Chickpea Farming-

दलहनी फसल की अच्छी किस्म लगाकर किसान अच्छा मुनाफा ले सकता है. खास कर चने की खेती से किसान कई तरह से मुनाफा ले सकता है. जब चने का पौधा छोटा होता है उस समय चने की पत्तियों को बाजार में बेचकर मुनाफा लिया जा सकता है. इस के बाद जब चने में दाने बनने लगते हैं तो उन्हें सब्जी के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. अंत में आप चने की खेती से अनाज की पैदावार भी ले सकते हैं.

चना एक परागित फसल है. इसलिए आनुवंशिक रूप से शुद्ध बीज लेने के लिए, आधार बीज के लिए अन्य खेतों से बीज फसल की दूरी 20 मीटर व प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए दूरी 10 मीटर होनी चाहिए.

पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करें फिर 2 जुताई टिलर या हल से कर के पाटा चला कर खेत समतल कर लें.

वैरायटी

समय से बोआई के लिए पूसा-256, सद्भावना, सूर्या, अवरोधी, करनाल चना-1, पंत जी-114, वल्लभ कल्लर चना-1 का इस्तेमाल करना चाहिए.

देर से बोआई के लिए उदय, पंत जी-186, पूसा-372 बहुत अच्छी वैरायटी हैं.

मिट्टी : चने की बीज फसल के लिए ऐसे खेत का चुनाव करें जिस में पिछले साल चने की फसल न ली गई हो. इस की खेती के लिए मटियार दोमट या दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान उदासीन यानी कम या ज्यादा न हो, अच्छी रहती है. खेत में पानी निकासी का अच्छा इंतजाम होना चाहिए.

बीज और उपचार : बीज फसल के लिए 60-80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज का इस्तेमाल करें. उकटा बीमारी से बचाव के लिए उपचार जरूरी है. ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर उपचारित करें. फिर बीज को राइजोबियम कल्चर व पीएसवी कल्चर से उपचारित करें. राइजोबियम और पीएसबी कल्चर के एकएक पैकेट 10 किलोग्राम बीज के लिए काफी होते हैं. दोनों कल्चर को गुड़ के साथ एक लीटर पानी में घोल लें और बीज को बाल्टी में ले कर कल्चर घोल अच्छी तरह से मिला दें ताकि सभी बीजों पर कल्चर लग जाए, इस के बाद बीज को छाया में सुखा लें.

बोआई : चने की बोआई अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े से नवंबर के पहले पखवाड़े में लाइन में करनी चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी 45-60 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. उकटा से बचाव के लिए प्लास्टर से उढ़ी हुई मेंड़ों पर बोआई करना सही होता है.

उर्वरक : चना एक दलहनी फसल है, इसे नाइट्रोजन की कम जरूरत होती है. चने की बीज फसल के लिए 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटेशियम व 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर देना चाहिए.

सिंचाई : पहली सिंचाई जरूरत के मुताबिक बोआई के 45-60 दिन बाद (फूल आने के पहले) और दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करनी चाहिए. फूल आते समय सिंचाई करना नुकसानदायक होता है. अगर बरसात अधिक हो जाए तो पानी निकास का इंतजाम करना चाहिए.

खरपतवार : बोआई के 25-30 दिन बाद एक निराईगुड़ाई कर दें. दूसरी निराई, पहली सिंचाई के बाद करें. खरपतवार रोकथाम के लिए 3.3 लीटर पेंडीमिथेलिन 30 ईसी प्रति हेक्टेयर की दर से 800 लीटर पानी में घोल बना कर बोआई के 72 घंटे के अंदर इस्तेमाल करें.

फसल सुरक्षा : फसल को बीमारी व कीटों से इस तरह बचाएं:

उकठा : इस बीमारी की रोकथाम के लिए लंबा फसल चक्र अपनाना चाहिए, जिस में 3-4 साल बाद चना बोना चाहिए. उकठा के कंट्रोल के लिए बीमारी सहन करने वाली वैरायटी का चुनाव और बीज उपचार जरूर करें. मिट्टी उपचार के लिए ढाई किलोग्राम ट्राइकोडर्मा और सौ किलोग्राम गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल बोआई से पहले करना चाहिए.

झुलसा : इस की रोकथाम के लिए जीरम 27 फीसदी की साढ़े 3 लीटर मात्रा का फूल आने से पहले एक छिड़काव और 10 दिन बाद दूसरा छिड़काव करना चाहिए.

कटुआ कीट : कटुआ की रोकथाम के लिए बोआई से पहले खेत में क्लोरोपाइरीफास ढाई लीटर या सेवीडाल दानेदार को 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाना चाहिए.

सेमीलूपर व फली छेदक : सेमीलूपर कीट व फली छेदक की रोकथाम के लिए फली बनना शुरू होते ही क्यूनालफास 25 ईसी डेढ़ लीटर रसायन को प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें. दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 15 दिन बाद प्रोफेनोफास 50 ईसी 2 लीटर या साइपरमेथ्रीन 10 ईसी 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से करें.

कटाई व गहाई : जब फलियां पीली पड़ जाएं व दाने कठोर हो जाएं तो फसल को काट कर एक हफ्ते के लिए खेत में ही सूखने दें. इस के बाद डंडों से पीट कर, बैलों को दाएं चला कर या थ्रेसर से गहाई कर के बीज निकला लिया जाता है.

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