ले कर फूलता है. नमी सोखने के साथ ही इस का आकार बढ़ कर इस में कई तरह के एंजाइम बनते हैं. ये एंजाइम बीज में जैव रासायनिक क्रियाएं करते हैं. जैव रासायनिक क्रियाओं से बीज और उस की ऊपरी परत नरम हो जाती है. इस नरम परत पर मिट्टी में मौजूद रोगाणुओं के हमले की संभावना रहती है. अगर तापमान और नमी भी इन रोगाणुओं की बढ़वार के अनुकूल हो तो इन का हमला हो कर बीज पर फफूंद, गलन, सूखा वगैरह बीमारी लग जाती हैं.

कई बर तो इन बीमारियों से छोटे पौधों की पूरी लाइन ही सूख जाती है. खाली जगह भरने के लिए फिर से बीज डाले जाते हैं तो वे भी फफूंदजनित बीमारी लग कर खत्म हो जाते हैं.

इन सब समस्याओं से बचने के लिए बीजों को बोने के पहले उन्हें उपचारित करना जरूरी होता है. तमाम तरह के रासायनिक फफूंदनाशक बाजार में हैं, इन में से कुछ की जानकारी यहां दी जा रही है:

थीरम :

इस का इस्तेमाल गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का, धान के बीजों के उपचार के लिए किया जाता है. तुवर, मूंग, उड़द, चना, मसूर, तिल, मूंगफली, अलसी, सब्जियों, फलों, फूल वगैरह के बीजों के उपचार के लिए ढाई ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से इस का इस्तेमाल किया जाता है.

यह एग्रोसान, सेरेसान वगैरह पारा वाले फफूंदनाशकों के समान असरदार है, लेकिन इनसान व पशुपक्षियों के लिए कम नुकसानदायक है.

वेपम :

इस में फफूंदनाशक के साथ ही सूत्रकृमि यानी निमेटोड को खत्म करने की कूवत भी है. इस का इस्तेमाल पपीते के पौधों में अंकुरण के समय लगने वाली बीमारी को रोकने लिए किया जाता है. निमेटोड की रोकथाम के लिए इसे मिट्टी उपचार में भी इस्तेमाल किया जाता है.

पेटाक्लोरोनाइट्रोबेंजीन :

यह ब्रासीकाल किंटोजोन, टेराक्लोर वगैरह नामों से मिलता है. इस से बीज या पौध की जड़ों को उपचारित किया जाता है.

केप्टान :

यह केप्टान डब्ल्यू-50 या केप्टान-75 डब्ल्यू वगैरह नामों से बाजार में मिलता है. इस का इस्तेमाल बीज व मिट्टी के उपचार के लिए किया जाता है.

विटावेक्स :

इस का इस्तेमाल बीज के अंदर पाई जाने वाली बीमारी जैसे गेहूं के मुक्त कंडुवा (लूज स्मट) से बचाव के लिए बीज उपचार के लिए किया जाता है. इस की ढाई ग्राम मात्रा एक किलोग्राम बीज के लिए काफी होती है.

प्लांटवेक्स :

इस का उपयोग गेरुआ (रस्ट) और कंडुवा (स्मट) बीमारी की रोकथाम के लिए किया जाता है.

बिनोमिल :

यह बाजार में बेनलेट नाम से मिलता है. इस का इस्तेमाल स्मट, भभूतिया, राइजोक्टोनिया, फ्यूजेरियम की रोकथाम के लिए बीज उपचार या मिट्टी उपचार के लिए किया जा सकता है.

कार्बंडाजिम :

यह बाबिस्टीन या डोरोसोल के नाम से बाजार में मिलता है. यह पौधों द्वारा ग्रहण कर के बीमारियों से अंदरूनी सुरक्षा प्रदान करता है. इस का इस्तेमाल बीज उपचार के अलावा पौधों पर छिड़काव के लिए भी किया जाता है.

थियोबेनडेजोल :

यह पौधों द्वारा ग्रहण कर के उन की बीमारियों से लड़ने की कूवत बढ़ाता है. इस का इस्तेमाल बीज उपचार, पौधों पर छिड़काव और मिट्टी उपचार में किया जाता है.

मेटलेक्सिल :

बाजार में यह रिडोमिल के नाम से मिलता है. इस की 6 ग्राम मात्रा प्रति एक किलोग्राम बीज के लिए लगती है. यह अंगूर की बेलों के मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) और सरसों के श्वेत किट्ट (व्हाइटरस्ट) की रोकथाम के लिए बहुत अच्छा है.    Seed Treatment

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...